तेहरान की वापसी : पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन, परमाणु कूटनीति और भारत के रणनीतिक हित

तेहरान की वापसी : पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन, परमाणु कूटनीति और भारत के रणनीतिक हित

मुख्य परीक्षा – सामान्य अध्ययन के अंतर्गत
GS–2 : भारत के अन्य देशों के साथ संबंध, विदेश नीति, वैश्विक शक्ति संतुलन, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ,पश्चिम एशिया का सामरिक महत्व
GS–3 : ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक अवसंरचना, समुद्री मार्ग, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता
प्रारंभिक परीक्षा के लिये : JCPOA, P5+1, UNSC, Chabahar Port, Strait of Hormuz, IAEA

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु एवं वायु रक्षा स्थलों पर सैन्य कार्रवाई और उसके बाद पुनः कूटनीतिक वार्ता की पहल ने पश्चिम एशिया को एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीतिक केंद्र में ला खड़ा किया है। वर्ष 2015 के परमाणु समझौते — Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) — से लेकर 2018 में अमेरिकी वापसी और अब 2026 में नई वार्ताओं तक, ईरान का प्रश्न वैश्विक शक्ति-संतुलन की परीक्षा बन चुका है। अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump, इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu तथा ओमान की मध्यस्थता में चल रही वार्ताएँ इस बात का संकेत देती हैं कि पश्चिम एशिया एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है ।

ईरान का परमाणु प्रश्न : पृष्ठभूमि

2000 के दशक के प्रारंभ से ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को आशंका थी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सैन्य आयाम दे सकता है। अमेरिका और इज़राइल का मानना था कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में अग्रसर है। ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति Hassan Rouhani तथा सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei का दावा था कि कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उद्देश्यों के लिए है।

P5+1 वार्ता प्रक्रिया

2013 में अमेरिकी राष्ट्रपति Barack Obama के नेतृत्व में अमेरिका ने बहुपक्षीय वार्ता शुरू की। इसमें शामिल थे: P5+1
– संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य
– जर्मनी
2015 में ऐतिहासिक समझौता JCPOA  संपन्न हुआ, जिसका उद्देश्य था:
✔ यूरेनियम संवर्धन की सीमा तय करना
✔ अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी
✔ आर्थिक प्रतिबंधों में चरणबद्ध राहत

ट्रंप युग और समझौते का पतन

2018 में राष्ट्रपति Donald Trump ने JCPOA को “अमेरिकी हितों के विरुद्ध” बताते हुए इससे बाहर निकलने की घोषणा की। इसके परिणाम:
– ईरान पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध
– यूरोपीय सहयोगियों में असंतोष
– रूस और चीन की सीमित कूटनीतिक असहमति
2025–26 में स्थिति और गंभीर हुई जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए। हालाँकि कुछ महीनों बाद ओमान की राजधानी मस्कट में पुनः वार्ता की पहल हुई जो इस बात का संकेत है कि सैन्य विकल्प के साथ कूटनीति समानांतर चल रही है।

अरब देशों की चिंता : युद्ध नहीं, स्थिरता

खाड़ी के अरब राष्ट्र — विशेषकर सऊदी अरब, यूएई और कतर सैन्य टकराव से बचना चाहते हैं। कारण:
✔ तेल निर्यात पर निर्भरता
✔ विदेशी निवेश का प्रवाह
✔ अमेरिकी सैन्य अड्डों की मौजूदगी
यदि ईरान अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाता है, तो संघर्ष पूरे क्षेत्र में फैल सकता है।

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य : ऊर्जा की जीवनरेखा

Strait of Hormuz फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है।
✔ विश्व के लगभग 20% तेल व्यापार का मार्ग
✔ सऊदी अरब, इराक, यूएई और ईरान का प्रमुख निर्यात मार्ग
✔ वैश्विक ऊर्जा बाजार का “चोक पॉइंट”
किसी भी सैन्य तनाव से बीमा दरें बढ़ती हैं और आपूर्ति बाधित हो सकती है।

भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ

1. ऊर्जा सुरक्षा
– भारत अपनी तेल आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है।
– ईरान पहले भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में था।
JCPOA के समय:
✔ तेल आयात में सहजता
✔ प्रतिबंधों में ढील
अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत को ईरानी तेल आयात रोकना पड़ा।

2. चाबहार बंदरगाह : कनेक्टिविटी का द्वार

Chabahar Port भारत की मध्य एशिया रणनीति का प्रमुख स्तंभ है।
✔ पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान व मध्य एशिया तक पहुँच
✔ अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से जुड़ाव
✔ सामरिक संतुलन
यदि ईरान अस्थिर होता है, तो यह परियोजना प्रभावित हो सकती है।

3. क्षेत्रीय संतुलन
– ईरान के साथ भारत के संबंध केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं:
– पाकिस्तान के साथ ईरान का जटिल संबंध
– अफगानिस्तान में तालिबान के साथ व्यवहारिक दृष्टिकोण
– मध्य एशिया में तुर्की–पाकिस्तान प्रभाव का संतुलन
– इसलिए ईरान भारत के लिए बहुआयामी रणनीतिक भागीदार है।

ईरान का आंतरिक परिदृश्य

ईरान में पिछले वर्षों में लगातार आंतरिक विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
– आर्थिक संकट
– प्रतिबंधों का प्रभाव
– युवा आबादी की असंतुष्टि
– अमेरिकी हमलों के बाद “राष्ट्रवादी एकजुटता” बढ़ी है। तथाकथित “मध्यमार्गी” धड़ा भी अब कट्टरपंथियों के साथ खड़ा दिखाई देता है। घरेलू सत्ता-संतुलन बाहरी नीति को सीधे प्रभावित करेगा।

वैश्विक शक्ति-संतुलन की पुनर्परिभाषा

– ईरान प्रश्न केवल परमाणु मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था का प्रश्न है।
अमेरिका : क्षेत्रीय प्रभुत्व और इज़राइल की सुरक्षा
इज़राइल : अस्तित्वगत सुरक्षा चिंता
रूस–चीन : पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करना
यूरोप : ऊर्जा और शरणार्थी संकट से बचाव
इस परिप्रेक्ष्य में पश्चिम एशिया अब “नियम-आधारित व्यवस्था” से अधिक शक्ति-राजनीति का मंच बनता जा रहा है।

संभावित परिदृश्य

(1) नया परमाणु समझौता
✔ सीमित संवर्धन
✔ प्रतिबंधों में राहत
✔ क्षेत्रीय तनाव में कमी

(2) सैन्य टकराव का विस्तार
✔ अमेरिकी ठिकानों पर हमला
✔ तेल बाजार में उछाल
✔ वैश्विक मंदी की आशंका

(3) लंबी अनिश्चितता
✔ वार्ता जारी
✔ सैन्य दबाव समानांतर

भारत की नीति-चुनौतियाँ

– रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना
– अमेरिका–ईरान–इज़राइल–रूस के बीच संतुलन
– ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण
– समुद्री सुरक्षा सुदृढ़ करना
– संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता

भारत को चाहिए:

✔ कूटनीतिक सक्रियता
✔ ऊर्जा भंडारण क्षमता विस्तार
✔ नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण
✔ क्षेत्रीय बहुपक्षीय संवाद में भागीदारी

निष्कर्ष

तेहरान की भू-राजनीतिक वापसी यह दर्शाती है कि पश्चिम एशिया अब भी वैश्विक राजनीति का धुरी बिंदु है। 2015 का JCPOA, 2018 की वापसी, 2026 की नई वार्ता — यह पूरा चक्र बताता है कि सैन्य शक्ति और कूटनीति दोनों साथ-साथ चलती हैं। भारत के लिए यह केवल एक बाहरी संकट नहीं, बल्कि ऊर्जा, कूटनीति और रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा है। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या विश्व शक्तियाँ एक संतुलित समझौते की दिशा में बढ़ती हैं — या पश्चिम एशिया एक और दीर्घकालिक संघर्ष की ओर अग्रसर होता है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न

निम्न कथनों पर विचार कीजिए:
1. JCPOA 2015 में P5+1 और ईरान के बीच संपन्न हुआ था।
2. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ विश्व के लगभग 20% तेल व्यापार का मार्ग है।
3. चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तान के माध्यम से मध्य एशिया से जोड़ता है।
4. ओमान ने अमेरिका–ईरान वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है।

सही विकल्प चुनिए:
(a) केवल 1, 2 और 4
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (a)

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न

“ईरान का परमाणु प्रश्न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा है।” वर्तमान घटनाक्रम के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।

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