भारत में जैव-सुरक्षा (Biosecurity in India)

भारत में जैव-सुरक्षा (Biosecurity in India)

भारत में जैव-सुरक्षा (Biosecurity):  उभरते जैविक खतरों के विरुद्ध समग्र रणनीति

  पाठ्यक्रम : जीएस – 3  पर्यावरण और पारिस्थितिकी

परिचय

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जैविक खतरे एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। रोगजनक जीवों, विषाक्त पदार्थों और जैव प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग से उत्पन्न जोखिमों ने राष्ट्रों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। भारत, जो कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और घनी आबादी वाला देश है, इन खतरों से विशेष रूप से प्रभावित हो सकता है। जैव-सुरक्षा (Biosecurity) उन प्रथाओं और प्रणालियों का समूह है जो जैविक अभिकर्ताओं, विषाक्त पदार्थों या प्रौद्योगिकियों के जानबूझकर दुरुपयोग को रोकने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। भारत को इन जोखिमों को कम करने के लिए कानूनों, एजेंसियों के समन्वय, अनुसंधान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से जैव-सुरक्षा को मजबूत करने की आवश्यकता है।

पृष्ठभूमि :


जैव-सुरक्षा की अवधारणा 20वीं शताब्दी के अंत में उभरी, जब जैविक हथियारों के प्रसार और महामारियों के खतरे बढ़े। कोविड-19 महामारी ने दुनिया को जैव-सुरक्षा की कमियों का अहसास कराया, जहां प्रयोगशाला से रिसाव या जानबूझकर दुरुपयोग की आशंकाएं चर्चा में रहीं। भारत में जैव-सुरक्षा का इतिहास 1980 के दशक से जुड़ा है, जब पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और जैव-सुरक्षा नियम, 1989 लागू हुए। हालांकि, आधुनिक चुनौतियां जैसे जीन संपादन (CRISPR), सिंथेटिक बायोलॉजी और असममित युद्ध ने मौजूदा ढांचे को अपर्याप्त बना दिया है। भारत की भौगोलिक स्थिति—लंबी छिद्रिल सीमाएं और समुद्री मार्ग—रोगजनकों के सीमा-पार आवागमन को आसान बनाती है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ती है।

भारत को जैव-सुरक्षा की आवश्यकता क्यों?

भारत की विविधता और निर्भरताएं इसे जैविक खतरों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। प्रमुख कारण निम्न हैं:
कृषि और खाद्य सुरक्षा जोखिम: भारत की अर्थव्यवस्था कृषि और पशुधन पर निर्भर है। कृषि-आतंकवाद (Agro-terrorism) और बायो-सेबोटेज (Bio-sabotage) के माध्यम से फसलों या पशुओं को लक्षित किया जा सकता है। बायो-सेबोटेज का अर्थ है जानबूझकर किसी देश की कृषि, पशुधन या खाद्य आपूर्ति को नुकसान पहुंचाना। उदाहरणस्वरूप, अफ्रीकन स्वाइन फीवर जैसी बीमारियां पशुधन को नष्ट कर सकती हैं।
भौगोलिक कारक: छिद्रिल सीमाएं और समुद्री मार्ग रोगजनकों, आक्रामक प्रजातियों या जैविक सामग्रियों के अनियंत्रित प्रवेश की अनुमति देते हैं। पड़ोसी देशों से महामारियों का फैलाव, जैसे बर्ड फ्लू, एक वास्तविक खतरा है।
गैर-राज्य अभिकर्ताओं से खतरा: आतंकवादी समूह कम लागत वाले विषाक्त पदार्थों जैसे राइसिन (Ricin) का उपयोग कर असममित जैविक युद्ध (Asymmetric biological warfare) छेड़ सकते हैं। यह युद्ध पारंपरिक हथियारों से सस्ता लेकिन अधिक संक्रामक होता है, जिससे बड़े पैमाने पर क्षति हो सकती है।
जैव प्रौद्योगिकी का प्रसार: नए उपकरण जैसे सिंथेटिक बायोलॉजी दुरुपयोग और आकस्मिक रिसाव के जोखिम बढ़ाते हैं। आकस्मिक रिसाव का अर्थ है प्रयोगशाला से अनजाने में रोगजनक का बाहर निकलना, जैसा कि कुछ वैश्विक घटनाओं में देखा गया।
लोक स्वास्थ्य: जैव-सुरक्षा घटनाएं स्वास्थ्य प्रणालियों को पंगु बना सकती हैं। पशुजन्य (Zoonotic) बीमारियां जैसे इबोला या कोविड-19 स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ डालती हैं और आर्थिक नुकसान पहुंचाती हैं।
ये कारक भारत को वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों से जोड़ते हैं, जहां जैव-सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न अंग है।

चुनौतियां :

जैव-सुरक्षा को मजबूत करने में कई बाधाएं हैं:

कानूनी और विनियामक कमियां: भारत में कोई समर्पित जैव-सुरक्षा कानून नहीं है। मौजूदा कानून जैसे पर्यावरण अधिनियम GMOs को नियंत्रित करते हैं, लेकिन दोहरे-उपयोग प्रौद्योगिकी (Dual-use technology) की दुविधा से नहीं निपटते।
एजेंसी समन्वय की कमी: स्वास्थ्य, कृषि, रक्षा और पर्यावरण मंत्रालयों में समन्वय की कमी से प्रभावी प्रतिक्रिया बाधित होती है।
अनुसंधान और संसाधन की कमी: विषाणु संक्रमण से बचाव के लिए टीके और रक्षा-तंत्र विकसित करने में निवेश कम है।
वैश्विक खतरे: ऑस्ट्रेलिया समूह जैसे मंचों में भारत की भागीदारी है, लेकिन गैर-राज्य अभिकर्ताओं से खतरा बढ़ रहा है।

आगे की राह : 

जैव-सुरक्षा को मजबूत करने के लिए निम्न कदम उठाए जाने चाहिए:
विधायी और विनियामक ढांचा: एक समर्पित जैव-सुरक्षा कानून बनाना, जो स्वास्थ्य, रक्षा और जैव-प्रौद्योगिकी को एकीकृत करे। वैश्विक मॉडल जैसे अमेरिका की राष्ट्रीय जैव-सुरक्षा रणनीति या ऑस्ट्रेलिया का जैव-सुरक्षा अधिनियम अपनाए जा सकते हैं।
नोडल एजेंसी: एक केंद्रीय जैव-सुरक्षा एजेंसी स्थापित करना जो अंतर-मंत्रालय समन्वय सुनिश्चित करे।
अनुसंधान एवं विकास: विषाणु रक्षा-तंत्र, टीके और जैव-खतरे शमन पर फोकस। नई प्रौद्योगिकियां जैसे माइक्रोबियल फोरेंसिक (Microbial forensics) और सोशल मीडिया निगरानी अपनाना।
क्षमता निर्माण: प्रयोगशालाओं को मजबूत करना, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।

जैव-सुरक्षा से संबंधित पहलें

वैश्विक पहलें:
जैविक हथियार अभिसमय (BWC, 1975): जैविक हथियारों पर प्रतिबंध लगाने वाली बाध्यकारी संधि।
ऑस्ट्रेलिया समूह: रासायनिक और जैविक हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए निर्यात नियंत्रण मंच

भारतीय पहलें:

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: खतरनाक सूक्ष्मजीवों और GMOs को नियंत्रित करता है।
सामूहिक विनाश के हथियार अधिनियम, 2005: जैविक हथियारों को अपराध घोषित करता है।
अन्य: जैव-सुरक्षा नियम, 1989; NDMA के जैविक आपदा दिशा-निर्देश।

निष्कर्ष :

जैव-सुरक्षा भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और लोक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। आधुनिक खतरों से निपटने के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना होगा। यह विषय UPSC में पर्यावरण, सुरक्षा और विज्ञान-प्रौद्योगिकी से जुड़े प्रश्नों के लिए प्रासंगिक है, जो उम्मीदवारों को बहुआयामी विश्लेषण की मांग करता है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.निम्नलिखित में से कौन-सा अधिनियम भारत में जैविक हथियारों को अपराध करने के साधन घोषित करता है?
(a) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
(b) सामूहिक विनाश के हथियार अधिनियम, 2005
(c) जैव-सुरक्षा नियम, 1989
(d) जैविक हथियार अभिसमय, 1975

उत्तर: (b)

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.भारत में जैव-सुरक्षा की आवश्यकता, चुनौतियों और मजबूत करने के उपायों पर चर्चा कीजिए। वैश्विक और राष्ट्रीय पहलों के संदर्भ में अपनी राय दीजिए। (250 शब्द)

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