20 Aug यूपीएससी ने ओडिशा डीजीपी चयन बैठक को स्थगित करने पर सर्वोच्च न्यायालय में सहमति व्यक्त की
✎ प्रकाश सिंह वाद उच्चतम न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसने पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और पुलिस सुधारों को लागू करने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली | GS Paper II — शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पहलू
- Prelims: पुलिस महानिदेशक (DGP), प्रकाश सिंह वाद (Prakash Singh case), अनुच्छेद 142 (Article 142), संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), राज्य पुलिस प्रमुखों का कार्यकाल, न्यायिक सक्रियता
- Essay: भारत में पुलिस सुधारों की आवश्यकता और चुनौतियाँ, न्यायपालिका की भूमिका: कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना
त्वरित पुनरावृत्ति: प्रकाश सिंह वाद उच्चतम न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय है जिसने पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और पुलिस सुधारों को लागू करने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने ओडिशा के पुलिस महानिदेशक (Director General of Police – DGP) के चयन के संबंध में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को अगली सुनवाई तक बैठक स्थगित करने का निर्देश दिया है। यह मामला ओडिशा सरकार द्वारा एक कनिष्ठ अधिकारी को DGP पद के उम्मीदवारों की सूची में शामिल करने के कथित प्रयास से संबंधित है, जो उच्चतम न्यायालय के ‘प्रकाश सिंह वाद’ में दिए गए निर्देशों का उल्लंघन माना जा रहा है।
पृष्ठभूमि
- वर्ष 2006 में, उच्चतम न्यायालय ने ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ वाद में पुलिस सुधारों को लेकर ऐतिहासिक निर्णय दिया था।
- इस निर्णय का उद्देश्य पुलिस बल को राजनीतिक और अन्य बाहरी दबावों से मुक्त करना था ताकि वह निष्पक्ष रूप से कार्य कर सके।
- न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए कई दिशा-निर्देश जारी किए थे।
- इन निर्देशों में यह शामिल था कि DGP का चयन राज्य सरकारों द्वारा UPSC द्वारा सूचीबद्ध तीन सबसे वरिष्ठ और योग्य अधिकारियों में से किया जाना चाहिए।
- न्यायालय ने ‘कार्यवाहक DGP’ (acting DGP) की अवधारणा को समाप्त कर दिया और पुलिस प्रमुखों के लिए न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल अनिवार्य किया।
- जुलाई 2018 और मार्च 2019 के बाद के उच्चतम न्यायालय के आदेशों ने नियुक्ति तंत्र का और अधिक विवरण दिया, जिसमें पदधारी DGP की सेवानिवृत्ति से तीन महीने पहले UPSC को प्रस्ताव भेजना शामिल था।
प्रकाश सिंह वाद और पुलिस सुधार
- प्रकाश सिंह वाद भारतीय पुलिस व्यवस्था में सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप था, जिसका उद्देश्य पुलिस बल को अधिक स्वायत्त, जवाबदेह और पेशेवर बनाना था।
- उच्चतम न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए।
- इन निर्देशों के अनुसार, राज्य सरकारों को UPSC द्वारा तैयार किए गए तीन सबसे वरिष्ठ और योग्य अधिकारियों के पैनल में से ही DGP का चयन करना होगा।
- DGP को न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि वे बिना किसी भय या पक्षपात के कार्य कर सकें और नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
- न्यायालय ने राज्य सुरक्षा आयोगों (State Security Commissions) की स्थापना, पुलिस स्थापना बोर्डों (Police Establishment Boards) का गठन और पुलिस शिकायत प्राधिकरणों (Police Complaints Authorities) की स्थापना जैसे अन्य सुधारों का भी सुझाव दिया था।
- अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को ऐसे आदेश पारित करने की शक्ति देता है जो उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले में ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए आवश्यक हों।
- इस वाद में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि DGP का पद राजनीतिक या अन्य बाहरी दबावों से मुक्त होना चाहिए ताकि पुलिस बल की स्वतंत्रता और अखंडता बनी रहे।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| DGP चयन प्रक्रिया | राज्यों में पुलिस बल के प्रमुख के चयन की विधि, जो सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों से नियंत्रित होती है। |
| प्रकाश सिंह निर्णय (2006) | सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय जिसने पुलिस सुधारों के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए, विशेष रूप से DGP की नियुक्ति और कार्यकाल के संबंध में। |
| निश्चित कार्यकाल | DGP के लिए न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल, ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति और कार्यात्मक स्वायत्तता सुनिश्चित हो सके। |
| UPSC की भूमिका | DGP पद के लिए उपयुक्त अधिकारियों का एक पैनल तैयार करने में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की केंद्रीय भूमिका। |
| वरिष्ठता और योग्यता | DGP के चयन में वरिष्ठता, योग्यता और उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड को प्राथमिकता देना। |
महत्व
शासन और प्रशासन
- यह मामला राज्यों में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के महत्व को रेखांकित करता है।
- यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करने और पुलिस बल को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने की आवश्यकता पर बल देता है, जिससे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में उनकी स्वायत्तता बनी रहे।
- यह प्रशासनिक नियुक्तियों में नियमों और प्रक्रियाओं के उल्लंघन के आरोपों की न्यायिक समीक्षा की भूमिका को दर्शाता है।
न्यायिक हस्तक्षेप और पुलिस सुधार
- सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के माध्यम से पुलिस सुधारों को लागू करने की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- यह पुलिस बल के पेशेवर कामकाज और राजनीतिक हस्तक्षेप से उसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।
- यह पुलिस नेतृत्व में स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए DGP के लिए निश्चित कार्यकाल के महत्व पर प्रकाश डालता है।
संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
- यह मामला राज्यों के भीतर महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों से संबंधित निर्णयों में केंद्र सरकार (UPSC के माध्यम से) और राज्य सरकारों के बीच संभावित तनाव और सहयोग के क्षेत्रों को दर्शाता है।
- यह दर्शाता है कि कैसे सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश संघीय ढांचे के भीतर प्रशासनिक प्रक्रियाओं के मानकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चुनौतियाँ
1. राजनीतिक हस्तक्षेप
- DGP की नियुक्ति में राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा हस्तक्षेप की प्रवृत्ति, जो पुलिस बल के पेशेवर कामकाज को प्रभावित कर सकती है।
- वरिष्ठता और योग्यता के बजाय राजनीतिक विचारों के आधार पर अधिकारियों को बढ़ावा देने या चुनने का प्रयास।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही; पुलिस सुधार
2. सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों का अनुपालन
- राज्य सरकारों द्वारा ‘प्रकाश सिंह’ निर्णय और बाद के आदेशों में निर्धारित दिशानिर्देशों का पूर्ण और समय पर अनुपालन सुनिश्चित करना।
- नियुक्ति प्रक्रिया में मनमानी या नियमों के उल्लंघन के आरोपों से निपटना।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, न्यायपालिका; शासन
3. प्रशासनिक पारदर्शिता
- DGP चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, जिससे भाई-भतीजावाद या अनुचित प्रभाव के आरोप लग सकते हैं।
- पैनल में शामिल किए जाने वाले अधिकारियों के लिए स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ मानदंड सुनिश्चित करना।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही
4. पुलिस बल का मनोबल
- यदि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष और योग्यता-आधारित नहीं है, तो पुलिस बल के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों का मनोबल गिर सकता है।
- अधिकारियों के बीच अविश्वास और आंतरिक कलह की संभावना।
यूपीएससी लिंक: शासन; आंतरिक सुरक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| DGP चयन में देरी | पुलिस बल के नेतृत्व में अनिश्चितता और प्रशासनिक अस्थिरता। |
| कनिष्ठ अधिकारी को शामिल करने का आरोप | वरिष्ठता और योग्यता के सिद्धांतों का उल्लंघन, जो ‘प्रकाश सिंह’ निर्णय के विपरीत है। |
| सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन | न्यायिक निर्देशों की अवहेलना, जो कानून के शासन को कमजोर करती है। |
| राजनीतिक हस्तक्षेप का आरोप | पुलिस बल की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर सवाल, जो कानून-व्यवस्था के लिए हानिकारक है। |
| UPSC की भूमिका पर प्रश्न | UPSC की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर दबाव, यदि वह राजनीतिक दबाव में काम करता है। |
आगे की राह
- राज्य सरकारों को सर्वोच्च न्यायालय के ‘प्रकाश सिंह’ निर्णय और बाद के आदेशों में निर्धारित DGP चयन दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए।
- DGP पद के लिए उपयुक्त अधिकारियों का पैनल तैयार करने की प्रक्रिया में UPSC को पूर्ण स्वायत्तता और स्वतंत्रता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिसमें वरिष्ठता, योग्यता और उत्कृष्ट सेवा रिकॉर्ड को प्रमुख मानदंड बनाया जाए।
- DGP के लिए न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि उन्हें राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करने का अवसर मिल सके।
- पुलिस बल में आंतरिक अनुशासन और मनोबल बनाए रखने के लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पदोन्नति और नियुक्तियां केवल योग्यता और वरिष्ठता के आधार पर हों।
- न्यायपालिका को पुलिस सुधारों के कार्यान्वयन की निगरानी जारी रखनी चाहिए और किसी भी उल्लंघन के मामले में त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
प्रकाश सिंह वाद · पुलिस सुधार · DGP चयन प्रक्रिया · संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) · अनुच्छेद 142 · न्यायिक सक्रियता · संघवाद · राज्य पुलिस बल · पुलिस महानिदेशक · निश्चित कार्यकाल
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 142’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय की असाधारण शक्तियाँ’}
अवधारणा प्रवाह
राज्य सरकार द्वारा DGP चयन प्रक्रिया शुरू करना → सर्वोच्च न्यायालय के ‘प्रकाश सिंह’ निर्णय के उल्लंघन का आरोप → सर्वोच्च न्यायालय का मामले में हस्तक्षेप → UPSC द्वारा चयन बैठक स्थगित करने पर सहमति → न्यायिक समीक्षा और पुलिस सुधारों का महत्व
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रकाश सिंह वाद (Prakash Singh case) में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक (DGP) के चयन और कार्यकाल से संबंधित दिशानिर्देश जारी किए थे।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए ये दिशानिर्देश जारी किए थे।
3. इन दिशानिर्देशों के अनुसार, राज्य सरकारों को DGP का चयन UPSC द्वारा पैनलबद्ध किए गए तीन सबसे वरिष्ठ और मेधावी अधिकारियों में से करना होता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि प्रकाश सिंह वाद पुलिस सुधारों और DGP के चयन से संबंधित एक ऐतिहासिक निर्णय है। कथन 2 सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में अनुच्छेद 142 का प्रयोग किया था। कथन 3 भी सही है क्योंकि दिशानिर्देशों में UPSC द्वारा पैनलबद्ध तीन वरिष्ठ अधिकारियों में से चयन का प्रावधान है।
Q2. अभिकथन (A): पुलिस महानिदेशक (DGP) का पद राजनीतिक या अन्य बाहरी दबावों से मुक्त होना चाहिए।
कारण (R): सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने के लिए DGP के लिए न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल अनिवार्य किया है कि वे स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि प्रकाश सिंह वाद का मुख्य उद्देश्य DGP के पद को राजनीतिक दबावों से मुक्त करना था। कारण (R) भी सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने DGP के लिए न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल अनिवार्य किया था ताकि वे स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें और यह A की सही व्याख्या भी है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ प्रकाश सिंह वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों के आलोक में पुलिस महानिदेशक (DGP) के चयन और कार्यकाल से संबंधित मुद्दों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ये दिशानिर्देश पुलिस बलों के राजनीतिकरण को रोकने में सफल रहे हैं? (15 अंक)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: प्रकाश सिंह वाद (2006) और उसके महत्व का संक्षिप्त परिचय, जिसमें पुलिस सुधारों और DGP के चयन पर इसके प्रभाव का उल्लेख हो।
2. प्रकाश सिंह वाद के प्रमुख दिशानिर्देश: DGP के चयन (UPSC द्वारा पैनलबद्ध तीन वरिष्ठ अधिकारियों में से), न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल, कार्यवाहक DGP की अवधारणा को समाप्त करना, राज्य सरकार द्वारा तीन महीने पहले प्रस्ताव भेजने आदि का विस्तृत उल्लेख।
3. दिशानिर्देशों का उद्देश्य: पुलिस बलों को राजनीतिक और अन्य बाहरी दबावों से मुक्त करना, पुलिस की स्वायत्तता और व्यावसायिकता सुनिश्चित करना।
4. सफलताओं का विश्लेषण: कुछ हद तक राजनीतिक हस्तक्षेप में कमी, कार्यकाल की स्थिरता, चयन प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता।
5. चुनौतियों/कमियों का समालोचनात्मक परीक्षण: दिशानिर्देशों का पूर्ण कार्यान्वयन न होना, राज्यों द्वारा ‘कार्यवाहक DGP’ की नियुक्ति के माध्यम से दिशानिर्देशों को दरकिनार करने के प्रयास, चयन प्रक्रिया में अभी भी संभावित राजनीतिक प्रभाव, राज्य सरकारों और केंद्र के बीच समन्वय में मुद्दे।
6. हालिया घटनाक्रमों का संदर्भ: ओडिशा DGP चयन मामले जैसे वर्तमान उदाहरणों का उल्लेख, जो दिशानिर्देशों के उल्लंघन के आरोपों को उजागर करते हैं।
7. निष्कर्ष: पुलिस सुधारों की निरंतर आवश्यकता, दिशानिर्देशों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सुझाव और पुलिस बलों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के महत्व पर बल।
स्रोत: The Hindu
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