तेल, सत्ता और पश्चिम एशिया का बदलता इतिहास

तेल, सत्ता और पश्चिम एशिया का बदलता इतिहास

SYLLABUS – WORLD HISTORY (GS-1, HISTORY OPTIONAL PAPER 2)

WHY IT IS IN NEWS ?  – आधुनिक पश्चिम एशिया का इतिहास केवल धार्मिक या सामरिक संघर्षों की कहानी नहीं, बल्कि साम्राज्य के पतन, औपनिवेशिक पुनर्विभाजन, तेल-आधारित कॉरपोरेट वर्चस्व, और उसके विरुद्ध क्षेत्रीय प्रतिरोध की कहानी है.

1) Ottoman Empire के पतन पर स्रोत क्या कहते हैं?

Ottoman Empire कभी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया तक फैली एक विशाल शक्ति थी, लेकिन 19वीं सदी तक वह कमजोर होकर “Sick Man of Europe” बन गया. यही कमजोरी प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उसके विघटन का आधार बनी.

इस पतन का बड़ा ऐतिहासिक महत्व यह है कि आज के अधिकांश पश्चिम एशियाई राष्ट्र Ottoman ढाँचे के टूटने के बाद बने. युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने अरबों को Ottoman शासन के विरुद्ध विद्रोह के लिए उकसाया और स्वतंत्र अरब साम्राज्य का वादा किया, लेकिन युद्ध के बाद Paris Peace Conference और Mandate System के जरिए वही क्षेत्र ब्रिटेन और फ्रांस के प्रभावक्षेत्रों में बाँट दिए गए. इसीलिए स्रोत इसे Arab nationalism के साथ “betrayal” और “colonialism through the back door” कहते हैं.

यानी Ottoman Empire का पतन केवल एक साम्राज्य का अंत नहीं था; यह आधुनिक पश्चिम एशिया की अस्थिर सीमाओं, अविश्वास, राष्ट्रवाद, और दीर्घकालिक संघर्षों की शुरुआत था. स्रोत तो इसे यहाँ तक कहते हैं कि यूरोप के लिए प्रथम विश्वयुद्ध 31 वर्ष का संकट रहा होगा, पर पश्चिम एशिया के लिए यह एक प्रकार का “100-year war” बन गया, क्योंकि उसके घाव कभी भरे नहीं.

2) Corporate Dominance के संदर्भ में Exploitative Royalty Terms क्या थे?

पश्चिम एशिया के पास तेल तो था, पर उसे निकालने, शोधन करने और विश्व बाजार तक पहुँचाने की तकनीक, पूँजी और अवसंरचना पश्चिमी कंपनियों के पास थी. इसी असमानता का लाभ उठाकर Anglo-Iranian Oil Company, Aramco जैसी कंपनियों ने तेल-समृद्ध देशों पर असमान और शोषणकारी शर्तें थोपीं.

इन शर्तों की मुख्य विशेषताएँ थीं:

  • 30/70 royalty split: कई मामलों में उत्पादक देश को केवल लगभग 30% हिस्सा मिलता था, जबकि 70% कॉरपोरेट हितों के पास जाता था.
  • Tax disparity: कंपनियाँ अपने गृह-देशों को जितना कर देती थीं, वह उत्पादक देशों को दिए गए भुगतान से कई गुना अधिक था.
  • Supply manipulation: तेल सस्ता रखने के लिए आपूर्ति को जानबूझकर अधिक रखा जाता था ताकि पश्चिमी औद्योगिक वृद्धि को सस्ता ईंधन मिलता रहे, भले ही उत्पादक देशों के संसाधन तेजी से समाप्त हों.

इस तरह तेल व्यापार केवल आर्थिक लेन-देन नहीं था; यह कॉरपोरेट नियंत्रण + सामरिक प्रभुत्व का तंत्र था. स्रोतों के अनुसार, पश्चिमी कंपनियाँ केवल व्यापारिक संस्थाएँ नहीं रहीं, बल्कि वे अपने-अपने राज्यों की शक्ति-विस्तार की वाहक बन गईं.

3) इस शोषण के विरुद्ध क्षेत्रीय प्रतिक्रिया क्या थी?

सबसे बड़ा उदाहरण ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक का है, जिन्होंने 1951 में Anglo-Iranian Oil Company का राष्ट्रीयकरण किया. स्रोत इसे corporate arbitrariness के विरुद्ध राष्ट्रवादी प्रतिरोध के रूप में देखते हैं. लेकिन 1953 में ब्रिटेन और अमेरिका ने तख्तापलट के जरिए मोसद्देक को हटा दिया. इससे यह स्पष्ट होता है कि कॉरपोरेट हितों की रक्षा के लिए भू-राजनीतिक हस्तक्षेप भी किया गया.

इसके बाद Saudi Arabia ने दबाव बनाकर 50-50 profit-sharing model की दिशा में परिवर्तन कराया. आगे चलकर 1960 में OPEC का गठन हुआ, जिसे स्रोत collective bargaining against Western corporate dominance का औजार मानते हैं. यानी तेल उत्पादक देशों ने पहली बार संगठित होकर कहा कि संसाधनों का मूल्य निर्धारण केवल उपभोक्ता शक्तियाँ नहीं करेंगी.

4) 1973 Oil Crisis और वैश्विक आर्थिक नीति पर प्रभाव

1973 का oil embargo वह मोड़ था जहाँ तेल पहली बार एक strategic weapon के रूप में खुलकर सामने आया. इसका असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं था; इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी. स्रोत का तर्क है कि इस संकट ने Keynesian मॉडल को झटका दिया और आगे चलकर neoliberal hyper-globalisation के लिए जमीन तैयार की.

अर्थात पश्चिम एशिया के तेल संकटों ने आज की global economic policy को गहराई से प्रभावित किया:

  • ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा गया,
  • डॉलर-आधारित तेल व्यापार ने अमेरिकी प्रभुत्व को मजबूत किया,
  • और तेल-झटकों ने वैश्विक वित्त, मुद्रास्फीति, व्यापार व आपूर्ति शृंखलाओं की नई राजनीति पैदा की.

5) Petro-dollar और US hegemony का संबंध

केंद्रीय तर्क यह है कि petro-dollar व्यवस्था ने अमेरिकी शक्ति को लंबे समय तक सहारा दिया. जब वैश्विक तेल व्यापार डॉलर में होने लगा, तो डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मांग बनी रही; इससे अमेरिका को वित्तीय, सामरिक और राजनीतिक लाभ मिला. इस तरह तेल केवल ईंधन नहीं रहा, बल्कि US hegemony का monetary foundation भी बन गया.

लेकिन यह भी संकेत है कि यदि West Asia में अस्थिरता बढ़ती है, Hormuz जैसे choke point बाधित होते हैं और वैकल्पिक ऊर्जा व बहुध्रुवीय शक्ति-केंद्र उभरते हैं तो petrodollar-आधारित व्यवस्था भी कमजोर हो सकती है.

6) भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए इसका क्या अर्थ है?

पश्चिम एशिया के संघर्ष—विशेषकर Strait of Hormuz जैसे समुद्री मार्गों पर संकट—भारत के लिए गंभीर ऊर्जा जोखिम पैदा करते हैं, क्योंकि भारत की बड़ी मात्रा में तेल-आयात निर्भरता इसी क्षेत्र से जुड़ी है. ऐसे संघर्ष:

  • तेल कीमतें बढ़ा सकते हैं,
  • शिपिंग लागत बढ़ा सकते हैं,
  • चालू खाते और महँगाई पर दबाव डाल सकते हैं,
  • और भारत की सामरिक स्वायत्तता को कठिन बना सकते हैं.

इसलिए अप्रत्यक्ष रूप से भारत के लिए तीन संदेश है:

  1. energy source diversification,
  2. strategic reserves,
  3. renewables/alternative energy transition.

निष्कर्ष

समग्र रूप से पश्चिम एशिया की वर्तमान उथल-पुथल को समझने के लिए तीन ऐतिहासिक परतों को साथ देखना होगा:

  • Ottoman Empire का पतन और औपनिवेशिक पुनर्विभाजन
  • तेल पर पश्चिमी कॉरपोरेट वर्चस्व और शोषणकारी royalty व्यवस्था
  • उसके विरुद्ध राष्ट्रवादी प्रतिरोध, OPEC, और बदलता वैश्विक शक्ति-संतुलन

यही कारण है कि पश्चिम एशिया का इतिहास केवल अतीत नहीं, बल्कि आज की global economy, US hegemony, multipolarity, और India’s energy security को समझने की कुंजी भी है.

PRACTICE QUESTION FOR UPSC CSE MAINS : 

आधुनिक पश्चिम एशिया के इतिहास में पेट्रोलियम एक निर्णायक कारक कैसे बना? स्पष्ट कीजिए।
(250 शब्द, 15 अंक)

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