24 Jan भारत के विद्युत क्षेत्र की प्रमुख उपलब्धियाँ 2025
भारत के विद्युत क्षेत्र की प्रमुख उपलब्धियाँ 2025
सामान्य अध्ययन-III : पर्यावरण और पारिस्थितिकी नवीकरणीय ऊर्जा, खनिज और ऊर्जा संसाधन संसाधनों का संरक्षणआधारिक संरचना
चर्चा में क्यों?
वर्ष 2025 विद्युत मंत्रालय के लिये एक ऐतिहासिक अवधि सिद्ध हुआ, क्योंकि भारत के विद्युत क्षेत्र ने रिकॉर्ड उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, जिससे सतत विकास और ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ आधार मिला।
वर्ष 2025 में विद्युत मंत्रालय की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या रहीं?

रिकॉर्ड आपूर्ति और विश्वसनीयता: वित्त वर्ष 2025-26 में 242.49 गीगावॉट की अब तक की सर्वाधिक विद्युत मांग को सफलतापूर्वक पूरा किया गया, जिससे राष्ट्रीय ऊर्जा कमी वर्ष 2013-14 के 4.2% से घटकर मात्र 0.03% रह गई। साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में विद्युत उपलब्धता क्रमशः 22.6 घंटे और 23.4 घंटे तक बढ़ा दी गई।
भारत का विद्युत क्षेत्र वर्ष 2032 तक लगभग 450 अरब अमेरिकी डॉलर के अनुमानित निवेश के साथ तीव्र वृद्धि के लिये तैयार है।
विशाल क्षमता विस्तार: कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता नवंबर 2025 तक बढ़कर लगभग 509 गीगावॉट हो गई, जो वर्ष 2014 के बाद से 104.4% की वृद्धि दर्शाती है। वर्ष 2025 में ही 55.57 गीगावॉट क्षमता जोड़ी गई।
वर्ष 2014 के बाद से नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में कुल 178 गीगावॉट की वृद्धि हुई है, जिसमें 130 गीगावॉट सौर ऊर्जा और 33 गीगावॉट पवन ऊर्जा शामिल हैं।
थर्मल एवं कोयला सुरक्षा : वित्त वर्ष 2025-26 में 13.32 गीगावॉट नई कोयला आधारित क्षमता आवंटित की गई, जिससे कुल क्षमता 226.23 गीगावॉट हो गई। कोयले का भंडार 51.7 मीट्रिक टन (MT) के दृढ़ स्तर पर बनाए रखा गया, जिसे कोयला आवंटन और ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये संशोधित SHAKTI नीति 2025 से समर्थन मिला।
भंडारण और पारेषण को बढ़ावा: वर्ष 2031-32 तक 57 गीगावॉट पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं (PSP) और व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) योजनाओं के तहत 43,220 मेगावाट-घंटा (MWh) बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) के लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं।
राष्ट्रीय विद्युत योजना (2023-32) का लक्ष्य वर्ष 2032 तक पारेषण नेटवर्क को बढ़ाकर 6.48 लाख सर्किट किलोमीटर (ckm) करना है और वर्ष 2025 में 25.8 गीगावॉट के RE-लिंक्ड इंटर स्टेट ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स को स्वीकृति दी गई है।
वर्तमान में, भारत का राष्ट्रीय विद्युत पारेषण नेटवर्क लगभग 5 लाख सर्किट किलोमीटर (ckm) है।
वितरण सुधार और उपभोक्ता केंद्रित पहल: नवीनीकृत वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) के तहत 19.79 करोड़ पूर्व-भुगतान स्मार्ट मीटर मंज़ूर किये गए, जिससे AT&C (त्रुटि एवं चोरी) नुकसान 16.16% तक कम हुआ तथा औसत आपूर्ति लागत (ACS) और औसत राजस्व प्राप्ति (ARR) का अंतर ₹0.11/किलोवाट-घंटा तक घट गया।
इसके अलावा इसने पीएम-जनमन और DA-JGUA (धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान) पहल के तहत 13.65 लाख घरों को बिजली कनेक्शन प्रदान किये।
ऊर्जा दक्षता और कार्बन बाज़ार की शुरुआत: अनुपालन के लिये कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) शुरू की गई, जो एल्युमिनियम, सीमेंट आदि क्षेत्रों को कवर करती है और ऑफसेट तंत्र प्रदान करती है। स्टैंडर्ड्स और लेबलिंग कार्यक्रम को 41 उपकरणों तक विस्तारित किया गया और MSME ऊर्जा दक्षता के लिये ADEETIE (औद्योगिक और प्रतिष्ठानों में ऊर्जा दक्ष तकनीक को लागू करने में सहायता) योजना शुरू की गई।
महत्त्वपूर्ण नियामक सुधार: लेट पेमेंट सरचार्ज नियम, 2022 ने डिस्कॉम्स के पुराने बकाया को ₹1,39,947 करोड़ से घटाकर ₹8,005 करोड़ कर दिया। बिजली (संशोधन) नियम, 2025 ने उपभोक्ता-स्वामित्व वाली ऊर्जा भंडारण की अनुमति दी।
जलवायु प्रतिबद्धता पूरी हुई: लगभग पाँच वर्ष पहले ही राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान (NDCs) का लक्ष्य हासिल कर लिया गया, जिसमें गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता का संचयी हिस्सा वर्ष 2014 में 32% से बढ़कर अक्तूबर 2025 तक 51% हो गया।

कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS)
परिचय: CCTS एक महत्त्वपूर्ण नीति बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो भारत को केवल ऊर्जा दक्षता पर केंद्रित तंत्र से एक व्यापक बाज़ार-आधारित प्रणाली की ओर ले जाता है, जिसका उद्देश्य सीधे ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को मूल्यित और घटाकर इसके महत्त्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्यों को पूरा करना है।
मुख्य उद्देश्य: CCTS एक बाज़ार-आधारित तंत्र है, जिसे भारतीय अर्थव्यवस्था को कार्बन मुक्त बनाने के लिये ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन का मूल्य निर्धारण करने और राष्ट्रीय कार्बन ट्रेडिंग प्रणाली को सुगम बनाने हेतु डिज़ाइन किया गया है।
PAT से विकास: यह प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार (PAT) योजना (जो ऊर्जा बचत प्रमाण-पत्रों (ESCerts) के माध्यम से ऊर्जा दक्षता पर केंद्रित थी) से विकसित होकर प्रति टन उत्पादन ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन की तीव्रता को कम करने पर केंद्रित हो गया है।
मुख्य उपकरण: यह कार्बन क्रेडिट प्रमाण-पत्र (CCC) जारी करता है, जिसमें से प्रत्येक प्रमाण-पत्र एक टन CO2 समतुल्य (tCO2e) की कमी का प्रतिनिधित्व करता है।
दोहरी प्रणाली: इसके माध्यम से कार्य करता है:
अनुपालन तंत्र: ऊर्जा-गहन उद्योगों (जैसे- एल्युमिनियम, सीमेंट, उर्वरक, लोहा और स्टील) को उनके-विशेष GHG उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य पूरा करने के लिये बाध्य करता है।
ऑफसेट तंत्र: अनुपालन ढाँचे के बाहर की संस्थाओं को स्वैच्छिक रूप से भाग लेने और क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति देता है।
क्षेत्रीय कवरेज: शुरुआत में उन क्षेत्रों को लक्षित किया गया है जो भारत के कुल उत्सर्जन (जैसे- लोहा और स्टील, एल्युमिनियम आदि) का 16% योगदान देते हैं। बाद में विद्युत क्षेत्र (जो कुल उत्सर्जन का 40% है) को भी शामिल किया जा सकता है।
नियामक ढाँचा: इसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) और राष्ट्रीय संचालन समिति भारतीय कार्बन मार्केट (NSCICM) द्वारा निगरानी में रखा गया है।
रणनीतिक महत्त्व: यह सीधे भारत के लक्ष्य का समर्थन करता है, जिसके तहत वर्ष 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता को 45% तक कम किया जाना है और यह स्वच्छ तकनीकों, नवीकरणीय ऊर्जा तथा कार्बन कैप्चर में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करता है।
निष्कर्ष :
वर्ष 2025 में, भारत के ऊर्जा क्षेत्र ने विश्वसनीयता, क्षमता (509.7 GW), नवीकरणीय ऊर्जा (178 GW) और सुधारों में परिवर्तनकारी उपलब्धियाँ हासिल कीं, जिससे घाटे में थोड़ी-सी कमी आई, हालाँकि इससे NDC लक्ष्य में वृद्धि हुई, जिससे सतत ऊर्जा सुरक्षा और एक मज़बूत हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में इसका मार्ग मज़बूत हुआ।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. यह एक पब्लिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है।
2. यह एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. भारतीय कार्बन बाज़ार और कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) की औद्योगिक विकार्बनीकरण को गति देने तथा वैश्विक हरित वित्त परिदृश्य में भारत की स्थिति मज़बूत करने में भूमिका का परीक्षण कीजिये।
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