भारत में दल – बदल विरोधी कानून

भारत में दल – बदल विरोधी कानून

मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 2 – के अंतर्गत ‘ भारतीय संविधान एवं शासन व्यवस्था ’ से संबंधित।

प्रारंभिक परीक्षा के अंतर्गत – ‘संसद, विधायिका, विधानसभा, संवैधानिक संशोधन, न्यायिक समीक्षा, दसवीं अनुसूची, 52वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1985, 91वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003, व्हिप की शक्ति, अनुच्छेद 102(2) और 191(2), दिनेश गोस्वामी समिति, विधि आयोग’ से संबंधित। 

 

ख़बरों में क्यों ?

 

 

  • भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा फरवरी 2026 में, तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को दिए गए कड़े निर्देशों के कारण यह कानून सुर्खियों में है।
  • भारत में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) लोकतांत्रिक स्थिरता और संसदीय शुचिता सुनिश्चित करने वाला एक अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षा कवच है। किन्तु हाल के वर्षों में, विशेषकर 2024 से 2026 के बीच, विभिन्न राज्यों (जैसे – महाराष्ट्र, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश) में हुई राजनीतिक उथल-पुथल ने इस कानून को पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

 

उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय की वर्तमान पृष्ठभूमि : 

 

  • उच्चतम न्यायालय ने इस ऐतिहासिक मामले में ‘अध्यक्ष’ की शक्तियों और उनकी जवाबदेही को लेकर अत्यंत महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
  • न्यायिक सख्ती और समय सीमा का निर्धारण : उच्चतम न्यायालय ने पडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य (2025-26) मामले में स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं पर अनिश्चित काल तक निर्णय को सुरक्षित या लंबित नहीं रख सकते हैं। न्यायालय ने अध्यक्ष को ‘अदालत की अवमानना’ की चेतावनी देते हुए लंबित याचिकाओं पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का अंतिम अवसर दिया है।
  • अर्ध-न्यायिक उत्तरदायित्व : न्यायालय ने पुनः स्मरण कराया कि दल-बदल के मामलों में निर्णय लेते समय अध्यक्ष का पद एक ‘अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण’ (Quasi-judicial Tribunal) की भाँति होता है। अतः, किसी भी प्रकार की राजनीतिक निष्ठा या दलीय पक्षपात के कारण निर्णय लेने में विलंब करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह संवैधानिक नैतिकता और स्थापित लोकतांत्रिक सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन है।
  • संवैधानिक मर्यादा की रक्षा : पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संवैधानिक पदाधिकारी अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल रहते हैं, तो न्यायपालिका को लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हेतु हस्तक्षेप करने का पूर्ण अधिकार है।

 

दल-बदल विरोधी कानून और उससे संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधान क्या है?

 

 

  • भारत में दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधान दसवीं अनुसूची के अंतर्गत शामिल किया गया है या उसमें ही निहित हैं, जिसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के द्वारा संविधान में जोड़ा गया था। 
  • भारतीय संविधान के दसवीं अनुसूची में वर्ष 2003 के 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
  • इसका मुख्य उद्देश्य ‘आया राम-गया राम’ की राजनीति को समाप्त कर सरकारों को स्थिरता प्रदान करना था।

 

अयोग्यता का आधार (अनुच्छेद 102(2) और 191(2) ) :  

 

दसवीं अनुसूची के तहत किसी सदस्य को निम्नलिखित आधारों पर अयोग्य घोषित किया जा सकता है:

  • राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ना : यदि सदन का कोई सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल का उम्मीदवार होने के नाते चुना गया है, स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है।
  • निर्वाचित सदस्य का अपने राजनीतिक दल द्वारा जारी व्हिप का उल्लंघन करना : यदि कोई सदस्य अपने राजनीतिक दल द्वारा जारी किसी निर्देश (निर्देशों के खिलाफ) के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, और ऐसी कार्रवाई को 15 दिनों के भीतर उसके राजनीतिक दल द्वारा माफ नहीं किया गया हो।
  • निर्दलीय निर्वाचित सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाना : यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य (जो किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं था) चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
  • मनोनीत सदस्य का दल में शामिल होना : यदि कोई मनोनीत सदस्य (Nominated Member) सदन में अपना स्थान ग्रहण करने की तारीख से 6 महीने की अवधि समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।

 

अयोग्यता कब लागू नहीं होती है / अपवाद :

 

  • राजनीतिक दल का विलय (Merger) : यदि किसी सदस्य के राजनीतिक दल का किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो जाता है, तो वह सदस्य अयोग्य नहीं होगा, बशर्ते उस दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य विलय के पक्ष में हों।
  • पीठासीन अधिकारी (Speaker/Chairman) : यदि सदन का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति या उपसभापति चुना गया कोई सदस्य स्वेच्छा से अपने दल की सदस्यता छोड़ देता है, या अपने पद पर न रहने के बाद पुनः अपने दल में शामिल हो जाता है, तो उसे अयोग्य नहीं माना जाएगा।

 

निर्णय लेने की शक्ति : 

 

  • सभापति / अध्यक्ष का निर्णय : अयोग्यता से संबंधित किसी भी प्रश्न पर निर्णय सदन के अध्यक्ष या सभापति का होता है।
  • अंतिम निर्णय : अध्यक्ष या सभापति का निर्णय ही अंतिम निर्णय होता है।

 

न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति : 

 

  • किहोतो होलोहन मामला (1992) : भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में यह निर्णय दिया कि अध्यक्ष के निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। न्यायालय इस बात की जांच कर सकता है कि क्या निर्णय नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है, अथवा दुर्भावनापूर्ण है या असंवैधानिक है।
  • प्रक्रियात्मक अनियमितता : न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत यह जांचा जा सकता है कि अध्यक्ष ने दसवीं अनुसूची में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया है या नहीं किया है।

 

क्षेत्राधिकार का अपवर्जन (Bar of Jurisdiction) : 

 

  • संवैधानिक प्रावधान के अनुसार, अध्यक्ष के निर्णय को किसी भी न्यायालय में तब तक चुनौती नहीं दी जा सकती जब तक कि अध्यक्ष द्वारा निर्णय न ले लिया गया हो। अध्यक्ष के निर्णय के बाद ही न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

 

दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय : 

 

मामला निर्णय का सारांश
किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू (1992) कोर्ट ने कानून को वैध ठहराया लेकिन कहा कि अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन है।
नबाम रेबिया मामला (2016) यदि अध्यक्ष के खिलाफ स्वयं हटाने का प्रस्ताव लंबित है, तो वह दल-बदल की कार्यवाही शुरू नहीं कर सकता।
कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर अध्यक्ष (2020) कोर्ट ने निर्देश दिया कि अयोग्यता याचिकाओं का निपटारा सामान्यतः 3 महीने के भीतर किया जाना चाहिए।
पडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना (2025/26) अध्यक्ष की निष्क्रियता को “संवैधानिक विफलता” माना जा सकता है और न्यायालय समय सीमा तय कर सकता है।

 

दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित प्रमुख समस्याएँ : 

 

प्रमुख समस्याएँ :

 

  • अध्यक्ष के निर्णयों में राजनीतिक पक्षपात की संभावना होना : अध्यक्ष अक्सर सत्ताधारी दल का होता है, जिससे उसके निर्णयों में राजनीतिक पक्षपात की संभावना रहती है।
  • थोक रूप से छोटे दलों का बड़े दलों में दल-बदल करना : 2/3 सदस्यों के विलय वाले प्रावधान का उपयोग करके छोटे दलों को बड़े दलों में समाहित कर लिया जाता है।
  • निर्णय लेने में जानबूझकर देरी करना : अक्सर सत्ताधारी दल का होने वाला अध्यक्ष जानबूझकर कार्यकाल के अंत तक निर्णय नहीं लिया जाता ताकि सदस्य का पद सुरक्षित रहे।
  • राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव होना : ‘व्हिप’ के कारण सांसद/विधायक अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट नहीं दे पाते, वे केवल पार्टी आलाकमान के रबर स्टैंप बनकर रह जाते हैं।

 

दल-बदल विरोधी कानून में सुधार के लिए स्थायी समाधान की राह : 

 

 

  • दल-बदल की समस्या भारतीय लोकतंत्र की शुचिता के लिए एक गंभीर चुनौती है। इसमें सुधार हेतु निम्नलिखित बहुआयामी उपायों को अपनाया जा सकता है – 

 

संस्थागत और कानूनी सुधार रूप से समाधान की राह : 

 

  • सदन के अध्यक्ष के स्थान पर स्वतंत्र न्यायाधिकरण की स्थापना करने की जरूरत : अयोग्यता संबंधी निर्णय लेने का अधिकार सदन के अध्यक्ष (Speaker) के बजाय एक स्वतंत्र निकाय को मिलना चाहिए। दिनेश गोस्वामी समिति और विधि आयोग के सुझावों के अनुसार, यह निर्णय राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर लिया जाना चाहिए, ताकि राजनीतिक पक्षपात की गुंजाइश न रहे।
  • व्हिप की अनिवार्यता की सीमा का निर्धारण करने की आवश्यकता : व्हिप की अनिवार्यता केवल उन विशेष परिस्थितियों तक सीमित होनी चाहिए जहाँ सरकार के अस्तित्व पर संकट हो (जैसे: अविश्वास प्रस्ताव या बजट)। सामान्य विधेयकों पर सदस्यों को अपनी अंतरात्मा और विवेक के आधार पर मतदान करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
  • अयोग्यता की याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए अनिवार्य समय-सीमा तय करने की जरूरत : अयोग्यता की याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए संविधान में संशोधन कर 3 से 6 महीने की अनिवार्य समय-सीमा तय की जानी चाहिए, ताकि ‘न्याय में देरी, न्याय की अवहेलना’ वाली स्थिति उत्पन्न न हो।

 

दंडात्मक प्रावधानों को सख्त करना : 

 

  • लाभ के पद पर रोक लगाने की जरूरत : दल-बदल करने वाले किसी भी सदस्य को सदन की शेष कार्य अवधि के लिए किसी भी मंत्री पद या लाभ के पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए।
  • विलय के प्रावधानों की समीक्षा करने की आवश्यकता : वर्तमान में 2/3 सदस्यों के विलय को दी गई छूट की समीक्षा अनिवार्य है, क्योंकि इसका दुरुपयोग ‘सामूहिक दल-बदल’ के रूप में किया जा रहा है।

 

नैतिक और लोकतांत्रिक रूप से समाधान की राह : 

 

  • राजनीतिक दलों के भीतर पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देने की आवश्यकता : राजनीतिक दलों के भीतर पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना आवश्यक है। यदि दलों के भीतर संवाद और असहमति का सम्मान होगा, तो सदस्यों में असंतोष कम होगा।
  • जनादेश का अपमान करने पर उम्मीदवारों को चुनाव में दंडित करने और मतदाताओं को  जागरूक करने की आवश्यकता : अंततः लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च है। मतदाताओं को ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव में दंडित (अस्वीकार) करना चाहिए जो व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए जनादेश का अपमान कर दल बदलते हैं।

 

निष्कर्ष : 

 

  1. देश में दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीति में शुचिता लाना था, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसने ‘फुटकर दल-बदल’ की जगह ‘थोक दल-बदल’ की अवधारणा को ही जन्म दे दिया है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार महत्वपूर्ण है, जिसे ‘व्हिप’ के माध्यम से दबाया नहीं जाना चाहिए।
  2. यह संवैधानिक ढांचा भारतीय राजनीति में स्थिरता लाने के लिए बनाया गया है, हालांकि इसके कार्यान्वयन को लेकर समय-समय पर बहस होती रहती है।
  3. भारत में भले ही न्यायपालिका ने समय-समय पर इस कानून की व्याख्या की है ताकि अध्यक्ष की शक्तियों के दुरुपयोग को रोका जा सके, किन्तु इसके बाद भी यह भारतीय राजनीति में जारी है। 
  4. निष्कर्षतः, दसवीं अनुसूची को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए अध्यक्ष की न्यायिक शक्तियों को एक स्वतंत्र निकाय को सौंपना और निर्णय प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना अनिवार्य है। 
  5. भारत में दल-बदल कानून केवल एक कानूनी छिद्र भर ही नहीं है, बल्कि एक नैतिक संकट भी है। इसके स्थायी समाधान के लिए केवल कानून को सख्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक शुचिता और लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने की भी आवश्यकता है।
  6. अतः यह केवल कानून बदलने से या उसमें संशोधन करने भर से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता और मूल्यों के पुनरुद्धार से ही भारतीय लोकतंत्र की गरिमा अक्षुण्ण रह सकती है।

 

स्त्रोत – इंडियन एक्सप्रेस। 

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी सदस्य को अयोग्य ठहराने के आधारों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सत्य हैं?

  1. यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है जिसके टिकट पर वह चुना गया था। 
  2. यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव के 6 महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है। 
  3. यदि कोई मनोनीत सदस्य सदन में अपना स्थान ग्रहण करने के 6 महीने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है। 
  4. यदि कोई सदस्य अपने दल के व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है और दल उसे 15 दिनों के भीतर माफ नहीं करता है।

कूट के माध्यम से सही विकल्प का चयन कीजिए : 

A. केवल 1 और 3 

B. केवल 1, 3 और 4 

C. केवल 1, 2 और 3 

D. उपरोक्त सभी। 

 

उत्तर : B

व्याख्या : कथन 2 गलत है क्योंकि निर्दलीय सदस्य यदि ‘कभी भी’ किसी दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य हो जाता है (6 महीने की छूट केवल मनोनीत सदस्यों के लिए है)। अतः विकल्प B सही उत्तर है। 

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. “ भारतीय राजनीति में संविधान की 10वीं अनुसूची का उद्देश्य ‘लोकतांत्रिक शुचिता’ सुनिश्चित करना था, किन्तु वर्तमान भारत में यह ‘वैधानिक छिद्रों’ और ‘अध्यक्ष की पक्षपातपूर्ण भूमिका’ के कारण संकट में है।” इस कथन के संदर्भ में दल-बदल विरोधी कानून की वर्तमान चुनौतियों का परीक्षण कीजिए तथा इसे अधिक प्रभावी बनाने हेतु आवश्यक सुधारों का सुझाव प्रस्तुत कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )  

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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