विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025: भारत के बिजली क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधारों की दिशा में एक कदम

विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025: भारत के बिजली क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधारों की दिशा में एक कदम

विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 : भारत के बिजली क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधारों की दिशा में एक कदम

पाठ्यक्रम : GS पेपर 3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण) और GS पेपर 2 (शासन)

समाचार में क्यों?

इस विधेयक का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देकर, टैरिफ को युक्तिसंगत बनाकर, नियामक को मजबूत बनाकर तथा दीर्घकालिक अकुशलताओं को दूर करके भारत के विद्युत क्षेत्र का आधुनिकीकरण करना है। विद्युत मंत्रालय ने विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 का मसौदा जारी किया।

परिचय

भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में बिजली क्षेत्र की भूमिका अपरिहार्य है। वर्तमान में, देश का विद्युत वितरण क्षेत्र अक्षमता, वित्तीय संकट और संरचनात्मक कमियों से ग्रस्त है।  केंद्र सरकार द्वारा अक्टूबर 2025 में जारी विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 का मसौदा एक महत्वपूर्ण पहल है। यह विधेयक विद्युत अधिनियम, 2003 में संशोधन प्रस्तावित करता है, जिसका उद्देश्य वितरण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना, विनियामक ढांचे को मजबूत करना तथा लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ के माध्यम से एक पारदर्शी, कुशल और टिकाऊ बिजली बाजार का निर्माण करना है। यह सुधार न केवल डिस्कॉम्स (वितरण कंपनियों) की वित्तीय बदहाली को दूर करने का प्रयास करता है, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों को भी गति प्रदान करेगा।   यह विधेयक अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और शासन सुधारों के अंतर्संबंधों को समझने का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।

1. पृष्ठभूमि और आवश्यकता

भारत का विद्युत क्षेत्र लंबे समय से चुनौतियों का शिकार रहा है। 2023-24 में डिस्कॉम्स का संचयी ऋण लगभग 6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था, जबकि AT&C (एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल) हानियां औसतन 18-20% पर अटकी हुई हैं। क्रॉस-सब्सिडी की विकृतियां उद्योगों पर बोझ डाल रही हैं, जिससे विनिर्माण क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो रही है। इसके अतिरिक्त, सब्सिडी भुगतान में देरी और बिलिंग दक्षता की कमी ने डिस्कॉम्स को कर्ज के जाल में फंसा दिया है।
राष्ट्रीय विद्युत नीति 2021 और RDSS (रिवैंप्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम) जैसे प्रयासों के बावजूद, संरचनात्मक सुधारों की कमी बनी हुई है। इस संदर्भ में, 2025 का संशोधन मसौदा वितरण क्षेत्र को निजी निवेश के लिए आकर्षक बनाने और उपभोक्ता-केंद्रित बाजार विकसित करने का कानूनी आधार प्रदान करता है। यह विधेयक COVID-19 के बाद की आर्थिक वृद्धि और नेट-जीरो लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।

2. विधेयक की प्रमुख विशेषताएं

विधेयक चार प्रमुख आयामों—संरचनात्मक सुधार, टैरिफ सुधार, शासन सुधार तथा संधारणीयता—पर केंद्रित है।
(A) संरचनात्मक सुधार
– प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा: एक ही भौगोलिक क्षेत्र में एकाधिक लाइसेंसधारियों (सरकारी और निजी दोनों) को बिजली वितरण की अनुमति। इससे उपभोक्ताओं को विकल्प मिलेंगे, और सेवा गुणवत्ता में सुधार होगा। साझा अवसंरचना (जैसे ट्रांसफॉर्मर, मीटर) का उपयोग अनिवार्य होगा, जिससे लागत कम होगी।
-सार्वभौमिक सेवा दायित्व (USO): सभी लाइसेंसधारियों पर गैर-भेदभावपूर्ण आपूर्ति सुनिश्चित करने का दायित्व। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में पहुंच मजबूत होगी।
-ओपन एक्सेस: 1 MW से ऊपर के उपभोक्ताओं को USO से छूट देने का अधिकार राज्य विद्युत विनियामक आयोगों (SERCs) को, लेकिन राज्य सरकार की पूर्व सहमति अनिवार्य।
(B) टैरिफ सुधार और क्रॉस-सब्सिडी तर्कसंगतकरण
– लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ: टैरिफ वास्तविक आपूर्ति लागत पर आधारित होगा, जिससे डिस्कॉम्स की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित होगी। किसानों और गरीब उपभोक्ताओं के लिए पारदर्शी बजटीय सब्सिडी का प्रावधान।
-क्रॉस-सब्सिडी में कमी: विनिर्माण, रेलवे और मेट्रो जैसे क्षेत्रों के लिए 5 वर्षों में क्रॉस-सब्सिडी समाप्त करने का लक्ष्य। इससे औद्योगिक टैरिफ 20-30% कम हो सकता है, जो निर्यात को बढ़ावा देगा।
(C) शासन एवं विनियामक सुधार
– राष्ट्रीय विद्युत परिषद: केंद्र-राज्य समन्वय के लिए एक नया मंच, जो नीति सामंजस्य और विवाद निपटान सुनिश्चित करेगा।
SERCs को सशक्तिकरण: मानकों लागू करने, गैर-अनुपालन पर दंड लगाने तथा टैरिफ आवेदन में देरी पर स्वतः संज्ञान (suo moto) लेकर निर्धारण करने की शक्ति।
(D) संधारणीयता और बाजार विकास
– गैर-जीवाश्म ऊर्जा दायित्व: अनुपालन न करने पर कठोर दंड। 2030 तक 50% गैर-जीवाश्म ऊर्जा लक्ष्य को मजबूत करेगा।
– बाजार सुधार: नए ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म, स्टोरेज सिस्टम और स्मार्ट मीटर जैसे उभरते उपकरणों को समर्थन। इससे रिन्यूएबल इंटीग्रेशन आसान होगा।

3. विधेयक द्वारा संबोधित प्रमुख समस्याएं

यह विधेयक निम्नलिखित चुनौतियों को लक्षित करता है:

1. डिस्कॉम्स की वित्तीय बदहाली: AT&C हानियों को कम करने, बिलिंग दक्षता बढ़ाने और सब्सिडी भुगतान को समयबद्ध बनाने का प्रयास।
2. प्रतिस्पर्धा की कमी : एकाधिकार समाप्त कर उपभोक्ता-केंद्रित मॉडल अपनाना, जो नवाचार को प्रोत्साहित करेगा।
3. क्रॉस-सब्सिडी की विकृति : उद्योगों पर अनुचित बोझ हटाकर ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूत करना।

4. संभावित लाभ

– उपभोक्ता सशक्तिकरण : विकल्पों से बेहतर सेवा और कम टैरिफ
-औद्योगिक वृद्धि : सस्ती बिजली से विनिर्माण लागत घटेगी।
– दक्षता वृद्धि : डिस्कॉम्स में निजी निवेश से AT&C हानियां 10% से नीचे लाई जा सकती हैं।
– केंद्र-राज्य समन्वय : परिषद से नीतिगत एकरूपता।
स्वच्छ ऊर्जा : रिन्यूएबल्स की हिस्सेदारी बढ़ेगी, जो जलवायु लक्ष्यों से जुड़ेगी।

5. चुनौतियां :

हालांकि आशाजनक, विधेयक को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है:
– राज्यों का विरोध : राजस्व हानि का भय, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में।
अवसंरचना साझाकरण : मानकों का अभाव साझा नेटवर्क में विवाद पैदा कर सकता है।
-राजनीतिक बाधाएं : लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ का किसान-विरोधी माना जाना।
– SERCs की क्षमता : स्वतंत्रता और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी।
– ग्रामीण चुनौतियां : USO का बोझ निजी कंपनियों पर पड़ सकता है, जिससे निवेश हतोत्साहित हो।
इन चुनौतियों को दूर करने के लिए, केंद्र को राज्यों के साथ परामर्श बढ़ाना होगा।

निष्कर्ष :

विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 भारत के ऊर्जा क्षेत्र को वैश्विक मानकों तक पहुंचाने की दिशा में एक साहसिक कदम है। यदि प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह न केवल डिस्कॉम्स को मजबूत करेगा, बल्कि सतत विकास को भी गति देगा।  इस विधेयक को वर्तमान आर्थिक सुधारों (जैसे PLI स्कीम) और जलवायु नीतियों के संदर्भ में देखना चाहिए। सफलता के लिए, केंद्र-राज्य सहयोग और पारदर्शी कार्यान्वयन अनिवार्य है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न: 

Q. विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह विधेयक एक ही भौगोलिक क्षेत्र में एकाधिक वितरण लाइसेंसधारियों को कार्य करने की अनुमति देता है।
2. विधेयक क्रॉस-सब्सिडी को समाप्त करने का लक्ष्य रखता है, विशेषकर विनिर्माण और रेलवे क्षेत्रों के लिए पांच वर्षों के भीतर।
3. राज्य विद्युत विनियामक आयोगों (SERCs) को टैरिफ निर्धारण में स्वतः संज्ञान लेने की अनुमति नहीं है।

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 केवल
(b) 1 और 3 केवल
(c) 2 और 3 केवल
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)
व्याख्या: कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है, क्योंकि विधेयक SERCs को आवेदन में देरी पर टैरिफ निर्धारण की अनुमति देता है।

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.“भारत के विद्युत क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और वितरण सुधारों को लागू करने के लिए प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। यह विद्युत क्षेत्र की वित्तीय एवं संरचनात्मक चुनौतियों को किस हद तक संबोधित करता है?”    ( शब्द सीमा – 250, अंक – 15 )

 

 

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