08 Oct भारत में भूस्खलन : कारण, परिणाम और शमन रणनीतियाँ
पाठ्यक्रम – मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3 के ‘ पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी ’ खण्ड के अंतर्गत – भारत में भूस्खलन – जलवायु परिवर्तन के युग में एक बढ़ती चुनौती से संबंधित।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए – पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), मृदा अपरदन और अपक्षय, भूस्खलन जोखिम क्षेत्रीकरण मानचित्रण, जनसंख्या विस्थापन और आजीविका की हानि
मुख्य परीक्षा के लिए – भूस्खलन क्या होता है ? भूस्खलन से निपटने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा जारी दिशानिर्देशों की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। भारत में भूस्खलन के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा इसके प्रभावी प्रबंधन में देश के समक्ष उपस्थित प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।
खबरों में क्यों?

- हाल ही में हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में एक भीषण भूस्खलन हुआ, जिसने एक निजी बस को अपनी चपेट में ले लिया। इस दुर्घटना में कम से कम 15 लोगों की मृत्यु (कुछ रिपोर्टों में संख्या 18 बताई गई है) और अनेक लोग घायल हो गए। यह हादसा लगातार भारी वर्षा के कारण पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता बढ़ने से हुआ।
- इसी प्रकार, पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में भी अत्यधिक वर्षा (12 घंटे में 300 मिमी से अधिक) के कारण कई स्थानों पर भूस्खलन हुए। इन घटनाओं में 24 से अधिक लोगों की जान गई, सैकड़ों घर बह गए, और सड़क, पुल तथा बिजली ढाँचे को व्यापक नुकसान पहुँचा। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और स्थानीय प्रशासन ने राहत व बचाव कार्य आरंभ किए।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के अनुसार भूस्खलन क्या होता है ?
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) भूस्खलन को इस प्रकार परिभाषित करता है – “ गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से चट्टानों, मलबे या मिट्टी के द्रव्यमान का ढलान की ओर खिसकना या बहना, जो प्राकृतिक या मानव-जनित कारणों से होता है। ”
- भूस्खलन को “हाइड्रो-मौसमी एवं भूवैज्ञानिक आपदाओं” की श्रेणी में रखा गया है। भारत में यह एक आवर्ती (Recurring) आपदा है, विशेषकर हिमालयी क्षेत्र और पश्चिमी घाटों में। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 12.6% भाग भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है, जिससे भारत विश्व के सबसे अधिक भूस्खलन-प्रवण देशों में से एक है।
भारत में भूस्खलन के प्रमुख कारण :
- भारत में भूस्खलन के कारणों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – प्राकृतिक/भूवैज्ञानिक कारक और मानवजनित (मानव-प्रेरित) कारक।
प्राकृतिक / भूवैज्ञानिक कारक :
- अत्यधिक वर्षा (Heavy Rainfall) : यह भूस्खलन का सबसे आम और तात्कालिक ट्रिगर है। मानसून के दौरान होने वाली तीव्र वर्षा मिट्टी के छिद्रों में पानी के दबाव (pore pressure) को बढ़ा देती है। इससे मिट्टी के कणों के बीच का संसंजन (cohesion) कम हो जाता है, जिससे ढलान अस्थिर हो जाता है और विफल हो जाता है। उदाहरण – केरल के वायनाड क्षेत्र (2024) में अत्यधिक मानसूनी वर्षा के कारण कई घातक भूस्खलन हुए। दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल में भी 12 घंटों से भी कम समय में 300 मिमी से अधिक वर्षा ने बड़े पैमाने पर भूस्खलन को जन्म दिया।
- भूकंप (Earthquakes) और भूगर्भीय संरचना : भूकंपीय कंपन अस्थिर चट्टान द्रव्यमान को ढीला कर देते हैं, विशेष रूप से हिमालय जैसे भूगर्भीय रूप से युवा और नाजुक पर्वत क्षेत्रों में। हिमालय एक युवा वलित पर्वत श्रृंखला है, जो अपनी नाजुक संरचना और उच्च भूकंपीय गतिविधि के कारण भूस्खलन के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। उदाहरण – वर्ष 2015 के नेपाल भूकंप ने उत्तर सिक्किम और उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर भूस्खलन को ट्रिगर किया था।
- मृदा अपरदन और अपक्षय (Soil Erosion & Weathering) : नदियों द्वारा निरंतर अपरदन (विशेष रूप से नदी की निचली कटाई) और चट्टानों का अपक्षय ढलान की शक्ति और स्थिरता को कमजोर करता है। यह प्रक्रिया ढलान के आधार से समर्थन को हटा देती है, जिससे ऊपरी हिस्से के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है। उदाहरण – सिक्किम की तीस्ता घाटी में नदी द्वारा निरंतर आधार की कटाई ने बार-बार ढलान की अस्थिरता पैदा की है।
- बर्फ का पिघलना और ग्लेशियरों का पीछे हटना (Snowmelt & Glacier Retreat) : तेजी से बर्फ पिघलने और हिमनद पीछे हटने से ढलान की मिट्टी में जल संतृप्ति (water saturation) होती है, जिससे उसकी शक्ति कम हो जाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण यह कारक हिमालय में और भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। उदाहरण – वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा को हिमनद पिघलने और संबंधित ढलान विफलता से जोड़ा गया था।
- तीव्र ढलान और भूगर्भीय जोड़ : पहाड़ों की खड़ी ढलानें और चट्टानों में मौजूद प्राकृतिक दोष (faults), जोड़ (joints) और फ्रैक्चर उन्हें स्वाभाविक रूप से कमजोर और गति के लिए प्रवण बनाते हैं। दार्जिलिंग हिमालय और उत्तर-पूर्वी पहाड़ी श्रृंखलाओं में यह संरचनात्मक कमजोरी स्पष्ट है।
मानवजनित (मानव-प्रेरित) कारक :
- वनों की कटाई (Deforestation) : वनस्पतियों को हटाना ढलानों को अस्थिर करता है, क्योंकि पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं (रूट बाइंडिंग)। वनस्पति आवरण के हटने से वर्षा जल का सीधा प्रवाह होता है, जिससे मिट्टी का कटाव तेज होता है। उदाहरण – नीलगिरि (तमिलनाडु) में चाय बागान के विस्तार के लिए वनों की कटाई ने ढलान विफलताओं को जन्म दिया है।
- अनियोजित निर्माण और सड़क काटना (Unplanned Construction & Road Cutting) : सड़क निर्माण, सुरंगों का निर्माण और पहाड़ी ढलानों पर अतिक्रमण ढलान के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ते हैं। ढलान के निचले हिस्से को काटने (toe cutting) से ढलान का समर्थन हट जाता है, जिससे अस्थिरता पैदा होती है। उदाहरण – उत्तराखंड का जोशीमठ क्षेत्र (2023) भू-धंसाव और ढलान अस्थिरता के कारण चर्चा में रहा, जिसका एक प्रमुख कारण अनियोजित निर्माण गतिविधियाँ थीं।
- खनन और उत्खनन (Mining & Quarrying) : विस्फोट और उत्खनन से उत्पन्न कंपन ढलानों में दरारें और ढीलापन पैदा करते हैं, जिससे भूस्खलन ट्रिगर हो सकता है। यह गतिविधि अक्सर ढलान के आधार को कमजोर करती है। उदाहरण – झारखंड के झरिया कोयला क्षेत्रों के आसपास की गतिविधियाँ इस खतरे को बढ़ाती हैं।
- खराब जल निकासी और शहरीकरण (Poor Drainage & Urbanization) : प्राकृतिक जल निकासी नालों के अवरुद्ध होने से पानी का जमाव होता है, जो मिट्टी की संतृप्ति को बढ़ाता है और ढलान की अस्थिरता को ट्रिगर करता है। शहरीकरण के कारण जल निकासी की समस्याएँ और बढ़ गई हैं। उदाहरण – मुंबई के उपनगरीय भूस्खलन (जैसे घाटकोपर, 2000) खराब जल निकासी और अनियोजित बस्ती के कारण हुए थे।
- पहाड़ियों पर कृषि विस्तार (Agricultural Expansion) : पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेती (terracing) और सिंचाई की पद्धतियाँ मिट्टी में पानी के रिसने (infiltration) को बढ़ाती हैं, जिससे ढलान की स्थिरता कम हो जाती है। उदाहरण – मेघालय में झूम खेती (स्थानांतरित खेती) वाले क्षेत्र।
भूस्खलन के गंभीर परिणाम :
भूस्खलन के परिणाम बहुआयामी होते हैं, जो पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, समाज, स्वास्थ्य और यहाँ तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी प्रभावित करते हैं।
पर्यावरणीय परिणाम (Environmental Consequences) :
- वन और जैव विविधता का विनाश : भूस्खलन से बड़े पैमाने पर वन आवरण नष्ट हो जाता है, जिससे स्थानीय जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुँचती है।
- नदी अवसादन (River Sedimentation) : भूस्खलन से भारी मात्रा में मलबा नदियों और जलाशयों में जमा हो जाता है। इससे नदियों का प्रवाह बाधित होता है, बाढ़ का खतरा बढ़ता है और जलविद्युत परियोजनाओं तथा सिंचाई प्रणालियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उदाहरण – वायनाड (2024) में 200 हेक्टेयर से अधिक वन नष्ट हुए और स्थानीय जल विज्ञान (hydrology) में बदलाव आया।
आर्थिक परिणाम (Economic Consequences) :
- बुनियादी ढांचे को क्षति : सड़कों, पुलों, बिजली लाइनों और कृषि भूमि जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को व्यापक क्षति पहुँचती है। इससे पुनर्निर्माण और रखरखाव की लागत में भारी वृद्धि होती है।
- व्यापार और पर्यटन का बुरी तरह प्रभावित होना : महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्गों और सड़कों के अवरुद्ध होने से आर्थिक गतिविधियाँ ठप हो जाती हैं, माल ढुलाई बाधित होती है, और पहाड़ी राज्यों की अर्थव्यवस्था का आधारस्तंभ पर्यटन बुरी तरह प्रभावित होता है। उदाहरण – NH-44 (जम्मू और कश्मीर) और NH-10 (सिक्किम) अक्सर अवरुद्ध रहते हैं, जिससे रखरखाव पर सालाना ₹650 करोड़ का खर्च आता है।
सामाजिक परिणाम (Social Consequences) :
- जनसंख्या विस्थापन और आजीविका की हानि : भूस्खलन से घर नष्ट हो जाते हैं, जिससे प्रभावित आबादी का बड़ी संख्या में विस्थापन होता है। इससे खासकर कृषि और पर्यटन पर निर्भर समुदायों में आजीविका असुरक्षा उत्पन्न होती है। उदाहरण – हिमाचल प्रदेश में 2023 के मानसून के बाद कई गांवों को स्थानांतरित करना पड़ा।
- मृत्यु और चोटें : भूस्खलन के कारण प्रतिवर्ष औसतन 300 से अधिक मौतें होती हैं (NDMA के अनुसार), और कई लोग घायल होते हैं।
स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य परिणाम (Health and Mental Health Consequences) :
- बीमारी का प्रकोप : दूषित जल और स्वच्छता प्रणालियों के टूटने के कारण हैजा, टाइफाइड जैसी जल-जनित बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
- स्वास्थ्य पहुंच का अवरोध : सड़कों के क्षतिग्रस्त होने से स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बाधित होती है, जिससे आपातकालीन चिकित्सा सहायता मुश्किल हो जाती है।
- मानसिक स्वास्थ्य संकट : भूस्खलन से बचे लोगों में आघात (trauma) और दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक तनाव उत्पन्न होता है। संपत्ति और प्रियजनों के नुकसान से अवसाद और चिंता जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं। उदाहरण – वर्ष 2023 में रायगढ़ भूस्खलन के बाद कई परिवारों को मनोवैज्ञानिक परामर्श की आवश्यकता पड़ी।
राष्ट्रीय सुरक्षा परिणाम (National Security Consequences) :
- सीमा सड़कों की आवाजाही में व्यवधान उत्पन्न होना : संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में भूस्खलन से सेना की रसद, संचार लाइनें और सीमा सड़कों की आवाजाही बाधित होती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है। उदाहरण – अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में लगातार भूस्खलन भारत-चीन सीमा पर आवाजाही में बाधा डालते हैं।
भूस्खलन के लिए शमन और रोकथाम से संबंधित प्रमुख रणनीतियाँ :
संरचनात्मक उपाय (Structural Measures) :
- रिटेनिंग वॉल और गैबियन वॉल का निर्माण : ढलान के आधार और निचले हिस्सों में कंक्रीट की रिटेनिंग वॉल या पत्थरों से भरी गैबियन वॉल का निर्माण करना।
- रॉक बोल्टिंग (Rock Bolting) और शॉर्टक्रीट : अस्थिर चट्टान ब्लॉकों को स्थिर करने के लिए स्टील के बोल्ट का उपयोग करना और ढलान की सतह को मजबूत करने के लिए शॉर्टक्रीट (तेजी से सूखने वाला कंक्रीट मिश्रण) लगाना।
- ढलान जल निकासी प्रणाली : ढलान की सतह पर और उसके भीतर पानी के संचय को रोकने के लिए प्रभावी जल निकासी चैनल और सब-सरफेस ड्रेन (subsurface drains) का निर्माण करना।
- जैव-इंजीनियरिंग और वनीकरण : गहरी जड़ वाली घास, झाड़ियों और पेड़ों को लगाकर मिट्टी के कटाव को कम करना और जड़ों की मदद से मिट्टी को बांधना (रूट बाइंडिंग)। उदाहरण – सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) सिक्किम और हिमाचल प्रदेश में ढलान स्थिरीकरण के लिए जैव-इंजीनियरिंग का उपयोग कर रहा है।
गैर-संरचनात्मक उपाय (Non-Structural Measures) :
- भूस्खलन जोखिम क्षेत्रीकरण मानचित्रण (Landslide Hazard Zonation – LHZ) : भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) और इसरो जैसी एजेंसियां उच्च, मध्यम और निम्न जोखिम वाले क्षेत्रों को दर्शाने वाले मानचित्र तैयार करती हैं। ये मानचित्र भूमि उपयोग विनियमन के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।
- भूमि उपयोग विनियमन : LHZ मानचित्रों के आधार पर, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण और खनन जैसी जोखिम भरी गतिविधियों पर सख्त प्रतिबंध लगाना।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems ): ढलान की गति, वर्षा की तीव्रता और जल स्तर को मापने वाले सेंसर और स्वचालित गेज का उपयोग करके वास्तविक समय में डेटा एकत्र करना और संभावित भूस्खलन से पहले सामुदायिक स्तर पर अलर्ट जारी करना।
नीतिगत और संस्थागत उपाय (Policy & Institutional Measures) :
- राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम प्रबंधन रणनीति (2019) : NDMA की इस रणनीति का कार्यान्वयन, जो जोखिम मानचित्रण, शमन, जागरूकता और क्षमता निर्माण पर केंद्रित है।
- एकीकृत पहाड़ी क्षेत्र नियोजन : पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) और NDMA के समन्वय में पहाड़ी क्षेत्रों के लिए सतत विकास योजनाएँ बनाना।
- क्षमता निर्माण : राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों (SDMAs) और स्थानीय प्रशासन की तकनीकी और जनशक्ति क्षमता को बढ़ाना, साथ ही NDRF और SDRF टीमों को विशेष प्रशिक्षण देना।
प्रौद्योगिकी और पूर्वानुमान (Technology & Forecasting) :
- सुदूर संवेदन और GIS : ढलान की निगरानी और जोखिम मूल्यांकन के लिए उपग्रह डेटा (ISRO), LiDAR (Light Detection and Ranging), GIS (Geographic Information System) और ड्रोन जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करना। उदाहरण – ISRO का भुकोश प्लेटफॉर्म भूस्खलन की सूची और भेद्यता डेटा को एकीकृत करता है, जो योजनाकारों के लिए महत्वपूर्ण है।
- ढलान निगरानी (Slope Monitoring) : ढलानों में विरूपण (deformation) और गति को मापने के लिए इनक्लिनोमीटर और एक्सटेंसोमीटर जैसे सेंसर स्थापित करना।
समुदाय आधारित तैयारी और जागरूकता (Community-Based Preparedness) :
- जागरूकता अभियान और प्रशिक्षण : स्थानीय समुदायों, विशेष रूप से पंचायत स्तर पर, को भूस्खलन के खतरों और तत्काल प्रतिक्रिया उपायों के बारे में शिक्षित करना।
- मॉक ड्रिल : स्थानीय टीमों की तैयारी का परीक्षण करने और निकासी मार्गों को समझने के लिए नियमित मॉक ड्रिल आयोजित करना। उदाहरण – हिमाचल प्रदेश और सिक्किम में NDMA का ‘भूस्खलन-तैयार पहाड़ी समुदाय’ कार्यक्रम।
पर्यावरण प्रबंधन (Environmental Management) :
- खनन का विनियमन : उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में उत्खनन पर सख्त कानूनी प्रतिबंध लगाना और केवल वैज्ञानिक रूप से व्यवहार्य तरीकों से ही खनन की अनुमति देना।
- पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र (Eco-Sensitive Zoning) : उच्च जोखिम वाली ढलानों के आसपास बफर जोन स्थापित करना, जहाँ किसी भी प्रकार के निर्माण या विदोहन की अनुमति नहीं है। उदाहरण – केरल और उत्तराखंड सरकारों ने 2018 के बाद उच्च जोखिम वाली ढलानों के आसपास बफर जोन लागू किए।
निष्कर्ष :
- भूस्खलन भारत के पर्वतीय भूगोल की एक अनिवार्य प्राकृतिक प्रक्रिया है, परंतु जलवायु परिवर्तन, अनियोजित निर्माण, वनों की कटाई और जनसंख्या दबाव ने इसे अब एक गंभीर आपदा स्वरूप दे दिया है। यदि भारत को सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप एक आपदा-लचीला (Disaster-Resilient) राष्ट्र बनना है, तो “सुरक्षित पर्वत – सुरक्षित जीवन” की अवधारणा को राष्ट्रीय नीति एवं विकास योजना के केंद्र में स्थान देना अनिवार्य है।
- हाल की घटनाएँ, जैसे हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में हुए भीषण भूस्खलन, इस बात के स्पष्ट संकेतक हैं कि अब केवल आपदा के बाद राहत और पुनर्वास पर्याप्त नहीं, बल्कि पूर्वानुमान, रोकथाम और जोखिम न्यूनीकरण को नीति की प्राथमिकता बनाना होगा।
- भूस्खलन प्रबंधन के लिए एक एकीकृत, वैज्ञानिक और सहभागी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें संरचनात्मक उपाय (जैसे रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज सिस्टम), गैर-संरचनात्मक उपाय (जैसे भूमि उपयोग विनियमन, जनजागरूकता), नीतिगत समन्वय (NDMA–SDMA–राज्य सरकारों के बीच सहयोग) और तकनीकी नवाचार (ISRO, GSI के मानचित्रण एवं भू-स्थानिक निगरानी) का संयोजन हो।
- इसके साथ ही, भूस्खलन प्रबंधन के लिए सतत भूमि उपयोग योजना, पारिस्थितिक पुनर्स्थापना, और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को सशक्त बनाना आवश्यक है ताकि पर्वतीय क्षेत्रों की नाजुक पारिस्थितिकी को संरक्षित रखा जा सके।
- अंततः, भारत को अपनी पहाड़ी संपदा और मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भूस्खलन जोखिम प्रबंधन को केवल आपदा नीति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास एजेंडा का अभिन्न अंग बनाना होगा।
स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. भारत में भूस्खलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- हिमालय युवा मोड़दार पर्वत संरचना और उच्च भूकंपीय गतिविधि के कारण अधिक भूस्खलन-प्रवण हैं।
- पश्चिमी घाटों में भूस्खलन मुख्यतः अत्यधिक वर्षा और वनों की कटाई के कारण होते हैं।
- भूस्खलन जोखिम क्षेत्र (Landslide Hazard Zonation) मानचित्र भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा तैयार किए जाते हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही है?
(A) केवल एक
(B) केवल दो
(C) तीनों
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर – (B) केवल दो (1 और 2 सही हैं, तीसरा गलत है – LHZ मानचित्र मुख्यतः GSI तैयार करता है।)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. “ भारत में भूस्खलन एक आवर्ती प्राकृतिक आपदा है, जो विशेष रूप से हिमालयी और पश्चिमी घाट क्षेत्रों में व्यापक रूप से देखी जाती है। ” इस कथन के संदर्भ में भूस्खलनों के प्रमुख कारणों, उनके सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय परिणामों तथा प्रभावी निवारण और प्रबंधन उपायों पर विस्तृत चर्चा कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )
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