28 Aug राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और भारत के फार्मा क्षेत्र की चुनौतियाँ
मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 2 – भारतीय राजनीति एवं शासन व्यवस्था के अंतर्गत – स्वास्थ्य, समवर्ती सूची, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और भारत के फार्मा क्षेत्र की चुनौतियाँ, सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप
प्रारंभिक परीक्षा के लिए – संसदीय स्थायी समिति, नीति आयोग, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA), किफायती दवाइयाँ एवं स्वास्थ्य उत्पाद समिति (CAMPH)
खबरों में क्यों?

- हाल ही में रसायन और उर्वरक पर संसद की स्थायी समिति ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा 2024 में आवश्यक दवाओं के मूल्य में 50% तक की वृद्धि को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
- संसद की स्थायी समिति का मानना है कि यह कदम जनस्वास्थ्य और दवाओं की वहनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। समिति ने इस मूल्य वृद्धि के औचित्य, प्रक्रिया और पारदर्शिता पर प्रश्न उठाए हैं, जिससे स्वास्थ्य नीति में संतुलन और जवाबदेही का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
- इस घटनाक्रम ने न केवल भारत की औषधि मूल्य निर्धारण प्रणाली को जांच के दायरे में ला दिया है, बल्कि देश के फार्मास्युटिकल क्षेत्र की व्यापक चुनौतियों और सुधार की आवश्यकता पर भी दिया है।
मूल मामला क्या है?
- वर्ष 2024 में NPPA ने औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 (DPCO 2013) और नीति आयोग की CAMPH समिति के परामर्श से 11 आवश्यक दवाओं की कीमतों में 50% तक वृद्धि को मंजूरी दी।
- इन दवाओं में बैक्टीरियल संक्रमण, अस्थमा और द्विध्रुवी विकार (bipolar disorder) के इलाज में प्रयुक्त औषधियाँ शामिल हैं।
- हालाँकि यह निर्णय उत्पादन लागत, सक्रिय औषधि संघटक (API) और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में वृद्धि जैसे कारणों पर आधारित था, लेकिन सार्वजनिक वहनीयता, गरीब वर्ग की पहुँच और मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता जैसे पहलुओं की अनदेखी को लेकर तीव्र आलोचना हुई है।
संसदीय समिति की मुख्य चिंताएँ और उससे जुड़ी प्रमुख टिप्पणियाँ :
- सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव : समिति ने यह स्पष्ट किया कि आवश्यक दवाओं की कीमतों में भारी वृद्धि जन स्वास्थ्य नीति के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। इससे गरीब और मध्यम वर्ग की दवाओं तक पहुँच बाधित हो सकती है।
- उपभोक्ता हितों को उचित प्राथमिकता नहीं देना और निर्णय की प्रक्रिया में सीमित औचित्य : हालाँकि NPPA ने मूल्य वृद्धि का कारण उत्पादन लागत बढ़ना बताया, लेकिन समिति के अनुसार, निर्णय प्रक्रिया में वहनीयता और उपभोक्ता हितों को उचित प्राथमिकता नहीं दी गई।
- कैंसर दवाओं पर मूल्य नियंत्रण की कमी : NLEM-2022 में कैंसर-रोधी दवाओं की संख्या 40 से बढ़कर 63 हो गई है, लेकिन कई महंगी ऑन्कोलॉजी दवाएँ अब भी DPCO के बाहर हैं, जिससे ये दवाएँ अधिकांश रोगियों की पहुँच से बाहर हो जाती हैं।
संसद की स्थायी समिति की प्रमुख सिफारिशें :
- मूल्य निर्धारण प्रक्रिया की समीक्षा – समिति चाहती है कि NPPA मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया को अधिक जनोन्मुखी और तार्किक बनाए।
- ऑन्कोलॉजी जैसी गंभीर दवाओं को मूल्य नियंत्रण में शामिल करना – सरकार को सुझाव दिया गया है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं को DPCO के अंतर्गत लाया जाए।
- भविष्य की मूल्य वृद्धि में पारदर्शिता – किसी भी मूल्य वृद्धि का निर्णय सार्वजनिक हित, उपलब्ध आँकड़ों, और स्पष्ट मापदंडों पर आधारित हो।
- गैर-आवश्यक दवाओं की सख्त निगरानी – गैर-आवश्यक दवाओं पर वार्षिक मूल्य वृद्धि की अधिकतम सीमा (10%) सुनिश्चित की जाए।
- नियमित मूल्य निगरानी और समावेशन – दवा बाजार की लगातार निगरानी और आवश्यक औषधियों को मूल्य नियंत्रण में शामिल करने की प्रक्रिया को तेज किया जाए।
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की मुख्य भूमिका और संरचना :
- NPPA भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन फार्मास्यूटिकल विभाग द्वारा 1997 में स्थापित एक स्वायत्त निकाय है, जिसका उद्देश्य देश में आवश्यक दवाओं की उपलब्धता, वहनीयता और न्यायसंगत मूल्य निर्धारण सुनिश्चित करना है।
प्रमुख कार्य :
- DPCO 2013 के अंतर्गत मूल्य नियंत्रण लागू करना।
- आवश्यक दवाओं की सूची (NLEM) के आधार पर मूल्य तय करना।
- अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) तय करना और गैर-आवश्यक दवाओं पर निगरानी रखना।
डिजिटल और पारदर्शी पहल :
- IPDMS 2.0 : इंटीग्रेटेड फार्मास्यूटिकल डाटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम, जिससे उत्पादन और वितरण पर नजर रखी जाती है।
- PMRU : देश भर में स्थापित प्राइस मॉनिटरिंग एंड रिसर्च यूनिट्स।
- फार्मा जन समाधान और फार्मा सही दाम जैसे सार्वजनिक प्लेटफॉर्म।
भारत के फार्मा क्षेत्र की मुख्य चुनौतियाँ :
- गुणवत्ता और विनियामक अनुपालन संबंधी चुनौतियाँ : हाल के वर्षों में भारत में बने कुछ कफ सिरप को लेकर WHO की चेतावनी सामने आई, जिससे गुणवत्ता मानकों पर प्रश्न उठे। यद्यपि भारत के पास सबसे अधिक US-FDA मान्यता प्राप्त संयंत्र हैं, फिर भी उत्पादन की गुणवत्ता में असमानता एक चुनौती बनी हुई है।
- बौद्धिक संपदा अधिकार और अनिवार्य लाइसेंस / पेटेंट संबंधी चुनौतियाँ : भारत के जेनेरिक दवाओं के पक्ष में अनिवार्य लाइसेंसिंग के रुख से कई वैश्विक कंपनियाँ असहज रही हैं। उदाहरण के लिए, कैंसर की कुछ महंगी दवाओं पर भारत द्वारा अनिवार्य लाइसेंस दिए जाने से अंतरराष्ट्रीय विवाद खड़े हो चुके हैं।
- भारत का API पर आयात निर्भरता संबंधी चुनौतियाँ : भारत लगभग 70–80% API चीन से आयात करता है। चीन में आपूर्ति शृंखला में आया व्यवधान भारत की दवा निर्माण क्षमता को प्रभावित करता है और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- जेनेरिक दवाओं पर अत्यधिक निर्भरता का होना : भारत वैश्विक जेनेरिक दवा बाजार में अग्रणी है, परंतु इससे नवाचार और उच्च-मूल्य उत्पाद विकास की दिशा में प्रगति सीमित हो जाती है।
- कुशल मानव संसाधन / कौशल की कमी का होना : बायोलॉजिक्स, AI आधारित फार्मा अनुसंधान, और नियामक मामलों में कुशल मानव संसाधन की कमी फार्मा क्षेत्र के उन्नयन में बाधक है।
- पर्यावरणीय चुनौतियाँ : फार्मा उद्योग में जैव चिकित्सा अपशिष्ट, कार्बन उत्सर्जन, और जल प्रदूषण जैसे मुद्दे पर्यावरणीय चिंता के कारण बन चुके हैं।
समाधान की राह और भविष्य की दिशा :

- अनुसंधान और नवाचार में निवेश करने की आवश्यकता : भारत को R&D में निवेश बढ़ाना होगा, ताकि बायोलॉजिक्स, जीन थेरेपी, और नवीन औषधियों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा की क्षमता विकसित की जा सके।
- API निर्माण को प्रोत्साहन देने की जरूरत : PIL योजना और API पार्कों की स्थापना से आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे भारत की आपूर्ति शृंखला अधिक सुदृढ़ और लचीली बनेगी।
- फार्मा उत्पादन को सतत् उत्पादन प्रक्रिया को वैश्विक हरित मानकों के अनुरूप बनाना आवश्यक : पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों, नवीकरणीय ऊर्जा, और शून्य अपशिष्ट प्रक्रियाओं के माध्यम से फार्मा उत्पादन को वैश्विक हरित मानकों के अनुरूप बनाना आवश्यक है।
- डिजिटल और AI एकीकरण की जरूरत : AI आधारित दवा विकास, गुणवत्ता नियंत्रण और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन से न केवल दक्षता बढ़ेगी, बल्कि भारत फार्मा टेक्नोलॉजी में वैश्विक नेतृत्व भी प्राप्त कर सकता है।
- स्वास्थ्य अवसंरचना, उत्पादन और अनुसंधान में सार्वजनिक-निजी भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता : स्वास्थ्य अवसंरचना, उत्पादन और अनुसंधान में PPP मॉडल के तहत सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में भी आवश्यक दवाओं की पहुँच और गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है।
- कौशल विकास के माध्यम से कुशल कार्यबल तैयार करने की जरूरत : शैक्षणिक संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग से उन्नत तकनीकी क्षेत्रों में कुशल कार्यबल तैयार किया जा सकता है। सरकार को स्किल डेवलपमेंट में निवेश बढ़ाना चाहिए।
- घरेलू बाजार में अनुसंधान और नवाचार पर अधिक जोर देने की आवश्यकता : भारत में मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसे NCD का भार लगातार बढ़ रहा है। फार्मा कंपनियों को इन बीमारियों के इलाज में अनुसंधान और नवाचार पर अधिक जोर देना होगा।
- सस्ती दवा दुकानों के माध्यम से सस्ती दवाओं की उपलब्धता में विस्तार किए जाने की जरूरत : जन औषधि योजना, ई-फार्मा नेटवर्क, और सस्ती दवा दुकानों के माध्यम से सस्ती दवाओं की उपलब्धता में विस्तार किया जा सकता है।
- उन्नत चिकित्सा तकनीकों में निवेश की आवश्यकता : CRISPR, RNA आधारित चिकित्सा, और बायोसिमिलर्स में निवेश करके भारत वैश्विक उच्च-मूल्य दवा बाजार में नेतृत्व कर सकता है।
निष्कर्ष :
- भारत का फार्मास्युटिकल क्षेत्र आज एक संभावनाओं और चुनौतियों के संगम पर खड़ा है। एक ओर यह “विश्व की फार्मेसी” के रूप में सस्ती जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करके वैश्विक स्वास्थ्य में योगदान दे रहा है, वहीं दूसरी ओर, इसे गुणवत्ता, नवाचार, और पारदर्शिता के उच्च मानकों की ओर बढ़ना भी आवश्यक हो गया है।
- NPPA द्वारा की गई मूल्य वृद्धि की आलोचना, हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या भारत का औषधि मूल्य निर्धारण तंत्र आमजन के हितों की पर्याप्त सुरक्षा कर रहा है?
- भारत को यदि फार्मा नवाचार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और घरेलू स्वास्थ्य आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना है, तो उसे नियामकीय पारदर्शिता, अनुसंधान में निवेश, और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति प्रतिबद्धता को प्राथमिकता देनी होगी।
- आत्मनिर्भर भारत और ” वन हेल्थ (One Health) ” के दृष्टिकोण के साथ, भारतीय फार्मा उद्योग न केवल अपनी चुनौतियों को पार कर सकता है, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य की दिशा को भी नया मार्ग दिखा सकता है।
स्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) का प्रमुख कार्य क्या है?
- आयातित दवाओं पर सीमा शुल्क तय करना
- आवश्यक दवाओं की कीमतें तय करना
- DPCO 2013 के तहत मूल्य नियंत्रण लागू करना
- दवा लाइसेंस को जारी करना
नीचे दिए गए कूट के माध्यम से सही विकल्प का चयन करें :
A. केवल 1 और 2
B. केवल 2 और 3
C. इनमें से कोई नहीं।
D. उपरोक्त सभी।
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. चर्चा कीजिए कि एक ओर जहाँ भारत का फार्मास्युटिकल क्षेत्र वैश्विक स्तर पर किफायती दवाओं के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है, वहीं दूसरी ओर इसे दीर्घकालिक सतत विकास के संदर्भ में इसे किन संरचनात्मक और रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, और इन चुनौतियों के समाधान में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की क्या भूमिका हो सकती है? (शब्द सीमा – 250 अंक – 15)

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