09 Dec भारत की जैव-अर्थव्यवस्था ( Bio-economy of India )
पाठ्यक्रम – जीएस – 3 : विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ एवं नीतिगत हस्तक्षेप
परिचय

भारत की जैव-अर्थव्यवस्था (Bioeconomy) एक उभरता हुआ क्षेत्र है जो जैव-प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स, जैव-विनिर्माण और जैव-ऊर्जा जैसे तत्वों पर आधारित है। यह अर्थव्यवस्था जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करके चक्रीय जैव-संसाधनों को एकीकृत करती है, जो सतत विकास और नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्यों के अनुरूप है। वर्ष 2014 में मात्र 10 बिलियन डॉलर से शुरू होकर 2024 में यह 165.7 बिलियन डॉलर तक पहुँच गई है, तथा 2030 तक 300 बिलियन डॉलर और 2047 तक 1.2 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य रखा गया है। यह क्षेत्र भारत को वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी महाशक्ति बनाने की क्षमता रखता है, लेकिन संरचनात्मक चुनौतियों के कारण नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं।
प्रमुख उपलब्धियाँ :
भारत ने जैव-अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय प्रगति की है, जो नीतिगत पहलों, अनुसंधान और नवाचार से संचालित है:
- घातीय विस्तार: जैव-अर्थव्यवस्था का आकार 2014 के 10 बिलियन डॉलर से 2024 में 165.7 बिलियन डॉलर हो गया है। यह वैश्विक औसत से तेज गति से बढ़ रही है, जिसमें जैव-फार्मा, जैव-ऊर्जा और जैव-कृषि का योगदान प्रमुख है।
- रणनीतिक नीति ढाँचा – BioE3 नीति: कैबिनेट द्वारा अनुमोदित यह नीति उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण पर केंद्रित है। यह बायो-फाउंड्रीज और बायो-एआई हब स्थापित करके रासायनिक प्रक्रियाओं को जैविक प्रक्रियाओं से प्रतिस्थापित करती है। छह विषयगत क्षेत्रों (जैसे स्मार्ट प्रोटीन, परिशुद्ध चिकित्सा) को लक्षित करके यह नेट-जीरो 2070 लक्ष्यों का समर्थन करती है।
- जीनोमिक सॉवरेनिटी: जीनोम इंडिया परियोजना के तहत 10,000 व्यक्तियों का जीनोम अनुक्रमण पूरा किया गया, जिससे यूरो-केंद्रित पूर्वाग्रहों को दूर करके भारत-विशिष्ट प्रिसिजन मेडिसिन विकसित हुई।
- वैश्विक बायोफार्मा नेतृत्व: भारत विश्व की फार्मेसी के रूप में उभरा है। साइटिवा इंडेक्स-2025 में शीर्ष 10 में शामिल, तथा सीरम इंस्टीट्यूट विश्व का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता है (1.5 बिलियन से अधिक खुराक)। बायोसिमिलर और उच्च-मूल्य दवाओं में प्रगति से आयात निर्भरता कम हुई।
- जैव-ऊर्जा एकीकरण: 2025 में E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य हासिल किया गया, जिससे ₹1.44 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बचत और 244 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का प्रतिस्थापन हुआ। कृषि अपशिष्ट का उपयोग किसानों की आय बढ़ा रहा है।
- स्टार्टअप इकोसिस्टम: बायोटेक स्टार्टअप्स 2014 के 50 से 2025 में 9,000 हो गए। BIRAC के समर्थन से 12 जैव-प्रौद्योगिकी पार्क और 95 इनक्यूबेटर स्थापित।
- कृषि जैव-प्रौद्योगिकी: GM सरसों संकर DMH-11 से पैदावार में 25-30% वृद्धि की संभावना, जो जलवायु-सहिष्णु फसलों की दिशा में कदम है।
ये उपलब्धियाँ भारत को वैश्विक नवाचार केंद्र बनाने में सहायक हैं।
संरचनात्मक चुनौतियाँ
जैव-अर्थव्यवस्था के विकास में कई बाधाएँ हैं:
- कम अनुसंधान निवेश: GERD GDP का मात्र 0.64-0.7% है (वैश्विक औसत 1.8%)। निजी क्षेत्र की अनिच्छा से सरकारी अनुदान पर निर्भरता बढ़ी।
- विनियामक गतिरोध: GM फसलों (जैसे DMH-11) पर न्यायिक देरी से निवेश रुका। Bt कपास ही एकमात्र व्यावसायिक GM फसल है।
- आपूर्ति शृंखला निर्भरता: चिकित्सा उपकरणों का 70-80% और API का 70% आयात, मुख्यतः चीन से।
- वित्तपोषण में वैली ऑफ डेथ: स्टार्टअप्स को व्यावसायीकरण चरण में पूँजी की कमी, जिससे IP विदेशों में बिकती है।
- अवसंरचना अभाव: जैव-निर्माण सुविधाओं की कमी से स्केल-अप कठिन। वैश्विक मेडटेक बाजार में भारत का हिस्सा मात्र 1.5%।
- नवाचार-व्यावसायीकरण विसंगति: अधिक शोध-पत्र लेकिन कम पेटेंट। वैश्विक नवाचार सूचकांक में 39वें स्थान पर, लेकिन IP सृजन में पीछे।
- प्रतिभा असंतुलन: स्नातकों में उभरते क्षेत्रों (जैसे AI-संचालित औषधि) में कौशल की कमी। ये चुनौतियाँ सतत विकास को बाधित करती हैं।
सतत एवं समावेशी विकास हेतु नीतिगत हस्तक्षेप
सतत जैव-अर्थव्यवस्था के लिए निम्नलिखित हस्तक्षेप आवश्यक हैं:
- बायो-फाउंड्रीज का नेटवर्क: प्लग-एंड-प्ले सुविधाएँ स्थापित करके स्केल-अप को आसान बनाना, जो स्टार्टअप्स के लिए सुलभ हों।
- विनियामक सैंडबॉक्स: सिंथेटिक जीव-विज्ञान के लिए सुविधाजनक ढाँचा, जो समय-सीमा कम करे और FDI आकर्षित करे।
- बायोटेक इनोवेशन बोर्ड: स्टॉक एक्सचेंज पर विशेष बोर्ड, जो IP-आधारित सूचीबद्धता की अनुमति दे।
- कौशल विकास: पाठ्यक्रम में बायो-एआई एकीकरण अनिवार्य, ताकि हाइब्रिड कार्यबल तैयार हो।
- घरेलू उत्पादन प्रोत्साहन: PLI योजनाओं को KSM और बायोरिएक्टर तक विस्तारित करके आयात कम करना।
- प्रौद्योगिकी अंतरण कार्यालय (TTO): विश्वविद्यालयों में स्थापित करके शोध को उत्पादों में बदलना।
- जीनोमिक डेटा सॉवरेनिटी: IBDC को वैश्विक साझेदारी मंच बनाकर प्रिसिजन मेडिसिन को बढ़ावा।
ये हस्तक्षेप समावेशी विकास सुनिश्चित करेंगे, जिसमें किसान, स्टार्टअप्स और छोटे उद्यम शामिल हों।
निष्कर्ष :
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था उपलब्धियों से समृद्ध है, लेकिन चुनौतियाँ इसे सीमित कर रही हैं। साहसिक नीतिगत सुधारों से यह क्षेत्र सतत, समावेशी और वैश्विक नेतृत्व वाला बन सकता है। BioE3 जैसे ढाँचे को मजबूत करके भारत 2047 तक 1.2 ट्रिलियन डॉलर की महाशक्ति बन सकता है, जो आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करेगा।
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