07 Aug महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से जोड़ने के केंद्र के प्रस्ताव पर सीपीआई(एम) का विरोध
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करने की एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जबकि महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य विधायी निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना है; इन दोनों को जोड़ने से महिला आरक्षण के…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय
- Prelims: महिला आरक्षण विधेयक, परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, संवैधानिक संशोधन, लोकसभा, राज्य विधानसभाएँ, समान प्रतिनिधित्व
- Essay: भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व: चुनौतियाँ और समाधान, संघवाद और संवैधानिक संशोधन: संतुलन की आवश्यकता
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करने की एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जबकि महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य विधायी निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना है; इन दोनों को जोड़ने से महिला आरक्षण के कार्यान्वयन में देरी हो सकती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] ने केंद्र सरकार से महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया से न जोड़ने का आग्रह किया है। पार्टी का मानना है कि परिसीमन के मुद्दे पर अभी तक कोई आम सहमति नहीं बनी है और केंद्र ने विपक्षी दलों के साथ पर्याप्त परामर्श नहीं किया है। CPI(M) ने कहा है कि यदि महिला आरक्षण विधेयक को अलग से पेश किया जाता है, तो विपक्षी दल इसका समर्थन करने के लिए तैयार हैं।
पृष्ठभूमि
- महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य लोकसभा (Lok Sabha) और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करना है।
- यह विधेयक लंबे समय से लंबित है और विभिन्न सरकारों द्वारा इसे पारित करने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन राजनीतिक सहमति के अभाव में यह सफल नहीं हो पाया है।
- परिसीमन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या में परिवर्तन के आधार पर ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखना है।
- भारत में परिसीमन का कार्य परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है, जिसका गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा होता है।
- वर्तमान में, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़ों के आधार पर किया जाना प्रस्तावित है। यह प्रावधान 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा किया गया था।
- विपक्षी दलों का तर्क है कि परिसीमन की प्रक्रिया से कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, खासकर उन राज्यों का जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
- महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का अर्थ है कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब अगला परिसीमन पूरा हो जाएगा, जिसमें काफी समय लग सकता है।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना।
- इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या में परिवर्तन के आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या को यथासंभव समान करना है, ताकि ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखा जा सके।
- भारत में, संविधान के अनुच्छेद 82 (संसद के लिए) और अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाओं के लिए) के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान है।
- परिसीमन का कार्य एक उच्च-शक्ति वाले निकाय, परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- भारत में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है: 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 2001 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित किया जा सके।
- 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने इस स्थगन को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया, जिसका अर्थ है कि अगली जनगणना के आँकड़ों के आधार पर ही नया परिसीमन होगा।
- परिसीमन प्रक्रिया में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से खींचना, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण करना शामिल है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| महिला आरक्षण विधेयक | महिलाओं को विधायी निकायों में प्रतिनिधित्व प्रदान करने का प्रस्ताव। |
| परिसीमन (Delimitation) | विधायी निकायों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण। |
| राजनीतिक दलों की सहमति का अभाव | परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र और विपक्षी दलों के बीच आम सहमति की कमी। |
| पृथक विधेयक की मांग | विपक्षी दल महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से अलग कर पेश करने का समर्थन कर रहे हैं। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा।
- परिसीमन को महिला आरक्षण से जोड़ने से विधेयक के पारित होने में देरी हो सकती है, क्योंकि परिसीमन एक संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दा है जिस पर राजनीतिक सहमति बनाना कठिन है।
सामाजिक महत्व
- विधायी निकायों में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व सामाजिक न्याय और समावेशिता को बढ़ावा देगा, जिससे महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा।
- परिसीमन प्रक्रिया में देरी या विवाद से विभिन्न सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है, जिससे क्षेत्रीय और सामाजिक असंतुलन की चिंताएँ बढ़ सकती हैं।
संवैधानिक और विधायी महत्व
- महिला आरक्षण विधेयक संविधान संशोधन के माध्यम से महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का प्रयास करता है, जो भारतीय लोकतंत्र की संरचना में एक महत्वपूर्ण बदलाव होगा।
- परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत किया जाता है, जिसका उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है।
चुनौतियाँ
1. परिसीमन पर आम सहमति का अभाव
- विभिन्न राजनीतिक दल परिसीमन के आधार, समय और प्रक्रिया पर सहमत नहीं हैं, जिससे विधेयक के पारित होने में बाधा आ रही है।
- केंद्र सरकार द्वारा विपक्षी दलों के साथ पर्याप्त परामर्श न करने का आरोप, जिससे विश्वास की कमी पैदा हुई है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था, संघवाद
2. महिला आरक्षण विधेयक का कार्यान्वयन
- परिसीमन से जोड़ने पर विधेयक के कार्यान्वयन में अनिश्चितता और देरी हो सकती है, जिससे महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिलने में विलंब होगा।
- आरक्षण के भीतर उप-कोटा (sub-quota) जैसे मुद्दों पर भी राजनीतिक सहमति की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण
3. राजनीतिक ध्रुवीकरण
- विधेयक को परिसीमन से जोड़ने से राजनीतिक दलों के बीच ध्रुवीकरण बढ़ सकता है, जिससे महत्वपूर्ण विधायी सुधारों पर आम सहमति बनाना कठिन हो जाएगा।
- विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार इस मुद्दे का राजनीतिकरण कर रही है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजनीति, शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना | विधेयक के पारित होने में देरी और राजनीतिक गतिरोध की संभावना। |
| परिसीमन पर आम सहमति का अभाव | विभिन्न राज्यों और राजनीतिक दलों के बीच जनसंख्या वृद्धि और प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद। |
| परामर्श की कमी | केंद्र सरकार पर विपक्षी दलों के साथ पर्याप्त परामर्श न करने का आरोप, जिससे अविश्वास बढ़ा है। |
| विधायी प्राथमिकताएँ | महिलाओं के प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक सुधारों को प्रक्रियात्मक मुद्दों से जोड़ने से उनकी प्राथमिकता कम हो सकती है। |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से अलग कर एक स्वतंत्र विधेयक के रूप में पेश करना चाहिए।
- परिसीमन के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों और हितधारकों के साथ व्यापक और समावेशी परामर्श आयोजित किया जाना चाहिए।
- एक स्वतंत्र और निष्पक्ष परिसीमन आयोग का गठन किया जाना चाहिए जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार कार्य करे।
- महिला आरक्षण विधेयक के प्रावधानों पर राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
- महिलाओं के लिए आरक्षण के कार्यान्वयन हेतु एक स्पष्ट समय-सीमा और कार्यप्रणाली निर्धारित की जानी चाहिए।
- परिसीमन प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि सभी पक्षों का विश्वास जीता जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
महिला आरक्षण · परिसीमन · संविधान संशोधन · संघवाद · प्रतिनिधित्व · समानता · राजनीतिक सुधार · लोकतांत्रिक प्रक्रिया · संसदीय बहस · राज्यों की भूमिका
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘संसद के प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘राज्यों के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 330’, ‘note’: ‘लोकसभा में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 332’, ‘note’: ‘राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
महिला आरक्षण विधेयक पेश करने का प्रस्ताव → विधेयक को परिसीमन से जोड़ने का सरकारी निर्णय → विपक्षी दलों द्वारा विरोध और पृथक विधेयक की मांग → परिसीमन पर राजनीतिक सहमति का अभाव → विधेयक के पारित होने और कार्यान्वयन में संभावित देरी → विधायी निकायों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम लागू करती है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
3. महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को अंतिम माना जाता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, ताकि परिसीमन प्रक्रिया में देरी न हो। कथन 3 भी सही है। महिला आरक्षण विधेयक का मुख्य उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करना है।
Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. परिसीमन आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
2. परिसीमन आयोग में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त, संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त और सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश शामिल होते हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: केवल 1 — कथन 1 सही है। परिसीमन आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। कथन 2 गलत है। परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश (जो अध्यक्ष होते हैं), मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं, न कि सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश और मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने के औचित्य का समालोचनात्मक परीक्षण करें। क्या यह कदम संघवाद और राज्यों के प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को प्रभावित कर सकता है? (15 अंक)
रूपरेखा: उत्तर की संरचना में निम्नलिखित बिंदु शामिल होने चाहिए:
1. **परिचय:** महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन के बीच संबंध की वर्तमान बहस का संक्षिप्त परिचय।
2. **महिला आरक्षण का औचित्य:** महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण, लैंगिक समानता और समावेशी लोकतंत्र के लिए महिला आरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालें।
3. **परिसीमन का उद्देश्य:** परिसीमन की संवैधानिक आवश्यकता (अनुच्छेद 82), ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत और जनसंख्या परिवर्तन के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण के महत्व को स्पष्ट करें।
4. **संयोजन का औचित्य (सरकार का संभावित तर्क):** तर्क दें कि जनसंख्या नियंत्रण में राज्यों के प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए भविष्य के परिसीमन के बाद ही आरक्षण लागू करना तार्किक हो सकता है, ताकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को दंडित न किया जाए।
5. **संयोजन की समालोचना (विपक्ष और विशेषज्ञों के तर्क):**
* **तत्काल कार्यान्वयन की आवश्यकता:** महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने की मांग, क्योंकि यह दशकों से लंबित है।
* **अनावश्यक देरी:** परिसीमन प्रक्रिया में लगने वाले समय (जनगणना, आयोग का गठन, रिपोर्ट) के कारण महिला आरक्षण के कार्यान्वयन में अत्यधिक देरी की संभावना।
* **संघवाद पर प्रभाव:** दक्षिणी राज्यों जैसे जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों की लोकसभा सीटों में संभावित कमी और इससे उनके प्रतिनिधित्व पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव पर चर्चा करें।
* **राजनीतिक सर्वसम्मति का अभाव:** परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति की कमी, जिससे महिला आरक्षण विधेयक भी विवादों में घिर सकता है।
* **अलग-अलग मुद्दे:** तर्क दें कि महिला आरक्षण और परिसीमन दो अलग-अलग संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दे हैं जिन्हें अलग-अलग निपटाया जाना चाहिए।
6. **संघवाद और प्रतिनिधित्व पर प्रभाव:** स्पष्ट करें कि कैसे परिसीमन का जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण संघवाद के सिद्धांत को प्रभावित कर सकता है, खासकर उन राज्यों के लिए जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन किया है। इससे राज्यों के बीच असंतोष बढ़ सकता है और केंद्र-राज्य संबंधों पर तनाव आ सकता है।
7. **निष्कर्ष:** एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें, जिसमें महिला आरक्षण की तात्कालिकता और परिसीमन की संवेदनशीलता दोनों को स्वीकार किया जाए। सुझाएं कि दोनों मुद्दों को अलग-अलग संबोधित करने या व्यापक राजनीतिक परामर्श के माध्यम से एक स्वीकार्य समाधान खोजने की आवश्यकता है। संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप समाधान पर बल दें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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