11 Aug लोकसभा ने केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ किया, विपक्ष के हंगामे के बीच पास हुआ बिल
✎ राज्य का नाम बदलने की शक्ति संसद में निहित है, जो अनुच्छेद 3 के तहत राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश और संबंधित राज्य विधानमंडल के विचार के बाद साधारण बहुमत से विधेयक पारित करके ऐसा कर सकती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघवाद, संसद और राज्य विधानमंडल—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।
- Prelims: राज्य का नाम परिवर्तन, अनुच्छेद 3, संविधान की पहली अनुसूची, केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026, राज्य पुनर्गठन, संसद की विधायी शक्ति, केरलम, मलयालम भाषा
- Essay: भारतीय संघवाद में राज्यों की स्वायत्तता और केंद्र की भूमिका, भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन और इसका समकालीन महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य का नाम बदलने की शक्ति संसद में निहित है, जो अनुच्छेद 3 के तहत राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश और संबंधित राज्य विधानमंडल के विचार के बाद साधारण बहुमत से विधेयक पारित करके ऐसा कर सकती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
लोकसभा ने हाल ही में केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को ध्वनि मत से पारित कर दिया है। इस विधेयक का उद्देश्य ‘केरल’ राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करना है। यह घटनाक्रम संसद में विधायी प्रक्रिया और राज्य के नाम परिवर्तन से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर प्रकाश डालता है।
पृष्ठभूमि
- केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने का आग्रह किया था।
- प्रस्ताव में कहा गया था कि मलयालम भाषा में राज्य का नाम ‘केरलम’ है और 1 नवंबर, 1956 को भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ था।
- भारतीय संविधान की पहली अनुसूची (First Schedule) में राज्य का नाम ‘केरल’ दर्ज है, जिसे बदलने की मांग की गई है।
- केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 पेश किया।
- विधेयक को बिना किसी चर्चा के ध्वनि मत से पारित कर दिया गया, जबकि विपक्षी सदस्य विभिन्न मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।
भारतीय संविधान के तहत राज्य के नाम परिवर्तन की प्रक्रिया क्या है?
- किसी राज्य का नाम बदलने के लिए, संसद में एक विधेयक पेश किया जाता है। यह विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना पेश नहीं किया जा सकता।
- राष्ट्रपति ऐसे किसी भी विधेयक को संबंधित राज्य विधानमंडल के विचार के लिए भेजते हैं, ताकि वे एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर अपनी राय व्यक्त कर सकें।
- राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त की गई राय संसद के लिए बाध्यकारी नहीं होती है; संसद उसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
- राज्य विधानमंडल की राय प्राप्त होने के बाद (या निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद), विधेयक को संसद के दोनों सदनों में साधारण बहुमत (Simple Majority) से पारित किया जाता है।
- विधेयक के पारित होने के बाद, राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त होती है और यह कानून बन जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्य का नाम परिवर्तन | किसी राज्य के नाम में परिवर्तन उसकी सांस्कृतिक पहचान और भाषाई विरासत को दर्शाता है। |
| संवैधानिक प्रक्रिया | यह प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद की शक्ति को रेखांकित करती है। |
| राज्य विधानमंडल की भूमिका | राज्य विधानमंडल द्वारा प्रस्ताव पारित करना केंद्र सरकार से नाम परिवर्तन का अनुरोध करने का पहला कदम है। |
| लोकसभा द्वारा विधेयक पारित | यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार ने राज्य के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है और संवैधानिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। |
| प्रथम अनुसूची में संशोधन | नाम परिवर्तन के लिए संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन आवश्यक है, जहाँ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नाम सूचीबद्ध हैं। |
महत्व
राजनीतिक एवं प्रशासनिक महत्व
- राज्य के नाम में परिवर्तन राज्य की पहचान और भाषाई भावनाओं को दर्शाता है।
- यह संघवाद (Federalism) के सिद्धांत को मजबूत करता है, जहाँ राज्य अपनी पहचान से संबंधित मामलों में केंद्र से अनुरोध कर सकते हैं।
- प्रशासनिक रूप से, सभी सरकारी दस्तावेजों, अभिलेखों और पहचान पत्रों में नए नाम को अद्यतन करना होगा।
सांस्कृतिक एवं भाषाई महत्व
- केरलम नाम मलयालम भाषा में राज्य की मूल पहचान को दर्शाता है, जो भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के सिद्धांत के अनुरूप है।
- यह राज्य की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई स्वायत्तता के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
संवैधानिक महत्व
- यह प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद की शक्ति का एक उदाहरण है, जो नए राज्यों के निर्माण और मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन से संबंधित है।
- संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन राज्यों के नाम से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के महत्व को उजागर करता है।
चुनौतियाँ
1. संसदीय कार्यवाही में व्यवधान
- विपक्ष के विरोध के कारण बिना चर्चा के विधेयक पारित होना संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के लिए चिंता का विषय है।
- महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा न होने से कानून निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संसद की कार्यप्रणाली
2. प्रशासनिक और वित्तीय निहितार्थ
- नाम परिवर्तन से सभी सरकारी विभागों, संस्थानों और सार्वजनिक सेवाओं में नाम अद्यतन करने की लागत और रसद संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न होंगी।
- यह राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर प्रशासनिक संसाधनों पर दबाव डाल सकता है।
यूपीएससी लिंक: शासन: ई-गवर्नेंस, पारदर्शिता और जवाबदेही
3. संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
- हालांकि नाम परिवर्तन राज्य के अनुरोध पर आधारित है, लेकिन संसदीय कार्यवाही में व्यवधान केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव का संकेत दे सकता है।
- यह संघवाद के सुचारू कामकाज के लिए संवाद और सहयोग के महत्व को रेखांकित करता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| संसदीय बहस का अभाव | महत्वपूर्ण विधेयकों पर बिना चर्चा के पारित होना विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता को कम करता है। |
| विपक्षी विरोध | सदन में लगातार व्यवधान और नारेबाजी से महत्वपूर्ण विधायी कार्य बाधित होते हैं। |
| प्रशासनिक अद्यतन | नाम परिवर्तन के बाद सभी सरकारी दस्तावेजों, बोर्डों और डिजिटल प्लेटफार्मों को अद्यतन करने में समय और संसाधन लगेंगे। |
| वित्तीय लागत | नाम परिवर्तन से जुड़े सभी प्रशासनिक और लॉजिस्टिक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय व्यय होगा। |
आगे की राह
- संसदीय कार्यवाही में व्यवधानों को कम करने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच रचनात्मक संवाद और आम सहमति बनाने के प्रयास किए जाने चाहिए।
- महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि कानून निर्माण की गुणवत्ता बनी रहे।
- राज्य के नाम परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए।
- नाम परिवर्तन के बाद सभी सरकारी और सार्वजनिक दस्तावेजों में नए नाम को सुचारू रूप से अद्यतन करने के लिए एक समयबद्ध प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
- केंद्र और राज्य सरकारों को संघवाद के सिद्धांतों का सम्मान करते हुए सहयोग और समन्वय के साथ काम करना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्य का नाम परिवर्तन · अनुच्छेद 3 · संविधान की पहली अनुसूची · संसदीय प्रक्रिया · संघवाद · राज्य पुनर्गठन · विधायी प्रक्रिया · लोकसभा · राज्य विधानसभा संकल्प · संसदीय संप्रभुता · भाषा आधारित राज्य · संसदीय गतिरोध
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 3’, ‘note’: ‘राज्यों के नाम में परिवर्तन की शक्ति’}
- {‘article’: ‘प्रथम अनुसूची’, ‘note’: ‘राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नाम’}
अवधारणा प्रवाह
केरल विधानसभा ने नाम बदलने का प्रस्ताव पारित किया। → राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया। → केंद्र सरकार ने केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 पेश किया। → लोकसभा ने विधेयक को ध्वनि मत से पारित किया। → विधेयक को राज्यसभा में भेजा जाएगा और फिर राष्ट्रपति की सहमति मिलेगी। → संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन होगा। → राज्य का नाम ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ हो जाएगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी राज्य का नाम बदलने के लिए संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को साधारण बहुमत से एक विधेयक पारित करना होता है।
2. राज्य विधानसभा द्वारा नाम परिवर्तन के संबंध में पारित संकल्प केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी होता है।
3. संविधान की पहली अनुसूची में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नाम और उनकी क्षेत्रीय सीमाएँ शामिल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 3 संसद को साधारण बहुमत से किसी राज्य का नाम बदलने का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। राज्य विधानसभा का संकल्प केवल एक सिफारिशी प्रकृति का होता है और केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होता है। कथन 3 सही है। पहली अनुसूची में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नाम और उनकी क्षेत्रीय सीमाएँ सूचीबद्ध हैं।
Q2. भारत के संविधान के किस अनुच्छेद के तहत संसद को किसी राज्य का नाम बदलने का अधिकार प्राप्त है?
- अनुच्छेद 2
- अनुच्छेद 3
- अनुच्छेद 4
- अनुच्छेद 5
उत्तर: अनुच्छेद 3 — संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्यों के निर्माण और मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने का अधिकार देता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारतीय संघवाद के संदर्भ में, किसी राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस प्रक्रिया में केंद्र और राज्य के बीच संबंधों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** केरल का ‘केरलम’ में नाम बदलने के हालिया विधेयक का संदर्भ देते हुए राज्य के नाम परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया का संक्षिप्त परिचय।
2. **संवैधानिक प्रावधान:**
* अनुच्छेद 3: संसद की शक्ति, साधारण बहुमत।
* राष्ट्रपति की भूमिका: विधेयक पेश करने से पहले राज्य विधानमंडल को संदर्भित करना।
* राज्य विधानमंडल की भूमिका: केवल सिफारिशी प्रकृति, केंद्र पर बाध्यकारी नहीं।
* संविधान की पहली अनुसूची: नाम परिवर्तन के बाद इसमें संशोधन की आवश्यकता।
3. **प्रक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण:**
* **केंद्र की प्रधानता:** संसद की सर्वोच्च शक्ति और राज्य की इच्छा पर केंद्र का वीटो।
* **संघवाद पर प्रभाव:** सहकारी संघवाद के सिद्धांतों पर संभावित प्रभाव, जहां राज्य की स्वायत्तता सीमित होती है।
* **लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व:** राज्य विधानसभा के संकल्प के महत्व को कम करना।
* **ऐतिहासिक संदर्भ:** भाषा आधारित राज्यों का गठन और नाम परिवर्तन की आवश्यकता।
4. **केंद्र-राज्य संबंध:**
* **सहयोग के बिंदु:** राज्य विधानसभा के संकल्प और केंद्र द्वारा उस पर विचार।
* **टकराव के बिंदु:** यदि केंद्र राज्य की सिफारिश को स्वीकार नहीं करता है तो संभावित तनाव।
* **संवैधानिक संतुलन:** संघ की एकता और राज्यों की पहचान के बीच संतुलन।
5. **निष्कर्ष:** प्रक्रिया की आवश्यकता और संघवाद के सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाए रखने के महत्व पर बल देते हुए निष्कर्ष।
स्रोत: Mint
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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