भारत की पर्यावरणीय शासन-व्यवस्था

भारत की पर्यावरणीय शासन-व्यवस्था

पाठ्यक्रम : सामान्य अध्ययन-III :  पर्यावरण  प्रदूषण संरक्षणऔर  गिरावट  

परिचय : 

भारत की विकास यात्रा आर्थिक वृद्धि, अवसंरचना विस्तार और औद्योगिक उत्पादन पर आधारित रही है। किंतु इसके समानांतर, पर्यावरणीय शासन-तंत्र में नीतिगत कमजोरियाँ, संस्थागत विफलताएँ और विनियामक ढील ने पारिस्थितिक असंतुलन को तीव्र किया है। बदलते जलवायु जोखिम, हिमनद झील फटने की घटनाएँ, विषाक्त वायु प्रदूषण, जल-अभाव, जैवविविधता ह्रास और विरासत अपशिष्ट—ये सभी संकेत हैं कि भारत को एक निर्णायक नीतिगत सुधार की आवश्यकता है। 

1. भारत के पर्यावरणीय विनियमन-तंत्र की प्रमुख कमियाँ 

(1) नीतिगत शिथिलता और नियमों का कमजोर प्रवर्तन 
कई प्रकार के पर्यावरणीय अनापत्ति प्रमाण (EC/FC) पोस्ट-फैक्टो तरीके से जारी किए जाते हैं, जिससे जवाबदेही घटती है।
वन संरक्षण अधिनियम में संशोधनों से सुरक्षा कवच कमजोर हुआ और वनों को विकास परियोजनाओं हेतु अधिक आसानी से उपलब्ध कराया गया।
खनन जैसे क्षेत्रों में मानकों का उल्लंघन, अरावली पर्वतमाला का क्षरण इसका उदाहरण है।

(2) संस्थागत क्षमता और वित्तीय कमी
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB/SPCBs) तकनीकी और मानव संसाधन की गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं।
पर्यावरण मंत्रालय का कुल बजट, जलवायु जोखिम के अनुपात में अत्यंत कम है।

(3) पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (EIA) की खामियाँ
EIA रिपोर्टों में डेटा-हेरफेर, कॉपी-पेस्ट और कम वैज्ञानिक गुणवत्ता अक्सर उजागर होती है।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी सीमित है, जिससे लोकतांत्रिक पर्यावरण शासन कमजोर होता है।

(4) शहरों में पारिस्थितिक ढाँचों की अनदेखी
शहरी मास्टर प्लान कंक्रीटीकरण पर आधारित रहते हैं, “स्पंज सिटी”, ब्लू-ग्रीन नेटवर्क, पारगम्य सतहों को प्राथमिकता नहीं दी जाती।
परिणामस्वरूप बाढ़, शहरी गर्मी द्वीप प्रभाव और जल पुनर्भरण में कमी बढ़ती है।

(5) जल और वायु प्रदूषण प्रबंधन में संरचनात्मक समस्याएँ
उत्तरी भारत में ‘बाउल इफेक्ट’ के कारण वायु प्रदूषण दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट बन गया है, परंतु उत्सर्जन नियंत्रण को वैज्ञानिक आधार पर लागू नहीं किया जाता। भूजल दोहन पुनर्भरण से कहीं अधिक है, और राज्यों में जल शासन खंडित तथा असमन्वित है।

(6) ‘हरित बनाम हरित’ संघर्ष
नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ (सौर पार्क, ट्रांसमिशन लाइनों) जैवविविधता हानि का कारण बन रही हैं।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) का तेजी से घटता आवास इसका प्रमुख उदाहरण है।

(7) अपशिष्ट प्रबंधन की प्रणालीगत विफलता
देश में प्रतिदिन 1.5 लाख टन MSW उत्पन्न होता है, परंतु 30% से कम का वैज्ञानिक निपटान होता है।
माइक्रोप्लास्टिक और विरासत अपशिष्ट सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा रहे हैं।

2. पर्यावरणीय शासन को सुदृढ़ करने के लिये उपयुक्त उपाय

(1) नीतिगत एवं नियामक सुधार
EIA ढाँचे को डेटा-सुदृढ़, पारदर्शी और वास्तविक जन-सहभागी बनाया जाए।
पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में पूर्व-आकलन, पर्यावरणीय लेखा और कठोर ऑडिट अनिवार्य हों।
‘ग्रीन टैक्सोनॉमी’ लागू कर यह स्पष्ट किया जाए कि कौन सी परियोजना वास्तव में पर्यावरण-सकारात्मक है।
(2) संस्थागत क्षमता निर्माण
CPCB/SPCBs को आधुनिक तकनीक, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, GIS-आधारित निरीक्षण से सशक्त किया जाए।
पर्यावरण जांच एजेंसियों में विशेषज्ञता बढ़ाने हेतु पर्यावरण कैडर का गठन किया जाए।
(3) शहरी जलवायु समुत्थानशीलता
मास्टर प्लान में स्पंज सिटी मॉडल, ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर, शहरी वन, नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस (NbS) को अनिवार्य करें।
वर्षा जल संचयन, आर्द्रभूमि पुनर्स्थापन और छत-हरियाली को नीति समर्थन दिया जाए।
(4) जल शासकीय सुधार
भूजल निष्कर्षण पर “असली” पानी की कीमत और कृषि सब्सिडी सुधार।
जलभृत पुनर्भरण को स्थानीय निकायों के प्रदर्शन संकेतक (KPIs) में शामिल किया जाए।
नदी बेसिन-आधारित जल प्रबंधन लागू किया जाए।
(5) स्वच्छ ऊर्जा व जैव-अर्थव्यवस्था का विस्तार
विकेन्द्रीकृत माइक्रो-ग्रिड, रूफटॉप सोलर और समुदाय आधारित ऊर्जा प्रणालियों को बढ़ावा।
कृषि में चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था—पराली से CBG, जैवखाद—को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जाए।
(6) जैवविविधता और प्राकृतिक पूँजी का संरक्षण
‘नो-गो’ इकोलॉजिकल ज़ोन्स का वैज्ञानिक निर्धारण कर विकास गतिविधियों को सीमित किया जाए।
तटीय क्षेत्र प्रबंधन में लिविंग शोरलाइन्स, मैंग्रोव बहाली, प्रवाल-पुनर्जीवन को प्राथमिकता दी जाए।
(7) जलवायु-समुत्थानशील अवसंरचना
सभी बड़ी परियोजनाओं के लिये अनिवार्य जलवायु जोखिम आकलन (CRA)।
50-वर्षीय बाढ़ रेखा, गर्म रातों और ताप तनाव को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन मानक विकसित हों।
(8) अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार
डिजिटल विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) को कड़ाई से लागू किया जाए।
शहरी खनन (Urban Mining) को प्रोत्साहन देकर लिथियम, कोबाल्ट जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों की घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

निष्कर्ष : 

  • भारत को आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के झूठे द्वंद्व से आगे बढ़कर समन्वित, विज्ञान-आधारित और संस्थागत रूप से सुदृढ़ पर्यावरणीय शासन अपनाने की आवश्यकता है।
  • मजबूत विनियमन, समुदाय-आधारित संरक्षण, चक्रीय अर्थव्यवस्था, जलवायु-समुत्थानशील अवसंरचना तथा जैव विविधता-सुरक्षा की दिशा में ठोस कदम भारत को उपभोग-प्रधान मॉडल से पुनर्योजी एवं सतत विकास मॉडल की ओर ले जा सकते हैं।
  • यह न केवल SDG लक्ष्यों (6, 7, 11, 13, 14, 15) को बढ़ावा देगा, बल्कि भारत को 21वीं सदी के जलवायु संकटों के प्रति अधिक तैयार, सक्षम और प्रतिस्पर्धी भी बनाएगा।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. भारत में साइबर सुरक्षा घटनाओं पर रिपोर्ट करना निम्नलिखित में से किसके/किनके लिये विधितः अधिदेशात्मक है? (2017)
1. सेवा प्रदाता
2. डेटा सेंटर
3. कॉर्पोरेट निकाय
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. भारत की पर्यावरणीय शासन-व्यवस्था आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और पारिस्थितिक संधारणीयता सुनिश्चित करने की समानांतर चुनौती का सामना कर रही है। भारत के पर्यावरणीय विनियमन-तंत्र में मौजूद प्रमुख कमियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये तथा सतत विकास के लिये पर्यावरणीय शासन को सुदृढ़ करने हेतु उपयुक्त उपाय सुझाइये।               ( शब्द सीमा – 250, अंक – 15 )

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