स्वच्छ पौध – समृद्ध किसान बनाम क्लीन प्लांट मिशन और सतत बागवानी

स्वच्छ पौध – समृद्ध किसान बनाम क्लीन प्लांट मिशन और सतत बागवानी

पाठ्यक्रम – सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 3 – के अंतर्गत – पर्यावरण और पारिस्थितिकी खण्ड से संबंधित।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), क्लीन प्लांट प्रोग्राम, कृषि सकल मूल्य वर्धित (GVA), मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH), जीआई-टैग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)

मुख्य परीक्षा के लिए – भारतीय बागवानी की उत्पादकता, आय और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में स्वच्छ पौध कार्यक्रम (सीपीपी) की भूमिका का विश्लेषण करें।

 

खबरों में क्यों ?

 

 

  • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 9 अगस्त 2024 को क्लीन प्लांट प्रोग्राम (CPP) को मंजूरी दी थी, जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय किसानों को रोग-मुक्त और उच्च-गुणवत्ता वाली पौध रोपण सामग्री उपलब्ध कराना है। 
  • यह कार्यक्रम विशेष रूप से उन व्यवस्थित रोगाणुओं (Systemic Pathogens), जैसे कि वायरस, से निपटने के लिए बनाया गया है, जो बागवानी फसलों की पैदावार और गुणवत्ता में भारी कमी लाते हैं। इस महत्वपूर्ण पहल को राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) द्वारा लागू किया जाएगा, जबकि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण में सहायता प्रदान करेगी। 
  • इस कार्यक्रम पर कुल ₹1,765.67 करोड़ का खर्च आएगा, जिसमें दिसंबर 2023 में एशियाई विकास बैंक (ADB) द्वारा स्वीकृत 98 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण भी शामिल है।

 

क्लीन प्लांट प्रोग्राम (CPP) का महत्व और उद्देश्य : 

 

  • क्लीन प्लांट प्रोग्राम कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा एशियाई विकास बैंक के सहयोग से परिकल्पित एक दूरदर्शी पहल है। इसका प्राथमिक लक्ष्य प्रमुख फल फसलों के लिए स्वस्थ, वायरस-मुक्त और रोग-मुक्त रोपण सामग्री सुनिश्चित करना है। 
  • यह कार्यक्रम रोकथाम-आधारित फसल स्वास्थ्य प्रबंधन पर केंद्रित है, जिसका अर्थ है कि अच्छी उपज और फसल स्वास्थ्य की नींव साफ-सुथरे और प्रमाणित पौधों से ही शुरू होती है। 
  • यह किसानों की उत्पादकता, आय और लाभप्रदता में वृद्धि करने का प्रयास करता है। इसके साथ ही, यह गुणवत्ता मानकों को स्थापित करके भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को भी बढ़ावा देगा।

 

भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए क्लीन प्लांट प्रोग्राम (CPP) के प्रमुख लाभ :

 

  • किसानों की आय में वृद्धि : उच्च गुणवत्ता वाले, वायरस-मुक्त पौधों के उपयोग से फसलों की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इससे किसानों को अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलेगा और उनकी आय में सीधी वृद्धि होगी। उदाहरण के लिए, यदि एक केले के पौधे में वायरस न हो, तो वह स्वस्थ रूप से बढ़ेगा और अधिक फल देगा, जिससे किसान को अधिक लाभ होगा।
  • नर्सरियों को बढ़ावा देना : यह कार्यक्रम एक मजबूत प्रमाणन प्रणाली और अवसंरचनात्मक सहयोग प्रदान करके नर्सरियों को बढ़ावा देगा, जिससे साफ-सुथरी रोपण सामग्री का बड़े पैमाने पर उत्पादन और वितरण सुनिश्चित होगा। यह एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करेगा, जहाँ नर्सरियाँ गुणवत्तापूर्ण सामग्री की आपूर्ति कर सकेंगी।
  • उपभोक्ता अनुभव में सुधार करना : जब फसलें रोग-मुक्त पौधों से उगाई जाएँगी, तो उनसे मिलने वाले फल और सब्जियाँ बेहतर गुणवत्ता वाले होंगे। इनमें बेहतर स्वाद, आकर्षक रूप-रंग और अधिक पोषण होगा, जिससे उपभोक्ताओं का अनुभव बेहतर होगा।
  • निर्यात प्रतिस्पर्धा में वृद्धि करना : रोग-मुक्त और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादन से भारत को वैश्विक स्तर पर बढ़त मिलेगी। जब हमारे कृषि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करेंगे, तो उनके निर्यात में वृद्धि होगी, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
  • समानता व समावेशिता को बढ़ावा देना : यह कार्यक्रम सभी किसानों के लिए सस्ती और गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री उपलब्ध कराएगा, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को भी समान अवसर मिलेंगे। यह महिला किसानों की भागीदारी को भी बढ़ावा देगा और विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट जरूरतों के अनुसार समाधान प्रदान करेगा।

 

भारतीय बागवानी का महत्व : 

 

  • भारतीय अर्थव्यवस्था में बागवानी का महत्व अतुलनीय है। यह क्षेत्र न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि लाखों लोगों को रोजगार भी देता है और विदेशी मुद्रा अर्जित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • कृषि सकल मूल्य वर्धित (GVA) द्वारा अर्थव्यवस्था में योगदान देना : भारत का कुल बागवानी उत्पादन 367.72 मिलियन टन है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3.66% अधिक है। यह क्षेत्र कृषि सकल मूल्य वर्धित (GVA) में 33% का योगदान देता है, जबकि यह केवल 13% कृषि भूमि पर होता है। हिमाचल प्रदेश में सेब का उत्पादन इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
  • किसानों के लिए उच्च उत्पादकता प्रदान करना : बागवानी फसलें खाद्यान्न की तुलना में कहीं अधिक उत्पादक होती हैं। बागवानी की औसत उत्पादकता 12.5 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि खाद्यान्न की 2.23 टन प्रति हेक्टेयर है। पुणे में पॉलीहाउस फ्लोरीकल्चर इसका प्रमाण है, जहाँ सीमित क्षेत्र में उच्च मूल्य वाली फसलें उगाई जाती हैं।
  • व्यावसायिक और निजी क्षेत्र का विकास और निर्यात को बढ़ावा देना : फलों और मसालों का बढ़ता निर्यात, और पॉलीहाउस व कोल्ड-चेन में निजी निवेश इस क्षेत्र में व्यावसायिक विकास को दर्शाता है। गुजरात में आम प्रसंस्करण इकाइयाँ इस बात का स्पष्ट उदाहरण हैं कि कैसे निजी क्षेत्र मूल्यवर्धन और निर्यात को बढ़ावा दे रहा है।
  • महिला किसानों की भागीदारी को सुनिश्चित करना : वर्ष 2024 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में 76.9% ग्रामीण महिलाएँ कृषि क्षेत्र में संलग्न हैं, और उनमें से एक बड़ा हिस्सा बागवानी में सक्रिय रूप से काम करता है। पश्चिम बंगाल में महिलाएँ आम की बागवानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • निर्यात और विदेश नीति को प्रोत्साहित करना : भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फल और सब्जी उत्पादक है, और इसका निर्यात लगातार बढ़ रहा है। तमिलनाडु से केले का निर्यात विदेशी बाजारों में भारतीय उत्पादों की बढ़ती माँग को दर्शाता है।
  • खाद्य सुरक्षा और पोषण को बढ़ावा देना : भारत का सब्जी उत्पादन 219.6 मिलियन टन है, जो खाद्यान्न उत्पादन से अधिक है, जो पोषण और खाद्य सुरक्षा में बागवानी के महत्व को उजागर करता है। उत्तराखंड में पत्तेदार सब्ज़ियों का उत्पादन स्थानीय और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में योगदान करता है।
  • पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण होना : बागवानी बागान कार्बन को अवशोषित करते हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सहन करने में मदद करते हैं। मध्य प्रदेश में संतरे के बागान जलवायु अनुकूल खेती का उदाहरण हैं।

 

संबंधित सरकारी नीतियाँ और पहल : 

 

  1. मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) : यह योजना रोपण सामग्री, क्षेत्र विस्तार, प्रसंस्करण और विपणन अवसंरचना पर ध्यान केंद्रित करती है। यह सभी राज्यों में लागू है और कश्मीर में केसर के पुनरुद्धार और जीआई-टैग के निर्यात में वृद्धि जैसी सफलता की कहानियों को जन्म दे चुकी है।
  2. हॉर्टिकल्चर क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोग्राम (CDP) : इस कार्यक्रम का उद्देश्य विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में बागवानी क्लस्टरों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना है। 55 क्लस्टर स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें आम, केला और मसाले पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश का आम क्लस्टर मध्य-पूर्व में आम का निर्यात करने में सफल रहा है।
  3. ऑपरेशन ग्रीन्स (TOP to TOTAL) : यह योजना टमाटर, प्याज और आलू जैसी फसलों की मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करती है। यह 22 राज्यों में लागू है और संकट के समय आंध्र प्रदेश में टमाटर किसानों को राहत प्रदान कर चुकी है।
  4. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) : यह योजना सूक्ष्म सिंचाई और जल दक्षता को बढ़ावा देती है। इसने 72 लाख हेक्टेयर में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को अपनाया है, जिससे महाराष्ट्र में अंगूर किसानों ने 40% तक पानी की बचत की है।
  5. कृषि निर्यात नीति 2018 : यह नीति फल, सब्जी और मसालों के निर्यात को बढ़ावा देती है। इसके तहत 46 उत्पाद-जनपद निर्यात हब के रूप में विकसित किए गए हैं, जैसे केरल में मसाला हब, जिसने काली मिर्च के निर्यात में वृद्धि की है।
  6. डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन (2021-26) : यह मिशन डिजिटल समाधानों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों का उपयोग कर रहा है। यह 7 राज्यों में पायलट परियोजनाओं के रूप में चल रहा है और आंध्र प्रदेश में ब्लॉकचेन का उपयोग करके यूरोपीय संघ को आम निर्यात को ट्रैक करने में मदद कर रहा है।

 

भारतीय बागवानी क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ : 

 

  • जलवायु परिवर्तन : अनियमित मानसून, तापमान वृद्धि, और बाढ़-सूखे जैसी घटनाएँ फसलों पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। 2022 की गर्मी के कारण महाराष्ट्र में प्याज उत्पादन में 20% की कमी आई थी।
  • कटाई के बाद नुकसान : भारत में कटाई के बाद 20-30% कृषि उत्पाद खराब हो जाते हैं, जो किसानों के लिए भारी नुकसान का कारण बनता है। उत्तर प्रदेश में आलू की 25% बर्बादी इसका एक उदाहरण है।
  • अवसंरचना की कमी : कोल्ड स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स की अपर्याप्तता के कारण किसान अक्सर अपने उत्पाद कम कीमतों पर बेचने को मजबूर होते हैं। ओडिशा में सब्जी किसान अक्सर इस समस्या से जूझते हैं।
  • गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री का अभाव : रोग-ग्रस्त पौधे अभी भी एक बड़ी समस्या हैं। तमिलनाडु में केले की फसल को “बंची टॉप वायरस” से भारी नुकसान हुआ था, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
  • बाजार अस्थिरता : प्याज और टमाटर जैसी फसलों में कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जाता है। नासिक में प्याज की कीमत ₹25 प्रति किलोग्राम से घटकर ₹2 प्रति किलोग्राम हो गई थी।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा : निर्यात के लिए गुणवत्ता मानकों की चुनौती बनी हुई है। यूरोप में भारतीय अंगूरों को अक्सर कीटनाशक अवशेषों (pesticide residues) के कारण अस्वीकार कर दिया जाता है।
  • जल संकट : अत्यधिक भूजल दोहन कई क्षेत्रों में पानी की कमी का कारण बन रहा है। महाराष्ट्र के जलगाँव में केले की खेती के कारण पानी का संकट गहरा गया है।

 

समाधान / आगे की राह : 

 

  1. जलवायु-सहनशील खेती को बढ़ावा देने की जरूरत : आईसीएआर जैसे संस्थानों द्वारा विकसित जलवायु-सहनशील फसल किस्मों को अपनाना आवश्यक है। छत्तीसगढ़ में सौर सिंचाई और विविध फसलें उगाना इस दिशा में एक अच्छा कदम है।
  2. कोल्ड-चेन विस्तार करने की आवश्यकता : राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) की परियोजनाओं के माध्यम से कोल्ड-चेन अवसंरचना का विस्तार करना होगा, जिससे कटाई के बाद के नुकसान को कम किया जा सके। उत्तर प्रदेश में आलू का नुकसान कम करने के लिए ऐसी पहलें महत्वपूर्ण हैं।
  3. बाजार और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में सुधार करने की जरूरत : ई-नैम (e-NAM) जैसी डिजिटल पहलों और ग्रामीण भंडारण सुविधाओं का विस्तार करके बाजार की अस्थिरता को कम किया जा सकता है। ओडिशा में किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने में ये कदम सहायक होंगे।
  4. गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री को बढ़ावा देने की आवश्यकता : क्लीन प्लांट प्रोग्राम (CPP) जैसी पहलें रोग-मुक्त रोपण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगी, जिससे तमिलनाडु में केले जैसी फसलों की उत्पादकता में सुधार होगा।
  5. मूल्य स्थिरता प्रबंधन को सुनिश्चित करने की जरूरत : राज्य सरकारों को मूल्य स्थिरीकरण फंड स्थापित करने चाहिए और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को समर्थन देना चाहिए, जैसा कि नासिक में प्याज के मामले में किया गया।
  6. निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की आवश्यकता : एपीडा (APEDA) और एनएचबी को मिलकर काम करना चाहिए ताकि भारतीय उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को अपनाया जा सके। भारतीय अंगूर उत्पादकों द्वारा यूरोपीय संघ के निर्यात मानकों को अपनाना एक सफल उदाहरण है।
  7. जल-दक्ष खेती को बढ़ावा देने की जरूरत : आईसीएआर और राष्ट्रीय जल मिशन को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना चाहिए। जलगाँव में ड्रिप सिंचाई को अपनाने से पानी की बचत हुई है।

 

निष्कर्ष : 

 

  • भारत सरकार ने बागवानी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण नीतियाँ और योजनाएँ शुरू की हैं, जो इस क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। क्लीन प्लांट प्रोग्राम (CPP) भारत की बागवानी को एक नई दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • यह रोग-मुक्त पौध रोपण सामग्री उपलब्ध कराकर उपज, किसानों की आय और निर्यात प्रतिस्पर्धा को सीधे तौर पर बढ़ाएगा। 
  • मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) जैसी मौजूदा योजनाओं के साथ मिलकर, यह कार्यक्रम जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, कटाई के बाद होने वाले नुकसान और मूल्य अस्थिरता जैसी चुनौतियों का समाधान करने में मदद करेगा। 
  • जलवायु-सहनशील खेती, कोल्ड-चेन के विस्तार, और डिजिटल ट्रेसिबिलिटी पर जोर देकर, भारत अपने बागवानी क्षेत्र को वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जा सकता है, जिससे किसानों की समृद्धि और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

 

स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

  1. MIDH एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसे भारत में बागवानी के समग्र विकास हेतु लागू किया गया है।
  2. MIDH के अंतर्गत भारत सरकार सभी राज्यों में कुल व्यय का 90% योगदान करती है।
  3. इस योजना में फल, सब्ज़ियाँ, कंद फसलें, मसाले, फूल, नारियल और बाँस शामिल हैं।

कूट के आधार पर सही उत्तर चुनिए —
A. केवल 1 और 3
B. केवल 2 और 3
C. केवल 1 और 2
D. 1, 2 और 3

उत्तर –  A

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) के प्रमुख उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिए तथा समालोचनात्मक रूप से विवेचना कीजिए कि यह कार्यक्रम भारत के बागवानी क्षेत्र के समग्र, संतुलित और सतत् विकास में किस प्रकार योगदान देता है? ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

 

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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