13 Aug सुप्रीम कोर्ट ने बीएनएसएस के तहत पुलिस हिरासत के दायरे को स्पष्ट किया

✎ सर्वोच्च न्यायालय ने BNSS की धारा 187(2) के तहत पुलिस हिरासत के दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा है कि अब यह हिरासत कुल अनुमेय अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के दौरान 15 दिनों तक टुकड़ों में उपलब्ध हो सकती है, जिससे जांच एजेंसियों को…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, कार्यप्रणाली, सरकार की नीतियां और हस्तक्षेप | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा
- Prelims: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), पुलिस हिरासत, न्यायिक हिरासत, अनुच्छेद 187 BNSS, अनुच्छेद 58 BNSS, गिरफ्तारी और हिरासत के अधिकार
- Essay: आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार और मानवाधिकार, कानून का शासन और पुलिस की शक्तियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने BNSS की धारा 187(2) के तहत पुलिस हिरासत के दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा है कि अब यह हिरासत कुल अनुमेय अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के दौरान 15 दिनों तक टुकड़ों में उपलब्ध हो सकती है, जिससे जांच एजेंसियों को अधिक लचीलापन मिलेगा, जबकि अधिवक्ता से मिलने का अधिकार पूछताछ के दौरान निरंतर उपस्थिति की गारंटी नहीं देता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने ‘द स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू’ मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187(2) के दायरे को स्पष्ट किया है। न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि BNSS के तहत पुलिस हिरासत की मांग करने की अवधि को बढ़ाया गया है, जिससे जांच एजेंसी को कुल अनुमेय हिरासत अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के दौरान 15 दिनों तक की पुलिस हिरासत टुकड़ों में मिल सकती है, बजाय इसके कि यह केवल रिमांड के पहले 15 दिनों तक सीमित रहे। न्यायालय ने यह भी कहा कि अधिवक्ता से मिलने का अधिकार BNSS की धारा 38 के तहत गारंटीकृत है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पूछताछ सत्र के दौरान अधिवक्ता की निरंतर भौतिक उपस्थिति अनिवार्य है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के उद्देश्य से, केंद्र सरकार ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) को प्रतिस्थापित करते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) अधिनियमित किया है।
- BNSS का उद्देश्य आपराधिक मामलों की जांच, गिरफ्तारी, हिरासत और परीक्षण से संबंधित प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाना और उन्हें अधिक कुशल बनाना है।
- पुरानी CrPC के तहत, पुलिस हिरासत आमतौर पर रिमांड के पहले 15 दिनों तक ही सीमित थी, जिससे जांच एजेंसियों को कई बार चुनौतियों का सामना करना पड़ता था।
- नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए, संविधान के अनुच्छेद 22 (Article 22) के तहत गिरफ्तारी और हिरासत के संबंध में कुछ सुरक्षा उपाय प्रदान किए गए हैं, जिनमें गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का अधिकार शामिल है।
- पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत के बीच का अंतर आपराधिक न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जहाँ पुलिस हिरासत में अभियुक्त पुलिस की निगरानी में रहता है, जबकि न्यायिक हिरासत में वह न्यायालय की निगरानी में जेल में रहता है।
- जांच एजेंसियों को प्रभावी ढंग से जांच करने की अनुमति देने और अभियुक्तों के मानवाधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन बनाना आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक सतत चुनौती रही है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत पुलिस हिरासत
- BNSS की धारा 58 यह प्रावधान करती है कि पुलिस द्वारा बिना वारंट गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, जब तक कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 187 के तहत अधिकृत न किया जाए।
- BNSS की धारा 187(2) के अनुसार, यदि जांच अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि जांच 24 घंटे के भीतर पूरी नहीं की जा सकती है और यह मानने के लिए आधार हैं कि आरोप सही है, तो वह मजिस्ट्रेट से आगे की हिरासत की मांग कर सकता है।
- सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम स्पष्टीकरण के अनुसार, BNSS की धारा 187(2) पुलिस हिरासत की मांग करने की अवधि को बढ़ाती है। अब यह हिरासत कुल अनुमेय हिरासत अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के दौरान 15 दिनों तक टुकड़ों में उपलब्ध हो सकती है।
- यह प्रावधान जांच एजेंसियों को जटिल मामलों में, जहां जांच में अधिक समय लग सकता है, अधिक लचीलापन प्रदान करता है, जिससे वे प्रभावी ढंग से साक्ष्य एकत्र कर सकें।
- न्यायालय ने यह भी दोहराया कि BNSS की धारा 38 के तहत अभियुक्त को अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूछताछ के प्रत्येक सत्र के दौरान अधिवक्ता की निरंतर भौतिक उपस्थिति अनिवार्य है।
- यह निर्णय जांच की अखंडता और अभियुक्त के कानूनी प्रतिनिधित्व के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
- न्यायालय ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट या न्यायालय अपनी पर्यवेक्षी शक्ति का प्रयोग करते हुए हिरासत पर कोई पूर्ण और गैर-विस्तारणीय बाहरी सीमा नहीं लगा सकते हैं, क्योंकि ऐसी सीमा BNSS की धारा 187(2) के प्रावधानों को बाधित कर सकती है।
- यह स्पष्टीकरण आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस हिरासत के संबंध में कानूनी स्थिति को और अधिक स्पष्ट करता है और BNSS के कार्यान्वयन में सहायता करेगा।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| पुलिस हिरासत की अवधि | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187(2) के तहत पुलिस हिरासत की अवधि को बढ़ाया गया है। अब यह कुल अनुमेय हिरासत अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के दौरान 15 दिनों तक की कुल अवधि के लिए हिस्सों में उपलब्ध हो सकती है, बजाय इसके कि यह केवल रिमांड के पहले 15 दिनों तक सीमित रहे। |
| वकील की उपस्थिति | BNSS की धारा 38 के तहत पसंद के वकील से मिलने का अधिकार सुनिश्चित है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पूछताछ के पूरे सत्र के दौरान वकील लगातार शारीरिक रूप से मौजूद रहेगा। |
| न्यायिक मजिस्ट्रेट का अधिकार | न्यायिक मजिस्ट्रेट या न्यायालय अपनी पर्यवेक्षी शक्ति का प्रयोग करते हुए हिरासत पर कोई पूर्ण और गैर-विस्तारणीय बाहरी सीमा नहीं लगा सकते हैं, क्योंकि ऐसी सीमा BNSS की धारा 187(2) के उपयोग को बाधित करती है। |
| गिरफ्तारी के बाद हिरासत | BNSS की धारा 58 के अनुसार, बिना वारंट गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, जब तक कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 187 के तहत अधिकृत न किया जाए। |
महत्व
कानूनी एवं न्यायिक महत्व
- सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत पुलिस हिरासत की व्याख्या और दायरे को स्पष्ट करता है, जिससे जांच एजेंसियों को अधिक लचीलापन मिलता है।
- यह निर्णय जांच अधिकारी के निर्बाध जांच करने के अधिकार और अभियुक्त के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
- यह न्यायिक मजिस्ट्रेटों और न्यायालयों के लिए दिशानिर्देश स्थापित करता है कि वे हिरासत की अवधि निर्धारित करते समय BNSS के वैधानिक प्रावधानों का ध्यान रखें।
शासन एवं प्रशासन
- पुलिस हिरासत की अवधि में वृद्धि से गंभीर और जटिल मामलों की जांच में पुलिस को सहायता मिलेगी, खासकर जहां साक्ष्य इकट्ठा करने में अधिक समय लगता है।
- यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में जांच प्रक्रिया की दक्षता और प्रभावशीलता को बढ़ाने में योगदान दे सकता है।
चुनौतियाँ
1. मानवाधिकारों का संरक्षण
- पुलिस हिरासत की बढ़ी हुई अवधि से अभियुक्तों के मानवाधिकारों के उल्लंघन की संभावना बढ़ सकती है, विशेषकर हिरासत में यातना और दुर्व्यवहार के मामलों में।
- वकील की लगातार उपस्थिति के बिना पूछताछ से अभियुक्त पर दबाव बढ़ सकता है और आत्म-अभिशंसा (self-incrimination) की संभावना बढ़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, संविधान और राजव्यवस्था
2. न्यायिक निरीक्षण की भूमिका
- न्यायिक मजिस्ट्रेटों पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि पुलिस हिरासत का दुरुपयोग न हो और हिरासत केवल वैध जांच उद्देश्यों के लिए ही मांगी जाए।
- न्यायिक निरीक्षण की कमी या अपर्याप्तता से पुलिस को असीमित शक्तियां मिलने का खतरा हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका, आपराधिक न्याय प्रणाली
3. जांच की गुणवत्ता
- हालांकि हिरासत की अवधि बढ़ी है, फिर भी यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि जांच की गुणवत्ता में सुधार हो और केवल हिरासत पर निर्भरता न बढ़े।
- आधुनिक जांच तकनीकों और फोरेंसिक विज्ञान का उपयोग करके साक्ष्य-आधारित जांच पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।
यूपीएससी लिंक: कानून और व्यवस्था, पुलिस सुधार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पुलिस हिरासत की विस्तारित अवधि | अभियुक्तों के मानवाधिकारों के संभावित उल्लंघन और हिरासत में यातना का जोखिम। |
| वकील की निरंतर अनुपस्थिति | पूछताछ के दौरान अभियुक्त पर अनुचित दबाव और आत्म-अभिशंसा की संभावना। |
| न्यायिक निरीक्षण की सीमाएं | मजिस्ट्रेटों द्वारा हिरासत आदेशों पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करने की चुनौती। |
| जांच के तरीके | पुलिस द्वारा हिरासत पर अत्यधिक निर्भरता और वैज्ञानिक जांच विधियों की उपेक्षा का जोखिम। |
आगे की राह
- पुलिस हिरासत के दौरान अभियुक्तों के मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त दिशानिर्देश और प्रोटोकॉल लागू किए जाएं।
- पुलिस कर्मियों के लिए मानवाधिकारों, वैज्ञानिक जांच तकनीकों और BNSS के प्रावधानों पर नियमित प्रशिक्षण आयोजित किया जाए।
- न्यायिक मजिस्ट्रेटों को पुलिस हिरासत के आदेश देते समय विवेकपूर्ण और सावधानीपूर्वक कार्य करने के लिए सशक्त किया जाए, ताकि दुरुपयोग को रोका जा सके।
- जांच एजेंसियों को आधुनिक फोरेंसिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए ताकि साक्ष्य-आधारित जांच को मजबूत किया जा सके।
- पुलिस हिरासत के दौरान वकील की पहुंच और परामर्श के अधिकार को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, भले ही वकील पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद न हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
- अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और हिरासत से संरक्षण
अवधारणा प्रवाह
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय → BNSS की धारा 187(2) की व्याख्या → पुलिस हिरासत की अवधि में वृद्धि → जांच एजेंसियों को अधिक लचीलापन → मानवाधिकारों के संरक्षण की चुनौती → न्यायिक निरीक्षण की भूमिका का महत्व
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. BNSS की धारा 58 के अनुसार, पुलिस द्वारा बिना वारंट गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, जब तक कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 187 के तहत अधिकृत न किया जाए।
2. BNSS की धारा 187(2) पुलिस हिरासत की अवधि को पहले 15 दिनों की रिमांड तक सीमित करती है।
3. BNSS की धारा 38 के तहत, अभियुक्त को अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है, जिसमें पूछताछ के दौरान अधिवक्ता की निरंतर शारीरिक उपस्थिति शामिल है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। BNSS की धारा 58 गिरफ्तारी के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने का प्रावधान करती है। कथन 2 गलत है। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि BNSS की धारा 187(2) पुलिस हिरासत की अवधि को बढ़ाती है, जिससे कुल निरोध की अनुमेय अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के दौरान 15 दिनों तक की हिरासत टुकड़ों में भी ली जा सकती है, न कि केवल पहले 15 दिनों तक सीमित। कथन 3 गलत है। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ पूछताछ के दौरान अधिवक्ता की निरंतर शारीरिक उपस्थिति नहीं है।
Q2. अभिकथन (A): भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187(2) जांच एजेंसी द्वारा पुलिस हिरासत मांगने की अवधि को बढ़ाती है।
कारण (R): उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में कहा है कि मजिस्ट्रेट या अदालत अपनी पर्यवेक्षी शक्ति का प्रयोग करते हुए हिरासत पर एक पूर्ण और गैर-विस्तारणीय बाहरी सीमा नहीं लगा सकती है, क्योंकि ऐसी सीमा BNSS की धारा 187(2) के तहत उपलब्ध प्रावधानों को समाप्त कर देती है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि BNSS की धारा 187(2) पुलिस हिरासत मांगने की अवधि को पहले 15 दिनों से आगे बढ़ाती है। कारण (R) भी सही है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट या अदालत जांच के दौरान पुलिस हिरासत की आवश्यकता को पूरी तरह से समाप्त नहीं कर सकती। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या भी करता है क्योंकि यह बताता है कि क्यों BNSS की धारा 187(2) पुलिस हिरासत की अवधि को बढ़ाती है और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत पुलिस हिरासत के दायरे को स्पष्ट करने वाले हालिया उच्चतम न्यायालय के निर्णय का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस निर्णय का आपराधिक न्याय प्रणाली में जांच एजेंसियों के अधिकारों और अभियुक्तों के मानवाधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** उच्चतम न्यायालय के ‘द स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू’ मामले में BNSS की धारा 187(2) के तहत पुलिस हिरासत के दायरे को स्पष्ट करने वाले हालिया निर्णय का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **निर्णय का स्पष्टीकरण:**
* BNSS की धारा 187(2) के तहत पुलिस हिरासत अब कुल निरोध की अनुमेय अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के दौरान 15 दिनों तक टुकड़ों में भी उपलब्ध हो सकती है, न कि केवल रिमांड के पहले 15 दिनों तक सीमित।
* मजिस्ट्रेट या अदालत हिरासत पर पूर्ण और गैर-विस्तारणीय बाहरी सीमा नहीं लगा सकती।
* BNSS की धारा 38 के तहत अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है, लेकिन इसमें पूछताछ के दौरान अधिवक्ता की निरंतर शारीरिक उपस्थिति शामिल नहीं है।
3. **जांच एजेंसियों के अधिकारों पर प्रभाव (सकारात्मक):**
* जांच में लचीलापन और दक्षता में वृद्धि।
* जटिल मामलों में साक्ष्य जुटाने और सच्चाई का पता लगाने के लिए पर्याप्त समय।
* अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने में सहायता।
4. **अभियुक्तों के मानवाधिकारों पर प्रभाव (संभावित चिंताएं):**
* पुलिस हिरासत की विस्तारित अवधि से उत्पीड़न या यातना की संभावना बढ़ सकती है।
* अधिवक्ता की निरंतर अनुपस्थिति से निष्पक्ष पूछताछ के अधिकार का उल्लंघन।
* स्वैच्छिक बयानों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न।
* ‘अनुच्छेद 21’ (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और ‘अनुच्छेद 22’ (गिरफ्तारी और निरोध के विरुद्ध संरक्षण) के तहत गारंटीकृत अधिकारों का संतुलन।
5. **आलोचनात्मक विश्लेषण और संतुलन:**
* जांच की आवश्यकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन की आवश्यकता।
* न्यायिक निगरानी और मजिस्ट्रेट की भूमिका का महत्व।
* पुलिस सुधारों और जवाबदेही तंत्रों की आवश्यकता पर बल।
6. **निष्कर्ष:** आपराधिक न्याय प्रणाली में BNSS के प्रावधानों को लागू करते समय जांच की प्रभावशीलता और मानवाधिकारों के संरक्षण के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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