2026 के मानसून पूर्वानुमान: अल नीनो का असर और वर्षा में कमी

संसद प्रश्न: दक्षिण-पश्चिम मानसून का पूर्वानुमान — concept mind map

2026 के मानसून पूर्वानुमान: अल नीनो का असर और वर्षा में कमी

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मानसून पूर्वानुमान प्रक्रिया

✎ दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिस पर अल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु घटनाएँ महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं, जिससे वर्षा पैटर्न में बदलाव और क्षेत्रीय असमानताएँ आती हैं।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल, जलवायु विज्ञान)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि, खाद्य सुरक्षा, आपदा प्रबंधन)
  • Prelims: दक्षिण-पश्चिम मानसून, अल नीनो, दीर्घकालिक औसत (LPA), भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), मानसून पूर्वानुमान, कृषि पर मानसून का प्रभाव
  • Essay: भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में मानसून की भूमिका और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव और भारत की अनुकूलन रणनीतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिस पर अल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु घटनाएँ महत्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं, जिससे वर्षा पैटर्न में बदलाव और क्षेत्रीय असमानताएँ आती हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने संसद में दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 के पूर्वानुमान और वास्तविक वर्षा पैटर्न से संबंधित जानकारी प्रस्तुत की है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा का अनुमान लगाया था, जिसे बाद में अल नीनो (El Niño) की स्थिति विकसित होने की आशंका के साथ अद्यतन किया गया। जून में कम वर्षा के बावजूद, जुलाई में मध्य भारत में भारी वर्षा हुई, लेकिन देश के कई हिस्सों में अभी भी महत्वपूर्ण वर्षा की कमी बनी हुई है, जो अल नीनो के प्रभाव को दर्शाती है।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है, और कृषि का एक बड़ा हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून पर आश्रित है।
  • IMD हर साल दो चरणों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए दीर्घकालिक पूर्वानुमान जारी करता है, जो कृषि नियोजन और जल संसाधन प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण होता है।
  • दीर्घकालिक औसत (LPA) पिछले 50 वर्षों की औसत मानसूनी वर्षा को संदर्भित करता है और इसका उपयोग मानसून के प्रदर्शन को मापने के लिए एक बेंचमार्क के रूप में किया जाता है।
  • अल नीनो एक जटिल मौसम पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ा है और भारत में कमजोर मानसून से संबंधित है।
  • कम वर्षा से कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे सरकार को जोखिम प्रबंधन और आपदा तैयारियों के उपाय करने पड़ते हैं।
  • IMD विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों को अद्यतन सलाह जारी करता है ताकि वे कृषि नियोजन और आपदा तैयारियों में सहायता कर सकें।

दक्षिण-पश्चिम मानसून और अल नीनो

  • दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में जून से सितंबर तक होने वाली वर्षा का प्रमुख स्रोत है, जो देश की वार्षिक वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत प्रदान करता है।
  • यह मानसून हिंद महासागर से उत्पन्न होता है और भारत की ओर बढ़ता है, जिससे देश के अधिकांश हिस्सों में भारी वर्षा होती है।
  • अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की एक आवधिक घटना है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है।
  • भारत में, अल नीनो आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है, जिससे कम वर्षा और सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
  • इसके विपरीत, ला नीना (La Niña) अल नीनो का विपरीत है, जिसमें पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में सतही जल ठंडा हो जाता है, और यह अक्सर भारत में सामान्य या अधिक वर्षा से जुड़ा होता है।
  • IMD भारत में मानसून की भविष्यवाणी करने के लिए विभिन्न मॉडलों और जलवायु कारकों का उपयोग करता है, जिसमें अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) की स्थिति भी शामिल है।
  • मानसून की कमी से फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जल भंडारण के स्तर कम हो जाते हैं, और स्थानीय मौसम संबंधी सूखा पड़ सकता है।
  • सरकार और संबंधित एजेंसियां मानसूनी वर्षा की निगरानी करती हैं और कृषि तथा जल प्रबंधन के लिए जोखिम शमन रणनीतियाँ तैयार करती हैं।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
दीर्घकालिक औसत (LPA) यह दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा का 50 वर्षों का औसत है, जिसका उपयोग पूर्वानुमानों के लिए बेंचमार्क के रूप में किया जाता है।
अल नीनो यह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है, विशेषकर भारतीय मानसून को कमजोर करती है।
मौसम संबंधी उपखंड ये भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्र हैं जिनका उपयोग भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) वर्षा के आंकड़ों और पूर्वानुमानों को अधिक विस्तृत रूप से प्रस्तुत करने के लिए करता है।
दीर्घकालिक पूर्वानुमान यह पूरे मानसून सीज़न के लिए वर्षा की मात्रा का प्रारंभिक अनुमान है, जो कृषि और जल प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।
संचयी मौसमी वर्षा यह मानसून सीज़न की शुरुआत से लेकर एक निश्चित तिथि तक दर्ज की गई कुल वर्षा है, जो वास्तविक वर्षा पैटर्न को दर्शाती है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • भारत की लगभग 50 प्रतिशत कृषि भूमि वर्षा-आधारित है, इसलिए मानसून की वर्षा में कमी से कृषि उत्पादन पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
  • कम वर्षा से ग्रामीण आय में कमी आती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समग्र आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी हो सकती है।
  • जलविद्युत उत्पादन (Hydroelectric Power Generation) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे ऊर्जा संकट और औद्योगिक उत्पादन में बाधा आ सकती है।

सामाजिक महत्व

  • पेयजल की कमी से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जल संकट उत्पन्न हो सकता है, जिससे स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।
  • फसल खराब होने से किसानों की आजीविका प्रभावित होती है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और पलायन बढ़ सकता है।
  • सूखे जैसी स्थितियों से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे आम जनता पर मुद्रास्फीति (Inflation) का बोझ बढ़ता है।

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय महत्व

  • कम वर्षा से मिट्टी की नमी (Soil Moisture) में कमी आती है, जिससे भूमि का क्षरण (Land Degradation) और मरुस्थलीकरण (Desertification) की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
  • जल भंडारों (Water Reservoirs) और भूजल स्तर (Groundwater Levels) में कमी से पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और जैव विविधता (Biodiversity) को खतरा होता है।
  • लंबे समय तक शुष्क मौसम से जंगल की आग (Forest Fires) का खतरा बढ़ जाता है, जिससे वायु प्रदूषण और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है।

चुनौतियाँ

1. कृषि उत्पादकता में कमी

  • वर्षा आधारित फसलों (Rain-fed Crops) पर प्रतिकूल प्रभाव, जिससे उपज में कमी आती है।
  • किसानों की आय में गिरावट और ग्रामीण संकट का बढ़ना।

2. जल संकट

  • जल भंडारों और भूजल स्तर में कमी, जिससे पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है।
  • शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जल प्रबंधन की चुनौतियाँ।

3. खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति

  • फसल उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि और खाद्य सुरक्षा पर दबाव।
  • मुद्रास्फीति का दबाव, जिससे आम जनता की क्रय शक्ति प्रभावित होती है।

4. क्षेत्रीय असमानताएँ

  • देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा के पैटर्न में भारी भिन्नता, जिससे कुछ क्षेत्र गंभीर सूखे का सामना करते हैं जबकि अन्य में सामान्य वर्षा होती है।
  • संसाधनों के असमान वितरण और विकास में क्षेत्रीय असंतुलन।

5. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

  • अल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता, जिससे मानसून के पूर्वानुमान और प्रबंधन में जटिलता आती है।
  • दीर्घकालिक जलवायु पैटर्न में बदलाव, जिससे कृषि और जल नियोजन को अनुकूलित करने की आवश्यकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
कम मौसमी वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) से 12 प्रतिशत कम संचयी वर्षा, जिससे कृषि और जल उपलब्धता पर नकारात्मक प्रभाव।
अल नीनो का प्रभाव कमजोर से मध्यम तीव्रता वाले अल नीनो की स्थिति, जिसने मानसूनी प्रवाह को बाधित किया और वर्षा की कमी में योगदान दिया।
क्षेत्रीय वर्षा की कमी 47 प्रतिशत जिलों में वर्षा की कमी या अत्यधिक कमी, विशेषकर बिहार, अरुणाचल प्रदेश, असम, पंजाब, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में।
कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव लंबे समय तक शुष्क मौसम, मिट्टी की नमी की कमी और वर्षा आधारित फसलों पर नमी का दबाव, जिससे फसल खराब होने की आशंका।
जल भंडारण में कमी कम वर्षा के कारण जल भंडारों के स्तर में गिरावट, जिससे पेयजल और सिंचाई के लिए भविष्य में जल संकट की संभावना।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)
  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)
  • राष्ट्रीय जल मिशन (National Water Mission)

आगे की राह

  • भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी किए गए अद्यतन पूर्वानुमानों और सलाहों के आधार पर राज्य सरकारों और संबंधित मंत्रालयों द्वारा सक्रिय आपदा तैयारी और कृषि नियोजन किया जाना चाहिए।
  • वर्षा आधारित क्षेत्रों में फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को बढ़ावा देना और ऐसी फसलों को उगाना जो कम पानी में भी जीवित रह सकें।
  • जल संरक्षण (Water Conservation) और जल संचयन (Water Harvesting) तकनीकों को बढ़ावा देना, जैसे कि वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge)।
  • किसानों को सूखे से निपटने के लिए वित्तीय सहायता और बीमा योजनाओं (Insurance Schemes) का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
  • सिंचाई के आधुनिक तरीकों, जैसे ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर सिंचाई (Sprinkler Irrigation) को बढ़ावा देना ताकि पानी का कुशल उपयोग हो सके।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करने और अनुकूलन रणनीतियों (Adaptation Strategies) को विकसित करने के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना।
  • किसानों को मौसम संबंधी जानकारी और कृषि सलाह तक आसान पहुँच प्रदान करना ताकि वे समय पर निर्णय ले सकें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

दक्षिण-पश्चिम मानसून · दीर्घकालिक औसत (LPA) · अल नीनो · मौसम पूर्वानुमान · कृषि योजना · आपदा तैयारी · जलवायु परिवर्तन · क्षेत्रीय असमानताएं · वर्षा की कमी · जल भंडारण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची’}

अवधारणा प्रवाह

अल नीनो की स्थिति का विकास  →  दक्षिण-पश्चिम मानसून का कमजोर होना  →  कम मौसमी वर्षा और क्षेत्रीय असमानताएँ  →  कृषि उत्पादन और जल भंडारों पर नकारात्मक प्रभाव  →  खाद्य सुरक्षा, मुद्रास्फीति और ग्रामीण संकट

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए दो चरणों में दीर्घकालिक पूर्वानुमान जारी करता है।
2. अल नीनो की स्थिति आमतौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा को बाधित करती है।
3. दीर्घकालिक औसत (LPA) पिछले 50 वर्षों की औसत मानसूनी वर्षा को संदर्भित करता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। IMD आमतौर पर अप्रैल और जून में दो चरणों में पूर्वानुमान जारी करता है। कथन 2 सही है। अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ा है, जो अक्सर भारत में कमजोर मानसून का कारण बनता है। कथन 3 गलत है। LPA आमतौर पर पिछले 50 वर्षों के बजाय एक विशिष्ट लंबी अवधि (जैसे 1971-2020) के औसत को संदर्भित करता है, हालांकि 50 वर्ष एक सामान्य अवधि है, यह ‘पिछले 50 वर्षों’ के बजाय एक निश्चित संदर्भ अवधि होती है।

Q2. अल नीनो घटना के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से प्रभाव भारत के मानसून पर देखा जा सकता है?
1. लंबे समय तक शुष्क मौसम
2. स्थानीय मौसम संबंधी सूखा
3. मिट्टी की नमी में कमी
4. वर्षा आधारित फसलों पर नमी का दबाव
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 3 और 4
  3. केवल 1, 2 और 3
  4. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — अल नीनो की स्थिति अक्सर भारत में मानसून को कमजोर करती है, जिससे लंबे समय तक शुष्क मौसम, स्थानीय मौसम संबंधी सूखा और मिट्टी की नमी में कमी आती है। ये सभी कारक वर्षा आधारित फसलों और जल भंडारों पर नमी का दबाव डालते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूर्वानुमान में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। अल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं के कारण उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार द्वारा अपनाए जाने वाले उपायों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की भूमिका को विस्तार से समझाना होगा, जिसमें पूर्वानुमान के चरण, उपयोग की जाने वाली विधियाँ (जैसे दीर्घकालिक औसत – LPA) और पूर्वानुमानों की सटीकता शामिल है। अल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं के कारण मानसून पर पड़ने वाले प्रभावों (जैसे वर्षा की कमी, क्षेत्रीय असमानताएं) का उल्लेख करें। सरकार द्वारा इन चुनौतियों का सामना करने के लिए किए जाने वाले उपायों पर चर्चा करें, जिसमें आपदा तैयारी, कृषि नियोजन, जल प्रबंधन, किसानों को सलाह जारी करना और संबंधित मंत्रालयों तथा राज्य सरकारों के बीच समन्वय शामिल है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और कृषि मंत्रालय की भूमिका का भी उल्लेख किया जा सकता है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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