08 Aug वैश्विक संघर्ष और टैरिफ: सी. रंगराजन ने नीति पुनर्विचार की ज़रूरत पर दिया जोर
✎ बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक और व्यापारिक परिदृश्य के कारण भारत को अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए, जिसमें महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन और आत्मनिर्भरता पर अधिक ध्यान केंद्रित करना शामिल है, भले ही यह उदारीकरण…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय | GS Paper III — उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, औद्योगिक नीति तथा इसके प्रभावों में परिवर्तन | GS Paper II — भारत एवं उसके पड़ोसी-संबंध | GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध
- Prelims: उदारीकरण (Liberalisation), वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain), टैरिफ (Tariff), घरेलू उत्पादन (Domestic Production), आत्मनिर्भर भारत, नई आर्थिक नीति (New Economic Policy), संरक्षणवाद (Protectionism), विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector)
- Essay: बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की आर्थिक संप्रभुता, वैश्वीकरण बनाम संरक्षणवाद: भारत के लिए सही संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक और व्यापारिक परिदृश्य के कारण भारत को अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए, जिसमें महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन और आत्मनिर्भरता पर अधिक ध्यान केंद्रित करना शामिल है, भले ही यह उदारीकरण के कुछ सिद्धांतों से विचलन हो।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष सी. रंगराजन ने भारत की नई आर्थिक नीति (New Economic Policy) की 35वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों और टैरिफ (Tariff) के बढ़ते उपयोग के कारण उत्पन्न चुनौतियों पर प्रकाश डाला, और सुझाव दिया कि भारत को अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए, विशेष रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
पृष्ठभूमि
- भारत ने 1991 में नई आर्थिक नीति (New Economic Policy) अपनाई, जिसमें उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) और वैश्वीकरण (Globalisation) के सिद्धांतों पर जोर दिया गया।
- इस नीति का उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को गति देना था।
- पिछले कुछ वर्षों में, वैश्विक व्यापार में टैरिफ (Tariff) और गैर-टैरिफ बाधाओं (Non-Tariff Barriers) का उपयोग बढ़ा है, जिससे मुक्त व्यापार के सिद्धांतों को चुनौती मिली है।
- रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक तनावों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (Global Supply Chains) को बाधित किया है और ऊर्जा तथा खाद्य सुरक्षा पर चिंताएं बढ़ाई हैं।
- सी. रंगराजन ने तर्क दिया है कि इन बाहरी झटकों के कारण भारत को अपनी आर्थिक रणनीति में बदलाव करने की आवश्यकता है, भले ही इसका मतलब उदारीकरण के कुछ नियमों से ‘भटकना’ हो।
- उन्होंने रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर चिप्स के निर्माण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) को अपनाने जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया।
भारत की नई आर्थिक नीति (1991) और इसके निहितार्थ
- भारत की नई आर्थिक नीति 1991 में गंभीर भुगतान संतुलन (Balance of Payments) संकट के जवाब में शुरू की गई थी।
- इस नीति के तीन मुख्य स्तंभ थे: उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) और वैश्वीकरण (Globalisation), जिन्हें ‘LPG सुधार’ के रूप में जाना जाता है।
- उदारीकरण का अर्थ था अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण और प्रतिबंधों को कम करना, जिससे उद्योगों को अधिक स्वतंत्रता मिली।
- निजीकरण में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (Public Sector Undertakings – PSUs) में सरकारी हिस्सेदारी बेचना और निजी क्षेत्र की भूमिका का विस्तार करना शामिल था।
- वैश्वीकरण का उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना था, जिसमें व्यापार बाधाओं को कम करना और विदेशी निवेश को आकर्षित करना शामिल था।
- इन सुधारों ने भारत की आर्थिक संवृद्धि को गति दी, विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि की और विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया।
- हालांकि, इन सुधारों के कुछ आलोचक भी हैं जो तर्क देते हैं कि इन्होंने असमानता बढ़ाई और कुछ घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुंचाया।
- वर्तमान संदर्भ में, रंगराजन जैसे अर्थशास्त्री यह सुझाव दे रहे हैं कि वैश्विक परिवर्तनों के कारण भारत को अपनी ‘LPG’ नीतियों के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है, विशेषकर रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| वैश्विक भू-राजनीतिक परिवर्तन | देशों के बीच संघर्ष और व्यापारिक बाधाएँ (टैरिफ) वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। |
| टैरिफ का बढ़ता उपयोग | संरक्षणवाद (Protectionism) की बढ़ती प्रवृत्ति, जो मुक्त व्यापार के सिद्धांतों के विपरीत है। |
| नई आर्थिक नीति (NEP) की 35वीं वर्षगाँठ | भारत की आर्थिक उदारीकरण (Economic Liberalisation) यात्रा का पुनर्मूल्यांकन और भविष्य की दिशा पर विचार। |
| घरेलू उत्पादन पर जोर | महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे रक्षा, चिप उत्पादन और AI में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता। |
| उदारीकरण के नियमों का संभावित उल्लंघन | बदलती वैश्विक परिस्थितियों में राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए नीतिगत लचीलेपन की आवश्यकता। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (Global Supply Chains) में व्यवधान और उनके प्रभावों को कम करने के लिए घरेलू विनिर्माण (Domestic Manufacturing) को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।
- टैरिफ और व्यापार युद्धों के कारण निर्यात-उन्मुख रणनीतियों पर पुनर्विचार और आंतरिक मांग पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
- महत्वपूर्ण इनपुट और वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भरता कम करके आर्थिक स्थिरता और लचीलापन बढ़ाना।
सामरिक महत्व
- रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता (Self-reliance) राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है, विशेषकर भू-राजनीतिक संघर्षों के वर्तमान परिदृश्य में।
- सेमीकंडक्टर चिप्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में घरेलू क्षमता का विकास भविष्य की सुरक्षा और आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए महत्वपूर्ण है।
- वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को बनाए रखने के लिए नीतिगत समायोजन आवश्यक हैं।
नीतिगत महत्व
- भारत की नई आर्थिक नीति के सिद्धांतों, विशेषकर उदारीकरण और वैश्वीकरण (Globalisation) की सीमाओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता।
- बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुकूल नई औद्योगिक और व्यापार नीतियों को तैयार करना।
- संरक्षणवादी उपायों और घरेलू उत्पादन प्रोत्साहन के बीच संतुलन स्थापित करना ताकि आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार दोनों को बढ़ावा मिले।
चुनौतियाँ
1. वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता
- देशों के बीच बढ़ते संघर्ष और तनाव वैश्विक व्यापार और निवेश प्रवाह को बाधित करते हैं।
- यह अनिश्चितता आपूर्ति श्रृंखलाओं को अस्थिर करती है और ऊर्जा तथा खाद्य सुरक्षा पर दबाव डालती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, अर्थव्यवस्था
2. संरक्षणवाद और टैरिफ
- विभिन्न देशों द्वारा लगाए गए टैरिफ भारत के निर्यात को प्रभावित कर सकते हैं और वैश्विक व्यापार को धीमा कर सकते हैं।
- यह मुक्त व्यापार के सिद्धांतों को कमजोर करता है और वैश्विक आर्थिक एकीकरण के लिए चुनौती प्रस्तुत करता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
3. आपूर्ति श्रृंखला का लचीलापन
- महत्वपूर्ण इनपुट और वस्तुओं के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता बाहरी झटकों के प्रति अर्थव्यवस्था को संवेदनशील बनाती है।
- घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने में निवेश, प्रौद्योगिकी और कुशल श्रम की कमी जैसी चुनौतियाँ हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, औद्योगिक नीति
4. उदारीकरण बनाम आत्मनिर्भरता
- उदारीकरण के सिद्धांतों से हटकर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों और प्रतिबद्धताओं पर असर पड़ सकता है।
- संतुलन स्थापित करना ताकि ‘आत्मनिर्भरता’ संरक्षणवाद में न बदल जाए और प्रतिस्पर्धात्मकता बनी रहे।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, सरकारी नीतियाँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| भू-राजनीतिक संघर्ष | वैश्विक व्यापार मार्गों में व्यवधान, ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि और निवेश प्रवाह में कमी। |
| टैरिफ का बढ़ता उपयोग | निर्यात बाजारों तक पहुँच में कमी, घरेलू उद्योगों पर लागत का बोझ और वैश्विक व्यापार संवृद्धि में बाधा। |
| महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आयात निर्भरता | बाहरी झटकों के प्रति अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता, राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम (विशेषकर रक्षा में) और तकनीकी पिछड़ापन। |
| उदारीकरण के नियमों से विचलन | अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भागीदारों के साथ तनाव, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों का उल्लंघन और दीर्घकालिक आर्थिक दक्षता पर संभावित नकारात्मक प्रभाव। |
आगे की राह
- महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे रक्षा, सेमीकंडक्टर और AI में घरेलू विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने के लिए लक्षित प्रोत्साहन और नीतियाँ लागू करना।
- अनुसंधान एवं विकास (Research & Development) में निवेश बढ़ाना ताकि तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके और नवाचार को बढ़ावा मिले।
- आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविध बनाना और लचीलापन (Resilience) बढ़ाना ताकि बाहरी झटकों के प्रभाव को कम किया जा सके।
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों में सक्रिय रूप से भाग लेना लेकिन राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए आवश्यक नीतिगत स्थान बनाए रखना।
- कौशल विकास कार्यक्रमों को मजबूत करना ताकि उभरते उद्योगों की जरूरतों को पूरा किया जा सके और रोजगार सृजन हो।
- राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों को वैश्विक अनिश्चितताओं के अनुकूल बनाना ताकि आर्थिक स्थिरता बनी रहे।
- निर्यात विविधीकरण (Export Diversification) पर ध्यान केंद्रित करना और नए बाजारों की तलाश करना ताकि टैरिफ के प्रभाव को कम किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नई आर्थिक नीति · उदारीकरण · वैश्वीकरण · संरक्षणवाद · घरेलू उत्पादन · आर्थिक संप्रभुता · आपूर्ति श्रृंखला · व्यापार शुल्क · भू-राजनीतिक संघर्ष · आत्मनिर्भर भारत · आर्थिक नीति पुनर्विचार · आर्थिक सुधार
अवधारणा प्रवाह
वैश्विक संघर्ष और टैरिफ में वृद्धि → मुक्त व्यापार और उदारीकरण के सिद्धांतों पर दबाव → आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और आयात निर्भरता का जोखिम → महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता → नीतिगत पुनर्विचार: उदारीकरण के नियमों से संभावित विचलन → आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए समायोजन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत की नई आर्थिक नीति (NEP) 1991 में शुरू की गई थी।
2. NEP का मुख्य उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के माध्यम से खोलना था।
3. डॉ. सी. रंगराजन ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर के रूप में कार्य किया है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 और 2 सही हैं। भारत की नई आर्थिक नीति 1991 में शुरू की गई थी और इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था को उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के माध्यम से खोलना था। कथन 3 भी सही है, डॉ. सी. रंगराजन RBI के पूर्व गवर्नर रहे हैं।
Q2. अभिकथन (A): डॉ. सी. रंगराजन के अनुसार, वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों और व्यापार शुल्कों के कारण भारत को अपनी आर्थिक नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए।
कारण (R): बदलती वैश्विक परिस्थितियों में, महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना आवश्यक है, भले ही यह उदारीकरण के कुछ नियमों को तोड़ता हो।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं। डॉ. रंगराजन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वैश्विक संघर्षों और शुल्कों के कारण नीतिगत पुनर्विचार की आवश्यकता है। कारण (R) इस पुनर्विचार के पीछे के तर्क को सही ढंग से बताता है कि घरेलू उत्पादन और आत्मनिर्भरता महत्वपूर्ण है, भले ही यह उदारीकरण के कुछ सिद्धांतों से विचलित हो।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ डॉ. सी. रंगराजन के हालिया बयानों के आलोक में, भारत की नई आर्थिक नीति (1991) के सिद्धांतों से विचलन की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। क्या भू-राजनीतिक संघर्ष और व्यापार शुल्क जैसे बाहरी झटके भारत की आर्थिक संप्रभुता को बनाए रखने के लिए संरक्षणवादी उपायों को न्यायोचित ठहराते हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** डॉ. सी. रंगराजन के बयानों का संदर्भ दें, जिसमें उन्होंने वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्षों और व्यापार शुल्कों के कारण नीतिगत पुनर्विचार का आह्वान किया है। भारत की 1991 की नई आर्थिक नीति (NEP) के मूल सिद्धांतों (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) का संक्षिप्त उल्लेख करें।
2. **NEP के सिद्धांतों से विचलन की आवश्यकता:**
* **वैश्विक परिदृश्य में बदलाव:** शीत युद्ध के बाद के उदारीकृत विश्व से वर्तमान के भू-राजनीतिक तनावों, व्यापार युद्धों और आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों की ओर बदलाव।
* **संरक्षणवाद का उदय:** कई देशों द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए व्यापार शुल्कों और गैर-शुल्क बाधाओं का उपयोग।
* **महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता:** रक्षा, सेमीकंडक्टर चिप्स, AI जैसी महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों और आवश्यक इनपुट वस्तुओं में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता।
* **आपूर्ति श्रृंखला का लचीलापन:** वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिमों को कम करना।
3. **संरक्षणवादी उपायों का औचित्य:**
* **आर्थिक संप्रभुता:** राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना।
* **बाहरी झटकों से बचाव:** वैश्विक अनिश्चितताओं और व्यवधानों के खिलाफ अर्थव्यवस्था को बफर प्रदान करना।
* **रणनीतिक उद्योग विकास:** उभरते उद्योगों को शुरुआती समर्थन देना।
* **’आत्मनिर्भर भारत’ पहल:** सरकार की वर्तमान नीतिगत दिशा के साथ तालमेल।
4. **संभावित चुनौतियाँ और संतुलन:**
* **दक्षता का नुकसान:** अत्यधिक संरक्षणवाद से प्रतिस्पर्धा में कमी और नवाचार में बाधा आ सकती है।
* **व्यापारिक संबंध:** संरक्षणवादी नीतियां अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों को तनावपूर्ण बना सकती हैं।
* **उपभोक्ता लागत:** घरेलू उत्पादन महंगा होने पर उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ सकता है।
* **संतुलित दृष्टिकोण:** उदारीकरण के लाभों को पूरी तरह से त्यागने के बजाय, रणनीतिक क्षेत्रों में लक्षित हस्तक्षेपों के साथ एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर दें।
5. **निष्कर्ष:** बदलती वैश्विक वास्तविकताओं के अनुकूल होने के लिए नीतिगत लचीलेपन की आवश्यकता पर बल दें, जो भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों और संप्रभुता को सुनिश्चित करे, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ाव के लाभों को भी बनाए रखे।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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