जनजातीय भूमि अधिकार: विकास परियोजनाओं में सहमति और कानूनी प्रावधानों की पूरी जानकारी

जनजातीय भूमि अधिकार और परियोजनाओं में सहमति — concept mind map

जनजातीय भूमि अधिकार: विकास परियोजनाओं में सहमति और कानूनी प्रावधानों की पूरी जानकारी

✎ जनजातीय भूमि अधिकार और विकास परियोजनाओं में सहमति का मुद्दा भारत के संघीय ढाँचे, जनजातीय अधिकारों के संरक्षण और समावेशी विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को दर्शाता है, जिसमें ग्राम सभा की भूमिका और वन अधिकार अधिनियम…

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जनजातीय भूमि अधिकार ढांचा

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना।  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ।  |  GS Paper II — विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
  • Prelims: जनजातीय भूमि अधिकार, वन अधिकार अधिनियम, 2006, पेसा अधिनियम, 1996, ग्राम सभा की सहमति, वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980, सातवीं अनुसूची – राज्य सूची
  • Essay: भारत में जनजातीय अधिकारों का संरक्षण और समावेशी विकास की चुनौतियाँ।, संघवाद और भूमि प्रशासन: केंद्र-राज्य संबंधों का बदलता स्वरूप।

त्वरित पुनरावृत्ति: जनजातीय भूमि अधिकार और विकास परियोजनाओं में सहमति का मुद्दा भारत के संघीय ढाँचे, जनजातीय अधिकारों के संरक्षण और समावेशी विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को दर्शाता है, जिसमें ग्राम सभा की भूमिका और वन अधिकार अधिनियम, 2006 का अनुपालन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

जनजातीय कार्य राज्यमंत्री ने हाल ही में लोकसभा में बताया कि भूमि और उसके प्रबंधन का मामला राज्यों के विशेष विधायी और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनजातीय भूमि के विपथन (diversion) का ब्यौरा केंद्रीय स्तर पर नहीं रखा जाता है और विभिन्न मंत्रालयों (जैसे ग्रामीण विकास, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन, पंचायती राज) के माध्यम से भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और ग्राम सभा की सहमति से जुड़े नियमों के कार्यान्वयन की स्थिति पर प्रकाश डाला। यह जानकारी जनजातीय समुदायों के भूमि अधिकारों और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चल रही बहस के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • भारत का संविधान (Constitution of India) भूमि और उसके प्रबंधन को सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) की राज्य सूची (State List) के तहत राज्यों के विशेष अधिकार क्षेत्र में रखता है, जो भूमि संबंधी मामलों में राज्यों की प्राथमिक भूमिका को रेखांकित करता है।
  • वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA), 2006, जनजातीय समुदायों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वन भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के विपथन के लिए ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति का प्रावधान है।
  • पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act – PESA), 1996, अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों को विशेष अधिकार देता है, जिसमें भूमि अधिग्रहण और लघु वन उत्पादों पर नियंत्रण शामिल है, जिससे ग्राम सभाओं की भूमिका मजबूत होती है।
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि के विपथन को नियंत्रित करता है और इसके लिए केंद्र सरकार की अंतिम मंजूरी आवश्यक है।
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change – MoEFCC) का PARIVESH पोर्टल वन भूमि के विपथन से संबंधित प्रस्तावों की ऑनलाइन प्रक्रिया और जानकारी प्रदान करता है, जिससे पारदर्शिता बढ़ती है।
  • भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act), 2013, भूमि अधिग्रहण और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।

जनजातीय भूमि अधिकार और विकास परियोजनाओं में सहमति

  • जनजातीय भूमि अधिकार भारत में जनजातीय समुदायों को उनकी पारंपरिक भूमि और संसाधनों पर प्राप्त कानूनी और संवैधानिक अधिकार हैं, जो उनकी पहचान, आजीविका और संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 3(2) कुछ विकास सुविधाओं के लिए एक हेक्टेयर तक की वन भूमि के विपथन की अनुमति देती है, बशर्ते संबंधित ग्राम सभा की सिफारिश आवश्यक हो।
  • वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 11(7) के अनुसार, राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन तभी वन भूमि के विपथन का आदेश जारी कर सकता है जब उसे केंद्र सरकार से ‘अंतिम’ मंजूरी मिल जाए और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों का निपटारा सुनिश्चित किया जाए।
  • PESA अधिनियम, 1996, अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन से संबंधित मामलों में परामर्श और सहमति का अधिकार देता है, जिससे स्थानीय स्वशासन मजबूत होता है।
  • जनजातीय कार्य मंत्रालय (Ministry of Tribal Affairs – MoTA) राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्र प्रशासनों से लगातार यह सुनिश्चित करने को कहता रहा है कि वन अधिकार अधिनियम की धारा 4(5) का पालन किया जाए, जिसके तहत अधिकारों की मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक दावेदारों को उनकी कब्ज़े वाली वन भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता।
  • परियोजना से प्रभावित परिवारों की भूमि का अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन का काम, जिसमें मुआवजे का भुगतान और नियमों को लागू करना शामिल है, संबंधित राज्य सरकार या परियोजना प्राधिकरण द्वारा किया जाता है।
  • केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय (जैसे ग्रामीण विकास, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन, पंचायती राज) भूमि संबंधी मामलों में नोडल भूमिका निभाते हैं, लेकिन भूमि और उसके प्रबंधन का वास्तविक कार्यान्वयन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
भूमि और उसका प्रबंधन संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य सूची का विषय, राज्यों के विशेष विधायी और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
वन भूमि का गैर-वानिकी उपयोग PARIVESH (परिवेश) पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन प्रक्रिया, पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित करता है।
वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 की धारा 3(2) विकास सुविधाओं के लिए एक हेक्टेयर तक की वन भूमि के न्यूनतम विपथन (Diversion) का प्रावधान, ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य।
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA), 1996 अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों के अधिकारों और भूमि संबंधी मामलों में उनकी भूमिका को सशक्त करता है, हालांकि इसका विवरण केंद्रीय स्तर पर नहीं रखा जाता।
वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 11(7) वन भूमि के विपथन के लिए केंद्र सरकार की ‘अंतिम’ मंजूरी और FRA सहित अन्य सभी लागू अधिनियमों के तहत अधिकारों के निपटान का अनुपालन अनिवार्य।
FRA की धारा 4(5) वन अधिकारों की मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक दावेदारों को उनकी कब्जे वाली वन भूमि से बेदखल न करने का प्रावधान, जनजातीय हितों की सुरक्षा।

महत्व

शासन और प्रशासन

  • यह स्पष्ट करता है कि भूमि और उसके प्रबंधन के मामले में राज्यों की प्रमुख भूमिका है, जो भारतीय संघवाद (Federalism) की प्रकृति को दर्शाता है।
  • PARIVESH पोर्टल जैसे ऑनलाइन तंत्र पारदर्शिता बढ़ाते हैं और वन भूमि के उपयोग से संबंधित प्रस्तावों की निगरानी में मदद करते हैं।

जनजातीय अधिकार और सशक्तिकरण

  • वन अधिकार अधिनियम (FRA) और PESA अधिनियम जनजातीय समुदायों के भूमि अधिकारों, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी उपकरण हैं।
  • ग्राम सभा की सहमति का प्रावधान जनजातीय समुदायों को उनके पारंपरिक क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं पर निर्णय लेने में सशक्त करता है, जिससे ‘स्व-शासन’ का सिद्धांत मजबूत होता है।

पर्यावरण संरक्षण

  • वन भूमि के विपथन के लिए कठोर नियम और केंद्र सरकार की अंतिम मंजूरी की आवश्यकता पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि विकास परियोजनाएं पर्यावरणीय स्थिरता और वन पारिस्थितिकी तंत्र पर उनके प्रभाव का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करने के बाद ही आगे बढ़ें।

सामाजिक न्याय और समावेशन

  • विस्थापन और पुनर्वास से संबंधित नियमों का अनुपालन यह सुनिश्चित करता है कि विकास परियोजनाओं से प्रभावित समुदायों, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों को उचित मुआवजा और पुनर्वास मिले।
  • यह संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा करने और उन्हें विकास प्रक्रिया में शामिल करने के महत्व पर जोर देता है।

चुनौतियाँ

1. केंद्र-राज्य समन्वय का अभाव

  • भूमि संबंधी मामलों के राज्य सूची में होने के कारण, केंद्रीय मंत्रालयों के पास जनजातीय भूमि के विपथन या PESA के कार्यान्वयन का केंद्रीय स्तर पर कोई विवरण नहीं होता है।
  • यह विभिन्न परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और ग्राम सभा की सहमति के नियमों को लागू करने से जुड़े विवादों के समाधान में जटिलता पैदा करता है।

2. वन अधिकार अधिनियम (FRA) का अपर्याप्त कार्यान्वयन

  • FRA के प्रावधानों के उल्लंघन की शिकायतें अभी भी सामने आती हैं, और अधिनियम को लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की है।
  • अधिकारों को मान्यता देने और उनके सत्यापन की प्रक्रिया में देरी से दावेदारों को उनके वन अधिकारों से वंचित होने का खतरा बना रहता है।

3. ग्राम सभा की सहमति का उल्लंघन

  • कई परियोजनाओं में ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति को दरकिनार करने या उसमें हेरफेर करने की शिकायतें मिलती हैं।
  • यह जनजातीय समुदायों के स्व-शासन और निर्णय लेने के अधिकारों को कमजोर करता है।

4. पुनर्वास और पुनर्स्थापन के मुद्दे

  • परियोजना से प्रभावित परिवारों के लिए भूमि अधिग्रहण, मुआवजे का भुगतान और पुनर्वास व पुनर्स्थापन नियमों के कार्यान्वयन में अक्सर चुनौतियां आती हैं।
  • यह विस्थापित समुदायों, विशेषकर जनजातीय लोगों के बीच असंतोष और आजीविका के नुकसान का कारण बनता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
केंद्रीय डेटा का अभाव जनजातीय भूमि के विपथन और PESA कार्यान्वयन का केंद्रीय स्तर पर कोई विवरण नहीं, प्रभावी निगरानी में बाधा।
FRA उल्लंघन राज्यों द्वारा FRA के प्रावधानों को लागू करने में देरी या उल्लंघन, जनजातीय अधिकारों का हनन।
ग्राम सभा की सहमति परियोजनाओं में ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति को दरकिनार करने या उसमें हेरफेर की प्रवृत्ति।
पुनर्वास में कमी परियोजना प्रभावित परिवारों को अपर्याप्त मुआवजा और पुनर्वास, आजीविका का नुकसान।
केंद्र-राज्य समन्वय भूमि संबंधी मामलों में केंद्र और राज्यों के बीच प्रभावी समन्वय की कमी, विवादों का समाधान कठिन।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006
  • पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996

आगे की राह

  • राज्यों को वन अधिकार अधिनियम (FRA) और PESA अधिनियम के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिसमें जनजातीय समुदायों के अधिकारों की मान्यता और सत्यापन में तेजी लाना शामिल है।
  • ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने और विकास परियोजनाओं पर उनकी सहमति को वास्तविक व सार्थक बनाने के लिए तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जिसमें प्रभावित परिवारों को समय पर और पर्याप्त मुआवजा व आजीविका विकल्प प्रदान करना शामिल है।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के बीच भूमि संबंधी मामलों, विशेषकर जनजातीय क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों पर बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
  • PARIVESH पोर्टल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर वन भूमि के विपथन और FRA के अनुपालन से संबंधित डेटा को अधिक व्यापक और सुलभ बनाया जाना चाहिए, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाई जा सके।
  • जनजातीय समुदायों को उनके अधिकारों और उपलब्ध कानूनी उपायों के बारे में जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाने चाहिए।
  • FRA के उल्लंघन या ग्राम सभा की सहमति के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों के त्वरित और प्रभावी समाधान के लिए एक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जनजातीय भूमि अधिकार · वन अधिकार अधिनियम, 2006 · ग्राम सभा की सहमति · भूमि अधिग्रहण · पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन · पंचायती राज मंत्रालय · राज्य सूची का विषय · वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 · PARIVESH पोर्टल · संघवाद और भूमि प्रबंधन · संवैधानिक प्रावधान · जनजातीय कार्य मंत्रालय

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • सातवीं अनुसूची (राज्य सूची – प्रविष्टि 18): भूमि और उसके प्रबंधन का विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में।

अवधारणा प्रवाह

विकास परियोजनाएं प्रस्तावित होती हैं।  →  परियोजनाओं के लिए वन भूमि के विपथन की आवश्यकता होती है।  →  वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होती है।  →  वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम के तहत केंद्र सरकार की अंतिम मंजूरी आवश्यक होती है।  →  भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के नियम लागू होते हैं।  →  राज्यों द्वारा इन नियमों का कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाता है।  →  जनजातीय भूमि अधिकार और आजीविका सुरक्षित रहती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत, भूमि और उसके प्रबंधन का मामला राज्यों के विशेष विधायी और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
2. वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के अनुसार, राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन को वन भूमि के विपथन के लिए केंद्र सरकार से ‘अंतिम’ मंज़ूरी की आवश्यकता होती है।
3. अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 की धारा 3(2) के तहत, विकास सुविधाओं के लिए वन भूमि के कम से कम विपथन हेतु ग्राम सभा की सिफारिश आवश्यक नहीं है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि भूमि राज्य सूची का विषय है। कथन 2 भी सही है क्योंकि वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 11(7) में केंद्र सरकार की अंतिम मंज़ूरी का प्रावधान है। कथन 3 गलत है क्योंकि वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 3(2) के तहत विकास सुविधाओं के लिए वन भूमि के विपथन हेतु ग्राम सभा की सिफारिश आवश्यक है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन सा मंत्रालय PARIVESH पोर्टल का संचालन करता है, जो वन भूमि के गैर-वानिकी कार्यों के लिए उपयोग से संबंधित प्रस्तावों को ऑनलाइन संसाधित करता है?

  1. जनजातीय कार्य मंत्रालय
  2. ग्रामीण विकास मंत्रालय
  3. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
  4. पंचायती राज मंत्रालय

उत्तर: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय — PARIVESH पोर्टल पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा संचालित किया जाता है, जिसका उपयोग वन भूमि के गैर-वानिकी कार्यों के लिए उपयोग से संबंधित प्रस्तावों को ऑनलाइन संसाधित करने के लिए किया जाता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ जनजातीय भूमि अधिकारों के संरक्षण में वन अधिकार अधिनियम, 2006 की भूमिका का परीक्षण करें। साथ ही, विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास में ग्राम सभा की सहमति के महत्व पर चर्चा करें। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** जनजातीय भूमि अधिकारों और विकास परियोजनाओं के बीच के द्वंद्व का संक्षिप्त परिचय।
2. **वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 की भूमिका:**
* अधिनियम का उद्देश्य: वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देना और उन्हें सुरक्षित करना।
* धारा 3(1) के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों (CFR) की मान्यता।
* धारा 4(5) का महत्व: अधिकारों की मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक बेदखली पर रोक।
* ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका: अधिकारों के निर्धारण और सत्यापन में।
3. **भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास में ग्राम सभा की सहमति का महत्व:**
* Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act (PESA), 1996 के तहत ग्राम सभा की शक्तियाँ।
* वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 3(2) में विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के विपथन हेतु ग्राम सभा की सिफारिश की अनिवार्यता।
* भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम, 2013 (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013) के तहत सहमति का प्रावधान।
* जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, संस्कृति और आजीविका पर प्रभाव को कम करने में सहमति की भूमिका।
* विवादों को कम करने और परियोजनाओं की स्वीकार्यता बढ़ाने में महत्व।
4. **चुनौतियाँ और कार्यान्वयन के मुद्दे:**
* ग्राम सभा की सहमति को दरकिनार करने के प्रयास।
* अधिकारों की धीमी मान्यता प्रक्रिया।
* केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी।
* प्रशासनिक और विधायी अधिकार क्षेत्र से संबंधित मुद्दे (भूमि राज्य सूची का विषय)।
5. **निष्कर्ष:** जनजातीय अधिकारों और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए ग्राम सभा की सहमति और FRA के प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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