मेकेडाटू परियोजना: सीडब्ल्यूसी ने कर्नाटक को संशोधित डीपीआर प्रस्तुत करने को कहा

Mekedatu: CWC asks Karnataka to submit revised Detailed Project Report — diagram

मेकेडाटू परियोजना: सीडब्ल्यूसी ने कर्नाटक को संशोधित डीपीआर प्रस्तुत करने को कहा

Mekedatu Reservoir ProjectBalance ReservoirKaveri RiverDrinking waterDPR SubmissionJan 20194.75 tmcft extraCWC ReviewExcess water useRevised DPR requiredCWDT Decision2007 finalSupreme Court 2018Allocated Water6.5 tmcftUrban & ruralRegulatory ComplianceInter-stateJudicial orders
Mekedatu Reservoir Project

✎ मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक की एक पेयजल और संतुलन जलाशय परियोजना है, जिसे केंद्रीय जल आयोग ने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के निर्णय और सुप्रीम कोर्ट के जल आवंटन के अनुपालन में संशोधित DPR प्रस्तुत करने के लिए वापस कर…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय जल विवाद  |  GS Paper III — पर्यावरण: जल संसाधन प्रबंधन, नदी घाटी परियोजनाएँ
  • Prelims: मेकेदाटू परियोजना, कावेरी नदी, केंद्रीय जल आयोग (CWC), कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT), अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR)
  • Essay: भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों का प्रबंधन: चुनौतियाँ और समाधान, संघवाद और जल संसाधन: सहकारी संघवाद की आवश्यकता

त्वरित पुनरावृत्ति: मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक की एक पेयजल और संतुलन जलाशय परियोजना है, जिसे केंद्रीय जल आयोग ने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के निर्णय और सुप्रीम कोर्ट के जल आवंटन के अनुपालन में संशोधित DPR प्रस्तुत करने के लिए वापस कर दिया है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदाटू संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना की संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को वापस कर दिया है। आयोग ने कर्नाटक से कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय और अपनी कुछ टिप्पणियों के अनुपालन में एक नई DPR प्रस्तुत करने को कहा है। CWC ने पाया है कि परियोजना में प्रस्तावित जल का उपभोग सुप्रीम कोर्ट द्वारा कर्नाटक को आवंटित मात्रा से अधिक है।

पृष्ठभूमि

  • मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर एक संतुलन जलाशय और पेयजल परियोजना है, जिसे कर्नाटक सरकार बेंगलुरु महानगर क्षेत्र और उसके आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए प्रस्तावित कर रही है।
  • कावेरी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं।
  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) का गठन 1990 में अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) के तहत किया गया था।
  • CWDT ने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में संशोधित किया। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के लिए शहरी और ग्रामीण आबादी हेतु कुल 6.5 tmcft (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) जल के उपभोग को अंतिम रूप दिया था।
  • कर्नाटक ने जनवरी 2019 में पहली बार मेकेदाटू परियोजना की DPR CWC को सौंपी थी, जिसमें 4.75 tmcft अतिरिक्त उपभोग्य जल का प्रस्ताव था।

केंद्रीय जल आयोग (CWC) और अंतर-राज्यीय जल विवाद

  • केंद्रीय जल आयोग (CWC) जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के तहत एक प्रमुख तकनीकी संगठन है, जो देश में जल संसाधनों के प्रबंधन और उपयोग से संबंधित मामलों में सलाह देता है।
  • CWC सिंचाई और बहुउद्देशीय परियोजनाओं की DPRs की जांच, मूल्यांकन और स्वीकृति के लिए दिशानिर्देश जारी करता है।
  • अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 संसद को दो या अधिक राज्यों के बीच नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार देता है।
  • जब किसी अंतर-राज्यीय जल विवाद में किसी राज्य द्वारा प्रस्तुत परियोजना में जल के उपभोग या भंडारण का प्रस्ताव होता है, तो उसे संबंधित न्यायाधिकरण के निर्णय या सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करना होता है।
  • CWC का मुख्य कार्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रस्तावित परियोजनाएँ मौजूदा जल आवंटन, पर्यावरणीय मानदंडों और तकनीकी व्यवहार्यता के अनुरूप हों।
  • मेकेदाटू परियोजना के मामले में, CWC ने पाया कि प्रस्तावित जल का उपभोग सुप्रीम कोर्ट द्वारा कर्नाटक को आवंटित 6.5 tmcft की कुल सीमा से अधिक है, जिसमें वर्तमान उपभोग भी शामिल है।
  • CWC ने परियोजना के लिए प्रस्तावित 59.46 tmcft की लाइव स्टोरेज क्षमता के निर्धारण के आधार पर भी सवाल उठाया है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
मेकेदाटू परियोजना का उद्देश्य बेंगलुरु महानगर क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराना तथा जलविद्युत उत्पादन करना।
परियोजना की वर्तमान स्थिति केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने कर्नाटक के संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को वापस कर दिया है, जिसमें कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन का आग्रह किया गया है।
जल उपयोग में विसंगति CWC ने पाया है कि प्रस्तावित उपभोग्य जल उपयोग (6.95 tmcft) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कर्नाटक को आवंटित मात्रा (6.5 tmcft) से अधिक है।
अतिरिक्त घटक संशोधित DPR में मेकेदाटू जलाशय के अतिरिक्त शिवनसमुद्र रन-ऑफ-रिवर पावर (SRRP) परियोजना और कावेरी नदी पर एक डायवर्जन वियर का निर्माण भी प्रस्तावित है।
भंडारण क्षमता पर आपत्ति CWC ने प्रस्तावित मेकेदाटू जलाशय की 59.46 tmcft की लाइव स्टोरेज क्षमता के निर्धारण के आधार को भी अनुपयुक्त बताया है।
राज्य सरकार का रुख कर्नाटक सरकार इसे एक प्रक्रियात्मक मामला मान रही है और CWC के सुझावों के अनुसार आवश्यक संशोधन करने का दावा कर रही है।

महत्व

अंतर-राज्यीय जल विवाद

  • यह परियोजना कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल बंटवारे के लंबे समय से चले आ रहे विवाद का एक और पहलू है।
  • CWC का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि राज्यों द्वारा प्रस्तावित परियोजनाएं स्थापित जल-बंटवारे के समझौतों और न्यायिक निर्णयों के अनुरूप हों।

शहरीकरण और पेयजल सुरक्षा

  • बेंगलुरु जैसे तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों के लिए पेयजल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मेकेदाटू परियोजना महत्वपूर्ण है।
  • हालांकि, इस मांग को पूरा करते समय अंतर-राज्यीय जल-बंटवारे के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक है।

संघवाद और नियामक संस्थाएँ

  • यह मामला भारत में संघवाद (Federalism) की जटिलताओं को दर्शाता है, जहाँ राज्यों के विकास संबंधी आकांक्षाओं को केंद्रीय नियामक निकायों (जैसे CWC) और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से संतुलित किया जाता है।
  • CWC जैसी संस्थाओं की भूमिका यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है कि जल संसाधनों का न्यायसंगत और टिकाऊ उपयोग हो।

पर्यावरणीय प्रभाव

  • नदी घाटी परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impact) हमेशा चिंता का विषय होते हैं, और मेकेदाटू परियोजना के लिए भी विस्तृत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और मंजूरी की आवश्यकता होगी।

चुनौतियाँ

1. अंतर-राज्यीय जल विवाद

  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के बावजूद, राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर असहमति बनी हुई है।
  • यह विवाद राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को बाधित करता है।

2. नियामक अनुपालन

  • राज्यों द्वारा प्रस्तुत परियोजनाओं को केंद्रीय नियामक निकायों जैसे CWC के दिशानिर्देशों और स्थापित मानदंडों का पालन करना होता है।
  • DPR में विसंगतियाँ परियोजना के कार्यान्वयन में देरी का कारण बनती हैं।

3. पेयजल सुरक्षा बनाम जल-बंटवारा

  • शहरीकरण के कारण पेयजल की बढ़ती मांग को पूरा करना एक चुनौती है, विशेषकर जब यह अंतर-राज्यीय जल-बंटवारे के समझौतों से टकराता हो।
  • संतुलन बनाना आवश्यक है ताकि किसी भी राज्य के हिस्से के पानी का अनुचित उपयोग न हो।

4. पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव

  • बड़े बांध और जलाशय परियोजनाओं के कारण विस्थापन, जैव विविधता का नुकसान और पारिस्थितिक तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • इन प्रभावों का उचित मूल्यांकन और शमन आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
जल उपयोग में विसंगति कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित 6.95 tmcft जल उपयोग सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आवंटित 6.5 tmcft से अधिक है, जिससे तमिलनाडु को मिलने वाले पानी पर असर पड़ सकता है।
परियोजना के नए घटक संशोधित DPR में मेकेदाटू जलाशय के अतिरिक्त शिवनसमुद्र रन-ऑफ-रिवर पावर (SRRP) परियोजना और डायवर्जन वियर जैसे नए घटक शामिल किए गए हैं, जिनका मूल DPR में उल्लेख नहीं था।
भंडारण क्षमता का आधार CWC ने प्रस्तावित मेकेदाटू जलाशय की लाइव स्टोरेज क्षमता (59.46 tmcft) के निर्धारण के आधार को अनुपयुक्त पाया है, जिससे परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय का अनुपालन परियोजना को CWDT के निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें कर्नाटक के लिए जल आवंटन स्पष्ट रूप से निर्धारित है।
अंतर-राज्यीय सहमति का अभाव तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध कर रहा है, जिससे अंतर-राज्यीय सहमति का अभाव है और परियोजना के कार्यान्वयन में बाधा आ रही है।

आगे की राह

  • कर्नाटक को CWC की आपत्तियों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप एक संशोधित और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) प्रस्तुत करनी चाहिए।
  • परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गहन मूल्यांकन (EIA) किया जाना चाहिए और उचित शमन उपाय प्रस्तावित किए जाने चाहिए।
  • केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए एक प्रभावी मध्यस्थता तंत्र को मजबूत करना चाहिए।
  • राज्यों को जल संसाधनों के प्रबंधन में सहयोग और पारदर्शिता को बढ़ावा देना चाहिए, विशेषकर साझा नदी घाटियों के संदर्भ में।
  • पेयजल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वैकल्पिक और टिकाऊ जल स्रोतों तथा जल संरक्षण तकनीकों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
  • सभी हितधारकों, विशेषकर प्रभावित राज्यों के साथ नियमित परामर्श और संवाद स्थापित किया जाना चाहिए।
  • CWC को अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाना चाहिए ताकि परियोजनाओं को अनावश्यक देरी का सामना न करना पड़े।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मेकेदाटू परियोजना · कावेरी जल विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद · केंद्रीय जल आयोग (CWC) · विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) · कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) · न्यायिक समीक्षा · संघवाद · जल प्रशासन · पर्यावरणीय प्रभाव आकलन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘अनुच्छेद 262’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
  • {‘सातवीं अनुसूची, सूची II, प्रविष्टि 17’: ‘राज्यों के जल संसाधन’}
  • {‘सातवीं अनुसूची, सूची I, प्रविष्टि 56’: ‘अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन एवं विकास’}

अवधारणा प्रवाह

कर्नाटक ने मेकेदाटू परियोजना का DPR CWC को प्रस्तुत किया।  →  CWC ने DPR में जल उपयोग और अन्य घटकों में विसंगतियाँ पाईं।  →  CWC ने कर्नाटक को संशोधित DPR प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।  →  परियोजना को कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का पालन करना होगा।  →  यह अंतर-राज्यीय जल विवाद और शहरी पेयजल सुरक्षा के मुद्दे को उजागर करता है।  →  परियोजना के लिए नियामक अनुपालन और अंतर-राज्यीय सहमति आवश्यक है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है।
2. केंद्रीय जल आयोग (CWC) जल शक्ति मंत्रालय के अधीन एक तकनीकी संगठन है।
3. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीनों
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीनों — कथन 1 सही है। मेकेदाटू परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित है, जिसका उद्देश्य पेयजल और बिजली उत्पादन है।
कथन 2 सही है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) जल शक्ति मंत्रालय के अधीन एक प्रमुख तकनीकी संगठन है, जो देश में जल संसाधन विकास के क्षेत्र में काम करता है।
कथन 3 सही है। कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के तहत किया गया था, ताकि कावेरी नदी जल के बंटवारे से संबंधित विवादों का समाधान किया जा सके।

Q2. अभिकथन (A): अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान भारत में संघवाद के सिद्धांतों के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करता है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है। अंतर-राज्यीय जल विवाद अक्सर राज्यों के बीच तनाव पैदा करते हैं और सहकारी संघवाद के सिद्धांतों को चुनौती देते हैं।
कारण (R) भी सही है। अनुच्छेद 262 संसद को ऐसे विवादों के समाधान के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जैसे कि अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956। यह प्रावधान इन विवादों को हल करने के लिए एक संवैधानिक तंत्र प्रदान करता है, जो संघवाद की चुनौतियों को संबोधित करता है। इस प्रकार, R, A की सही व्याख्या है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में केंद्रीय जल आयोग (CWC) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। मेकेदाटू परियोजना के संदर्भ में, ऐसे विवादों के समाधान में आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का संक्षिप्त परिचय और भारत में उनकी प्रासंगिकता।
2. **केंद्रीय जल आयोग (CWC) की भूमिका:**
* जल संसाधन विकास के लिए तकनीकी विशेषज्ञता और सलाह प्रदान करना।
* परियोजना रिपोर्टों (जैसे DPR) की जांच और मूल्यांकन।
* जल उपयोग और आवंटन पर तकनीकी अवलोकन और सिफारिशें।
* अंतर-राज्यीय जल विवाद न्यायाधिकरणों को तकनीकी सहायता।
* जल संसाधनों के एकीकृत प्रबंधन को बढ़ावा देना।
3. **मेकेदाटू परियोजना का संदर्भ:**
* परियोजना का संक्षिप्त विवरण और इसका उद्देश्य (पेयजल, बिजली)।
* CWC द्वारा DPR को वापस करने के कारण (आवंटन से अधिक पानी का उपयोग, संशोधित घटकों में वृद्धि)।
* कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन।
4. **अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में चुनौतियाँ:**
* **राज्यों के बीच राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव:** राज्यों के अपने हितों को प्राथमिकता देना।
* **डेटा की कमी और भिन्नता:** जल उपलब्धता, उपयोग और आवश्यकता पर सहमत डेटा का अभाव।
* **न्यायिक हस्तक्षेप और लंबी प्रक्रियाएँ:** न्यायाधिकरणों और अदालतों में लंबे समय तक चलने वाले मामले।
* **तकनीकी जटिलताएँ:** जल विज्ञान, इंजीनियरिंग और पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन।
* **बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण का दबाव:** पेयजल और सिंचाई की बढ़ती मांग।
* **पर्यावरणीय चिंताएँ:** बांधों और जलाशयों के पारिस्थितिक प्रभाव।
* **संविधानिक प्रावधानों की सीमाएँ:** अनुच्छेद 262 के तहत न्यायाधिकरणों के निर्णयों की अंतिम प्रकृति पर बहस।
5. **निष्कर्ष:** सहकारी संघवाद के महत्व पर बल देते हुए, विवादों के समाधान के लिए एक व्यापक, तकनीकी रूप से सुदृढ़ और राजनीतिक रूप से सहमत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर प्रकाश डालना।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments

Post A Comment