31 Jul भू-राजनीतिक व्यवधान: अंतर्देशीय आर्थिक गलियारों पर UPSC दृष्टिकोण
✎ भारत सरकार भू-राजनीतिक व्यवधानों के बावजूद वैश्विक समुद्री व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समूह के माध्यम से सक्रिय रूप से उपाय कर रही है, जिसमें व्यापार सुगमता, रसद लागत में कमी…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper III — अर्थव्यवस्था
- Prelims: अंतर-मंत्रालयी समूह, वैश्विक समुद्री व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, निर्यात संवर्धन पूंजीगत वस्तु (EPCG) योजना, अग्रिम प्राधिकरण योजना, आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS), घरेलू समुद्री बीमा पूल, व्यापार सुगमता
- Essay: भू-राजनीतिक अस्थिरता के युग में भारत का आर्थिक लचीलापन, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने में अंतर्देशीय आर्थिक गलियारों की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत सरकार भू-राजनीतिक व्यवधानों के बावजूद वैश्विक समुद्री व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समूह के माध्यम से सक्रिय रूप से उपाय कर रही है, जिसमें व्यापार सुगमता, रसद लागत में कमी और निर्यात प्रोत्साहन पर विशेष ध्यान दिया गया है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
वाणिज्य विभाग के अंतर्गत गठित एक अंतर-मंत्रालयी समूह नियमित रूप से बदलती स्थिति की समीक्षा करता है और समुद्री व्यापार तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं पर इसके प्रभावों का आकलन कर रहा है। सरकार ने इन चुनौतियों से निपटने और निर्बाध माल ढुलाई सुनिश्चित करने के लिए कई समन्वित उपाय किए हैं।
पृष्ठभूमि
- हाल के वर्षों में, विभिन्न भू-राजनीतिक संघर्षों और वैश्विक घटनाओं ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मार्गों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया है, जिससे माल ढुलाई लागत में वृद्धि और रसद में देरी हुई है।
- भारत एक प्रमुख व्यापारिक राष्ट्र है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन व्यवधानों का भारतीय निर्यात और आयात पर सीधा प्रभाव पड़ता है, जिससे आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
- सरकार ने इन चुनौतियों का सामना करने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना शामिल है।
- इस अंतर-मंत्रालयी समूह में विदेश मंत्रालय, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय, नागर विमानन मंत्रालय, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) जैसे कई महत्वपूर्ण हितधारक शामिल हैं।
- समीक्षा तंत्र में अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी मार्गों, निर्यात-आयात माल की आवाजाही, बंदरगाह संचालन, रसद, माल ढुलाई और बीमा लागत, तथा समुद्री व्यापार पर निर्भर विभिन्न क्षेत्रों में आपूर्ति श्रृंखलाओं की निरंतरता से संबंधित मुद्दे शामिल हैं।
- सरकार का उद्देश्य व्यापार सुगमता को बढ़ाना, रसद लागत को कम करना और भारतीय निर्यातकों तथा आयातकों के लिए एक स्थिर व्यापारिक वातावरण सुनिश्चित करना है।
- इन उपायों में निर्यात संवर्धन पूंजीगत वस्तु (EPCG) और अग्रिम प्राधिकरण योजनाओं के लिए निर्यात दायित्व अवधि का विस्तार, RODTP दरों की बहाली, और MSME की तरलता के लिए आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0 की शुरुआत शामिल है।
भू-राजनीतिक व्यवधानों से निपटने हेतु भारत सरकार के प्रमुख उपाय
- वाणिज्य विभाग के अधीन विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने निर्यात संवर्धन पूंजीगत वस्तु (EPCG) और अग्रिम प्राधिकरण योजनाओं के लिए निर्यात दायित्व अवधि को 31 अगस्त 2026 तक बढ़ाया है, जिससे 1,017 EPCG और 7,400 अग्रिम प्राधिकरणों को लाभ हुआ है।
- RODTP (Remission of Duties and Taxes on Exported Products) दरों को बहाल किया गया है और एक विशेष अभियान के माध्यम से 21,370 EPCG तथा अग्रिम प्राधिकरणों के निर्यात दायित्व का निर्वहन किया गया, जिससे लंबित बैंक गारंटी में फंसी धनराशि जारी हुई।
- कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने निर्यातकों के लिए एक हेल्पलाइन शुरू की है, और सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)/मुक्त व्यापार वेयरहाउसिंग जोन (FTWZ) में रत्न और आभूषणों के आयात तथा भंडारण की अनुमति दी है।
- केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) ने लौटाए गए और डायवर्ट किए गए कार्गो के लिए स्पष्टीकरण जारी किए हैं, तथा शुल्क माफी और कार्गो हैंडलिंग में लचीलापन 30 जून 2026 तक बढ़ाया है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)/वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने विस्तारित निर्यात ऋण अवधि को 270 से बढ़ाकर 450 दिन कर 5 जून 2026 तक जारी रखा है, और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) की तरलता के लिए आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0 शुरू की गई है।
- प्रमुख बंदरगाहों ने ग्राउंड रेंट और विलंब शुल्क पर 100 प्रतिशत और रीफर शुल्क पर 80 प्रतिशत की छूट दी है, जिससे रसद लागत में कमी आई है।
- कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CONCOR) और रेलवे ने व्यवधानों के कारण अटके कंटेनरों पर शुल्क माफ कर दिया है और बंदरगाहों पर लगभग 10,000 कंटेनरों की निकासी को सुगम बनाने के लिए समर्पित माल गलियारे पर डबल-स्टैक सेवाएं शुरू की हैं।
- मंत्रिमंडल ने घरेलू समुद्री बीमा पूल के लिए लगभग 150 करोड़ डॉलर की संप्रभु गारंटी को मंजूरी दी है, जिससे निर्यात के लिए माल ढुलाई और बीमा की लागत कम हो गई है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक आपातकालीन प्रकोष्ठ सक्रिय किया है और एलपीजी नियंत्रण आदेश और प्राकृतिक गैस आपूर्ति विनियमन आदेश जारी किए हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अंतर-मंत्रालयी समूह का गठन | वैश्विक समुद्री व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रभाव की निरंतर निगरानी और समन्वित कार्रवाई। |
| निर्बाध माल ढुलाई के उपाय | बंदरगाहों पर परिचालन सहायता, भूमि किराया और विलंब शुल्क में छूट, रेल संपर्क के माध्यम से कंटेनर निकासी की सुविधा। |
| व्यापार सुगमता उपाय | निर्यात संवर्धन पूंजीगत वस्तु (EPCG) और अग्रिम प्राधिकरण योजनाओं के लिए निर्यात दायित्व अवधि का विस्तार, RoDTEP दरों की बहाली। |
| वित्तीय सहायता और तरलता | निर्यात ऋण अवधि में वृद्धि (270 से 450 दिन), MSME के लिए आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0। |
| घरेलू समुद्री बीमा पूल | निर्यात के लिए माल ढुलाई और बीमा लागत को कम करने हेतु $150 मिलियन की संप्रभु गारंटी। |
| आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन | पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा आपातकालीन प्रकोष्ठ सक्रिय करना, महत्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर सीमा शुल्क में कमी। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- यह पहल वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच भारत के समुद्री व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं की निरंतरता सुनिश्चित करती है, जिससे निर्यात और आयात पर नकारात्मक प्रभाव कम होता है।
- निर्यात संवर्धन योजनाओं का विस्तार और निर्यात ऋण अवधि में वृद्धि निर्यातकों, विशेषकर MSME क्षेत्र को तरलता और परिचालन लचीलापन प्रदान करती है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है।
- माल ढुलाई और बीमा लागत में कमी से भारतीय उत्पादों की वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है और व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिलती है।
- बंदरगाहों और रेलवे द्वारा शुल्क माफी और परिचालन दक्षता में सुधार से रसद लागत कम होती है, जो ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देती है।
सामरिक महत्व
- भू-राजनीतिक व्यवधानों के प्रति सरकार की सक्रिय प्रतिक्रिया भारत की आर्थिक सुरक्षा और वैश्विक व्यापार में इसकी स्थिति को मजबूत करती है।
- विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय एक मजबूत और एकीकृत नीतिगत प्रतिक्रिया को दर्शाता है, जो भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए एक मॉडल स्थापित करता है।
- घरेलू समुद्री बीमा पूल के लिए संप्रभु गारंटी भारत की समुद्री व्यापार क्षमता को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे बाहरी निर्भरता कम होती है।
शासन और नीतिगत महत्व
- अंतर-मंत्रालयी समूह का गठन एक प्रभावी संस्थागत तंत्र का उदाहरण है जो जटिल, बहु-क्षेत्रीय मुद्दों को संबोधित करने के लिए आवश्यक है।
- सरकार द्वारा उठाए गए उपाय व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) और निर्यात संवर्धन पर केंद्रित हैं, जो भारत की विदेश व्यापार नीति के प्रमुख स्तंभ हैं।
- यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि सरकार कैसे वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू उद्योगों और व्यापार को समर्थन देने के लिए सक्रिय रूप से नीतिगत हस्तक्षेप करती है।
चुनौतियाँ
1. भू-राजनीतिक अस्थिरता
- वैश्विक संघर्ष, व्यापार युद्ध और राजनीतिक तनाव समुद्री व्यापार मार्गों को बाधित कर सकते हैं, जिससे शिपिंग लागत और समय में अप्रत्याशित वृद्धि हो सकती है।
- यह भारतीय निर्यातकों और आयातकों के लिए अनिश्चितता पैदा करता है, जिससे व्यापार योजना और निवेश निर्णय प्रभावित होते हैं।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, अर्थव्यवस्था
2. आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान
- अप्रत्याशित घटनाओं (जैसे महामारी, प्राकृतिक आपदाएँ) के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में रुकावटें कच्चे माल की उपलब्धता और तैयार माल के वितरण को प्रभावित कर सकती हैं।
- यह भारतीय उद्योगों के लिए उत्पादन लागत बढ़ा सकता है और समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ पैदा कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, आपदा प्रबंधन
3. रसद और अवसंरचनात्मक चुनौतियाँ
- भारत में बंदरगाहों और अंतर्देशीय परिवहन नेटवर्क पर क्षमता का दबाव, साथ ही रसद लागत की उच्चता, वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करती है।
- कंटेनर की कमी, बंदरगाहों पर भीड़ और कुशल मल्टीमॉडल परिवहन की अनुपलब्धता माल ढुलाई को धीमा कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, अवसंरचना
4. वित्तीय और बीमा संबंधी जोखिम
- भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण समुद्री बीमा प्रीमियम में वृद्धि और निर्यात ऋण की उपलब्धता में कमी भारतीय व्यापार के लिए वित्तीय बोझ बढ़ा सकती है।
- बैंक गारंटी और अन्य वित्तीय साधनों में फंसी पूंजी छोटे और मध्यम उद्यमों (MSME) की तरलता को प्रभावित करती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, वित्तीय बाजार
5. नियामक और प्रक्रियात्मक बाधाएँ
- जटिल सीमा शुल्क प्रक्रियाएँ, दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकताएँ और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी व्यापार सुगमता को बाधित कर सकती है।
- निर्यात संवर्धन योजनाओं के तहत निर्यात दायित्वों को पूरा करने में देरी से दंड और बैंक गारंटी के मुद्दे उत्पन्न हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन, अर्थव्यवस्था
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| वैश्विक समुद्री व्यापार पर भू-राजनीतिक प्रभाव | व्यापार मार्गों में व्यवधान, शिपिंग लागत में वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं में अनिश्चितता। |
| निर्यात-आयात माल की आवाजाही | बंदरगाहों पर भीड़, कंटेनर की कमी, माल ढुलाई में देरी। |
| रसद और बीमा लागत | बढ़े हुए बीमा प्रीमियम, उच्च माल ढुलाई लागत, निर्यातकों पर वित्तीय बोझ। |
| आपूर्ति श्रृंखलाओं की निरंतरता | कच्चे माल की उपलब्धता में बाधा, उत्पादन और वितरण में व्यवधान। |
| निर्यातकों के लिए तरलता | निर्यात ऋण की उपलब्धता, बैंक गारंटी में फंसी पूंजी, MSME पर प्रभाव। |
| ऊर्जा सुरक्षा | पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में व्यवधान, मूल्य अस्थिरता। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- निर्यात संवर्धन पूंजीगत वस्तु (EPCG) योजना
- अग्रिम प्राधिकरण योजना
- आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0
आगे की राह
- समुद्री व्यापार मार्गों की निगरानी और वैकल्पिक मार्गों की पहचान के लिए एक स्थायी भू-राजनीतिक विश्लेषण इकाई स्थापित करना।
- बंदरगाहों और अंतर्देशीय रसद अवसंरचना (जैसे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) में निवेश में वृद्धि करना ताकि क्षमता और दक्षता बढ़ाई जा सके।
- व्यापार सुगमता को और बढ़ाने के लिए सीमा शुल्क प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और सरलीकरण करना, तथा विभिन्न नियामक एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत करना।
- निर्यातकों, विशेषकर MSME के लिए रियायती निर्यात ऋण और बीमा योजनाओं का विस्तार करना, और जोखिम प्रबंधन तंत्र को मजबूत करना।
- घरेलू समुद्री बीमा क्षमता को और विकसित करना और भारतीय ध्वजपोतों के बेड़े को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करना।
- आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण वस्तुओं के लिए रणनीतिक भंडार विकसित करना और विविधीकृत सोर्सिंग रणनीतियों को बढ़ावा देना।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों में सक्रिय रूप से भाग लेना और वैश्विक व्यापार नियमों को आकार देने में भारत की भूमिका को मजबूत करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
भू-राजनीतिक व्यवधान · आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन · अंतर-मंत्रालयी समूह · निर्बाध माल ढुलाई · व्यापार सुगमता · रसद लागत · निर्यात संवर्धन योजनाएँ · आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) · प्रमुख बंदरगाह · घरेलू समुद्री बीमा पूल · आर्थिक गलियारे · वैश्विक समुद्री व्यापार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 246: संघ सूची (बंदरगाह, शिपिंग) के तहत केंद्र सरकार की विधायी शक्तियाँ।
- अनुच्छेद 265: कानून के प्राधिकार के बिना कोई कर नहीं लगाया जाएगा (सीमा शुल्क से संबंधित)।
- अनुच्छेद 282: संघ और राज्यों द्वारा अपने राजस्व से व्यय (योजनाओं के वित्तपोषण हेतु)।
- अनुच्छेद 301: व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता (आर्थिक गलियारों के माध्यम से)।
अवधारणा प्रवाह
भू-राजनीतिक व्यवधान (वैश्विक संघर्ष, व्यापार युद्ध) → वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर प्रभाव (बाधाएँ, लागत वृद्धि) → भारत के निर्यात-आयात और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर → सरकार द्वारा अंतर-मंत्रालयी समूह का गठन और निगरानी → व्यापार सुगमता, रसद और वित्तीय सहायता के लिए समन्वित उपाय → आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन और आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वाणिज्य विभाग के अंतर्गत गठित अंतर-मंत्रालयी समूह वैश्विक समुद्री व्यापार और रसद पर भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रभाव की निगरानी करता है।
2. इस समूह में विदेश मंत्रालय, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय तथा भारतीय रिज़र्व बैंक शामिल हैं।
3. सरकार ने निर्यात दायित्व अवधि को 31 अगस्त 2026 तक बढ़ा दिया है, जिसमें निर्यात संवर्धन पूंजीगत वस्तु (EPCG) और अग्रिम प्राधिकरण योजनाएँ शामिल हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। वाणिज्य विभाग के अंतर्गत गठित अंतर-मंत्रालयी समूह का मुख्य कार्य वैश्विक समुद्री व्यापार और रसद पर भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रभाव की निरंतर निगरानी करना है। कथन 2 सही है। इस समूह में विदेश मंत्रालय, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय, रिज़र्व बैंक और अन्य संबंधित मंत्रालय/विभाग शामिल हैं। कथन 3 सही है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने EPCG और अग्रिम प्राधिकरण योजनाओं के लिए निर्यात दायित्व अवधि को 31 अगस्त 2026 तक बढ़ा दिया है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से उपाय भू-राजनीतिक व्यवधानों के कारण उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार द्वारा नहीं किया गया है/किए गए हैं?
1. प्रमुख बंदरगाहों पर भूमि किराया और विलंब शुल्क में छूट।
2. निर्यात ऋण अवधि को 270 से घटाकर 180 दिन करना।
3. MSME की तरलता के लिए आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0 शुरू करना।
4. 40 महत्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर मूल सीमा शुल्क को शून्य करना।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2
- केवल 1, 3 और 4
- केवल 2 और 3
उत्तर: केवल 2 — विकल्प 1 सही है। प्रमुख बंदरगाहों पर भूमि किराया और विलंब शुल्क में छूट दी गई है। विकल्प 2 गलत है। RBI/DFS ने विस्तारित निर्यात ऋण अवधि को 270 से बढ़ाकर 450 दिन किया है, न कि घटाया है। विकल्प 3 सही है। MSME की तरलता के लिए ECLGS 5.0 शुरू की गई है। विकल्प 4 सही है। राजस्व विभाग ने 40 महत्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर मूल सीमा शुल्क को शून्य कर दिया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भू-राजनीतिक व्यवधानों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ने वाले प्रभावों का परीक्षण कीजिए। इन चुनौतियों से निपटने और भारत के समुद्री व्यापार को सुगम बनाने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रमुख उपायों की भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: भू-राजनीतिक व्यवधानों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर उनके प्रभाव का संक्षिप्त परिचय दें।
मुख्य भाग 1: भू-राजनीतिक व्यवधानों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तार से परीक्षण करें। इसमें समुद्री व्यापार मार्गों में बाधा, माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं की निरंतरता पर प्रभाव, और विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभावों को शामिल करें।
मुख्य भाग 2: इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा किए गए प्रमुख उपायों की विस्तृत चर्चा करें। इसमें निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल करें:
* अंतर-मंत्रालयी समूह की भूमिका और उसके कार्य।
* निर्यात संवर्धन पूंजीगत वस्तु (EPCG) और अग्रिम प्राधिकरण योजनाओं के तहत निर्यात दायित्व अवधि का विस्तार।
* प्रमुख बंदरगाहों पर परिचालन सहायता, भूमि किराया और विलंब शुल्क में छूट।
* रेल संपर्क के माध्यम से कंटेनर निकासी की सुविधा और समर्पित माल गलियारों का उपयोग।
* व्यापार सुगमता उपाय और रसद लागत को कम करने की पहल।
* RBI/DFS द्वारा विस्तारित निर्यात ऋण अवधि और आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0।
* घरेलू समुद्री बीमा पूल के लिए संप्रभु गारंटी।
* पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर सीमा शुल्क में कमी।
निष्कर्ष: इन उपायों के महत्व और भारत की आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन को मजबूत करने में उनकी भूमिका का सारांश प्रस्तुत करें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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