भारत में प्रस्तावित परिसीमन और प्रतिनिधित्व का संकट: लोकतंत्र बनाम संघवाद का द्वंद्व

भारत में प्रस्तावित परिसीमन और प्रतिनिधित्व का संकट: लोकतंत्र बनाम संघवाद का द्वंद्व

प्रस्तावना

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” है, जो यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक की राजनीतिक आवाज समान रूप से महत्वपूर्ण हो किंतु जब विभिन्न राज्यों में जनसंख्या वृद्धि असमान होती है और प्रतिनिधित्व का पुनर्वितरण उसी आधार पर किया जाता है, तो यह सिद्धांत संघीय संतुलन के साथ टकराने लगता है। 2026 के बाद प्रस्तावित परिसीमन अभ्यास इसी द्वंद्व को उजागर करता है। हाल ही में प्रस्तुत संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 तथा परिसीमन विधेयक, 2026 ने इस बहस को पुनः केंद्र में ला दिया है। इन विधेयकों का घोषित उद्देश्य नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के तहत महिला आरक्षण को लागू करना है, किंतु इसके दूरगामी प्रभाव भारत की संघीय राजनीति, क्षेत्रीय संतुलन और नीति-निर्माण पर पड़ सकते हैं।

 

 

परिसीमन की अवधारणा और संवैधानिक आधार

परिसीमन का आशय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों का पुनः आवंटन करना तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण करना है। इस प्रक्रिया का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 में निहित है, जिनके अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद संसद और राज्य विधानसभाओं में सीटों का पुनः समायोजन किया जाना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए संसद एक परिसीमन आयोग का गठन करती है, जो एक स्वतंत्र निकाय होता है और जिसके निर्णय सामान्यतः न्यायिक समीक्षा से बाहर होते हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और 1976 का फ्रीज

स्वतंत्रता के पश्चात भारत में परिसीमन 1951, 1961 और 1971 की जनगणनाओं के आधार पर किया गया। इन अवधियों में लोकसभा की सीटों की संख्या क्रमशः 494, 522 और 543 निर्धारित की गई, जबकि प्रति सीट जनसंख्या लगातार बढ़ती गई। 1970 के दशक में यह स्पष्ट हुआ कि जिन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अधिक है, उन्हें अधिक प्रतिनिधित्व मिल रहा है, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को इसका लाभ नहीं मिल रहा। इस असंतुलन को दूर करने के लिए 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा सीटों के पुनर्वितरण को 1971 की जनगणना पर स्थिर कर दिया गया। बाद में 84वें संविधान संशोधन (2001) के माध्यम से इस व्यवस्था को 2026 तक बढ़ा दिया गया। परिणामस्वरूप, आज भी लोकसभा सीटों का आवंटन 1971 की जनसंख्या पर आधारित है, हालांकि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण समय-समय पर किया गया है।

प्रस्तावित विधेयकों के प्रमुख प्रावधान

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 तथा परिसीमन विधेयक, 2026 तीन प्रमुख परिवर्तन प्रस्तावित करते हैं-
1. लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है, जिसमें 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्रशासित प्रदेशों के लिए निर्धारित होंगी।
2. 1971 की जनगणना पर आधारित फ्रीज को समाप्त कर संसद को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह साधारण कानून के माध्यम से किसी भी जनगणना को सीटों के आवंटन का आधार बना सके। वर्तमान में 2011 की जनगणना को आधार बनाए जाने की संभावना है, क्योंकि 2021 की जनगणना कोविड-19 महामारी और प्रशासनिक कारणों से विलंबित हुई है।
3. एक नए परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा, जो नवीनतम उपलब्ध जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करेगा और सीटों का पुनर्वितरण करेगा।
इन परिवर्तनों का घोषित उद्देश्य नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के तहत महिला आरक्षण को लागू करना है, क्योंकि आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नई सीटों का सृजन आवश्यक माना गया है।

संवैधानिक सिद्धांत और प्रतिनिधित्व का आधार

अनुच्छेद 81(2)(a) यह प्रावधान करता है कि लोकसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में होगा। इसका तात्पर्य यह है कि सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर ही किया जाएगा और इसमें किसी प्रकार की समान प्रतिशत वृद्धि या वर्तमान हिस्सेदारी को बनाए रखने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। इसका परिणाम यह है कि यदि 850 सीटों का पुनर्वितरण 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाता है, तो राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में व्यापक असमानता उत्पन्न हो सकती है।

प्रतिनिधित्व का गणित: कौन लाभ में, कौन हानि में

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यदि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का आवंटन किया जाता है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश जैसे राज्य सबसे अधिक लाभान्वित होंगे। ये सभी राज्य हिंदी हृदयभूमि का हिस्सा हैं, जहां जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक रही है।
इसके विपरीत, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और दादरा एवं नगर हवेली एवं दमन-दीव जैसे राज्यों को नुकसान उठाना पड़ेगा। इन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है।
क्षेत्रीय स्तर पर यह असंतुलन और अधिक स्पष्ट हो जाता है। हिंदी हृदयभूमि की हिस्सेदारी में लगभग पाँच प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है, जबकि दक्षिण भारत की हिस्सेदारी में लगभग 3.6 प्रतिशत की कमी आ सकती है। उत्तर-पूर्व और पूर्वी भारत के हिस्से में भी कमी देखी जा सकती है, जबकि पश्चिम और कुछ अन्य क्षेत्रों में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रह सकती है।
संपूर्ण रूप से देखा जाए तो हिंदी हृदयभूमि को कुल सीटों में अत्यधिक वृद्धि प्राप्त होगी, जबकि दक्षिण और उत्तर-पूर्व के राज्यों की वृद्धि सीमित रहेगी।

जनसांख्यिकीय कारण और असमानता की जड़

इस असमानता का मूल कारण जनसंख्या वृद्धि की भिन्न दरें हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) के अनुसार दक्षिण भारत के राज्यों में कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे है, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में यह अभी भी अधिक है। इसका अर्थ यह है कि जिन राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में निवेश कर जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की, वे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पीछे रह सकते हैं। इसके विपरीत, जिन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है, वे अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त करेंगे।

लोकतंत्र बनाम संघवाद: मूल द्वंद्व

यह पूरा मुद्दा लोकतांत्रिक सिद्धांत और संघीय संरचना के बीच संतुलन का प्रश्न बन जाता है। लोकतांत्रिक दृष्टिकोण के अनुसार, अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जिससे प्रत्येक नागरिक की राजनीतिक भागीदारी समान हो सके। इसके विपरीत, संघीय दृष्टिकोण यह अपेक्षा करता है कि सभी राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति का संतुलन बना रहे और कोई भी क्षेत्र अत्यधिक प्रभावशाली न हो जाए।
यहीं पर यह द्वंद्व उत्पन्न होता है—जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व संघीय संतुलन को कमजोर कर सकता है और क्षेत्रीय असमानताओं को बढ़ा सकता है।

प्रमुख चिंताएँ और संभावित प्रभाव

1. यह तर्क दिया जा रहा है कि यह प्रक्रिया उन राज्यों को दंडित करती है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है।
2. इससे संघीय असंतुलन बढ़ सकता है और दक्षिण भारत तथा उत्तर-पूर्व के राज्यों में राजनीतिक वंचना की भावना उत्पन्न हो सकती है।
3. संसद में हिंदी हृदयभूमि का वर्चस्व बढ़ने से राष्ट्रीय नीतियों का झुकाव एक विशेष क्षेत्र की ओर हो सकता है, जिससे क्षेत्रीय विविधता और संतुलन प्रभावित हो सकता है।
4. यह प्रक्रिया सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकती है, जिससे “उत्तर बनाम दक्षिण” की बहस और अधिक तीव्र हो सकती है।
5. संवैधानिक दृष्टि से भी यह समस्या उत्पन्न होती है कि अनुच्छेद 81 में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है जो राज्यों की वर्तमान हिस्सेदारी को संरक्षित रख सके।
6. इसके अतिरिक्त, न्यायपालिका ने भी इस संदर्भ में चिंता व्यक्त की है। 2025 के एक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने चेतावनी दी थी कि परिसीमन प्रक्रिया “समान चुनावी ढांचे को अस्थिर” कर सकती है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव और तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य

अन्य संघीय व्यवस्थाओं में इस प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिए संतुलनकारी तंत्र विकसित किए गए हैं-
1. संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रतिनिधि सभा की सीटों की संख्या 435 पर स्थिर रखी गई है और राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण “Equal Proportions Method” के माध्यम से किया जाता है, जिससे अत्यधिक परिवर्तन नहीं होते।
2. यूरोपीय संघ में “Degressive Proportionality” का सिद्धांत अपनाया गया है, जिसके अंतर्गत छोटे देशों को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाता है ताकि संतुलन बना रहे।
भारत में अभी तक ऐसा कोई स्पष्ट संतुलनकारी तंत्र विकसित नहीं किया गया है, जिससे यह समस्या और जटिल हो जाती है।

संभावित समाधान और आगे का मार्ग

इस चुनौती से निपटने के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार किया जा सकता है –
1. लोकसभा की सीटों की संख्या को वर्तमान स्तर पर स्थिर रखा जा सकता है, जिससे संघीय संतुलन बना रहे।
2. सभी राज्यों को समान प्रतिशत वृद्धि के आधार पर सीटें बढ़ाई जा सकती हैं, जिससे वर्तमान हिस्सेदारी में परिवर्तन न हो।
3. यूरोपीय संघ की तर्ज पर “degressive proportionality” को अपनाया जा सकता है, जिससे छोटे या जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को संरक्षण मिल सके।
4. एक मिश्रित या द्वैत मॉडल विकसित किया जा सकता है, जिसमें सीटों का एक भाग जनसंख्या के आधार पर और दूसरा भाग राज्यों के समान प्रतिनिधित्व के आधार पर निर्धारित किया जाए।
इसके अतिरिक्त, राज्य विधानसभाओं की सीटों में वृद्धि और स्थानीय निकायों को अधिक सशक्त बनाना भी लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने का एक प्रभावी उपाय हो सकता है।

निष्कर्ष

प्रस्तावित परिसीमन अभ्यास भारतीय लोकतंत्र के समक्ष एक मूलभूत प्रश्न प्रस्तुत करता है—क्या प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या के आधार पर निर्धारित होना चाहिए, या उसमें संघीय संतुलन, विकास और ऐतिहासिक योगदान जैसे अन्य तत्वों को भी शामिल किया जाना चाहिए? यदि इस प्रक्रिया को बिना संतुलन के लागू किया जाता है, तो यह न केवल क्षेत्रीय असंतोष को बढ़ावा देगा, बल्कि भारतीय संघवाद की मूल भावना को भी कमजोर कर सकता है। परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण नहीं है, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक संरचना और संघीय संतुलन के पुनर्परिभाषा का निर्णायक क्षण है।अतः आवश्यक है कि संसद एक संतुलित, सहमति-आधारित और नवाचारी मॉडल विकसित करे, जो लोकतांत्रिक न्याय और संघीय संतुलन दोनों को समान महत्व दे सके।

UPSC Prelims Questions

परिसीमन आयोग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
(i) यह संसद के अधिनियम द्वारा गठित होता है
(ii) इसके निर्णय न्यायालय में चुनौती नहीं दिए जा सकते
(iii) यह निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करता है
सही उत्तर: (d) 1, 2 और 3

UPSC Mains Questions

1. “भारत में प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन के बीच टकराव को उजागर करती है।” समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
2. “लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण में केवल जनसंख्या को आधार बनाना भारतीय संघवाद के लिए चुनौतीपूर्ण है।” उपयुक्त उदाहरणों सहित वैकल्पिक मॉडल सुझाइए।

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