04 Aug सुप्रीम कोर्ट ने दिया RBI को आदेश: म्यूल अकाउंट्स पर SOP बनाकर साइबर फ्रॉड रोकें
✎ सर्वोच्च न्यायालय ने RBI को 'म्यूल अकाउंट्स' सहित साइबर धोखाधड़ी से निपटने के लिए SOP बनाने और राज्यों को शिकायत निवारण व जन-जागरूकता बढ़ाने का निर्देश दिया है, जिसका उद्देश्य डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के पीड़ितों को त्वरित राहत और…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, शासन और सामाजिक न्याय | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
- Prelims: साइबर धोखाधड़ी, म्यूल अकाउंट्स, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), सर्वोच्च न्यायालय, मानक संचालन प्रक्रिया (SOP), डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी, शिकायत निवारण तंत्र, धन वापसी (मनी रेस्टोरेशन)
- Essay: डिजिटल युग में वित्तीय सुरक्षा: चुनौतियाँ और समाधान, तकनीकी प्रगति और नागरिक अधिकार: संतुलन की आवश्यकता
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने RBI को ‘म्यूल अकाउंट्स’ सहित साइबर धोखाधड़ी से निपटने के लिए SOP बनाने और राज्यों को शिकायत निवारण व जन-जागरूकता बढ़ाने का निर्देश दिया है, जिसका उद्देश्य डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के पीड़ितों को त्वरित राहत और न्याय प्रदान करना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को ‘म्यूल अकाउंट्स’ (Mule Accounts) सहित साइबर धोखाधड़ी से जुड़े बैंक खातों से निपटने के लिए एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने और जारी करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, न्यायालय ने राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को शिकायत निवारण, धन वापसी और जन-जागरूकता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं, जिससे साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों को राहत मिलने की उम्मीद है।
पृष्ठभूमि
- भारत में डिजिटल लेनदेन में तेजी से वृद्धि हुई है, जिसके साथ ही साइबर धोखाधड़ी के मामलों में भी वृद्धि देखी गई है।
- ‘म्यूल अकाउंट्स’ का उपयोग अक्सर धोखाधड़ी से प्राप्त धन को छिपाने और स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है, जिससे अपराधियों को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है।
- वर्तमान में, साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों के लिए शिकायत निवारण और धन वापसी की प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली हो सकती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ‘इन री: विक्टिम्स ऑफ डिजिटल अरेस्ट रिलेटेड टू फोर्ज्ड डॉक्यूमेंट्स’ मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर सुनवाई कर रहा था, जो डिजिटल गिरफ्तारी और फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से की जा रही साइबर ठगी से संबंधित है।
- न्यायालय ने महसूस किया कि डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने और पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाने के लिए एक मजबूत और एकीकृत प्रणाली की आवश्यकता है।
- इस निर्देश का उद्देश्य विभिन्न एजेंसियों, जैसे बैंकों, राज्यों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करना और उनकी जवाबदेही बढ़ाना है।
‘म्यूल अकाउंट्स’ और संबंधित अवधारणाएँ क्या हैं?
- ‘म्यूल अकाउंट्स’ (Mule Accounts) ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका उपयोग साइबर अपराधियों द्वारा धोखाधड़ी से प्राप्त धन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है। खाताधारक अक्सर अनजाने में या जानबूझकर अपराधियों के लिए ‘मनी म्यूल’ (Money Mule) के रूप में कार्य करते हैं।
- डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी (Digital Financial Fraud) में ऑनलाइन माध्यमों, जैसे फ़िशिंग, विशिंग, स्पूफिंग, मालवेयर और अन्य साइबर हमलों का उपयोग करके व्यक्तियों या संस्थाओं से वित्तीय जानकारी या धन चुराना शामिल है।
- मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) किसी विशेष कार्य या गतिविधि को सफलतापूर्वक और लगातार पूरा करने के लिए निर्धारित निर्देशों का एक सेट है। यह दक्षता, गुणवत्ता और एकरूपता सुनिश्चित करने में मदद करती है।
- शिकायत निवारण (Grievance Redressal) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति या समूह की शिकायतों या समस्याओं का समाधान किया जाता है। साइबर धोखाधड़ी के संदर्भ में, यह पीड़ितों की शिकायतों को दर्ज करने और उन पर कार्रवाई करने की प्रणाली है।
- धन वापसी (Money Restoraton) का अर्थ है धोखाधड़ी के शिकार हुए व्यक्ति को उसके खोए हुए धन को वापस दिलाना। यह प्रक्रिया अक्सर जटिल होती है और इसमें बैंकों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और अदालतों का समन्वय शामिल होता है।
- स्वतः संज्ञान (Suo Motu) एक कानूनी शब्द है जिसका अर्थ है कि कोई अदालत या प्राधिकरण बिना किसी बाहरी याचिका या आवेदन के अपने आप किसी मामले का संज्ञान लेता है और उस पर कार्रवाई करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| म्यूल अकाउंट्स (Mule Accounts) पर SOP | साइबर धोखाधड़ी से जुड़े बैंक खातों से निपटने के लिए एक मानकीकृत प्रक्रिया स्थापित करना, जिससे धोखाधड़ी पर प्रभावी नियंत्रण हो सके। |
| शिकायत निवारण और धन वापसी व्यवस्था | पीड़ितों के लिए शिकायत दर्ज करने और खोए हुए धन को वापस पाने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और प्रभावी बनाना। |
| जन-जागरूकता अभियान | लोगों को साइबर धोखाधड़ी के जोखिमों और उपलब्ध कानूनी उपायों के बारे में शिक्षित करना, जिससे वे धोखाधड़ी से बच सकें और समय पर सहायता प्राप्त कर सकें। |
| राज्यवार और बैंकवार विवरण | साइबर धोखाधड़ी रोकथाम प्रणाली के तहत दर्ज और निपटाई गई शिकायतों का डेटा एकत्र करना, जिससे विभिन्न एजेंसियों और बैंकों की जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। |
| उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ अदालतों को जानकारी | न्यायिक प्रणाली को शिकायत निवारण और धन वापसी की व्यवस्था से अवगत कराना, ताकि पीड़ित समय पर कानूनी लाभ उठा सकें। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी पर अंकुश लगाने से वित्तीय प्रणाली में विश्वास बढ़ेगा और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिलेगा।
- पीड़ितों को धन वापसी मिलने से उनकी आर्थिक हानि कम होगी और वित्तीय स्थिरता बनी रहेगी।
- बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर धोखाधड़ी के कारण पड़ने वाले बोझ में कमी आएगी, जिससे उनकी परिचालन दक्षता में सुधार होगा।
सामाजिक महत्व
- आम नागरिकों को साइबर धोखाधड़ी से सुरक्षा मिलेगी, जिससे उनकी गाढ़ी कमाई सुरक्षित रहेगी।
- जन-जागरूकता बढ़ने से समाज में साइबर सुरक्षा के प्रति समझ बढ़ेगी और लोग अधिक सतर्क रहेंगे।
- शिकायत निवारण तंत्र के सुदृढ़ होने से पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ेगी, जिससे सामाजिक विश्वास बहाल होगा।
शासन और नियामक महत्व
- RBI द्वारा SOP जारी करने से वित्तीय क्षेत्र में नियामक ढांचा मजबूत होगा और साइबर सुरक्षा मानकों में सुधार होगा।
- राज्यों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही बढ़ने से साइबर अपराधों की रोकथाम और जांच में सुधार होगा।
- न्यायिक प्रणाली की सक्रिय भागीदारी से साइबर धोखाधड़ी के मामलों का त्वरित और प्रभावी निपटान सुनिश्चित होगा।
चुनौतियाँ
1. तकनीकी चुनौतियाँ
- साइबर अपराधियों द्वारा उपयोग की जाने वाली तकनीकों का लगातार विकसित होना, जिससे उन्हें ट्रैक करना और रोकना मुश्किल हो जाता है।
- फर्जी वेबसाइटों, फिशिंग (Phishing) और मैलवेयर (Malware) जैसे परिष्कृत तरीकों का उपयोग, जो आम जनता के लिए पहचानना कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – सूचना प्रौद्योगिकी
2. अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय समन्वय
- साइबर धोखाधड़ी अक्सर कई राज्यों या देशों में फैली होती है, जिससे विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करना जटिल हो जाता है।
- डेटा साझाकरण और कानूनी क्षेत्राधिकार से संबंधित मुद्दे, जो जांच और अभियोजन में बाधा डालते हैं।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा – साइबर सुरक्षा
3. जागरूकता और शिक्षा का अभाव
- जनसंख्या के एक बड़े हिस्से में डिजिटल साक्षरता और साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूकता की कमी, जिससे वे आसानी से धोखाधड़ी का शिकार हो जाते हैं।
- नए प्रकार की धोखाधड़ी के बारे में त्वरित जानकारी का अभाव, जिससे लोग खुद को बचाने के लिए तैयार नहीं होते।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय – शिक्षा
4. कानूनी और नियामक ढाँचे की गतिशीलता
- साइबर अपराधों की तेजी से बदलती प्रकृति के कारण मौजूदा कानूनों और विनियमों को अद्यतन रखने की चुनौती।
- प्रौद्योगिकी-आधारित अपराधों के लिए विशिष्ट कानूनी प्रावधानों और न्यायिक मिसालों की कमी।
यूपीएससी लिंक: शासन – ई-गवर्नेंस, कानून
5. संसाधनों की कमी
- साइबर अपराधों से निपटने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों, तकनीकी उपकरणों और वित्तीय संसाधनों की कमी, विशेषकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में।
- बैंकों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर बढ़ते मामलों का बोझ, जिससे त्वरित कार्रवाई में देरी होती है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा – क्षमता निर्माण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| म्यूल अकाउंट्स की पहचान | इन खातों का उपयोग अक्सर निर्दोष व्यक्तियों द्वारा अनजाने में किया जाता है, जिससे वास्तविक अपराधियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। |
| धन वापसी में देरी | धोखाधड़ी के बाद धन को तुरंत कई खातों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जिससे उसे ट्रैक करना और पीड़ित को वापस दिलाना चुनौतीपूर्ण होता है। |
| साइबर अपराधों का बढ़ता दायरा | फिशिंग, विशिंग (Vishing), स्मिशिंग (Smishing) और डिजिटल अरेस्ट जैसे नए-नए तरीके सामने आ रहे हैं, जिनसे निपटना मुश्किल है। |
| डेटा गोपनीयता बनाम जांच | जांच के दौरान व्यक्तिगत डेटा तक पहुंच की आवश्यकता और व्यक्तियों की गोपनीयता के अधिकार के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है। |
| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का अभाव | यदि अपराधी और खाते विदेशों में हों, तो अंतर्राष्ट्रीय कानूनी सहायता और सहयोग प्राप्त करने में समय और जटिलता आती है। |
आगे की राह
- RBI को ‘म्यूल अकाउंट्स’ और अन्य साइबर धोखाधड़ी से संबंधित बैंक खातों के लिए एक व्यापक और गतिशील SOP तैयार करना चाहिए, जिसमें त्वरित फ्रीजिंग और धन वापसी के प्रावधान हों।
- राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना चाहिए, जिसमें एक समर्पित हेल्पलाइन और ऑनलाइन पोर्टल शामिल हो, जो 24/7 उपलब्ध रहे।
- बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपनी साइबर सुरक्षा प्रणालियों को लगातार अपग्रेड करना चाहिए और ग्राहकों के लिए धोखाधड़ी का पता लगाने और रिपोर्ट करने के लिए आसान तरीके प्रदान करने चाहिए।
- व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, जिसमें विभिन्न भाषाओं और माध्यमों का उपयोग करके लोगों को साइबर धोखाधड़ी के विभिन्न प्रकारों और उनसे बचने के तरीकों के बारे में शिक्षित किया जाए।
- कानून प्रवर्तन एजेंसियों को साइबर फोरेंसिक (Cyber Forensics) और डिजिटल जांच में विशेषज्ञता रखने वाले कर्मियों को प्रशिक्षित करना चाहिए और उन्हें आवश्यक तकनीकी उपकरण उपलब्ध कराने चाहिए।
- अंतर-एजेंसी और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि साइबर अपराधियों को ट्रैक किया जा सके और उन्हें न्याय के कटघरे में लाया जा सके, भले ही वे किसी भी क्षेत्राधिकार में हों।
- न्यायिक प्रणाली को साइबर अपराधों से संबंधित मामलों के त्वरित निपटान के लिए विशेष बेंच या फास्ट-ट्रैक अदालतों पर विचार करना चाहिए।
- डेटा साझाकरण प्रोटोकॉल को मानकीकृत किया जाना चाहिए, जिससे विभिन्न हितधारकों के बीच सूचना का सुरक्षित और कुशल आदान-प्रदान सुनिश्चित हो सके, जबकि गोपनीयता का भी ध्यान रखा जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
साइबर धोखाधड़ी · म्यूल अकाउंट्स · भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) · मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) · डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी · शिकायत निवारण तंत्र · धन वापसी · जन-जागरूकता अभियान · न्यायिक सक्रियता · वित्तीय सुरक्षा · साइबर सुरक्षा · सुओ मोटू
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 32’, ‘note’: ‘मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु उपचार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
साइबर धोखाधड़ी की घटना → पीड़ितों द्वारा शिकायत दर्ज करना → बैंकों/एजेंसियों द्वारा खातों को फ्रीज करना → सुप्रीम कोर्ट का RBI को SOP बनाने का आदेश → SOP के माध्यम से शिकायत निवारण और धन वापसी → जन-जागरूकता और जवाबदेही में वृद्धि → डिजिटल वित्तीय प्रणाली में विश्वास बहाली
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ‘म्यूल अकाउंट्स’ का उपयोग अक्सर वैध वित्तीय लेनदेन के लिए किया जाता है।
2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत में साइबर धोखाधड़ी से संबंधित सभी कानूनी मामलों का निपटारा करता है।
3. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ‘इन री: विक्टिम्स ऑफ डिजिटल अरेस्ट रिलेटेड टू फोर्ज्ड डॉक्यूमेंट्स’ मामले में स्वतः संज्ञान लिया है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 गलत है। ‘म्यूल अकाउंट्स’ का उपयोग आमतौर पर अवैध या धोखाधड़ी वाले वित्तीय लेनदेन के लिए किया जाता है, जहाँ धोखेबाज पीड़ितों से प्राप्त धन को इन खातों में जमा करते हैं और फिर उसे निकाल लेते हैं।
कथन 2 गलत है। RBI वित्तीय क्षेत्र का नियामक है और साइबर धोखाधड़ी से निपटने के लिए नीतियां और दिशानिर्देश बनाता है, लेकिन सभी कानूनी मामलों का निपटारा अदालतों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा किया जाता है।
कथन 3 सही है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘इन री: विक्टिम्स ऑफ डिजिटल अरेस्ट रिलेटेड टू फोर्ज्ड डॉक्यूमेंट्स’ मामले में स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लेकर सुनवाई की, जो डिजिटल अरेस्ट और फर्जी दस्तावेजों के जरिए की जा रही साइबर ठगी से संबंधित है।
Q2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा ‘म्यूल अकाउंट्स’ पर SOP जारी करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
- बैंकों को अपने ग्राहकों को अधिक ऋण देने के लिए प्रोत्साहित करना।
- डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना और पीड़ितों को राहत प्रदान करना।
- भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली को पूरी तरह से समाप्त करना।
- विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए नए वित्तीय उत्पाद पेश करना।
उत्तर: डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना और पीड़ितों को राहत प्रदान करना। — सुप्रीम कोर्ट ने RBI को ‘म्यूल अकाउंट्स’ समेत साइबर धोखाधड़ी से जुड़े बैंक खातों से निपटने के लिए SOP जारी करने का निर्देश दिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना और धोखाधड़ी के पीड़ितों के लिए शिकायत निवारण तथा धन वापसी की व्यवस्था को मजबूत करना है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ साइबर धोखाधड़ी से निपटने में ‘म्यूल अकाउंट्स’ की भूमिका की व्याख्या कीजिए। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के आलोक में, डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के पीड़ितों को राहत प्रदान करने में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और अन्य संबंधित एजेंसियों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जा सकती है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** साइबर धोखाधड़ी और ‘म्यूल अकाउंट्स’ (Mule Accounts) की संक्षिप्त परिभाषा। ‘म्यूल अकाउंट्स’ का उपयोग कैसे किया जाता है, इसका उल्लेख।
2. **’म्यूल अकाउंट्स’ की भूमिका:** साइबर धोखाधड़ी में ‘म्यूल अकाउंट्स’ के महत्व और कार्यप्रणाली का विस्तृत वर्णन। ये कैसे धोखाधड़ी चक्र का एक अभिन्न अंग बनते हैं, इस पर प्रकाश डालना।
3. **सुप्रीम कोर्ट के निर्देश:** हालिया सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लेख, विशेष रूप से RBI को SOP (Standard Operating Procedure) बनाने और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों तथा कानून प्रवर्तन एजेंसियों को शिकायत निवारण व धन वापसी की व्यवस्था को मजबूत करने के निर्देश। ‘इन री: विक्टिम्स ऑफ डिजिटल अरेस्ट रिलेटेड टू फोर्ज्ड डॉक्यूमेंट्स’ मामले का संदर्भ।
4. **RBI की जवाबदेही:** SOP के माध्यम से RBI की भूमिका, बैंकों पर नियामक नियंत्रण, दिशानिर्देशों का प्रवर्तन, और वित्तीय प्रणाली में विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी।
5. **अन्य एजेंसियों की जवाबदेही:**
* **राज्य और केंद्र शासित प्रदेश:** शिकायत निवारण तंत्र का प्रभावी कार्यान्वयन, जन-जागरूकता अभियान चलाना।
* **कानून प्रवर्तन एजेंसियां:** त्वरित जांच, अपराधियों की पहचान और गिरफ्तारी, धन की वसूली में सहायता।
* **बैंक:** संदिग्ध लेनदेन की पहचान, खातों को फ्रीज करना, ग्राहकों को शिक्षित करना, शिकायत निवारण में सक्रिय भूमिका।
* **उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल:** अधीनस्थ अदालतों को जानकारी प्रदान करना ताकि पीड़ित समय पर कानूनी उपायों का लाभ उठा सकें।
6. **जवाबदेही सुनिश्चित करने के उपाय:** राज्यवार और बैंकवार शिकायतों के विवरण की प्रस्तुति का महत्व, अंतर-एजेंसी समन्वय, तकनीकी उन्नयन, और कानूनी ढांचे को मजबूत करना।
7. **निष्कर्ष:** डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी से निपटने के लिए एक समन्वित और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल, जिसमें नियामक, कानून प्रवर्तन और न्यायिक निकायों की सक्रिय भूमिका शामिल हो।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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