28 Jul संसद सदस्यों के कारण उप-उत्पत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने दलबदल कानून के क्रियान्वयन में बड़ी चुनौतियाँ बताईं
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय। | GS Paper II — विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ।
- Prelims: दल-बदल विरोधी कानून, दसवीं अनुसूची, संसद सदस्य, विधानमंडल सदस्य, अयोग्यता, विलय अपवाद, अनुच्छेद 32
- Essay: भारतीय लोकतंत्र में दल-बदल विरोधी कानून का महत्व और चुनौतियाँ, संसदीय नैतिकता और संवैधानिक प्रावधानों का संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: दल-बदल विरोधी कानून, जो संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित है, का उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए विधायकों द्वारा पार्टी बदलने पर अंकुश लगाना है, लेकिन इसके ‘विलय अपवाद’ प्रावधान को अक्सर दुरुपयोग का एक साधन माना जाता है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता व्यक्त की है।
पूर्व में पूछा गया: Asked in UPSC Prelims 2013, 2014, 2020; Mains 2018
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के प्रवर्तन में ‘भारी मुद्दों’ पर चिंता व्यक्त की है, यह कहते हुए कि ये मुद्दे ‘संसद सदस्यों की अपनी रचना’ हैं। न्यायालय ने संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 की व्याख्या को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जो राजनीतिक दल के विलय के माध्यम से विधायकों को अयोग्यता से बचने की अनुमति देता है। न्यायालय ने गोवा में राजनीतिक दलबदल से संबंधित एक समान लंबित मामले के साथ इस याचिका को टैग करने पर सहमति व्यक्त की है।
पृष्ठभूमि
- दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़कर शामिल किया गया था।
- इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलबदल को रोकना और सरकारों में स्थिरता सुनिश्चित करना था, जो अक्सर विधायकों द्वारा एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने के कारण गिर जाती थीं।
- यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान करता है यदि वे स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ देते हैं या पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करते हैं।
- दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 में एक ‘विलय अपवाद’ (Merger Exception) का प्रावधान है, जिसके तहत यदि किसी राजनीतिक दल के दो-तिहाई विधायक किसी अन्य दल में विलय कर लेते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
- सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू मामले (1992) में दल-बदल विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) के निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की अनुमति दी थी।
- हाल के वर्षों में, इस कानून के विलय प्रावधान का उपयोग सरकारों को गिराने और बनाने के लिए एक उपकरण के रूप में किया गया है, जिससे इसकी प्रभावशीलता और उद्देश्य पर सवाल उठ रहे हैं।
दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) क्या है?
- दल-बदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित है, जिसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।
- इसका उद्देश्य राजनीतिक दलबदल को रोकना है, जो अक्सर विधायकों द्वारा व्यक्तिगत लाभ के लिए पार्टी बदलने से उत्पन्न होता है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है।
- यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों पर लागू होता है।
- अयोग्यता के मुख्य आधारों में स्वेच्छा से अपनी मूल राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ना, पार्टी के निर्देशों के विपरीत सदन में मतदान करना या मतदान से अनुपस्थित रहना शामिल है।
- एक निर्दलीय सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है यदि वह चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
- एक मनोनीत सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है यदि वह सदन में अपनी सीट लेने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
- कानून में ‘विलय’ का अपवाद है: यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय करने का निर्णय लेते हैं, तो न तो मूल दल के सदस्य और न ही विलय करने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जाएंगे।
- अयोग्यता संबंधी मामलों पर निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष और राज्य सभा में सभापति) द्वारा किया जाता है।
- पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है, जैसा कि किहोतो होलोहन मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| दल-बदल विरोधी कानून (Anti-defection law) | यह कानून विधायकों और सांसदों को एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल-बदल करने से रोकने के लिए बनाया गया है, ताकि राजनीतिक स्थिरता बनी रहे और जनादेश का सम्मान हो। |
| संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) | यह अनुसूची दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों को समाहित करती है, जिसमें दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के नियम और अपवाद शामिल हैं। |
| पैराग्राफ 4 (Paragraph 4) | यह प्रावधान दल-बदल विरोधी कानून के तहत विलय (merger) के अपवाद से संबंधित है, जिसके अनुसार यदि किसी दल के दो-तिहाई विधायक या सांसद किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। |
| अयोग्यता (Disqualification) | दल-बदल विरोधी कानून के तहत, यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी व्हिप (whip) के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- यह कानून राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने और निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा जनादेश के उल्लंघन को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है।
- यह सरकारों को अस्थिर करने के लिए ‘इंजीनियर्ड डिफेक्शन्स’ (engineered defections) के दुरुपयोग को रोकने का प्रयास करता है, जिससे अल्पमत बहुमत में और बहुमत अल्पमत में बदल सकता है।
संवैधानिक महत्व
- उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) का यह अवलोकन संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रभावी कार्यान्वयन और उसकी व्याख्या के महत्व को रेखांकित करता है।
- यह विधायिका (legislature) और न्यायपालिका (judiciary) के बीच शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) और न्यायिक समीक्षा (judicial review) की भूमिका पर भी प्रकाश डालता है।
शासन पर प्रभाव
- दल-बदल विरोधी कानून के कमजोर प्रवर्तन से राजनीतिक भ्रष्टाचार और हॉर्स-ट्रेडिंग (horse-trading) को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे सुशासन (good governance) प्रभावित होता है।
- यह कानून राजनीतिक दलों के भीतर अनुशासन बनाए रखने और विधायकों/सांसदों को अपनी पार्टी के प्रति जवाबदेह बनाने में मदद करता है।
चुनौतियाँ
1. विलय प्रावधान का दुरुपयोग
- पैराग्राफ 4 के तहत विलय के अपवाद का उपयोग अक्सर दल-बदल को वैध बनाने के लिए किया जाता है, जिससे मूल कानून का उद्देश्य कमजोर होता है।
- दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता के बावजूद, दल-बदल करने वाले विधायक या सांसद अक्सर इस प्रावधान का लाभ उठाकर अयोग्यता से बच जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, दसवीं अनुसूची
2. अध्यक्ष की भूमिका
- दल-बदल के मामलों में सदन के अध्यक्ष (Speaker) या सभापति (Chairman) का निर्णय अक्सर राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रभावित होता है, जिससे निर्णय में देरी या पक्षपात होता है।
- उच्चतम न्यायालय ने कई बार अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठाए हैं और समयबद्ध निर्णय लेने की आवश्यकता पर बल दिया है।
यूपीएससी लिंक: संसद और राज्य विधानमंडल
3. कानून में अस्पष्टता
- कानून में कुछ प्रावधानों की अस्पष्टता या व्याख्या की कमी, जैसे कि ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना’ (voluntarily giving up membership), कानूनी चुनौतियों और विभिन्न व्याख्याओं को जन्म देती है।
- यह अस्पष्टता दल-बदल करने वाले सदस्यों को कानूनी खामियों का फायदा उठाने का अवसर प्रदान करती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान की विशेषताएं
4. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा
- उच्चतम न्यायालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि ये मुद्दे मुख्य रूप से विधायी और राजनीतिक क्षेत्र से संबंधित हैं, जिससे न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा पर सवाल उठता है।
- न्यायपालिका द्वारा बार-बार हस्तक्षेप से विधायिका की संप्रभुता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका की संरचना और कार्यप्रणाली
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| दल-बदल को वैध बनाना | पैराग्राफ 4 के तहत विलय का अपवाद दल-बदल को कानूनी रूप से मान्य करने का एक उपकरण बन गया है, जिससे जनादेश का उल्लंघन होता है। |
| राजनीतिक अस्थिरता | इंजीनियर्ड डिफेक्शन्स के माध्यम से सरकारों को गिराया जा सकता है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है और विकास कार्य बाधित होते हैं। |
| अध्यक्ष की निष्पक्षता | दल-बदल के मामलों में अध्यक्ष के निर्णयों में देरी और राजनीतिक पूर्वाग्रह की आशंका बनी रहती है, जिससे कानून का प्रभावी प्रवर्तन बाधित होता है। |
| जनादेश का उल्लंघन | दल-बदल से मतदाताओं के निर्णय और राजनीतिक दलों के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, जिससे लोकतंत्र में विश्वास कम होता है। |
| कानूनी खामियां | कानून में मौजूद खामियां और अस्पष्टताएं दल-बदल करने वाले सदस्यों को अयोग्यता से बचने के लिए कानूनी रास्ते तलाशने का अवसर देती हैं। |
आगे की राह
- उच्चतम न्यायालय द्वारा अध्यक्ष के निर्णयों के लिए एक समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए, ताकि मामलों का त्वरित निपटारा हो सके।
- दल-बदल विरोधी कानून के पैराग्राफ 4 में संशोधन किया जाना चाहिए, ताकि विलय के प्रावधानों का दुरुपयोग रोका जा सके।
- अध्यक्ष की भूमिका को अधिक निष्पक्ष और स्वतंत्र बनाने के लिए, दल-बदल के मामलों का निर्णय किसी स्वतंत्र निकाय या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के पैनल द्वारा किया जा सकता है।
- राजनीतिक दलों को आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए, ताकि सदस्यों को पार्टी के भीतर अपनी असहमति व्यक्त करने के लिए पर्याप्त अवसर मिलें।
- कानून में ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना’ जैसे शब्दों की स्पष्ट परिभाषा प्रदान की जानी चाहिए, ताकि कानूनी अस्पष्टता कम हो।
- जनता को दल-बदल के नकारात्मक प्रभावों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि वे ऐसे कृत्यों के प्रति अधिक जागरूक और आलोचनात्मक हों।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
दल-बदल विरोधी कानून · दसवीं अनुसूची · संसदीय लोकतंत्र · न्यायिक समीक्षा · विधायी डोमेन · राजनीतिक दल का विलय · अयोग्यता · सदन के अध्यक्ष की भूमिका · लोकतांत्रिक सिद्धांत · संवैधानिक नैतिकता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 32 (Article 32)’, ‘note’: ‘मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट याचिका’}
- {‘article’: ‘दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule)’, ‘note’: ‘दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 102(2) (Article 102(2))’, ‘note’: ‘संसद सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 191(2) (Article 191(2))’, ‘note’: ‘राज्य विधानमंडल सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित’}
अवधारणा प्रवाह
सांसद/विधायक दल-बदल करते हैं → दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) लागू होता है → पैराग्राफ 4 के तहत विलय का अपवाद → कानूनी खामियों का दुरुपयोग होता है → उच्चतम न्यायालय द्वारा कानून के प्रवर्तन पर चिंता व्यक्त की जाती है → राजनीतिक अस्थिरता और जनादेश का उल्लंघन होता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था।
2. यह किसी राजनीतिक दल के विलय के आधार पर विधायकों की अयोग्यता से छूट प्रदान करती है, यदि उस दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय के लिए सहमत हों।
3. दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर अंतिम निर्णय भारत के राष्ट्रपति द्वारा लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 2
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 सही है। दसवीं अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था। कथन 2 सही है। दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 4 विलय के आधार पर अयोग्यता से छूट देता है, जिसके लिए मूल राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति आवश्यक है। कथन 3 गलत है। दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष (लोकसभा अध्यक्ष या राज्य विधानसभा अध्यक्ष) या सभापति (राज्यसभा) द्वारा लिया जाता है, न कि राष्ट्रपति द्वारा।
Q2. भारत में दल-बदल विरोधी कानून के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह कानून केवल संसद सदस्यों पर लागू होता है, राज्य विधानसभाओं के सदस्यों पर नहीं।
2. यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
3. इस कानून के तहत अयोग्यता संबंधी मामलों में न्यायिक समीक्षा संभव नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से गलत है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 3 — कथन 1 गलत है। दल-बदल विरोधी कानून संसद सदस्यों और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों दोनों पर लागू होता है। कथन 2 सही है। यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो उसे दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया जा सकता है। कथन 3 गलत है। किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि दल-बदल विरोधी कानून के तहत अध्यक्ष/सभापति के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं, हालांकि यह समीक्षा केवल निर्णय के बाद ही की जा सकती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “दल-बदल विरोधी कानून, जिसका उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना था, अब स्वयं राजनीतिक अस्थिरता का एक उपकरण बन गया है।” सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और इस कानून के प्रभावी प्रवर्तन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। साथ ही, इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए संभावित सुधारों का भी सुझाव दीजिए। (250 शब्द)
रूपरेखा: प्रश्न की शुरुआत दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के मूल उद्देश्य और इसकी पृष्ठभूमि से करें। सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों का उल्लेख करें, जिसमें कानून के प्रवर्तन में ‘विशाल मुद्दों’ और ‘सांसदों की स्वयं की देन’ होने पर प्रकाश डाला गया है। कानून के दुरुपयोग के तरीकों (जैसे सरकारों को गिराना, चुनावी जनादेश को बदलना) और पैराग्राफ 4 (विलय प्रावधान) के दुरुपयोग पर चर्चा करें। इसके बाद, कानून के प्रभावी प्रवर्तन में आने वाली चुनौतियों जैसे अध्यक्ष की भूमिका में पक्षपात, न्यायिक समीक्षा की सीमाएं, और ‘विलय’ की अस्पष्ट परिभाषा पर प्रकाश डालें। अंत में, इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए सुधारों का सुझाव दें, जैसे अध्यक्ष की शक्तियों को सीमित करना, स्वतंत्र प्राधिकरण द्वारा निर्णय, विलय प्रावधानों का पुनर्मूल्यांकन और राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना। निष्कर्ष में, कानून के महत्व को बनाए रखते हुए इसके दुरुपयोग को रोकने की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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