11 Mar एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) Debate : समाधान से अधिक समस्या ?
पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Mapping)
GS–2: भारतीय संविधान, संसद एवं राज्य विधानसभाएँ, संघीय ढाँचा, चुनाव प्रणाली, संवैधानिक संशोधन, निर्वाचन आयोग की भूमिका
GS–3: लोक प्रशासन, सार्वजनिक संस्थानों में जवाबदेही, चुनाव प्रबंधन, प्रशासनिक सुधार
GS–4: लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व, संस्थागत नैतिकता, सत्ता का दुरुपयोग रोकने की संवैधानिक व्यवस्था
Prelims: अनुच्छेद 75, अनुच्छेद 83, अनुच्छेद 85, अनुच्छेद 172, अनुच्छेद 356, सामूहिक उत्तरदायित्व, Constructive Vote of No Confidence, FPTP System

चर्चा में क्यों ?
हाल के वर्षों में भारत में “एक राष्ट्र, एक चुनाव” (One Nation, One Election – ONOE) की अवधारणा पर व्यापक बहस तेज हो गई है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना है ताकि चुनावी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, कम खर्चीला और प्रशासनिक रूप से कुशल बनाया जा सके। सरकार और इसके समर्थकों का तर्क है कि बार-बार चुनाव होने से चुनावी खर्च बढ़ता है, सुरक्षा बलों की तैनाती लंबे समय तक करनी पड़ती है, मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के कारण विकास कार्य बाधित होते हैं राजनीतिक दल लगातार चुनावी अभियान में लगे रहते हैं । इन्हीं समस्याओं के समाधान के रूप में समकालिक चुनाव (Simultaneous Elections) का प्रस्ताव सामने रखा गया है। हालाँकि कई संवैधानिक विशेषज्ञ, राजनीतिक विश्लेषक और पूर्व चुनाव आयुक्त यह मानते हैं कि यह प्रस्ताव भारतीय लोकतंत्र की संरचना और संघीय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौतियाँ पैदा कर सकता है। उनका तर्क है कि यह सुधार देखने में आकर्षक लग सकता है परंतु इसके दीर्घकालिक प्रभाव लोकतांत्रिक जवाबदेही और संघीय संतुलन को कमजोर कर सकते हैं।
एक राष्ट्र, एक चुनाव क्या है ?
One Nation One Election (ONOE) का अर्थ है कि पूरे देश में लोकसभा चुनाव, सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही समय पर कराए जाएँ। भारत में 1951–52 से लेकर 1967 तक यह व्यवस्था काफी हद तक मौजूद थी। उस समय लोकसभा और अधिकांश राज्यों के चुनाव एक साथ होते थे। लेकिन बाद में कई कारणों से यह प्रणाली टूट गई: राज्य सरकारों का समय से पहले गिरना, लोकसभा का समयपूर्व विघटन, राजनीतिक अस्थिरता। इसके परिणामस्वरूप धीरे-धीरे चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे और आज लगभग हर वर्ष देश के किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं।
प्रस्ताव के समर्थकों के प्रमुख तर्क
समकालिक चुनाव के समर्थक इसे प्रशासनिक सुधार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:
1. चुनावी खर्च में कमी : भारत में चुनाव प्रक्रिया अत्यंत विशाल होती है। इसमें शामिल हैं:
– लाखों मतदान केंद्र
– बड़ी संख्या में चुनाव कर्मी
– सुरक्षा बलों की तैनाती
– इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM)और VVPAT का उपयोग
समर्थकों का कहना है कि यदि चुनाव एक साथ कराए जाएँ तो यह खर्च कम हो सकता है।
2. प्रशासनिक दक्षता : बार-बार चुनाव होने से:
– प्रशासनिक मशीनरी चुनावी कार्यों में व्यस्त रहती है
– सरकारी अधिकारी और शिक्षक चुनाव ड्यूटी में लग जाते हैं
समकालिक चुनाव से प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकता है।
3. मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट का प्रभाव कम : चुनाव घोषित होते ही Model Code of Conduct लागू हो जाता है। इससे:
-नई योजनाएँ घोषित नहीं की जा सकतीं
-कई सरकारी निर्णय टल जाते हैं
यदि चुनाव कम बार हों तो यह बाधा भी कम होगी।
4. निरंतर चुनावी राजनीति से मुक्ति : भारत में अक्सर कहा जाता है कि देश “permanent campaign mode” में रहता है। राजनीतिक दल लगातार चुनाव की तैयारी में लगे रहते हैं। समकालिक चुनाव से राजनीतिक दलों को शासन पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिल सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय अनुभव: क्या समकालिक चुनाव सफल हैं?
ONOE के पक्ष में दिए गए तर्कों का मूल्यांकन करने के लिए अन्य लोकतांत्रिक देशों के अनुभवों को देखना आवश्यक है।
a. इंडोनेशिया का अनुभव : 2019 में इंडोनेशिया ने एक विशाल प्रयोग किया। वहाँ निम्नलिखित चुनाव एक साथ कराए गए: राष्ट्रपति चुनाव, राष्ट्रीय संसद, क्षेत्रीय संसद, स्थानीय परिषद
इसका उद्देश्य था: प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना, चुनावी खर्च कम करना लेकिन परिणाम अत्यंत चिंताजनक रहे।
प्रमुख समस्याएँ : लगभग 900 चुनाव कर्मियों की मृत्यु, हजारों कर्मियों का बीमार पड़ना, मतदान और मतगणना प्रक्रिया पर अत्यधिक दबाव
2024 में भी इसी प्रकार की समस्याएँ सामने आईं। इसके बाद इंडोनेशिया के संवैधानिक न्यायालय ने निर्णय लिया कि 2029 से राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव अलग-अलग कराए जाएँ।यह उदाहरण दर्शाता है कि अत्यधिक बड़े लोकतंत्रों में पूर्ण समकालिक चुनाव प्रशासनिक रूप से अत्यंत कठिन हो सकते हैं।
b. कई विकसित लोकतंत्रों में चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं।
– कनाडा : वहाँ संघीय चुनाव और प्रांतीय चुनाव अलग-अलग होते हैं-इससे संघीय संरचना मजबूत रहती है
– ऑस्ट्रेलिया : राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल निश्चित चार वर्ष का + संघीय संसद का कार्यकाल अलग है, इस कारण चुनावों का पूर्ण समकालिक होना संरचनात्मक रूप से संभव ही नहीं है।
– जर्मनी : में लोकतांत्रिक स्थिरता समकालिक चुनावों से नहीं बल्कि संस्थागत व्यवस्थाओं से सुनिश्चित की जाती है। वहाँ Constructive Vote of No Confidence की व्यवस्था है। इसका अर्थ है: यदि संसद चांसलर को हटाना चाहती है, तो उसे पहले नए चांसलर का चुनाव करना होगा। इस व्यवस्था से: राजनीतिक अस्थिरता कम होती है, सरकार गिरने की संभावना घटती है, जर्मनी में राज्यों के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं जिससे संघीय ढाँचा मजबूत रहता है।
भारत की चुनाव प्रणाली की विशिष्टता
भारत की चुनाव प्रणाली कई दृष्टियों से अन्य लोकतंत्रों से अलग है । भारत में First Past the Post(FPTP) प्रणाली लागू है। इसमें जो उम्मीदवार सबसे अधिक वोट प्राप्त करता है, वही विजेता होता है, बहुमत प्राप्त करना आवश्यक नहीं, यह प्रणाली अक्सर बड़े राजनीतिक दलों को लाभ देती है। यदि राष्ट्रीय और राज्य चुनाव एक साथ हों, तो राष्ट्रीय लहर (National Wave) का प्रभाव अधिक हो सकता है, क्षेत्रीय दल कमजोर पड़ सकते हैं, राज्यों की राजनीतिक विविधता कम हो सकती है ।
संसदीय लोकतंत्र बनाम राष्ट्रपति प्रणाली
भारत में संसदीय प्रणाली (Parliamentary System) है। इसमें सरकार का अस्तित्व संसद के विश्वास पर निर्भर करता है vs इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति प्रणाली है, कार्यपालिका और विधायिका अलग-अलग चुनी जाती हैं, इसलिए वहाँ चुनावी चक्र स्थिर रहते हैं।
भारत में यह व्यवस्था संभव नहीं है क्योंकि: सरकार गिर सकती है, संसद भंग हो सकती है, इसलिए चुनावों का समय हमेशा निश्चित नहीं रहता।
संविधान की मूल संरचना और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व
भारतीय संविधान का मूल उद्देश्य लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व (Democratic Accountability) सुनिश्चित करना है।संविधान सभा में डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने कहा था कि लोकतंत्र में दो लक्ष्यों को एक साथ पूरी तरह प्राप्त नहीं किया जा सकता: स्थिरता (Stability), उत्तरदायित्व (Responsibility) भारत ने उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी।
संवैधानिक प्रावधान
भारत में सरकार के कार्यकाल से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद हैं:
अनुच्छेद 75 – मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 164 – राज्य मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 83 – लोकसभा का अधिकतम पाँच वर्ष का कार्यकाल
अनुच्छेद 172 – राज्य विधानसभाओं का अधिकतम पाँच वर्ष का कार्यकाल
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि संविधान “अधिकतम कार्यकाल” निर्धारित करता है, निश्चित कार्यकाल नहीं। इसका अर्थ है कि यदि सरकार बहुमत खो देती है तो संसद या विधानसभा भंग की जा सकती है।
‘Unexpired Term Elections’ की अवधारणा : 129वाँ संविधान संशोधन विधेयक (2024), जो पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों पर आधारित है, एक नई अवधारणा प्रस्तुत करता है। इसका अर्थ है यदि कोई विधानसभा या लोकसभा समय से पहले भंग हो जाती है, तो नए चुनाव में चुनी गई सरकार केवल शेष अवधि (Remaining Term) तक ही कार्य करेगी।
संभावित समस्याएँ
इस व्यवस्था से कई गंभीर प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
1. मताधिकार का अवमूल्यन : यदि मतदाता किसी सरकार को चुनते हैं और उसका कार्यकाल केवल 2–3 वर्ष का हो, तो लोकतांत्रिक जनादेश कमजोर हो सकता है।
2. अल्पकालिक सरकारें : छोटे कार्यकाल वाली सरकारें: दीर्घकालिक नीति सुधार करने से बच सकती हैं, लोकप्रिय लेकिन अल्पकालिक फैसले ले सकती हैं
3. शासन का ठहराव : यदि कार्यकाल बहुत छोटा हो तो नीति-निर्माण में निरंतरता नहीं रह सकती।
संघवाद पर संभावित प्रभाव
भारत एक संघीय लोकतंत्र (Federal Democracy) है। राज्यों की स्वायत्तता इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण तत्व है। यदि चुनाव पूरी तरह समकालिक हो जाएँ, तो: राज्यों के चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित हो सकते हैं, राज्य सरकारों की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान कमजोर हो सकती है । सुप्रीम कोर्ट ने S. R. Bommai v. Union of India (1994) में संघवाद को संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा माना है। इसलिए ऐसी किसी भी व्यवस्था से सावधान रहना आवश्यक है जो संघीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
अनुच्छेद 356 और संभावित दुरुपयोग
ONOE प्रस्ताव के तहत यदि किसी राज्य की सरकार गिर जाती है तो चुनाव को राष्ट्रीय चुनाव चक्र तक टाला जा सकता है। इस स्थिति में राज्य में अनुच्छेद 356 (President’s Rule) लंबे समय तक लागू रह सकता है। यह स्थिति लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकती है क्योंकि: निर्वाचित सरकार का अभाव होगा, केंद्र का नियंत्रण बढ़ जाएगा, निर्वाचन आयोग की विवेकाधीन शक्तियाँ बढ़ सकती है।
प्रस्तावित अनुच्छेद 82A के अनुसार यदि किसी राज्य में समकालिक चुनाव कराना संभव न हो, तो निर्वाचन आयोग चुनाव स्थगित करने की सिफारिश कर सकता है लेकिन इस प्रस्ताव में कई अस्पष्टताएँ हैं: स्पष्ट मानदंडों का अभाव, समय सीमा का उल्लेख नहीं, संसदीय निगरानी की कमी । यह स्थिति संवैधानिक दुरुपयोग की संभावना बढ़ा सकती है।
चुनावी खर्च का तर्क: कितना मजबूत ?
ONOE के समर्थकों का एक बड़ा तर्क है कि इससे चुनावी खर्च कम होगा। लेकिन उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार: लोकसभा और विधानसभा चुनावों का कुल खर्च लगभग ₹4500 करोड़ है । यह GDP का लगभग 0.03% है । । यह राशि भारत के कुल बजट के मुकाबले बहुत छोटी है। इसके अतिरिक्त भारत में चुनाव चरणों में कराए जाते हैं, जिससे: EVM और VVPAT का पुनः उपयोग संभव होता है, सुरक्षा बलों का रोटेशन संभव होता है । यदि पूरे देश में एक साथ चुनाव हों तो संसाधनों की आवश्यकता बढ़ भी सकती है।
लोकतंत्र में चुनावों की आवृत्ति का महत्व
कुछ लोग मानते हैं कि बार-बार चुनाव होना लोकतंत्र के लिए समस्या है लेकिन कई लोकतांत्रिक सिद्धांतकार मानते हैं कि चुनावों की आवृत्ति वास्तव में लोकतंत्र की शक्ति है। इससे जनता को नियमित रूप से सरकार को जवाबदेह बनाने का अवसर मिलता है, राजनीतिक प्रणाली सक्रिय रहती है इसलिए चुनावों को केवल प्रशासनिक बोझ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
व्यापक विश्लेषण
ONOE की बहस वास्तव में तीन बड़े प्रश्न उठाती है:
1. क्या प्रशासनिक दक्षता लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से अधिक महत्वपूर्ण है?
यदि चुनाव कम बार हों तो प्रशासनिक सुविधा बढ़ सकती है, लेकिन इससे लोकतांत्रिक निगरानी कम हो सकती है।
2. क्या समकालिक चुनाव संघवाद को कमजोर कर सकते हैं?
राष्ट्रीय चुनावों का प्रभाव राज्य चुनावों पर बढ़ सकता है।
3. क्या संविधान में बड़े पैमाने पर संशोधन आवश्यक होंगे?
ONOE लागू करने के लिए कई अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा।
निष्कर्ष
“एक राष्ट्र, एक चुनाव” का विचार प्रशासनिक दृष्टि से आकर्षक लग सकता है, लेकिन इसके संवैधानिक और राजनीतिक प्रभाव अत्यंत व्यापक हैं। समकालिक चुनाव संघीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं, संसदीय उत्तरदायित्व को कमजोर कर सकते हैं, क्षेत्रीय राजनीतिक विविधता को कम कर सकते हैं । भारत का वर्तमान चुनाव मॉडल ,जहाँ चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, लोकतांत्रिक निगरानी और संघीय स्वायत्तता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए किसी भी सुधार को लागू करने से पहले व्यापक संवैधानिक बहस और संस्थागत मूल्यांकन आवश्यक है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न
निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद लोकसभा के कार्यकाल से संबंधित है?
1. अनुच्छेद 75
2. अनुच्छेद 83
3. अनुच्छेद 172
4. अनुच्छेद 356
सही विकल्प चुनिए:
(a) केवल 2
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
मुख्य परीक्षा प्रश्न
“एक राष्ट्र, एक चुनाव” प्रस्ताव प्रशासनिक दक्षता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन की चुनौती प्रस्तुत करता है। भारत की संघीय और संसदीय व्यवस्था के संदर्भ में इस प्रस्ताव का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द | 15 अंक)

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