न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता

न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता

पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Mapping)
GS–2  न्यायपालिका की संरचना, न्यायिक सुधार, लैंगिक समानता
GS–1  भारतीय समाज में लैंगिक असमानता, महिला सशक्तिकरण
GS–4  न्याय, समानता, सार्वजनिक संस्थानों की विश्वसनीयता
Prelims Collegium System, Gender Justice, Constitutional Equality

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने First National Conference of Indian Women in Law को संबोधित करते हुए कहा कि न्यायपालिका में महिलाओं की अधिक भागीदारी न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और वैधता के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका का स्वरूप तभी लोकतांत्रिक माना जा सकता है जब उसमें समाज के सभी वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो।

भारत की न्यायपालिका में महिलाओं की वर्तमान स्थिति

न्यायालय महिलाओं की भागीदारी
सुप्रीम कोर्ट 33 में से केवल 1 महिला न्यायाधीश
हाई कोर्ट लगभग 14.85% महिला न्यायाधीश
जिला न्यायालय लगभग 37% महिला न्यायाधीश


इससे स्पष्ट होता है कि निचली अदालतों में महिलाओं की उपस्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन उच्च न्यायपालिका में उनका प्रतिनिधित्व अत्यंत सीमित है।

महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के प्रमुख कारण

1. वरिष्ठता-आधारित चयन प्रणाली :
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति प्रायः seniority-cum-merit के आधार पर होती है। इतिहास में विधि क्षेत्र पुरुषों के प्रभुत्व वाला रहा है, इसलिए वरिष्ठ पदों पर महिलाओं की संख्या कम है।

2. संरचनात्मक बाधाएँ (Structural Barriers) : Collegium System में वरिष्ठ वकीलों की भूमिका प्रमुख होती है। बार में नेतृत्व पदों पर महिलाओं की संख्या सीमित है। नेटवर्किंग और अवसरों तक समान पहुँच नहीं मिलती।

3. कार्यस्थल से जुड़ी चुनौतियाँ
– लैंगिक पूर्वाग्रह
– अवसंरचना की कमी (जैसे मातृत्व सुविधाएँ)
– कार्य-जीवन संतुलन की समस्याएँ

4. “Leaky Pipeline” समस्या : महिलाएँ विधि शिक्षा और निचली अदालतों में प्रवेश तो करती हैं, लेकिन उच्च न्यायपालिका तक पहुँचने से पहले बड़ी संख्या में बाहर हो जाती हैं।

न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी क्यों महत्वपूर्ण है?

1. लैंगिक समानता को बढ़ावा : न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी संवैधानिक समानता (Article 14, 15) के सिद्धांत को मजबूत करती है।
2. लैंगिक संवेदनशील न्याय : महिला न्यायाधीश कई मामलों में अलग दृष्टिकोण ला सकती हैं, जैसे— लैंगिक हिंसा, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल उत्पीड़न, पारिवारिक कानून
3. न्यायपालिका की विश्वसनीयता : जब न्यायपालिका समाज की विविधता को प्रतिबिंबित करती है, तब जनता का भरोसा बढ़ता है, न्यायिक वैधता मजबूत होती है ।
4. प्रेरणा और रोल मॉडल : महिला न्यायाधीश नई पीढ़ी की महिलाओं को विधि क्षेत्र में आने, नेतृत्व भूमिकाएँ निभाने के लिए प्रेरित करती हैं।

सुधार की दिशा में संभावित उपाय

1. न्यायिक नियुक्तियों में लैंगिक संवेदनशीलता – Collegium और सरकार को gender diversity को नियुक्ति प्रक्रिया का महत्वपूर्ण मानदंड बनाना चाहिए।
2. बार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना
– महिला वकीलों को नेतृत्व अवसर
– न्यायिक प्रशिक्षण और मेंटरशिप कार्यक्रम
3. कार्यस्थल सुधार
– बेहतर अवसंरचना
– मातृत्व और देखभाल सुविधाएँ
– सुरक्षित कार्य वातावरण
4. संस्थागत नीति : न्यायपालिका में diversity policy विकसित की जा सकती है।

निष्कर्ष

न्यायपालिका केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक आधारशिला भी है। यदि न्यायपालिका में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा तो उसकी विश्वसनीयता और वैधता प्रभावित हो सकती है। इसलिए महिलाओं की बढ़ती भागीदारी केवल लैंगिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था की मजबूती का अनिवार्य तत्व है।

No Comments

Post A Comment