सोशल मीडिया का विनियमन बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक गरिमा के बीच संतुलन

सोशल मीडिया का विनियमन बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक गरिमा के बीच संतुलन

मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 3 – के अंतर्गत – विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी खण्ड से  संबंधित, सूचना प्रौद्योगिकी और कंप्यूटर, संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भूमिका, भारत के विभिन्न वर्गों पर सोशल मीडिया का प्रभाव एवं सोशल मीडिया का विनियमन।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए – भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नेशनल ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA), अनुच्छेद 21 एवं सोशल मीडिया, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, IT अधिनियम, 2000 की धारा 69A, IT अधिनियम, 2000 की धारा 79(1), सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021, के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) 

 

खबरों में क्यों ? 

 

 

  • हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का “व्यवसायीकरण” कर रहे हैं, जो प्राय: कमजोर वर्गों की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। 
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई यह टिप्पणी एक व्यापक बहस को जन्म देती है कि डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाए।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा सामाजिक संवेदनशीलता के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रभावी दिशा – निर्देश तैयार करे। 
  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय यह निर्णय भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में ऑनलाइन सामग्री के विनियमन की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है।

 

सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख अवलोकन : 

 

  • अभिव्यक्ति का व्यवसायीकरण और जवाबदेही में संतुलन की जरूरत : उच्चत्तम न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स अपनी सामग्री से पैसे कमाते हैं, और अक्सर यह सामग्री अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को पार कर जाती है। यह व्यवसायीकरण उन्हें अपने प्लेटफार्म पर प्रदर्शित होने वाली सामग्री के लिए अधिक जिम्मेदार बनाता है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस तरह की अभिव्यक्ति का उपयोग दिव्यांगजनों, महिलाओं, बच्चों, अल्पसंख्यकों और वरिष्ठ नागरिकों जैसे कमजोर वर्गों पर हमला करने के लिए नहीं किया जा सकता है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है जो ऑनलाइन व्यवहार को एक नैतिक और कानूनी ढांचे में बांधता है।
  • हास्य बनाम मानवीय गरिमा के बीच संतुलन की जरूरत : एक ओर हास्य जहाँ समाज में तनाव कम करने और विचारों को प्रसारित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, वहीं न्यायालय ने चेतावनी दी कि आपत्तिजनक चुटकुले और असंवेदनशील टिप्पणियाँ कलंक और भेदभाव को भी बढ़ावा देती हैं। इस तरह की सामग्री हाशिये पर पड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के संवैधानिक दायित्व को बाधित करती है।
  • डिजिटल क्षेत्र में एक स्पष्ट सीमांकन की आवश्यकता पर बल देने की जरूरत : न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यावसायिक अभिव्यक्ति और प्रतिबंधित अभिव्यक्ति के बीच एक स्पष्ट सीमांकन की आवश्यकता पर बल दिया। गैर-जिम्मेदार ऑनलाइन टिप्पणियाँ न केवल व्यक्तिगत गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सामुदायिक विश्वास को भी कमजोर करती हैं।

 

सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दी गई प्रमुख सिफारिशें : 

 

  • नियामक दिशा निर्देश बनाने का निर्देश देना : सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नेशनल ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA) जैसे हितधारकों के साथ परामर्श करके इन्फ्लुएंसर्स और पॉडकास्टर्स के लिए नियामक दिशा निर्देश बनाने का निर्देश दिया। इन दिशानिर्देशों में केवल “औपचारिकता” नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनमें उल्लंघन के लिए आनुपातिक और लागू करने योग्य परिणाम भी शामिल होने चाहिए।
  • सामाजिक सौहार्द के उल्लंघनकर्ताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना : न्यायालय ने सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के बीच जागरूकता, संवेदनशीलता और डिजिटल नैतिकता के महत्व पर बल दिया। इसका उद्देश्य सामाजिक नुकसान के लिए उल्लंघनकर्ताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना है, जिससे डिजिटल स्पेस में एक जिम्मेदार संस्कृति का निर्माण हो सके।
  • बहुलतावादी समाज में सामुदायिक अधिकारों की रक्षा करने की जरूरत : न्यायालय ने इन्फ्लुएंसर्स को अपने प्लेटफार्मों के माध्यम से बिना शर्त माफी मांगने का आदेश दिया। इस आदेश का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और गरिमा के बीच एक स्वस्थ संतुलन स्थापित करना है, ताकि एक विविध समाज में सामुदायिक अधिकारों की रक्षा की जा सके।

 

भारत में सोशल मीडिया विनियमन से संबंधित प्रमुख कानून : 

 

  • भारत में सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए एक बहुस्तरीय कानूनी ढांचा मौजूद है, जिसमें कानून, नियम और कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय शामिल हैं।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 : यह इलेक्ट्रॉनिक संचार और सोशल मीडिया को नियंत्रित करने वाला भारत का सबसे महत्वपूर्ण कानून है।
  • धारा 79(1) : यह धारा मध्यस्थों (जैसे फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम) को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए “सुरक्षित आश्रय” (Safe Harbour) का संरक्षण प्रदान करती है। इसका अर्थ है कि यदि वे केवल एक मंच के रूप में कार्य करते हैं और सामग्री को नियंत्रित या संशोधित नहीं करते हैं, तो वे सामग्री से उत्पन्न होने वाली कानूनी देनदारी से सुरक्षित रहते हैं।
  • धारा 69A : यह धारा सरकार को भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, रक्षा, विदेशी संबंधों, सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करने और अपराधों को भड़काने से रोकने के लिए ऑनलाइन सामग्री को अवरुद्ध करने की अनुमति देती है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 : ये नियम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को उपयोगकर्ता सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई जिम्मेदारियाँ सौंपते हैं। इनमें गैरकानूनी सामग्री को हटाना और गोपनीयता, कॉपीराइट, मानहानि और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जागरूकता फैलाना शामिल है। इन नियमों में 2023 के संशोधन ने मध्यस्थों को भारत सरकार से संबंधित झूठी या भ्रामक सामग्री हटाने के लिए बाध्य किया था, हालाँकि, इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने दुरुपयोग की आशंका का हवाला देते हुए रोक लगा दी है।

 

भारत में सोशल मीडिया विनियमन से संबंधित प्रमुख न्यायिक निर्णय : 

 

  • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) : इस ऐतिहासिक मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने IT अधिनियम, 2000 की धारा 66A को उसकी अस्पष्टता के कारण निरस्त कर दिया। न्यायालय ने दोहराया कि आलोचना, व्यंग्य और असहमति अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित हैं, जब तक कि वे अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाए गए युक्तिसंगत प्रतिबंधों के दायरे में न आते हों। धारा 66A में कंप्यूटर या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से झूठी या आपत्तिजनक जानकारी भेजने को अपराध घोषित किया गया था, जिसके लिए अधिकतम तीन वर्ष का कारावास निर्धारित था।
  • के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) : इस फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। इस फैसले ने बाद के डेटा संरक्षण उपायों को प्रभावित किया, जिनमें डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 शामिल है। इसने व्हाट्सएप की गोपनीयता नीतियों और आधार डेटा मानकों के विनियमन को भी प्रभावित किया।

 

भारत में सोशल मीडिया को विनियमित करने की आवश्यकता क्यों है?

 

 

  1. कमजोर समूहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना : अनियमित प्लेटफॉर्म अपमानजनक सामग्री, साइबरबुलिंग, ट्रोलिंग और शोषण को बढ़ावा देते हैं, खासकर महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, अल्पसंख्यकों और विकलांग व्यक्तियों के लिए। विनियमन इन समूहों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
  2. घृणा अभियानों और अतिवादी प्रचार से संबंधित अफवाह या गलत सूचना और अभद्र भाषा पर अंकुश लगाने की जरूरत : फर्जी खबरों, डीपफेक, घृणा अभियानों और अतिवादी प्रचार का तेजी से प्रसार सामाजिक सद्भाव, लोकतांत्रिक संवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करता है। प्रभावी विनियमन से दुष्प्रचार पारिस्थितिकी तंत्र पर अंकुश लगाया जा सकता है और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखा जा सकता है।
  3. मानसिक स्वास्थ्य और नैतिक मूल्यों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की जरूरत : अंतहीन स्क्रॉलिंग और “छूट जाने का डर” (FOMO) जैसी विशेषताएं युवाओं में नशे की लत, चिंता और अवसाद को बढ़ावा देती हैं। विनियमन डिजिटल कल्याण, जिम्मेदार डिजाइन और नैतिक संचार मानकों को बढ़ावा दे सकता है।
  4. विनियमन पारदर्शिता, प्रकटीकरण मानदंडों और उपभोक्ता संरक्षण को सुनिश्चित करना : इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के बढ़ते चलन के साथ, उपयोगकर्ता अक्सर अप्रकटित पेड प्रमोशन्स और अवैध उत्पादों (जैसे, बेटिंग ऐप्स) के कारण वित्तीय जोखिमों में फंस जाते हैं। विनियमन पारदर्शिता, प्रकटीकरण मानदंडों और उपभोक्ता संरक्षण को सुनिश्चित करता है।
  5. निजता के संवैधानिक अधिकार की रक्षा, डेटा गोपनीयता एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना : सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बड़े पैमाने पर उपयोगकर्ताओं का डेटा एकत्रित करते हैं, अक्सर उनकी सूचित सहमति के बिना। इससे गोपनीयता का उल्लंघन, निगरानी और लाभ या राजनीतिक प्रभाव के लिए दुरुपयोग होता है। इनका विनियमन, अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त निजता के संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए आवश्यक है।
  6. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी में संतुलन स्थापित करना : अनुच्छेद 19(1)(a) मुक्त अभिव्यक्ति की गारंटी प्रदान करता है, लेकिन यह अनुच्छेद 19(2) के तहत युक्तिसंगत प्रतिबंधों (लोक व्यवस्था, नैतिकता, शिष्टता, राज्य की सुरक्षा) के अधीन है। विनियमन वैध मुक्त अभिव्यक्ति और हानिकारक/अपमानजनक सामग्री के बीच संतुलन बनाने में मदद करता है।

 

भारत में सोशल मीडिया को विनियमित करने की राह में प्रमुख चुनौतियाँ :

 

 

  1. नियामक क्षमता पर दबाव : ऑनलाइन सामग्री की अत्यधिक मात्रा के कारण निरंतर निगरानी करना कठिन हो जाता है। इसके अलावा, उपयोगकर्ताओं की गुमनामी उन्हें घृणा फैलाने वाले भाषण, फेक न्यूज और हानिकारक सामग्री साझा करने के लिए और अधिक साहसी बना देती है, जिससे नियामक क्षमता पर दबाव पड़ता है।
  2. पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी : सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं होती और सामग्री की निगरानी से जुड़ी नीतियों में जवाबदेही का अभाव होता है। स्वतंत्र निगरानी के न होने से इनकी अपारदर्शी कार्यप्रणाली और मनमानी फैसलों को लेकर गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं।
  3. हानिकारक सामग्री की परिभाषा : हानिकारक सामग्री को परिभाषित करना एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों में अंतर के कारण आम सहमति बनाना कठिन हो जाता है। यह अस्पष्टता वैध अभिव्यक्ति और प्रतिबंधित भाषण के बीच एक “ग्रे ज़ोन” (अनिश्चित क्षेत्र) उत्पन्न करती है।
  4. स्वतंत्र अभिव्यक्ति बनाम सेंसरशिप : भारत में किसी भी प्रकार के नियमन का प्रयास सेंसरशिप या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश के रूप में देखा जा सकता है, विशेष रूप से तब जब मानदंड स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ और आनुपातिक न हों। यह एक नाजुक संतुलन है जिसे बनाए रखना बेहद जरूरी है।
  5. सीमा पार क्षेत्राधिकार संबंधी मुद्दे : हानिकारक सामग्री का एक बड़ा हिस्सा भारत के क्षेत्राधिकार के बाहर से आता है, जिससे घरेलू कानून के तहत प्रवर्तन और विनियमन कठिन हो जाता है।
  6. राजनीतिक निष्पक्षता संबंधी चिंताएँ : सामग्री की निगरानी से जुड़े निर्णयों पर अक्सर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते हैं, जिससे प्लेटफॉर्म की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं और नियामक तंत्र में जनता का विश्वास कम होता है।

 

समाधान की राह : 

 

  1. न्यायिक निगरानी का प्रावधान और एक मजबूत कानूनी-नीति ढाँचा निर्माण की आवश्यकता : आईटी अधिनियम, 2000 को डिजिटल इंडिया एक्ट के माध्यम से अद्यतन किया जाना चाहिए, ताकि प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, डेटा सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जा सके। इसके साथ ही, किसी भी अतिरेक से बचने के लिए न्यायिक निगरानी का प्रावधान भी आवश्यक है।
  2. स्वतंत्र निरीक्षण निकायों की अनिवार्यता के साथ तटस्थता और शीघ्र समाधान सुनिश्चित करने के लिए AI-आधारित मॉडरेशन टूल्स के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया जाना : एल्गोरिदम की ऑडिटिंग, पारदर्शिता रिपोर्ट और स्वतंत्र निरीक्षण निकायों को अनिवार्य किया जाना चाहिए। तटस्थता और शीघ्र समाधान सुनिश्चित करने के लिए AI-आधारित मॉडरेशन टूल्स के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  3. तकनीकी और संस्थागत क्षमताओं को सशक्त बनाने की आवश्यकता : साइबर फॉरेंसिक लैब्स का विस्तार किया जाना चाहिए और एजेंसियों की क्षमताओं को सशक्त बनाया जाना चाहिए। गोपनीयता और एन्क्रिप्शन मानकों की रक्षा करते हुए AI-सक्षम निगरानी प्रणालियों का एकीकरण भी महत्वपूर्ण है।
  4. राष्ट्रव्यापी डिजिटल साक्षरता अभियान और नैतिक उपयोग प्रथाओं को अपनाने की आवश्यकता : राष्ट्रव्यापी डिजिटल साक्षरता अभियान चलाए जाएं, जिनका उद्देश्य गलत सूचना, डीपफेक तथा साइबरबुलिंग के खिलाफ जागरूकता फैलाना हो। साथ ही, जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार को बढ़ावा दिया जाए एवं ऐसे नैतिक डिजाइन प्रथाओं को अपनाया जाए जो उपयोगकर्ता के कल्याण को प्राथमिकता दें।
  5. वैश्विक और बहु-हितधारक सहयोग को सुनिश्चित करने की जरूरत : सीमापार विनियमन (Cross-Border Regulation) के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जाए तथा एक समावेशी और भविष्य-उन्मुख डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण हेतु नागरिक समाज, शिक्षाविदों और उद्योग जगत की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

 

निष्कर्ष :

 

 

  • भारत में सोशल मीडिया के विनियमन की आवश्यकता इसलिए भी है ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर और संवेदनशील समूहों की गरिमा तथा अधिकारों के साथ संतुलित किया जा सके। 
  • सोशल मीडिया का विनियमन का निर्णय केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक बदलाव की दिशा में भी कदम है, जिससे ऑनलाइन व्यवहार नैतिक और जिम्मेदार बन सके। 
  • सोशल मीडिया के विनियमन से संबंधित एक सशक्त कानूनी ढांचा, तकनीकी समाधान, डिजिटल साक्षरता और नैतिक मूल्यों के समन्वय से जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है, गलत सूचनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकता है, तथा एक सुरक्षित, समावेशी और भरोसेमंद डिजिटल माहौल तैयार किया जा सकता है। 
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सोशल मीडिया के विनियमन की आवश्यकता एक सतत प्रक्रिया है, जिसके लिए सरकार, न्यायपालिका, उद्योग एवं नागरिक समाज के बीच निरंतर सहयोग और समन्वय आवश्यक है, ताकि डिजिटल भारत का भविष्य उज्ज्वल और सशक्त हो सके।
  • सोशल मीडिया को प्रभावी ढंग से विनियमित करना एक जटिल कार्य है, जिसमें कई बाधाएं शामिल हैं। अतः भारत में सोशल मीडिया को एक सुरक्षित, विश्वसनीय और उपयोगी मंच बनाने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

 

स्रोत – पी. आई. बी एवं द हिंदू।

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

 

Q.1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को विनियमित करने की आवश्यकता क्यों है?

  1. वे हास्य के माध्यम से सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देते हैं
  2. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स अपनी अभिव्यक्ति का व्यवसायीकरण कर रहे हैं
  3. उनकी टिप्पणियाँ कमजोर वर्गों की गरिमा को ठेस पहुँचा सकती हैं
  4. भारत में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स पारंपरिक मीडिया की जगह ले रहे हैं

नीचे दिए गए कूट के माध्यम से सही विकल्प का चयन कीजिए : 

A. केवल 1 और 4 

B. केवल 2 और 3 

C. केवल 1, 2 और 4 

D. उपरोक्त सभी।

उत्तर – B

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. डिजिटल युग में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज के कमजोर वर्गों की गरिमा की रक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने के संदर्भ में भारत में सोशल मीडिया के विनियमन की आवश्यकता, इससे जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं और सिफारिशों के आलोक में संभावित समाधान पर चर्चा कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 ) 

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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