भारत की बहु-संरेखित विदेश नीति (India’s multi-aligned foreign policy)

भारत की बहु-संरेखित विदेश नीति (India’s multi-aligned foreign policy)

भारत की बहु-संरेखित विदेश नीति : मुख्य स्तंभ, चुनौतियाँ एवं सुदृढ़ीकरण के उपाय

पाठ्यक्रम :  GS 2 –  अंतर्राष्ट्रीय संबंध

परिचय : 

वैश्विक अनिश्चितताओं के युग में, भारत की बहु-पक्षीयता (Multi-Alignment) की रणनीति रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का एक संतुलित प्रदर्शन है। यह नीति गुटीय राजनीति से परे जाकर, विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संबंधों को संतुलित करती है, जिससे भारत अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे सके। हाल के वर्षों में, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत-रूस संबंधों की मजबूती इस दृष्टिकोण का प्रमाण है। यह लेख भारत की बहु-संरेखित विदेश नीति के मुख्य स्तंभों, इसके समक्ष आने वाली चुनौतियों तथा इसे सुदृढ़ करने के उपायों पर चर्चा करता है।

मुख्य स्तंभ : 

भारत की बहु-पक्षीयता की नीति कई प्रमुख स्तंभों पर आधारित है, जो वैश्विक मामलों में इसकी स्वतंत्रता और लचीलापन सुनिश्चित करते हैं:

रणनीतिक स्वायत्तता और आक्रामक हेजिंग: भारत कठोर गुटों के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। यह अमेरिका और रूस जैसी प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के साथ संतुलन बनाता है। उदाहरणस्वरूप, 2024 में भारत ने रूस से 40% कच्चा तेल आयात किया, जबकि iCET (Initiative on Critical and Emerging Technology) और आर्टेमिस एकॉर्ड्स के माध्यम से अमेरिका के साथ प्रौद्योगिकी सहयोग मजबूत किया। इससे ऊर्जा सुरक्षा और उन्नत तकनीक दोनों प्राप्त होते हैं।
ग्लोबल साउथ का समर्थन: भारत खुद को विकासशील विश्व के सेतु के रूप में स्थापित करता है। यह ऋण, खाद्य सुरक्षा और जलवायु वित्त पर चिंताओं का समर्थन करता है। 2024 में तीसरे वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट की मेजबानी और G20 अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाना इसके उदाहरण हैं। इससे भारत नियम-निर्माता की भूमिका ग्रहण करता है।
भू-आर्थिक जोखिम-मुक्ति एवं समुत्थानशीलता: वैश्विक विखंडन के खिलाफ, भारत मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के माध्यम से लचीली आपूर्ति शृंखलाएँ विकसित करता है। EFTA (European Free Trade Association) के साथ 100 बिलियन डॉलर का FTA और IMEC (India-Middle East-Europe Corridor) इसके उदाहरण हैं, जो उच्च तकनीक निवेश आकर्षित करते हैं।
आत्मनिर्भरता के माध्यम से एकीकृत निवारण: मेक इन इंडिया के तहत, भारत घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करता है। 2024-25 में रक्षा निर्यात 23,622 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलें प्रदान करना इसका प्रमाण है, जो रक्षा निर्भरता कम करता है।
ऊर्जा-यथार्थवाद तथा हरित संक्रमण: भारत ऊर्जा सुरक्षा को संप्रभु अधिकार मानता है। कतर से 2048 तक LNG आयात का समझौता और LiFE (Lifestyle for Environment) मिशन इसके उदाहरण हैं, जो जीवाश्म ईंधन और हरित संक्रमण के बीच संतुलन बनाते हैं।
डिजिटल कूटनीति और तकनीकी-संप्रभुता: भारत DPI (Digital Public Infrastructure) को सॉफ्ट पावर के रूप में उपयोग करता है। UPI को UAE और नेपाल से जोड़ना तथा इंडिया स्टैक साझेदारी इसके उदाहरण हैं।
लघुपक्षवाद और मुद्दा-आधारित गठबंधन: भारत क्वाड और I2U2 जैसे छोटे समूहों का उपयोग करता है। 2024 में खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) में शामिल होना और क्वाड का विस्तार इसके प्रमाण हैं। ये स्तंभ भारत को वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने में सक्षम बनाते हैं।

बहुपक्षवाद बनाम लघुपक्षवाद: एक रणनीतिक तुलना 

मानदंड

बहुपक्षवाद

लघुपक्षवाद

मूल सिद्धांत 

सार्वभौमिक वैधता – व्यापक भागीदारी तथा वैश्विक सहमति के माध्यम से उन मानकों को निर्मित करना जिनकी विश्व-स्तर पर स्वीकृति हो।

सामरिक दक्षता – समान हितों वाले, सक्षम तथा सीमित समूहों के माध्यम से तीव्र परिणाम प्राप्त करना।

सदस्यता संरचना

वृहद तथा समावेशी – प्रायः लगभग सार्वभौमिक (जैसे: संयुक्त राष्ट्र के सदस्य); क्षमता या सामरिक अभिविन्यास की परवाह किये बिना सभी राज्यों के लिये खुला। 

लघु एवं विशिष्ट – साझा हितों और पूरक शक्तियों वाले कुछ चुनिंदा देशों (आमतौर पर 3-5) तक सीमित।

निर्णय लेना

सर्वसम्मति-प्रधान तथा धीमा  – विविध हितों और वीटो-शक्ति के कारण निर्णय-अवरोध संभावित (जैसे: UNSC)।

तीव्र और लचीला – सदस्य समान सामरिक लक्ष्यों को साझा करते हैं, इसलिये निर्णय त्वरित और क्रियाभिमुख।

क्षेत्र और फोकस

व्यापक एवं मानक-निर्धारण – औपचारिक संधियों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार और वैश्विक व्यापार जैसे बड़े वैश्विक मुद्दों का हल करता है।

संकीर्ण एवं कार्य-उन्मुख – समुद्री सुरक्षा, तकनीकी सहयोग या आपूर्ति शृंखला जैसी विशिष्ट चुनौतियों को लक्षित करता है।

संस्थागत रूप

औपचारिक एवं प्रशासनिक – बड़े सचिवालयों, चार्टरों और संरचित प्रक्रियाओं (जैसे: WTO, WHO) द्वारा समर्थित।

अनौपचारिक एवं अनुकूलनीय – आमतौर पर स्थायी सचिवालय के बिना; शिखर सम्मेलनों और कार्य समूहों (जैसे: I2U2, AUKUS) के माध्यम से संचालन करता है।

प्राथमिक सीमा

प्रासंगिकता का संकट – निर्णय में प्रायः विलंब, प्रक्रियागत जटिलता और महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के कारण अप्रभावी।

वैधता का संकट – विशिष्टता के आरोप तथा सार्वभौमिक बहुपक्षीय मानकों को दरकिनार करने की आलोचना।

प्रमुख उदाहरण

संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, WHO

क्वाड, BRICS, I2U2.

चुनौतियाँ : 

बहु-पक्षीयता की नीति कई चुनौतियों का सामना कर रही है:

अमेरिकी ट्रांज़ैक्शनलिज़्म से दबाव: अमेरिका के लेन-देन संबंधी दृष्टिकोण से भारत की स्वायत्तता प्रभावित होती है। S-400 समझौते पर CAATSA प्रतिबंधों की आशंका और 2025 में 50% टैरिफ इसका उदाहरण है।
रूस धुरी से घटते लाभ: प्रतिबंधों से रक्षा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। 2025 में रूसी तेल आयात घटकर 600,000 बैरल प्रति दिन रह गया, और RuPay-Mir भुगतान लिंक अभी चालू नहीं है।
चीन नॉर्मलाइज़ेशन का जाल: 2024 के सीमा समझौते के बावजूद, विश्वास की कमी है। चीन से आयात 74% बढ़ा, जबकि निर्यात 33% गिरा। तिब्बत में 600+ सीमा बस्तियाँ खतरा बढ़ाती हैं।
पड़ोसी देशों में डिलिवरी डेफिसिट: नेबरहूड फर्स्ट नीति में विलंब, जैसे अखौरा-अगरतला रेल लिंक, भारत विरोधी भावना बढ़ाते हैं। बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता इसका उदाहरण है।
FTA साझेदारों के साथ व्यापार घाटा: FTA से आयात बढ़ रहा है। 2025 की दूसरी तिमाही में घाटा 23% बढ़कर 26.7 बिलियन डॉलर हुआ। UAE से आयात 70.37% बढ़ा।
ग्लोबल साउथ में संसाधन विषमता: चीन की निवेश कूटनीति (जैसे 2024 FOCAC में 50.7 बिलियन डॉलर) भारत की सीमित क्षमता को चुनौती देती है।

ये चुनौतियाँ भारत की नीति को परीक्षण की स्थिति में डालती हैं।

सुदृढ़ीकरण के उपाय : 

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच, भारत निम्नलिखित उपाय अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है:

G4 एकजुटता के माध्यम से बहुपक्षवाद सुधार: G4 और L.69 समूह के साथ UNSC सुधार के लिए पाठ-आधारित वार्ता शुरू करें, जो अंतरिम मॉडल प्रस्तावित करे।
DPI कूटनीति का विस्तार: DPI को ग्लोबल साउथ में निर्यात करें और ग्लोबल DPI रिपोज़िटरी स्थापित करें, जो तकनीकी संप्रभुता बढ़ाए।
ग्लोबल साउथ सचिवालय की स्थापना: नई दिल्ली में स्थायी सचिवालय बनाएं, जो नीति पत्र तैयार करे।
महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति में एकीकरण: MSP जैसे साझेदारियों में मूल्य-संवर्द्धन पर ध्यान दें, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के साथ सह-विकास करें।
रक्षा निर्यात के माध्यम से SAGAR का संचालन: तेजस और ब्रह्मोस निर्यात बढ़ाएं, ऋण उपलब्ध कराकर सुरक्षा संरचना बनाएं।
AI गवर्नेंस में मानदंड-निर्माण: GPAI में सक्रिय रहें और 2026 इम्पैक्ट AI शिखर में फ्रेमवर्क विकसित करें।
प्रवासी समुदाय का लाभ: प्रवासी को लॉबिंग के लिए उपयोग करें, अनुकूल नीतियों के लिए समितियाँ बनाएं।
ये उपाय भारत को वैश्विक सेतु के रूप में स्थापित करेंगे।

निष्कर्ष :

भारत की बहु-संरेखित विदेश नीति वैश्विक गुटों के बीच स्वतंत्रता का प्रतीक है। मुख्य स्तंभों के माध्यम से यह अवसर पैदा करती है, लेकिन चुनौतियाँ इसे परीक्षण करती हैं। उपायों के माध्यम से सुदृढ़ीकरण से भारत नई वैश्विक व्यवस्था में नियम-निर्माता बन सकता है। जैसा कि कहा जाता है, “राष्ट्र तब उभरते हैं जब वे पक्ष चुनकर नहीं, बल्कि स्पष्टता और साहस के साथ अपना मार्ग चुनकर आगे बढ़ते हैं।” यह दृष्टिकोण भारत को वैश्विक संतुलनकारी शक्ति बनाएगा।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2016)
1. न्यू डेवलपर्मेंट बैंक की स्थापना ए.पी.ई.सी. (APEC) द्वारा की गई है।
2. न्यू डेवलपमेंट बैंक का मुख्यालय शंघाई में है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (b)

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. “पूर्व और पश्चिम के बीच नाजुक असंतुलन और यू.एस.ए. बनाम रूस-चीनी गठबंधन के बीच उलझन के कारण संयुक्त राष्ट्र में सुधार प्रक्रिया अभी भी अनसुलझी है।” इस संबंध में पूर्व-पश्चिम नीति टकरावों की जाँच और समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। (2025)

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