06 Aug जनजातीय भूमि अधिकार: परियोजनाओं में सहमति और कानूनी प्रावधानों की पूरी जानकारी
✎ जनजातीय भूमि अधिकार और विकास परियोजनाओं में ग्राम सभा की सहमति तथा वन अधिकार अधिनियम, 2006 का अनुपालन सुनिश्चित करना संवैधानिक और कानूनी रूप से अनिवार्य है, जबकि भूमि प्रशासन का प्राथमिक दायित्व राज्यों का है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – संघवाद, राज्य सूची, पंचायती राज, अनुसूचित क्षेत्र, जनजातीय प्रशासन | GS Paper II — सामाजिक न्याय – जनजातीय अधिकार, वन अधिकार अधिनियम | GS Paper III — पर्यावरण – वन संरक्षण, वन भूमि का गैर-वानिकी उपयोग
- Prelims: वन अधिकार अधिनियम, 2006, पेसा अधिनियम, 1996, ग्राम सभा की सहमति, सातवीं अनुसूची, वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980, PARIVESH पोर्टल
- Essay: भारत में जनजातीय अधिकार और विकास का द्वंद्व, संघवाद और भूमि प्रशासन: राज्यों की स्वायत्तता और केंद्रीय हस्तक्षेप की सीमाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: जनजातीय भूमि अधिकार और विकास परियोजनाओं में ग्राम सभा की सहमति तथा वन अधिकार अधिनियम, 2006 का अनुपालन सुनिश्चित करना संवैधानिक और कानूनी रूप से अनिवार्य है, जबकि भूमि प्रशासन का प्राथमिक दायित्व राज्यों का है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
जनजातीय कार्य राज्यमंत्री श्री दुर्गादास उइके ने लोकसभा में बताया कि भूमि और उसके प्रबंधन का मामला राज्यों के विशेष विधायी और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनजातीय भूमि के विपथन (diversion) का ब्यौरा केंद्रीय स्तर पर नहीं रखा जाता है, और परियोजनाओं में ग्राम सभा की सहमति तथा पुनर्वास से जुड़े विवादों का विवरण भी संबंधित राज्य सरकारों या परियोजना प्राधिकरणों के पास होता है, न कि जनजातीय कार्य मंत्रालय के पास। यह जानकारी जनजातीय भूमि अधिकारों और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौतियों को उजागर करती है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (सूची II) की प्रविष्टि संख्या 18 के तहत, भूमि और उसके प्रबंधन का विषय राज्यों के विशेष विधायी और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
- भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन (Rehabilitation and Resettlement) केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न केंद्रीय और राज्य कानूनों के तहत किया जाता है।
- वन भूमि का गैर-वानिकी कार्यों के लिए उपयोग करने के प्रस्तावों पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के PARIVESH पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन कार्रवाई की जाती है।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (FRA) की धारा 3(2) कुछ विकास सुविधाओं के लिए वन भूमि के कम से कम विपथन का प्रावधान करती है, बशर्ते यह एक हेक्टेयर से अधिक न हो और संबंधित ग्राम सभा की सिफारिश आवश्यक हो।
- पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना और ग्राम सभा को सशक्त बनाना है, जिसमें भूमि संबंधी मामलों पर भी अधिकार शामिल हैं।
- वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 का नियम 11(7) यह सुनिश्चित करता है कि वन भूमि के विपथन या पट्टे पर देने का आदेश तभी जारी किया जा सकता है जब केंद्र सरकार से ‘अंतिम’ मंजूरी मिल जाए और FRA सहित अन्य सभी लागू अधिनियमों का पालन किया जाए।
जनजातीय भूमि अधिकार और विकास परियोजनाएँ
- जनजातीय भूमि अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत पांचवीं और छठी अनुसूची के प्रावधानों द्वारा संरक्षित हैं, जो जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित हैं।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार शामिल हैं।
- यह अधिनियम ग्राम सभा को वन संसाधनों के प्रबंधन और संरक्षण में एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है, विशेषकर वन भूमि के विपथन के मामलों में उसकी सहमति अनिवार्य है।
- पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों को विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है, जिसमें भूमि अधिग्रहण, लघु वन उत्पादों के स्वामित्व और जनजातीय भूमि के अलगाव को रोकने की शक्ति शामिल है।
- विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण अक्सर जनजातीय समुदायों के विस्थापन और उनकी आजीविका के नुकसान का कारण बनता है, जिससे उनके अधिकारों और पारंपरिक जीवनशैली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- सरकार द्वारा प्रबंधित विकास सुविधाओं के लिए वन भूमि के विपथन के मामलों में भी, FRA की धारा 3(2) के तहत ग्राम सभा की सिफारिश आवश्यक है, जो जनजातीय समुदायों की सहमति के महत्व को रेखांकित करती है।
- PARIVESH पोर्टल पर्यावरण और वन मंजूरी के लिए एक ऑनलाइन एकल खिड़की प्रणाली है, जो परियोजनाओं के लिए आवश्यक विभिन्न स्वीकृतियों की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करती है, लेकिन इसमें जनजातीय अधिकारों के अनुपालन की निगरानी भी शामिल है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| भूमि और उसका प्रबंधन | संविधान की सातवीं अनुसूची (राज्य सूची) के तहत राज्यों का विशेष विधायी और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र। |
| वन भूमि का गैर-वानिकी उपयोग | PARIVESH (परिवेश) पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन प्रक्रिया; प्रस्तावों की स्थिति और विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध। |
| वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 की धारा 3(2) | विकास सुविधाओं के लिए एक हेक्टेयर तक वन भूमि के न्यूनतम विपथन का प्रावधान, ग्राम सभा की सिफारिश अनिवार्य। |
| पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA), 1996 | अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों के माध्यम से भूमि संबंधी मामलों में स्थानीय स्वशासन और जनजातीय अधिकारों का संरक्षण। |
| वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 | वन भूमि के विपथन के लिए केंद्र सरकार की ‘अंतिम’ मंजूरी और FRA सहित अन्य सभी लागू कानूनों का पालन अनिवार्य। |
| FRA की धारा 4(5) | अधिकारों की मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक दावेदारों को वन भूमि से बेदखल न करने का प्रावधान। |
महत्व
शासन और प्रशासन
- यह दर्शाता है कि भूमि और वन संबंधी मामलों में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है, जहाँ राज्य भूमि के प्रबंधन के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार हैं।
- PARIVESH पोर्टल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पारदर्शिता बढ़ाते हैं और वन भूमि के उपयोग से संबंधित प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करते हैं।
सामाजिक और जनजातीय अधिकार
- वन अधिकार अधिनियम (FRA) और PESA अधिनियम जनजातीय समुदायों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा करने और उन्हें विकास परियोजनाओं में निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- ग्राम सभा की सहमति को अनिवार्य करना यह सुनिश्चित करता है कि स्थानीय समुदायों की आवाज सुनी जाए और उनके हितों की रक्षा हो, जिससे जबरन विस्थापन की संभावना कम होती है।
पर्यावरण संरक्षण
- वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम और संबंधित नियम वन भूमि के गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए उपयोग को विनियमित करके पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
- केंद्र सरकार की ‘अंतिम’ मंजूरी की आवश्यकता यह सुनिश्चित करती है कि वन भूमि के विपथन के पर्यावरणीय प्रभावों का गहन मूल्यांकन किया जाए।
चुनौतियाँ
1. राज्यों द्वारा कार्यान्वयन में भिन्नता
- भूमि और वन संबंधी कानूनों का कार्यान्वयन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिससे विभिन्न राज्यों में नियमों के पालन और प्रवर्तन में असमानताएँ हो सकती हैं।
- कुछ राज्यों में FRA और PESA के प्रावधानों को पूरी तरह से लागू करने में शिथिलता देखी गई है, जिससे जनजातीय अधिकारों का हनन होता है।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
2. ग्राम सभा की सहमति का उल्लंघन
- कई परियोजनाओं में ग्राम सभा की सहमति प्राप्त करने की प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायतें मिलती हैं, जिससे जनजातीय समुदायों में असंतोष बढ़ता है।
- कुछ मामलों में, सहमति को औपचारिक रूप से प्राप्त कर लिया जाता है, लेकिन स्थानीय समुदायों के वास्तविक हितों को नजरअंदाज किया जाता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, शासन
3. भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के मुद्दे
- विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण अक्सर विस्थापित परिवारों के लिए अपर्याप्त मुआवजे और पुनर्वास के मुद्दों को जन्म देता है।
- पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन नीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, खासकर जनजातीय क्षेत्रों में।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास
4. डेटा की उपलब्धता और निगरानी
- जनजातीय भूमि के विपथन या FRA के उल्लंघन से संबंधित केंद्रीय स्तर पर डेटा का अभाव प्रभावी नीति निर्माण और निगरानी में बाधा डालता है।
- मंत्रालयों के बीच समन्वय की कमी भी डेटा संग्रह और विश्लेषण को प्रभावित करती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| भूमि संबंधी मामलों में राज्य का अधिकार क्षेत्र | राज्यों के बीच कार्यान्वयन में असमानता और केंद्रीय निगरानी की कमी। |
| वन भूमि का गैर-वानिकी उपयोग | पर्यावरणीय प्रभाव और जनजातीय अधिकारों का संभावित उल्लंघन यदि FRA का पालन नहीं किया जाता है। |
| ग्राम सभा की सहमति | सहमति प्राप्त करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और ईमानदारी की कमी, जिससे स्थानीय समुदायों के अधिकार प्रभावित होते हैं। |
| भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास | विस्थापितों के लिए अपर्याप्त मुआवजा, पुनर्वास में देरी और आजीविका का नुकसान। |
| केंद्रीय स्तर पर डेटा का अभाव | नीति निर्माण, निगरानी और जवाबदेही में बाधाएँ। |
आगे की राह
- राज्यों को वन अधिकार अधिनियम (FRA) और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA) के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
- ग्राम सभा की सहमति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समावेशी बनाया जाए, जिसमें स्थानीय समुदायों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित हो।
- भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन नीतियों का प्रभावी और समयबद्ध कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाए, जिसमें उचित मुआवजा और आजीविका सहायता शामिल हो।
- जनजातीय भूमि के विपथन और FRA के उल्लंघन से संबंधित डेटा को केंद्रीय स्तर पर संकलित और निगरानी करने के लिए एक तंत्र विकसित किया जाए।
- विभिन्न मंत्रालयों (जनजातीय कार्य, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन, पंचायती राज) के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए।
- जनजातीय समुदायों को उनके अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में शिक्षित करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ।
- FRA के प्रावधानों के उल्लंघन की शिकायतों के त्वरित और प्रभावी समाधान के लिए एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जनजातीय भूमि अधिकार · वन अधिकार अधिनियम, 2006 · ग्राम सभा की सहमति · भूमि अधिग्रहण · पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन · पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 · राज्य सूची · वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 · PARIVESH पोर्टल · संघवाद
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 244’: ‘अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन।’}
- {‘सातवीं अनुसूची (राज्य सूची)’: ‘भूमि और उसके प्रबंधन का विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में।’}
- {‘अनुच्छेद 243 (क)’: ‘ग्राम सभा की शक्तियाँ और कार्य।’}
अवधारणा प्रवाह
विकास परियोजना का प्रस्ताव → वन भूमि के विपथन की आवश्यकता → ग्राम सभा की सहमति (FRA के तहत) → PARIVESH पोर्टल पर आवेदन → केंद्र सरकार की ‘अंतिम’ मंजूरी → भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास → परियोजना का कार्यान्वयन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत, भूमि और उसके प्रबंधन का मामला राज्य सूची का विषय है।
2. वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 3(2) के तहत, सरकार द्वारा प्रबंधित विकास सुविधाओं के लिए वन भूमि का विपथन (diversion) एक हेक्टेयर से अधिक नहीं हो सकता है, जिसके लिए ग्राम सभा की सिफारिश आवश्यक है।
3. पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) का कार्यान्वयन जनजातीय कार्य मंत्रालय के प्रशासनिक दायरे में आता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि भूमि राज्य सूची का विषय है। कथन 2 भी सही है, यह वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। कथन 3 गलत है क्योंकि PESA अधिनियम का प्रशासनिक मंत्रालय पंचायती राज मंत्रालय (MoPR) है, न कि जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA)।
Q2. कथन (A): वन भूमि का गैर-वानिकी कार्यों के लिए उपयोग करने के प्रस्तावों पर PARIVESH पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन कार्रवाई की जाती है।
कारण (R): PARIVESH पोर्टल पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा वन संबंधी स्वीकृतियों की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए विकसित किया गया है।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — कथन A और कारण R दोनों सही हैं। PARIVESH पोर्टल वास्तव में वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग के प्रस्तावों को ऑनलाइन संसाधित करता है, और इसे MoEFCC द्वारा स्वीकृतियों को सुव्यवस्थित करने के लिए विकसित किया गया है। इस प्रकार, R, A का सही स्पष्टीकरण है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ जनजातीय भूमि अधिकारों के संदर्भ में, वन अधिकार अधिनियम, 2006 और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा कीजिए। परियोजनाओं के लिए जनजातीय भूमि के अधिग्रहण में ग्राम सभा की सहमति के महत्व का भी विश्लेषण कीजिए। (15 अंक)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** जनजातीय भूमि अधिकारों के महत्व और संवैधानिक प्रावधानों का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) के प्रमुख प्रावधान:**
* वन भूमि पर व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता।
* धारा 3(2) के तहत विकास परियोजनाओं के लिए एक हेक्टेयर तक वन भूमि के विपथन की शर्त (ग्राम सभा की सहमति)।
* धारा 4(5) के तहत अधिकारों की मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक बेदखली पर रोक।
* वन संसाधनों के प्रबंधन और संरक्षण में ग्राम सभा की भूमिका।
3. **पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) के प्रमुख प्रावधान:**
* अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों को विशेष शक्तियाँ और अधिकार।
* ग्राम सभा को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में परामर्श और सहमति का अधिकार।
* लघु वनोत्पादों पर स्वामित्व का अधिकार।
* जनजातीय समुदायों की परंपराओं और रीति-रिवाजों की सुरक्षा।
4. **परियोजनाओं के लिए जनजातीय भूमि अधिग्रहण में ग्राम सभा की सहमति का महत्व:**
* **संवैधानिक और कानूनी अनिवार्यता:** FRA और PESA के तहत अनिवार्य प्रावधान।
* **जनजातीय स्वशासन:** ग्राम सभा की भूमिका जनजातीय स्वशासन और निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत करती है।
* **विस्थापन और पुनर्वास:** सहमति प्रक्रिया विस्थापन को कम करने और उचित पुनर्वास सुनिश्चित करने में सहायक।
* **पारदर्शिता और जवाबदेही:** परियोजनाओं में पारदर्शिता लाती है और हितधारकों की जवाबदेही तय करती है।
* **सांस्कृतिक और पारिस्थितिक संरक्षण:** जनजातीय संस्कृति, आजीविका और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा।
* **संघर्ष समाधान:** स्थानीय समुदायों और परियोजना डेवलपर्स के बीच संघर्षों को कम करने में मदद।
5. **चुनौतियाँ और आगे की राह:** कार्यान्वयन में चुनौतियाँ (जैसे राज्य सरकारों की भूमिका, जागरूकता की कमी) और उन्हें दूर करने के उपाय।
6. **निष्कर्ष:** जनजातीय अधिकारों के संरक्षण और समावेशी विकास के लिए इन कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments