07 Aug केरल में लगातार बढ़ रहे पॉक्सो मामले: बाल अधिकार आयोग की रिपोर्ट
✎ POCSO अधिनियम, 2012, बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए एक विशेष कानून है, और केरल की हालिया रिपोर्ट बेहतर रिपोर्टिंग के साथ-साथ बच्चों की निरंतर संवेदनशीलता को दर्शाती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय: बच्चों से संबंधित मुद्दे, कल्याणकारी योजनाएँ और उनका प्रदर्शन | GS Paper II — शासन: विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकार की नीतियाँ और हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय | GS Paper I — भारतीय समाज: महिलाओं और बच्चों से संबंधित सामाजिक मुद्दे
- Prelims: POCSO अधिनियम, 2012, बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR), बाल यौन शोषण, बाल सुरक्षा तंत्र, कानूनी साक्षरता
- Essay: भारत में बाल सुरक्षा सुनिश्चित करना: चुनौतियाँ और समाधान, डिजिटल युग में बच्चों के अधिकार और उनकी सुरक्षा, सामाजिक जागरूकता और कानूनी साक्षरता: बाल अधिकारों के संरक्षण में भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: POCSO अधिनियम, 2012, बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए एक विशेष कानून है, और केरल की हालिया रिपोर्ट बेहतर रिपोर्टिंग के साथ-साथ बच्चों की निरंतर संवेदनशीलता को दर्शाती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की वार्षिक रिपोर्ट (2025-26) के अनुसार, राज्य में बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत दर्ज मामलों में लगातार वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2024 में 4,607 मामले दर्ज हुए थे, जो 2025 में बढ़कर 4,765 हो गए। यह वृद्धि बच्चों की संवेदनशीलता को उजागर करती है, हालांकि रिपोर्ट में बेहतर कानूनी साक्षरता और जागरूकता गतिविधियों को भी मामलों की बेहतर रिपोर्टिंग का कारण बताया गया है।
पृष्ठभूमि
- POCSO अधिनियम, 2012, बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन हमला और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों से बचाने के लिए एक विशेष कानून है।
- केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (Kerala State Commission for Protection of Child Rights) का गठन 2013 में हुआ था, जब POCSO के तहत 1,002 मामले दर्ज किए गए थे।
- रिपोर्ट के अनुसार, दर्ज मामलों में लगभग 86% (4,167) लड़कियाँ थीं, जबकि 13% (618) लड़के थे।
- 15-18 आयु वर्ग के बच्चे सबसे अधिक संवेदनशील पाए गए, जिनमें 55% (2,666) पीड़ित इस आयु वर्ग से थे।
- अधिकांश यौन अपराध निजी और परिचित स्थानों पर होते हैं, जिनमें अपराधी अक्सर परिवार के सदस्य या बच्चों से परिचित लोग होते हैं।
- तिरुवनंतपुरम जिले में सर्वाधिक मामले (689) दर्ज किए गए, जिसके बाद कोल्लम (502), मलप्पुरम (465) और कोझिकोड (460) का स्थान रहा।
- रिपोर्टिंग में वृद्धि का एक कारण कानूनी साक्षरता में सुधार, जागरूकता गतिविधियों को मजबूत करना और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की रिपोर्ट करने में झिझक में कमी को माना गया है।
बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO) क्या है?
- POCSO अधिनियम, 2012, भारत में बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन हमला और पोर्नोग्राफी से बचाने के लिए एक व्यापक कानून है।
- यह अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को बच्चा मानता है, चाहे वह लड़का हो या लड़की।
- इसका उद्देश्य बच्चों के सर्वोत्तम हित और कल्याण को सुनिश्चित करना है और यौन अपराधों के पीड़ितों के लिए त्वरित न्याय प्रदान करना है।
- अधिनियम में विशेष न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान है ताकि मामलों की सुनवाई शीघ्रता से और बाल-सुलभ वातावरण में की जा सके।
- यह बच्चों के यौन शोषण से संबंधित अपराधों को परिभाषित करता है और उनके लिए कठोर दंड का प्रावधान करता है।
- अधिनियम में पीड़ित बच्चे की पहचान गोपनीय रखने और उसकी गरिमा व निजता का सम्मान करने पर विशेष जोर दिया गया है।
- इसमें बच्चों को अपराध की रिपोर्ट करने के लिए प्रोत्साहित करने और उन्हें आवश्यक सहायता व सुरक्षा प्रदान करने के तंत्र भी शामिल हैं।
- POCSO अधिनियम में अपराधों की रिपोर्टिंग के लिए अनिवार्य प्रावधान हैं, जिसमें किसी भी व्यक्ति को, जिसे बच्चे के खिलाफ यौन अपराध की जानकारी है, उसे इसकी रिपोर्ट करनी होती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मामलों में वृद्धि | केरल में POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की संख्या में लगातार वृद्धि देखी जा रही है, जो बच्चों की संवेदनशीलता को दर्शाता है। |
| बेहतर रिपोर्टिंग | कानूनी साक्षरता में सुधार, जागरूकता गतिविधियों को मजबूत करने और बाल यौन अपराधों की रिपोर्टिंग में कम झिझक के कारण मामलों की बेहतर रिपोर्टिंग हुई है। |
| सर्वाधिक मामले | तिरुवनंतपुरम जिले में सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं, जो POCSO रिपोर्टिंग तंत्र तक पहुंच, जनसंख्या घनत्व और बेहतर जागरूकता से संबंधित हो सकता है। |
| पीड़ितों का लिंग | कुल बाल पीड़ितों में से 86% लड़कियां हैं, जो लड़कियों के प्रति यौन अपराधों की उच्च दर को दर्शाता है। |
| आयु वर्ग | 15-18 आयु वर्ग के बच्चे सबसे अधिक संवेदनशील हैं, जो कुल पीड़ितों का 55% हैं। |
| अपराध का स्थान | अधिकांश यौन अपराध निजी और परिचित स्थानों पर होते हैं, जिनमें अपराधी अक्सर परिवार के सदस्य या बच्चों से परिचित लोग होते हैं। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह रिपोर्ट बच्चों के प्रति यौन अपराधों की बढ़ती प्रवृत्ति को उजागर करती है, जो समाज में बच्चों की सुरक्षा और कल्याण के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
- यह बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने और उन्हें यौन शोषण से बचाने के लिए सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी की आवश्यकता पर बल देती है।
- परिवार और परिचितों द्वारा किए गए अपराधों की उच्च संख्या बच्चों के लिए ‘सुरक्षित स्थान’ की अवधारणा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता को दर्शाती है।
शासन और नीतिगत महत्व
- POCSO अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन और बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- कानूनी साक्षरता और जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है, ताकि पीड़ित बच्चे और उनके परिवार बिना किसी झिझक के मामलों की रिपोर्ट कर सकें।
- यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं को बाल यौन शोषण के खिलाफ लड़ाई में मौजूदा कमियों को दूर करने और नई रणनीतियाँ विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण डेटा प्रदान करती है।
मानवाधिकार महत्व
- बच्चों के मानवाधिकारों, विशेष रूप से उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अधिकार के उल्लंघन को दर्शाता है।
- यह रिपोर्ट बच्चों को यौन शोषण से मुक्त जीवन जीने के उनके अधिकार की रक्षा के लिए राज्य के दायित्व पर जोर देती है।
चुनौतियाँ
1. रिपोर्टिंग में झिझक
- सामाजिक कलंक, प्रतिशोध का डर और कानूनी प्रक्रिया की जटिलता के कारण पीड़ित बच्चे और उनके परिवार अक्सर मामलों की रिपोर्ट करने में झिझकते हैं।
- अपराधियों का परिचित होना भी रिपोर्टिंग में बाधा डालता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: कमजोर वर्गों का संरक्षण
2. जागरूकता की कमी
- बच्चों और अभिभावकों में यौन अपराधों के प्रकार, उनके परिणामों और रिपोर्टिंग तंत्र के बारे में जागरूकता की कमी है।
- जीवन कौशल प्रशिक्षण की कमी बच्चों को यौन अपराधों को समझने और उनसे बचने में अक्षम बनाती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: मानव संसाधन विकास
3. न्यायिक प्रक्रिया में देरी
- POCSO मामलों में न्याय मिलने में अक्सर देरी होती है, जिससे पीड़ितों को और अधिक आघात पहुँचता है और न्याय प्रणाली पर विश्वास कम होता है।
- जांच और अभियोजन में कमियाँ भी न्याय में देरी का कारण बनती हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन: न्यायपालिका की कार्यप्रणाली
4. पुनर्वास और सहायता
- यौन शोषण के शिकार बच्चों को पर्याप्त मनोवैज्ञानिक, चिकित्सा और कानूनी सहायता प्रदान करने में चुनौतियाँ हैं।
- दीर्घकालिक पुनर्वास और सामाजिक एकीकरण कार्यक्रमों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: कमजोर वर्गों का कल्याण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मामलों की बढ़ती संख्या | बच्चों की बढ़ती संवेदनशीलता और मौजूदा सुरक्षा तंत्रों की अपर्याप्तता को दर्शाता है। |
| अपराधों का निजी स्थानों पर होना | बच्चों के लिए ‘सुरक्षित’ माने जाने वाले स्थानों में भी खतरे की उपस्थिति, जिससे पहचान और रोकथाम मुश्किल हो जाती है। |
| अपराधियों का परिचित होना | बच्चों के विश्वास का दुरुपयोग और रिपोर्टिंग में झिझक का एक प्रमुख कारण। |
| लड़कियों की उच्च भेद्यता | लैंगिक असमानता और लड़कियों के प्रति यौन हिंसा के विशेष जोखिम को उजागर करता है। |
| विभिन्न आयु समूहों में भेद्यता | सभी आयु वर्ग के बच्चों को लक्षित करने वाले व्यापक रोकथाम और सुरक्षा उपायों की आवश्यकता। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- POCSO अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences Act)
आगे की राह
- बच्चों को यौन अपराधों को समझने और रिपोर्ट करने के लिए जीवन कौशल प्रशिक्षण (Life Skill Training) प्रदान किया जाए।
- कानूनी साक्षरता और जागरूकता कार्यक्रमों को ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलाया जाए।
- POCSO मामलों की त्वरित जांच और सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए विशेष अदालतों और प्रशिक्षित कर्मियों की संख्या बढ़ाई जाए।
- पीड़ित बच्चों के लिए व्यापक पुनर्वास पैकेज, जिसमें मनोवैज्ञानिक परामर्श, चिकित्सा सहायता और कानूनी सहायता शामिल हो, प्रदान किया जाए।
- समुदाय आधारित बाल संरक्षण समितियों (Community Based Child Protection Committees) को मजबूत किया जाए और उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
- बच्चों के लिए सुरक्षित रिपोर्टिंग तंत्र (Safe Reporting Mechanisms) विकसित किए जाएं, जैसे कि चाइल्ड हेल्पलाइन (Child Helpline) को और अधिक प्रभावी बनाना।
- स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में बाल सुरक्षा नीतियों को सख्ती से लागू किया जाए और शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
बच्चों का यौन उत्पीड़न · POCSO अधिनियम · बाल अधिकार संरक्षण · कानूनी साक्षरता · जागरूकता अभियान · बाल सुरक्षा तंत्र · लैंगिक संवेदनशीलता · बाल कल्याण समितियाँ · न्यायिक प्रक्रिया · सामाजिक-सांस्कृतिक कारक
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
- अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार
- अनुच्छेद 23: मानव दुर्व्यापार और बलात्श्रम का प्रतिषेध
- अनुच्छेद 24: कारखानों आदि में बच्चों के नियोजन का प्रतिषेध
- अनुच्छेद 39(f): बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर
अवधारणा प्रवाह
केरल में POCSO मामलों में वृद्धि → बेहतर रिपोर्टिंग और जागरूकता में सुधार → बच्चों की निरंतर भेद्यता और सुरक्षा तंत्र की कमी → यौन अपराधों का निजी/परिचित स्थानों पर होना → बच्चों के लिए जीवन कौशल प्रशिक्षण और जागरूकता की आवश्यकता → बाल संरक्षण नीतियों और कानूनों को मजबूत करना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. बाल यौन अपराध संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को बच्चा मानता है।
2. यह अधिनियम यौन उत्पीड़न, यौन हमला और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों को परिभाषित करता है और उनके लिए दंड का प्रावधान करता है।
3. इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई केवल विशेष न्यायालयों द्वारा की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। POCSO अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को बच्चा मानता है। कथन 2 सही है। यह अधिनियम बच्चों के खिलाफ विभिन्न यौन अपराधों को परिभाषित करता है और उनके लिए कठोर दंड का प्रावधान करता है। कथन 3 गलत है। POCSO अधिनियम के तहत मामलों की सुनवाई विशेष न्यायालयों द्वारा की जाती है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि ‘केवल’ विशेष न्यायालय ही हों। कुछ परिस्थितियों में, अन्य न्यायालय भी इन मामलों की सुनवाई कर सकते हैं, हालांकि विशेष न्यायालयों को प्राथमिकता दी जाती है।
Q2. अभिकथन (A): केरल में POCSO मामलों की बढ़ती संख्या केवल अपराध में वृद्धि का संकेत नहीं है।
कारण (R): कानूनी साक्षरता में सुधार और जागरूकता गतिविधियों को मजबूत करने से ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग बेहतर हुई है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मामलों की संख्या में वृद्धि का एक कारण बेहतर रिपोर्टिंग भी है, जो कानूनी साक्षरता और जागरूकता में सुधार के कारण संभव हुई है। इसलिए, कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के उद्देश्यों और प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। हालिया रिपोर्टों में POCSO मामलों की बढ़ती संख्या के आलोक में, बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की रोकथाम और रिपोर्टिंग में सुधार के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाएगा:
**भाग 1: POCSO अधिनियम के उद्देश्य और प्रमुख प्रावधान (लगभग 75-80 शब्द)**
* **उद्देश्य:** बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन हमले और पोर्नोग्राफी से बचाना; बच्चों के सर्वोत्तम हित को सुनिश्चित करना; न्यायपालिका को बाल-सुलभ बनाना।
* **प्रमुख प्रावधान:**
* ‘बच्चे’ की परिभाषा (18 वर्ष से कम आयु)।
* विभिन्न यौन अपराधों (यौन उत्पीड़न, यौन हमला, पोर्नोग्राफी) की स्पष्ट परिभाषा।
* इन अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान।
* विशेष न्यायालयों की स्थापना।
* मामलों की त्वरित सुनवाई और निपटान।
* पीड़ित बच्चे की पहचान की गोपनीयता।
* पीड़ित को सहायता और पुनर्वास।
* पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया को बाल-सुलभ बनाना।
**भाग 2: रोकथाम और रिपोर्टिंग में सुधार के लिए कदम (लगभग 170-175 शब्द)**
* **जागरूकता और कानूनी साक्षरता:** बच्चों, माता-पिता, शिक्षकों और समुदाय के सदस्यों के बीच POCSO अधिनियम और बाल अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना। ‘गुड टच-बैड टच’ जैसे जीवन कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देना।
* **रिपोर्टिंग तंत्र को मजबूत करना:**
* पुलिस, बाल कल्याण समितियों (CWC) और चाइल्डलाइन (1098) जैसे रिपोर्टिंग चैनलों को अधिक सुलभ और विश्वसनीय बनाना।
* रिपोर्टिंग करने वालों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करना।
* स्कूलों और अन्य संस्थानों में अनिवार्य रिपोर्टिंग प्रोटोकॉल लागू करना।
* **संस्थागत क्षमता निर्माण:**
* पुलिस, अभियोजन पक्ष और न्यायपालिका के कर्मियों को बाल यौन अपराधों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण देना।
* फोरेंसिक जांच और साक्ष्य संग्रह में सुधार।
* विशेष न्यायालयों की संख्या बढ़ाना और उनका सुचारू संचालन सुनिश्चित करना।
* **सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों का समाधान:**
* यौन शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना।
* लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देना और पितृसत्तात्मक मानसिकता को चुनौती देना।
* परिवार और परिचितों द्वारा किए जाने वाले अपराधों पर विशेष ध्यान देना।
* **पुनर्वास और सहायता:**
* पीड़ित बच्चों के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श, चिकित्सा सहायता और पुनर्वास सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना।
* पीड़ितों को समाज में पुनः एकीकृत करने के लिए सहायता प्रदान करना।
* **डेटा संग्रह और विश्लेषण:** मामलों के पैटर्न, कारणों और प्रभावी हस्तक्षेपों को समझने के लिए बेहतर डेटा संग्रह और विश्लेषण प्रणाली विकसित करना।
* **अंतर-एजेंसी समन्वय:** विभिन्न सरकारी विभागों, गैर-सरकारी संगठनों और समुदाय-आधारित संगठनों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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