भारत में गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ

भारत में गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ

पाठ्यक्रम :  जीएस 1  भूगोल

 भारत में गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ: 

भारत की अर्थव्यवस्था में प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector) केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे बाहर भी अनेक ऐसी गतिविधियाँ हैं जिनमें प्राकृतिक संसाधनों का प्रत्यक्ष उपयोग होता है। इन्हें गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ (Non-Farm Primary Activities) कहा जाता है।

परिचय

 

आर्थिक गतिविधियों को सामान्यतः तीन क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जाता है: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक।

प्राथमिक क्षेत्र में  वे गतिविधियाँ शामिल हैं जो प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण और उत्पादन से जुड़ी होती हैं। इनमें कृषि के अलावा अन्य गतिविधियाँ जैसे खनन, मत्स्य पालन, वानिकी और खदान निकासी को गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ कहा जाता है। ये गतिविधियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और कृषि को पूरक प्रदान करती हैं।

भारत जैसे विविध भौगोलिक देश में ये गतिविधियाँ देश की भौगोलिक संरचना (फिजियोग्राफी) से गहराई से जुड़ी हुई हैं, क्योंकि संसाधनों की उपलब्धता भौतिक विशेषताओं पर निर्भर करती है।

भारत की भौगोलिक संरचना को मुख्य रूप से छह भागों में विभाजित किया जा सकता है: हिमालय पर्वत, उत्तरी मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, तटीय मैदान, द्वीप समूह और मरुस्थल।

इन प्रत्येक क्षेत्रों में विशिष्ट भौतिक विशेषताएँ हैं जो गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। इस लेख में हम इन गतिविधियों की चर्चा करेंगे और उदाहरणों के साथ उनके भौगोलिक संबंध को समझेंगे।

गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ क्या हैं?

1. गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियों का अर्थ:

  • गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ वे हैं जो कृषि को छोड़कर प्राकृतिक संसाधनों के प्रत्यक्ष निष्कर्षण से जुड़ी होती हैं। मुख्य रूप से इनमें शामिल हैं:ये गतिविधियाँ भारत की अर्थव्यवस्था में योगदान देती हैं और लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। वे सभी आर्थिक क्रियाएँ जिनमें—
    प्राकृतिक संसाधनों का दोहन या संग्रहण किया जाता है,
    परंतु कृषि (Crop Farming) शामिल नहीं होती,
    उन्हें गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ कहते हैं। प्रमुख उदाहरण
  • मत्स्य पालन (Fishing): समुद्री और मीठे पानी की मछली पकड़ना।
  • वानिकी और संग्रहण (Forestry and Gathering): लकड़ी, बांस, औषधीय पौधे और अन्य वन उत्पादों का संग्रह।
  • खनन और खदान निकासी (Mining and Quarrying): खनिजों जैसे कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर आदि का निष्कर्षण।
  • पशुपालन (Animal Rearing): ऊंट, बकरी, भेड़ आदि का पालन, जो कृषि से अलग ग्रामीण काव्य के रूप में।
  • हॉर्टिकल्चर और बागवानी
    सिल्क-उद्योग (Sericulture), मौन-पालन (Apiculture)
    प्लांटेशन (Tea, Coffee, Rubber)

भौगोलिक संरचना से संबंध : 

भारत की विविध भौगोलिक विशेषताएँ — पर्वत, पठार, मैदान, तटीय क्षेत्र, नदी तंत्र, वन क्षेत्र — गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियों की प्रकृति, वितरण और तीव्रता को गहराई से प्रभावित करती हैं।
(A) पर्वतीय क्षेत्र (Himalayas, Western Ghats)
विशेषताएँ: ठंडा मौसम, खड़ी ढलानें, घने वन।
प्रभावित गतिविधियाँ:वन-आधारित गतिविधियाँ: देवदार, चीड़, भोजपत्र, औषधीय पौधों का संग्रह।हिमाचल में गुग्गुल, उत्तराखंड में यार्सा गुम्बा।
प्लांटेशन व हर्बल खेती: दार्जिलिंग → चाय और उत्तराखंड → औषधीय एवं सुगंधित पौधों का उत्पादन
पशुपालन:  ट्रांस-हिमालय में याक पालन  – भेड़-बकरी पालन (Gaddi, Bhotia समुदाय)
(B) तटीय क्षेत्र (West Coast & East Coast)
विशेषताएँ: लम्बी तटरेखा, खाड़ी व लैगून, खारे जल संसाधन।
प्रभावित गतिविधियाँ:  मछली पालन  गुजरात, केरल, ओडिशा में समुद्री मत्स्यन सबसे अधिक।
सुंदरबन में ब्रैकिश वॉटर फिशिंग और झींगा उत्पादन।
नारियल, मसाले व कैशक्रॉप आधारित गतिविधियाँ : केरल → नारियल, मसाला खेती   तमिलनाडु → पाम, शेलफिश उत्पाद
समुद्री नमक उत्पादन:
गुजरात का कच्छ क्षेत्र → भारत में कुल नमक उत्पादन में प्रमुख योगदान।
(C) पठार क्षेत्र (Deccan Plateau, Chotanagpur Plateau)
विशेषताएँ : कठोर शैल संरचना, खनिज संपदा से भरपूर।
प्रभावित गतिविधियाँ: खनन:  झारखंड और बिहार-
लौह-अयस्क, कोयला
छत्तीसगढ़: बॉक्साइट
कर्नाटक: मैंगनीज़, सोना
वन-आधारित आजीविकाएँ: तेंदूपत्ता, लाख (Lac Culture) – झारखंड, छत्तीसगढ़ : बांस, गोंद, रेज़िन
पर्वतीय पशुपालन: दक्कन में भेड़ पालन → ऊन एवं दुग्ध उद्योग
(D) इंडो-गैंगेटिक मैदान
विशेषताएँ: उपजाऊ भूमि, नदियों की प्रचुरता।हालाँकि यहाँ कृषि प्रमुख है, लेकिन गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ भी होती हैं—
डेयरी उद्योग: उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा → भारत के दूध उत्पादन का मुख्य आधार।
मत्स्यन (Inland Fishing): गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन में रिवर फिशरी और बिहार, बंगाल में तालाब/झील आधारित मछली पालन : रोहू, कतला, मृगल जैसी प्रजातियाँ अधिक
(E) मरुस्थलीय एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र (Rajasthan, Gujarat)
प्रभावित गतिविधियाँ:
ऊँट व भेड़ पालन:  राजस्थान में रेवाड़ी, मांस, ऊन आधारित गतिविधियाँ।
खनिज : राजस्थान में संगमरमर, जिंका, तांबा, जिप्सम।
बागवानी (Horticulture): खजूर, ड्रैगन फ्रूट, जीरा, सौंफ—थार में उभरती गतिविधियाँ।
भौगोलिक संरचना से संबंध और उदाहरण
भौगोलिक क्षेत्र  गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ उदाहरण
तटीय और द्वीपीय क्षेत्र मत्स्य पालन (समुद्री और अंतर्देशीय), मोती और सीप पालन केरल, गुजरात और बंगाल की खाड़ी में समुद्री मछली पकड़ना; मन्नार की खाड़ी में मोती/सीप पालन।
नदी घाटियाँ और आर्द्रभूमि अंतर्देशीय मत्स्य पालन गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान, चिल्का और पुलिकट झीलें।
पठार खनन और उत्खनन खनिज समृद्ध छोटा नागपुर पठार (कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट); कर्नाटक-गोवा बेल्ट (लौह अयस्क)।
पर्वतीय और पहाड़ी क्षेत्र वानिकी (लकड़ी, बांस, औषधीय पौधे) और पशुपालन (भेड़, बकरी, याक) हिमालय और पश्चिमी घाट। लद्दाख में याक पालन।
मैदान पशुपालन, लघु वनोपज संग्रहण, अंतर्देशीय मत्स्य पालन गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानों में मछली पकड़ना।

भारत की विविध फिजियोग्राफी इन गतिविधियों की वितरण और प्रकृति को निर्धारित करती है। संसाधनों की उपलब्धता भौतिक विशेषताओं जैसे पर्वत, पठार, तट और मरुस्थल पर निर्भर करती है। निम्नलिखित उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है:
1. खनन और खदान निकासी
यह गतिविधि मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय पठार से जुड़ी है, जहाँ प्राचीन चट्टानें और खनिज भंडार प्रचुर हैं। छोटा नागपुर पठार (झारखंड, ओडिशा) में कोयला और लौह अयस्क का खनन होता है, जो पठार की भूगर्भीय संरचना के कारण संभव है। इसी प्रकार, डेक्कन पठार में बॉक्साइट और मैंगनीज का खनन किया जाता है। ये क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ इलाके और खनिज-समृद्ध मिट्टी के कारण उपयुक्त हैं। उत्तरी मैदानों में खनन कम होता है क्योंकि वहाँ alluvial मिट्टी है जो कृषि के लिए अधिक अनुकूल है।
2. मत्स्य पालन
यह तटीय मैदानों और द्वीप समूहों से संबंधित है। पूर्वी और पश्चिमी तट (बंगाल की खाड़ी और अरब सागर) में विस्तृत समुद्र तट और महाद्वीपीय शेल्फ मत्स्य पालन को बढ़ावा देते हैं। उदाहरणस्वरूप, केरल और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में समुद्री मछली पकड़ना प्रमुख है। अंडमान और निकोबार द्वीपों में भी समुद्री संसाधनों की प्रचुरता के कारण यह गतिविधि फलती-फूलती है। हिमालय जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन सीमित है क्योंकि वहाँ समुद्र नहीं है।
3. वानिकी और संग्रहण
वानिकी मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों और घने जंगलों वाले इलाकों में होती है। हिमालय पर्वत श्रृंखला में लकड़ी, बांस और औषधीय पौधों का संग्रह किया जाता है, जो ऊँचे पर्वतों और वर्षा वनों की विशेषता है। पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट में भी वानिकी प्रमुख है, जहाँ सदाबहार जंगल हैं। थार मरुस्थल जैसे शुष्क क्षेत्रों में वानिकी न्यूनतम है क्योंकि वहाँ वनस्पति कम है।
4. पशुपालन
यह शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों से जुड़ा है। थार मरुस्थल (राजस्थान) में ऊंट और बकरी पालन होता है, जो मरुस्थलीय जलवायु और稀 वनस्पति के अनुकूल है। हिमालय की तलहटी में भेड़ पालन प्रचलित है, जहाँ घास के मैदान उपलब्ध हैं। उत्तरी मैदानों में यह कम होता है क्योंकि वहाँ कृषि प्रधान है।

निष्कर्ष :

गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और देश की भौगोलिक विविधता से सीधे प्रभावित होती हैं। ये गतिविधियाँ न केवल रोजगार प्रदान करती हैं बल्कि सतत विकास में भी योगदान देती हैं। हालांकि, पर्यावरणीय चुनौतियाँ जैसे अतिनिष्कर्षण और जलवायु परिवर्तन इन पर प्रभाव डाल रहे हैं। सरकार को इन क्षेत्रों में संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए नीतियाँ बनानी चाहिए। इस प्रकार, भारत की फिजियोग्राफी इन गतिविधियों की आधारशिला है, जो विविधता को अवसर में बदलती है।

 प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न: 

Q. निम्नलिखित में से कौन-सा उदाहरण भारत में गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधि का भौगोलिक संरचना से सही संबंध दर्शाता है?
(a) छोटा नागपुर पठार पर कोयला खनन
(b) इंडो-गंगा मैदान पर समुद्री मत्स्य पालन
(c) थार मरुस्थल पर वानिकी
(d) हिमालय में लौह अयस्क उत्खनन
उत्तर: (a)

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ क्या हैं? भारत में ये गतिविधियाँ भौगोलिक संरचना (Physiography) से कैसे संबंधित हैं? उपयुक्त उदाहरणों सहित चर्चा कीजिए     (UPSC 2025)          ( शब्द सीमा – 250, अंक – 15 )

No Comments

Post A Comment