राज्यसभा अध्यक्ष ने केंद्र से अमित शाह की उपस्थिति पर विचार करने को कहा

‘Consider request for Amit Shah’s Rajya Sabha presence’: Chairman to Centre — concept mind map

राज्यसभा अध्यक्ष ने केंद्र से अमित शाह की उपस्थिति पर विचार करने को कहा

✎ संसदीय लोकतंत्र में, मंत्रियों की सदन में उपस्थिति और उनके द्वारा सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर दिए गए स्पष्टीकरण सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए आवश्यक हैं, जबकि विपक्ष की भूमिका सरकार पर निगरानी रखने और उसे जवाबदेह…

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Rajya Sabha process

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इससे उत्पन्न होने वाले विषय।  |  GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका का कार्यकरण, मंत्रालयों और विभागों की सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके डिजाइन तथा कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।
  • Prelims: राज्यसभा अध्यक्ष (Chairman of Rajya Sabha), संसदीय कार्य मंत्री (Minister of Parliamentary Affairs), संसद के नियम (Rules of Parliament), विपक्ष के नेता (Leader of Opposition), प्रश्नकाल (Question Hour), शून्यकाल (Zero Hour), संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privileges)
  • Essay: संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका और उसकी चुनौतियाँ, भारत में संसदीय कार्यवाही का महत्व और उसकी प्रभावशीलता

त्वरित पुनरावृत्ति: संसदीय लोकतंत्र में, मंत्रियों की सदन में उपस्थिति और उनके द्वारा सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर दिए गए स्पष्टीकरण सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए आवश्यक हैं, जबकि विपक्ष की भूमिका सरकार पर निगरानी रखने और उसे जवाबदेह ठहराने की होती है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, राज्यसभा के सभापति ने केंद्र सरकार से केंद्रीय गृह मंत्री की सदन में उपस्थिति के विपक्ष के अनुरोध पर विचार करने को कहा। विपक्ष के सांसद सुरक्षा बलों द्वारा कथित ज्यादतियों पर गृह मंत्री से स्पष्टीकरण की मांग कर रहे थे। यह घटना संसदीय कार्यवाही, मंत्रियों की जवाबदेही और विपक्ष की भूमिका से संबंधित कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उजागर करती है।

पृष्ठभूमि

  • संसद में मंत्री की उपस्थिति की मांग विपक्ष द्वारा सरकार को जवाबदेह ठहराने का एक सामान्य तरीका है।
  • विपक्ष के सांसदों ने 20 जुलाई को पेपर लीक के विरोध में संसद की ओर मार्च कर रहे युवाओं पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई के दौरान कथित ज्यादतियों पर गृह मंत्री से जवाब मांगा था।
  • राज्यसभा के सभापति ने संसदीय कार्य मंत्री से विपक्ष की भावनाओं को गृह मंत्री तक पहुंचाने का अनुरोध किया।
  • संसदीय कार्य मंत्री ने विपक्ष के व्यवधानों को समाप्त करने के लिए नियम 235 और अप्रासंगिकता या पुनरावृत्ति पर नियम 240 का हवाला दिया।
  • विपक्ष के नेता ने जोर देकर कहा कि सदन में क्या, कब और कैसे कहना है, यह तय करना उनका अधिकार है।
  • विपक्ष के नेता ने यह भी उल्लेख किया कि भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली ने कहा था कि व्यवधान लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग है।

संसदीय कार्यवाही और मंत्रियों की जवाबदेही

  • भारतीय संसदीय प्रणाली में, मंत्री सामूहिक रूप से संसद के प्रति और विशेष रूप से लोकसभा के प्रति जवाबदेह होते हैं (अनुच्छेद 75)। हालांकि, राज्यसभा में भी मंत्रियों से प्रश्न पूछे जा सकते हैं और उनसे स्पष्टीकरण की अपेक्षा की जाती है।
  • संसद के दोनों सदनों में सदस्यों को प्रश्न पूछने, प्रस्ताव लाने और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करने का अधिकार है, जिसके माध्यम से वे सरकार को जवाबदेह ठहराते हैं।
  • प्रश्नकाल और शून्यकाल जैसे संसदीय उपकरण सदस्यों को सार्वजनिक महत्व के मामलों को उठाने और मंत्रियों से जवाब मांगने का अवसर प्रदान करते हैं।
  • संसदीय नियम, जैसे कि नियम 235 और नियम 240, सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने और सदस्यों द्वारा नियमों के उल्लंघन को रोकने के लिए बनाए गए हैं।
  • विपक्ष की भूमिका सरकार की नीतियों और कार्यों की आलोचना करना, सार्वजनिक मुद्दों को उठाना और सरकार को जवाबदेह ठहराना है। यह लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति के रूप में कार्य करता है।
  • संसदीय कार्य मंत्री की भूमिका सरकार और संसद के बीच समन्वय स्थापित करना, विधायी एजेंडे का प्रबंधन करना और सदन के पटल पर सरकार का प्रतिनिधित्व करना है।
  • सभापति (राज्यसभा में) या अध्यक्ष (लोकसभा में) सदन की कार्यवाही के संरक्षक होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि नियमों का पालन हो तथा सभी सदस्यों को बोलने का उचित अवसर मिले।
  • मंत्रियों की सदन में उपस्थिति और उनके द्वारा दिए गए बयान सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
संसदीय कार्यवाही संसद के कामकाज और बहस की प्रक्रिया को दर्शाता है।
विपक्ष की भूमिका सरकार को जवाबदेह ठहराने और जनहित के मुद्दों को उठाने में विपक्ष के महत्व को रेखांकित करता है।
अध्यक्ष/सभापति की भूमिका सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने में सभापति की निष्पक्ष भूमिका।
मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी मंत्रियों का सदन के प्रति जवाबदेह होना, विशेषकर महत्वपूर्ण मुद्दों पर।
संसदीय विशेषाधिकार सांसदों को सदन में अपनी बात रखने की स्वतंत्रता और नियमों के तहत उनके अधिकार।

महत्व

लोकतांत्रिक महत्व

  • यह घटना संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका और सरकार की जवाबदेही के महत्व को दर्शाती है।
  • गृह मंत्री से सदन में उपस्थित होकर सुरक्षा बलों द्वारा कथित ज्यादतियों पर जवाब देने की मांग, सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाने के लिए विपक्ष के संवैधानिक कर्तव्य का हिस्सा है।

संसदीय प्रक्रिया और नियम

  • यह घटना राज्यसभा के नियमों (जैसे नियम 235 और 240) के अनुप्रयोग और उनकी व्याख्या पर प्रकाश डालती है।
  • सभापति का केंद्र सरकार से विपक्ष के अनुरोध पर विचार करने का आग्रह संसदीय परंपराओं और सदन के सुचारु संचालन के लिए महत्वपूर्ण है।

शासन और जवाबदेही

  • पेपर लीक के विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई से संबंधित मुद्दे पर गृह मंत्री की उपस्थिति की मांग, शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • यह दर्शाता है कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर मंत्रियों का सदन में बयान देना और चर्चा करना संसदीय प्रणाली का एक अभिन्न अंग है।

चुनौतियाँ

1. संसदीय गतिरोध

  • विपक्ष के विरोध और सरकार के रुख के कारण सदन की कार्यवाही में बार-बार व्यवधान उत्पन्न होता है।
  • इससे महत्वपूर्ण विधायी कार्यों और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर चर्चा बाधित होती है।

2. सरकार की जवाबदेही

  • विपक्ष का मानना है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदन में जवाब देने से बच रही है।
  • यह सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर सवाल उठाता है।

3. अध्यक्ष/सभापति की भूमिका की सीमाएं

  • सभापति सदन के नियमों के तहत कार्यवाही को सुचारु रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन राजनीतिक गतिरोध को पूरी तरह से हल करने की उनकी क्षमता सीमित होती है।
  • विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच सहमति का अभाव सदन के कामकाज को प्रभावित करता है।

4. संसदीय बहस का गिरता स्तर

  • सदन में नारेबाजी और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से गंभीर बहस का स्तर गिरता है।
  • यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को कम करता है और जनता का विश्वास घटाता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
संसदीय व्यवधान महत्वपूर्ण विधायी कार्यों और सार्वजनिक चर्चाओं में बाधा।
मंत्रियों की अनुपस्थिति सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल।
नियमों की व्याख्या सदन के नियमों के उपयोग और दुरुपयोग पर विवाद।
लोकतांत्रिक बहस का स्तर सदन में गंभीर चर्चा के बजाय नारेबाजी और गतिरोध।
जनता का विश्वास संसदीय प्रक्रियाओं के प्रति जनता के विश्वास में कमी।

आगे की राह

  • सरकार को विपक्ष द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदन में सक्रिय रूप से जवाब देना चाहिए, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
  • सभापति को सदन के नियमों का निष्पक्षता से पालन कराते हुए सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए।
  • सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि संसदीय गतिरोध को कम किया जा सके।
  • सांसदों को संसदीय गरिमा और नियमों का सम्मान करते हुए रचनात्मक बहस में शामिल होना चाहिए, न कि केवल व्यवधान उत्पन्न करना।
  • संसदीय समितियों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए ताकि जटिल मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हो सके और सदन का समय बचाया जा सके।
  • जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मंत्रियों को महत्वपूर्ण नीतियों और घटनाओं पर सदन में बयान देने की प्रथा को मजबूत किया जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संसदीय विशेषाधिकार · संसद में मंत्रियों की उपस्थिति · विपक्ष की भूमिका · संसदीय कार्यवाही के नियम · प्रश्नकाल · शून्यकाल · कार्यस्थगन प्रस्ताव · संसदीय गतिरोध · लोकतंत्र में बहस · अधिकारों का हनन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 75(3)’, ‘note’: ‘मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 85’, ‘note’: ‘संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 105’, ‘note’: ‘संसद सदस्यों के विशेषाधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 118’, ‘note’: ‘संसद की प्रक्रिया के नियम बनाने की शक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन  →  सुरक्षा बलों द्वारा कथित ज्यादतियां  →  विपक्ष द्वारा गृह मंत्री की सदन में उपस्थिति की मांग  →  राज्यसभा में गतिरोध और नारेबाजी  →  सभापति द्वारा केंद्र से अनुरोध पर विचार करने का आग्रह  →  संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं पर बहस

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्यसभा का सभापति उपराष्ट्रपति होता है।
2. संसदीय कार्य मंत्री विपक्ष की मांगों को गृह मंत्री तक पहुँचाने के लिए अधिकृत है।
3. नियम 235 और नियम 240 दोनों ही सदन में सदस्यों के आचरण से संबंधित हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। कथन 2 भी सही है क्योंकि संसदीय कार्य मंत्री सरकार और विपक्ष के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और वह विपक्ष की मांगों को संबंधित मंत्री तक पहुंचा सकता है। कथन 3 भी सही है। नियम 235 सदस्यों द्वारा व्यवधान रोकने से संबंधित है, जबकि नियम 240 अप्रासंगिकता या पुनरावृत्ति से संबंधित है, दोनों ही सदन में सदस्यों के आचरण और कार्यवाही को विनियमित करते हैं।

Q2. राज्यसभा के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

  1. राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसे भंग नहीं किया जा सकता।
  2. उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।
  3. राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाता है।
  4. राज्यसभा के एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं।

उत्तर: राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाता है। — राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं किया जाता है। उनका चुनाव राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत के माध्यम से किया जाता है। अन्य सभी कथन सही हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ संसद में विपक्ष की भूमिका लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन अक्सर यह संसदीय गतिरोध का कारण बनती है। इस कथन के आलोक में, संसदीय कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने में सभापति/अध्यक्ष की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा:
1. **परिचय:** लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका का महत्व (सरकार को जवाबदेह ठहराना, वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करना, जनता के मुद्दों को उठाना)। संसदीय गतिरोध की संक्षिप्त चर्चा।
2. **विपक्ष की भूमिका और चुनौतियाँ:**
* सरकार पर दबाव बनाना (जैसे गृह मंत्री की उपस्थिति की मांग)।
* जनता के मुद्दों को उठाना (जैसे सुरक्षा बलों द्वारा कथित ज्यादतियां)।
* संसदीय नियमों का उपयोग (प्रश्नकाल, शून्यकाल, कार्यस्थगन प्रस्ताव)।
* चुनौतियाँ: व्यवधान, नारेबाजी, कार्यवाही का बाधित होना, नियमों का दुरुपयोग।
3. **सभापति/अध्यक्ष की भूमिका:**
* **नियमों का प्रवर्तन:** सदन के नियमों (जैसे नियम 235, 240) का निष्पक्ष अनुप्रयोग।
* **सदन की गरिमा बनाए रखना:** सदस्यों के आचरण को विनियमित करना।
* **समन्वय और मध्यस्थता:** सरकार और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास (जैसा कि वर्तमान घटना में हुआ)।
* **बहस और चर्चा को बढ़ावा देना:** सभी सदस्यों को बोलने का अवसर प्रदान करना।
* **निर्णय लेना:** सदन की कार्यवाही को स्थगित करना या जारी रखना।
4. **आलोचनात्मक परीक्षण:**
* **सफलताएँ:** सभापति/अध्यक्ष अक्सर सदन को सुचारू रूप से चलाने में सफल होते हैं, नियमों का पालन सुनिश्चित करते हैं।
* **सीमाएँ/चुनौतियाँ:** राजनीतिक ध्रुवीकरण, सदस्यों का असहयोग, सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों द्वारा नियमों का उल्लंघन, सभापति की निष्पक्षता पर सवाल।
* **सुझाव:** सर्वदलीय बैठकें, नियमों का कड़ाई से पालन, सदस्यों के लिए आचार संहिता, संसदीय प्रशिक्षण।
5. **निष्कर्ष:** एक जीवंत लोकतंत्र के लिए विपक्ष और सभापति/अध्यक्ष दोनों की प्रभावी भूमिका आवश्यक है। संसदीय गतिरोध को कम करने के लिए रचनात्मक संवाद और नियमों का सम्मान महत्वपूर्ण है।

स्रोत: The Indian Express


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