06 Sep शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की 25वीं शिखर बैठक और भारत की भूमिका
मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 2 – के अंतर्राष्ट्रीय संबंध के अंतर्गत – ‘ महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समूह और महत्त्वपूर्ण समझौते, भारत और इसके पड़ोसी देश, भारत की विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता’ खण्ड से
प्रारंभिक परीक्षा के लिए – शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स, उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो), पहलगाम हमला, कैलाश मानसरोवर यात्रा, वास्तविक नियंत्रण रेखा
खबरों में क्यों ?

- हाल ही में चीन के तियानजिन शहर में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के राष्ट्राध्यक्षों की परिषद की 25वीं शिखर बैठक आयोजित की गई, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री ने भी भाग लिया।
- यह बैठक इसलिए चर्चा में रही क्योंकि इसमें वैश्विक आतंकवाद, आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था जैसे प्रमुख मुद्दों पर गंभीर विमर्श और निर्णय लिए गए।
- भारत ने इस मंच का उपयोग अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए वैश्विक संतुलन की दिशा में योगदान देने के लिए किया। तियानजिन सम्मेलन न केवल SCO की भावी दिशा निर्धारित करता है, बल्कि भारत की सक्रिय कूटनीति और बहुध्रुवीय विश्व में उसकी भूमिका को भी दर्शाता है।
SCO शिखर सम्मेलन 2025 के प्रमुख निष्कर्ष :
- आतंकवाद के विरुद्ध सख्त रुख : तियानजिन घोषणापत्र में पहलगाम जैसे आतंकी हमलों की कठोर निंदा की गई। इसने आतंकियों की सीमा पार आवाजाही पर रोक और उग्रवादी समूहों के भाड़े के रूप में उपयोग के विरुद्ध प्रतिबद्धता व्यक्त की। यह भारत की लंबे समय से चली आ रही आतंकवाद-विरोधी नीति का समर्थन करता है।
- सदस्यता और साझेदारियों का विस्तार : लाओस को SCO का नया साझेदार देश घोषित किया गया, जिससे संगठन की कुल सदस्यता 27 हो गई — इसमें 10 पूर्ण सदस्य और 17 साझेदार देश शामिल हैं। यह संगठन की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र को दर्शाता है।
- वैश्विक शासन पहल (GGI) : GGI पहल को तियानजिन घोषणा का केंद्रबिंदु माना गया, जिसका उद्देश्य बहुपक्षवाद, सार्वभौमिक समानता और न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था को बढ़ावा देना है। यह भारत के “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” जैसे दृष्टिकोण के अनुरूप है।
- सांस्कृतिक समरसता और सामाजिक सहयोग : सदस्य देशों ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का स्वागत किया, जो नाजीवाद, नव-नाजीवाद, नस्लवाद और ज़ेनोफोबिया के खिलाफ है। इसके साथ ही लोगों के बीच संपर्क, आपसी सम्मान और बहुसांस्कृतिक सहयोग की पुष्टि की गई।
- वैश्विक संघर्षों पर एकजुट प्रतिक्रिया : गाजा और ईरान में सैन्य कार्रवाइयों की निंदा की गई और अफगानिस्तान में समावेशी शासन को स्थायी शांति का मार्ग बताया गया। इससे SCO के सदस्य देशों की साझा विदेश नीति प्राथमिकताएँ परिलक्षित होती हैं।
- आर्थिक और विकासात्मक सहयोग : इस शिखर बैठक में वैश्विक व्यापार स्थिरता, द्विपक्षीय निवेश, SCO विकास बैंक की स्थापना और बहुपक्षीय आर्थिक तंत्रों के विस्तार पर जोर दिया गया। ये घोषणाएँ एक प्रतिस्पर्धी आर्थिक समूह बनने की SCO की आकांक्षाओं को इंगित / व्यक्त करती हैं।
वैश्विक बहुपक्षवाद में SCO की भूमिका :

- व्यापक भूराजनीतिक पहुँच : SCO अब केवल मध्य एशियाई संगठन नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक GDP का लगभग 23% और विश्व की 42% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी सदस्यता में विविधता इसे एक वैश्विक मंच में परिवर्तित कर रही है।
- पश्चिमी गठबंधनों को चुनौती : तुर्की जैसे नाटो सदस्य की SCO में भागीदारी बताती है कि यह मंच पारंपरिक पश्चिमी संरचनाओं के एक वैकल्पिक मंच के रूप में उभर रहा है। विशेषकर वैश्विक दक्षिण के लिए यह एक मुखर मंच बनता जा रहा है।
- सुरक्षा ढाँचे का विस्तार : SCO नाटो द्वारा छोड़े गए सुरक्षा शून्य, विशेषतः अफगानिस्तान में, को भरने का प्रयास करता है। ताशकंद स्थित RATS आतंकवाद-विरोधी प्रयासों के लिए एक महत्त्वपूर्ण तंत्र है।
- आपसी संपर्कता और क्षेत्रीय व्यापारिक एकीकरण : INSTC और चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाओं को समर्थन देकर SCO क्षेत्रीय व्यापार और संपर्क को बढ़ावा देता है। SCO बिज़नेस काउंसिल और इंटरबैंक कंसोर्टियम आर्थिक सहयोग के लिए सक्रिय हैं।
- सभ्यतागत सहयोग : भारत की पारंपरिक चिकित्सा, बौद्ध धरोहर, डिजिटल समावेशन और स्टार्ट-अप जैसी पहलें SCO को मात्र सरकार-स्तरीय नहीं, बल्कि जनता-से-जनता के संबंधों को भी मजबूत करने वाले मंच में बदलती हैं।
- वैश्विक संस्थाओं में सुधार का समर्थन : SCO संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग करता है, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था को एक नया स्वरूप मिल सके। यह बहुध्रुवीयता और लोकतांत्रिक वैश्वीकरण की दिशा में एक प्रयास है।
SCO की प्रभावशीलता को प्रभावित करने वाली प्रमुख चुनौतियाँ :

- सुरक्षा के स्तर पर सीमित प्रभावशीलता का होना : RATS तंत्र हालाँकि नियमित अभ्यास करता है, लेकिन यह आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहा है। पाकिस्तान और ईरान जैसे देशों की मौजूदगी इसकी साख को कमजोर करती है।
- शक्तियों के असमानता का होना : मध्य एशियाई देश अक्सर रूस और चीन के प्रभुत्व में स्वयं को कमतर महसूस करते हैं। ‘शंघाई भावना’ व्यवहार की अपेक्षा भाषणों में ही सीमित है।
- कमजोर आर्थिक एकीकरण का होना : SCO समझौतों का क्रियान्वयन बहुत धीमा है। उदाहरणस्वरूप, SCO परिवहन समझौता अभी तक पूर्ण रूप से कार्यान्वित नहीं हुआ। मध्य एशिया के भीतर व्यापार अब भी न्यूनतम स्तर पर है, जो ASEAN से काफी पीछे है।
- संस्थागत संरचना की कमी होना : SCO के अंतर्गत बैंकिंग, व्यापार परिषदों और ऊर्जा सहयोग के लिए ठोस ढाँचागत संस्थाएँ स्थापित नहीं हो पाई हैं। यह मंच अधिकतर औपचारिक बैठकें और नेटवर्किंग तक ही सीमित है।
- सार्क (SAARC) से तुलना करना : जहाँ ASEAN ने संस्थागत सक्रियता के ज़रिए विवाद प्रबंधन में सफलता पाई है, वहीं SCO को SAARC की तरह केवल शिखर सम्मेलन-आधारित गतिविधियों तक सीमित देखा जा रहा है।
भारत की SCO से जुड़ी चिंताएँ :
- चीन का बढ़ता प्रभुत्व : SCO के भीतर चीन की सक्रियता और BRI (Belt and Road Initiative) को थोपने के प्रयास भारत के लिए चिंता का विषय हैं। BRI का एक हिस्सा, CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा), भारत की संप्रभुता का उल्लंघन करता है।
- संपर्क परियोजनाओं में भारत की सीमित भागीदारी : SCO के कई संपर्क परियोजनाओं में भारत की सीमित भागीदारी उसके आर्थिक और भू-रणनीतिक प्रभाव को सीमित करती है।
- चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति : भारतीय समुद्री क्षेत्र में चीन की घेराबंदी रणनीति SCO के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ सकती है, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
- पश्चिम-विरोधी गुट के रूप में छवि होना : SCO को रूस, चीन और ईरान के प्रभाव के चलते एक पश्चिम-विरोधी गुट के रूप में देखा जाता है। भारत के लिए यह चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि वह QUAD और G20 जैसे पश्चिम-नेतृत्व वाले मंचों में भी सक्रिय है।
- भारत की आतंकवाद – विरोधी नीतियों के विपरीत होना : भारत द्वारा पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग अक्सर चीन और पाकिस्तान द्वारा SCO मंच पर बाधित की जाती है। इससे भारत की आतंकवाद-विरोधी नीतियों को झटका लगता है।
समाधान की राह / भारत की रणनीतिक राह :

- भारत द्वारा रणनीतिक बहुसंरेखण (Strategic Multi-Alignment) की नीति को अपनाना : भारत, कठोर गुटबंदी से परे, सभी वैश्विक मंचों में सक्रिय रहता है — चाहे वह QUAD हो या SCO। यह उसकी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति को दर्शाता है।
- भारत की चयनात्मक भागीदारी होना : भारत SCO के संवेदनशील पहलुओं (जैसे, BRI, सुरक्षा) से दूरी बनाकर व्यापार, तकनीक और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रहता है। यह विवाद से दूर रहकर सहयोग की नीति है।
- भारत – रूस के बीच संतुलनकारी साझेदारी का होना : भारत-रूस संबंध SCO में भारत की स्थिति को मज़बूत बनाते हैं। रूस RIC (रूस-भारत-चीन) वार्ता को पुनर्जीवित करके भारत और चीन के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
- सीमा विवाद पर आपसी संवाद और चीन के साथ कूटनीतिक संवाद भी जारी रखना : भारत, LAC पर सैन्य तैयारी बनाए रखते हुए, चीन के साथ कूटनीतिक संवाद भी जारी रखता है। वर्ष 2024 के देपसांग और डेमचोक विमुक्ति समझौते इसका उदाहरण हैं।
- वैश्विक दक्षिण की चिंताओं को उठाने हेतु भारत द्वारा बहुपक्षीय मंचों का उपयोग करना : भारत SCO और BRICS जैसे मंचों का उपयोग वैश्विक दक्षिण की चिंताओं को उठाने हेतु करता है, जबकि QUAD और इंडो-पैसिफिक फ्रेमवर्क जैसे मंचों से चीन की आक्रामकता का संतुलन बनाता है।
निष्कर्ष :

- शंघाई सहयोग संगठन, विशेषकर 25वीं शिखर बैठक के पश्चात, एक ऐसा मंच बनकर उभरा है जो वैश्विक दक्षिण की आवाज़ उठाने, बहुपक्षीयता को सशक्त करने और एक अधिक न्यायसंगत विश्व व्यवस्था की दिशा में प्रयास कर सकता है।
- हालांकि, शंघाई सहयोग संगठन की शक्ति असंतुलन और संस्थागत प्रभावशीलता की कमी जैसी आंतरिक चुनौतियाँ इसकी संभावनाओं को सीमित करती हैं।
- भारत इस मंच में व्यावहारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाते हुए, सहयोग के अवसरों का लाभ उठाता है तथा विवादास्पद मुद्दों से दूरी बनाकर एक संतुलित भागीदार की भूमिका निभाता है।
- तियानजिन सम्मेलन न केवल शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की भावी दिशा को संकेत करता है, बल्कि भारत की बहुध्रुवीय विश्व में रणनीतिक स्वायत्तता और सक्रिय भूमिका को भी रेखांकित करता है।
स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिंदू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- यह वैश्विक GDP का लगभग 23% और जनसंख्या का 42% प्रतिनिधित्व करता है।
- इसका मुख्य कार्य केवल मध्य एशियाई देशों के मुद्दों तक ही सीमित है।
- यह वैश्विक दक्षिण के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है।
- शंघाई सहयोग संगठन (SCO) संयुक्त राष्ट्र (UN) के स्थान पर कार्य करता है।
उपर्युक्त में से कौन-सा / से कथन SCO के वैश्विक प्रभाव को दर्शाते हैं?
A. केवल 1 और 4
B. केवल 1 और 3
C. इनमें से कोई नहीं।
D. उपरोक्त सभी।
उत्तर – B
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. चीन एशिया में अपनी सैन्य शक्ति की स्थिति मजबूत करने के लिए आर्थिक साधनों का उपयोग कर रहा है। इस संदर्भ में भारत पर उसके प्रभावों की विवेचना कीजिए। इसके साथ – ही – साथ चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के भारत की सुरक्षा पर संभावित खतरों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

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