28 Mar समान मातृत्व, समान हक और ममता का समान अधिकार बनाम मातृत्व अवकाश पर सुप्रीम मुहर
- मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र के – 2 – राजव्यवस्था/शासन : सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020, सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप, प्रशासनिक डेटा, और नीति-निर्माण, महिलाओं से संबंधित मुद्दे, मातृत्व अवकाश, लैंगिक असमानता ’ खण्ड से संबंधित।
- निबंध (Essay) : भारत में स्त्री – पुरुष के बीच अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार, मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961, मौलिक अधिकार, मानवाधिकार, पितृत्व अवकाश, जैविक नियतवाद, भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक सोच / व्यवस्था का उपयोग सामाजिक – आर्थिक विकास पर निबंध लिखने में किया जा सकता है।
- प्रारंभिक परीक्षा के – ‘ मौलिक अधिकार, मानवाधिकार, जैविक नियतवाद, ‘अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’, अनुच्छेद 42, अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 45’ खण्ड से संबंधित।
ख़बरों में क्यों ?

- हाल ही में, भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (जिसने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 का स्थान लिया) की धारा 60(4) के उस हिस्से को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जो गोद लेने वाली माताओं के अवकाश को बच्चे की आयु (3 माह से कम) के आधार पर सीमित करता था।
- उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश एक मौलिक मानव अधिकार है और इसे जैविक व गोद लेने वाली माताओं के बीच विभाजित नहीं किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को वैधानिक मान्यता देने की भी पुरजोर सिफारिश की है।
भारत में मातृत्व सुरक्षा, कार्यस्थल पर समानता और समानता का आधार से संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधान:

- भारतीय संविधान न केवल समानता की बात करता है, बल्कि महिलाओं के लिए विशेष प्रावधानों का मार्ग भी प्रशस्त करता है। समानता से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद निम्नलिखित हैं:
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) : यह सुनिश्चित करता है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं करेगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जैविक माता और गोद लेने वाली माता के बीच भेदभाव करना इस अनुच्छेद का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि दोनों का उद्देश्य बच्चे का पालन-पोषण करना है।
- अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) : अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के पक्ष में ‘विशेष प्रावधान’ करने की शक्ति देता है। मातृत्व लाभ इसी शक्ति का एक वैधानिक विस्तार है।
- अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) : उच्चतम न्यायालय ने ‘जीवन के अधिकार’ की व्याख्या करते हुए इसमें ‘मानवीय गरिमा’ को जोड़ा है। गरिमापूर्ण जीवन के लिए मातृत्व के दौरान उचित देखभाल और बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव का समय मिलना अनिवार्य है।
- अनुच्छेद 42 (न्यायसंगत और मानवीय कार्य दशाएँ) : यह राज्य को निर्देश देता है कि वह कार्यस्थल पर मानवीय परिस्थितियाँ सुनिश्चित करे और ‘मातृत्व राहत’ (Maternity Relief) के लिए कानून बनाए।
- अनुच्छेद 45 (प्रारंभिक बाल्यकाल देखभाल) : यह 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की देखभाल और शिक्षा पर जोर देता है। मातृत्व अवकाश प्रत्यक्ष रूप से बच्चे के इस अधिकार को सुरक्षित करता है।
भारत में इससे संबंधित प्रमुख समस्याएँ :
- भारत में मातृत्व और पितृत्व लाभ के क्रियान्वयन में कई गहरे स्तर की समस्याएँ विद्यमान हैं:
- गोद लेने की प्रक्रिया की जटिलता : भारत में कानूनी रूप से बच्चा गोद लेने में औसतन 2 से 3 साल लग जाते हैं। ऐसे में ‘3 माह से कम उम्र के बच्चे’ की शर्त अव्यावहारिक थी, जिससे अधिकांश माताएँ लाभ से वंचित रह जाती थीं।
- पितृसत्तात्मक सोच : बच्चों के पालन-पोषण को केवल माँ की जिम्मेदारी माना जाता है। पितृत्व अवकाश की कमी इस धारणा को पुख्ता करती है कि पिता केवल ‘कमाऊ सदस्य’ है, ‘देखभाल करने वाला’ नहीं है।
- असंगठित क्षेत्र की उपेक्षा : भारत का लगभग 90% कार्यबल असंगठित क्षेत्र में है, जहाँ मातृत्व लाभ के कानून कागजों तक ही सीमित हैं।
- अपरिवारीकरण (De-familisation) का अभाव : महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के बजाय, मौजूदा व्यवस्था उन्हें वित्तीय सहायता के लिए परिवार पर निर्भर रहने को मजबूर करती है।
कार्यान्वयन में प्रमुख चुनौतियाँ :

- भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश को धरातल पर उतारने में निम्नलिखित चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं:
आर्थिक और कॉर्पोरेट चुनौतियाँ :
- आर्थिक बोझ और भर्ती में भेदभाव : निजी क्षेत्र, विशेष रूप से स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs), 26 सप्ताह के ‘सवैतनिक अवकाश’ के वित्तीय बोझ से बचने के लिए महिला उम्मीदवारों की तुलना में पुरुषों को वरीयता देते हैं।
- कैरियर पेनल्टी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ना : मातृत्व अवकाश से वापस कार्यस्थल पर लौटने वाली महिलाओं को अक्सर पदोन्नति में देरी या कम महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स दिए जाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
कानूनी और नीतिगत खामियाँ :
- पितृत्व अवकाश का वैधानिक अभाव : भारत में पितृत्व अवकाश के लिए कोई केंद्रीय कानून नहीं है। यह वर्तमान में केवल सरकारी कर्मचारियों (15 दिन) तक सीमित है। कानून की कमी यह संदेश देती है कि बच्चे का पालन-पोषण केवल महिला की जिम्मेदारी है।
- असंगठित क्षेत्र में पहुँच का कम होना : भारत की अधिकांश कामकाजी महिलाएँ असंगठित क्षेत्र (कृषि, निर्माण, घरेलू कार्य) में हैं, जहाँ इन कानूनी लाभों की पहुँच नहीं के बराबर है।
सामाजिक और बुनियादी ढांचागत बाधाएँ :
- सामाजिक रूढ़िवादिता और पितृसत्तात्मक सोच : समाज में आज भी यह धारणा प्रबल है कि घर की देखभाल ‘स्त्री’ का और धनार्जन ‘पुरुष’ का काम है। इस सोच के कारण पुरुष पितृत्व अवकाश लेने में संकोच करते हैं, जिससे महिलाओं पर ‘दोहरा बोझ’ बढ़ जाता है।
- शिशु देखभाल गृह (Creche) की कमी : मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत कार्यस्थलों पर क्रैच की सुविधा प्रदान करना अनिवार्य है, लेकिन छोटे शहरों और छोटे संस्थानों में इसकी उपलब्धता और गुणवत्ता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
समस्याओं के समाधान की राह :

- इन चुनौतियों से निपटने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं :
- साझा जिम्मेदारी : मातृत्व अवकाश को ‘माता-पिता अवकाश’ (Parental Leave) में बदला जाना चाहिए, जिसे माता और पिता अपनी सुविधा अनुसार आपस में साझा कर सकें।
- सरकारी वित्त पोषण सुनिश्चित करने की जरूरत : नियोक्ताओं पर पूरा बोझ डालने के बजाय, सरकार को स्कैंडिनेवियाई देशों की तरह सामाजिक सुरक्षा कोष के माध्यम से अवकाश के दौरान वेतन का भुगतान करना चाहिए।
- निजी क्षेत्र में पितृत्व अवकाश को अनिवार्य बनाने की आवश्यकता : सरकार को एक व्यापक कानून लाना चाहिए जो निजी क्षेत्र में भी पितृत्व अवकाश को अनिवार्य बनाए।
- क्रैच सुविधाओं का विस्तार करने की जरूरत : कार्यस्थलों पर अनिवार्य और उच्च गुणवत्ता वाली शिशु देखभाल सुविधाओं का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि महिलाएँ बिना तनाव के काम पर लौट सकें।
- समावेशी नीतियाँ बनाने की जरूरत : गोद लेने वाली माताओं के लिए आयु सीमा हटाना एक शुरुआत है; अब इसे ‘सरोगेसी’ के माध्यम से माता-पिता बनने वालों के लिए भी समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।
आगे की राह :
- भारत में मातृत्व और पितृत्व लाभ के क्रियान्वयन में कई गहरे स्तर की समस्याएँ विद्यमान हैं, किन्तु भविष्य की दिशा समावेशी और प्रगतिशील होनी चाहिए। जो निम्नलिखित हो सकते हैं –
- कानूनी एकरूपता : सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप तुरंत संशोधन किया जाए।
- जन – जागरूकता अभियान : गोद लेने के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को बदलना और इसे ‘प्रजनन स्वायत्तता’ के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता है।
- बालिका शिक्षा का संरक्षण करने की आवश्यकता : न्यायालय ने अपने निर्णय में यह उल्लेख किया कि यदि माता को अवकाश नहीं मिलता, तो बड़ी बहन को स्कूल छोड़कर छोटे भाई-बहन की देखभाल करनी पड़ती है। इस चक्र को तोड़ने के लिए संस्थागत सहायता अनिवार्य है।
- लचीली कार्य संस्कृति को प्रोत्साहन देना : वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड मॉडल को माता-पिता के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष :

- उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय ‘जैविक नियतवाद’ से ऊपर उठकर ‘देखभाल की संस्कृति’ को प्राथमिकता देता है। मातृत्व अवकाश को एक मौलिक मानवाधिकार मानकर न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बच्चा चाहे गोद लिया हुआ हो या जैविक, उसकी देखभाल का अधिकार और माँ की पेशेवर गरिमा सर्वोपरि है।
- पितृत्व अवकाश की मांग करके, न्यायालय ने लैंगिक समानता की नींव को और मजबूत किया है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह एक ऐसा ‘सामाजिक सुरक्षा ढाँचा’ तैयार करे जहाँ माता-पिता बनना किसी भी व्यक्ति के करियर के लिए बाधा नहीं, बल्कि समाज के निर्माण में एक साझा और गौरवपूर्ण योगदान बने।
स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. भारत में मातृत्व सुरक्षा और समानता से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के बारे में कौन से कथन सत्य हैं?
- अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के पक्ष में विशेष प्रावधान करने की शक्ति देता है।
- अनुच्छेद 42 राज्य को ‘मातृत्व राहत’ के लिए कानून बनाने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ में मानवीय गरिमा के साथ मातृत्व देखभाल भी शामिल है।
- अनुच्छेद 45 केवल 14 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों की शिक्षा पर केंद्रित है।
उपरोक्त विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए:
A. केवल 1 और 2
B. केवल 1, 2 और 3
C. केवल 2, 3 और 4
D. उपरोक्त सभी।
- उत्तर – B
- व्याख्या : कथन 4 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 45 ‘6 वर्ष से कम’ आयु के बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा पर जोर देता है, न कि 14 वर्ष से अधिक।)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. “हाल ही में उच्चतम न्यायालय द्वारा गोद लेने वाली माताओं के मातृत्व अवकाश पर दिया गया निर्णय ‘जैविक नियतवाद’ से ‘देखभाल की संस्कृति’ की ओर एक प्रगतिशील कदम है।” इस कथन के आलोक में, भारत में मातृत्व सुरक्षा से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की चर्चा कीजिए तथा पितृत्व अवकाश को वैधानिक मान्यता देने की आवश्यकता और इसके कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

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