तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से पारित किया मेकेदातू बाँध प्रस्ताव, उच्च न्यायालय में प्रस्तुत

Amended resolution on Mekedatu Dam was put to vote and passed unanimously by the Legislative Assembly, Advocate General — labelled illustration

तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से पारित किया मेकेदातू बाँध प्रस्ताव, उच्च न्यायालय में प्रस्तुत

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3D cutaway: Amended resolution on Mekedatu Dam was put to vote and passed unanimously by the Legislati

✎ अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है, जो केंद्र सरकार को राज्यों के बीच नदी जल विवादों के समाधान के लिए न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार देता है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान – संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय जल विवाद  |  GS Paper II — शासन – विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र
  • Prelims: मेकेदातू बांध, कावेरी नदी, अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262, जल शक्ति मंत्रालय, सर्वोच्च न्यायालय कावेरी जल विवाद निर्णय
  • Essay: संघवाद और अंतर-राज्यीय विवाद: भारतीय लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन और सतत विकास: जल विवादों का समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है, जो केंद्र सरकार को राज्यों के बीच नदी जल विवादों के समाधान के लिए न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार देता है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

मद्रास उच्च न्यायालय को महाधिवक्ता ने सूचित किया है कि मेकेदातू बांध पर एक संशोधित प्रस्ताव तमिलनाडु विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया था। यह प्रस्ताव केंद्र सरकार से अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 4 के तहत एक विशेष न्यायाधिकरण (Tribunal) गठित करने का आग्रह करता है ताकि कावेरी नदी पर मेकेदातू बांध के प्रस्तावित निर्माण को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद का समाधान किया जा सके। यह जानकारी AIADMK के मुख्य सचेतक द्वारा दायर एक रिट याचिका के जवाब में दी गई है, जिसमें संशोधित प्रस्ताव को चुनौती दी गई थी।

पृष्ठभूमि

  • मेकेदातू बांध कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु शहर के लिए पेयजल और बिजली उत्पादन करना है।
  • तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध करता है, यह तर्क देते हुए कि यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित जल-बंटवारे के समझौते का उल्लंघन करेगा और उसके निचले इलाकों में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति को प्रभावित करेगा।
  • कावेरी नदी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं।
  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, केंद्र सरकार को राज्यों के बीच नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार देता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में कावेरी जल विवाद पर अपना अंतिम निर्णय दिया था, जिसमें जल-बंटवारे की योजना को संशोधित किया गया था और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (Cauvery Water Management Authority) तथा कावेरी जल विनियमन समिति (Cauvery Water Regulation Committee) का गठन किया गया था।
  • तमिलनाडु विधानसभा का वर्तमान प्रस्ताव केंद्र से एक नया न्यायाधिकरण गठित करने का आग्रह करता है, विशेष रूप से मेकेदातू बांध से संबंधित विवाद को हल करने के लिए।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 और संवैधानिक प्रावधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित है। यह संसद को कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 262(2) संसद को यह भी अधिकार देता है कि वह कानून द्वारा यह प्रावधान करे कि सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय ऐसे किसी भी विवाद या शिकायत के संबंध में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं रखेगा।
  • इसी संवैधानिक शक्ति का उपयोग करते हुए, संसद ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किया।
  • इस अधिनियम की धारा 4 केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि यदि किसी राज्य सरकार द्वारा यह अनुरोध किया जाता है कि किसी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल से संबंधित कोई विवाद उत्पन्न हुआ है और बातचीत से इसका समाधान नहीं हो सका है, तो वह एक नदी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन करे।
  • न्यायाधिकरण के निर्णय को केंद्र सरकार द्वारा आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है, और यह निर्णय विवाद में शामिल पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
  • अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि न्यायाधिकरण के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, हालांकि न्यायिक समीक्षा के कुछ सीमित आधार उपलब्ध हो सकते हैं।
  • भारत में कई अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद न्यायाधिकरण स्थापित किए गए हैं, जैसे कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण, गोदावरी जल विवाद न्यायाधिकरण और कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मेकेदाटू बांध विवाद यह कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित बांध निर्माण से संबंधित है, जिस पर तमिलनाडु को आपत्ति है।
तमिलनाडु विधानसभा का प्रस्ताव विधानसभा ने केंद्र से कर्नाटक को मेकेदाटू बांध बनाने की अनुमति न देने और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 4 के तहत एक विशेष न्यायाधिकरण (Tribunal) गठित करने का आग्रह किया है।
संशोधित प्रस्ताव विपक्षी दल के अनुरोध पर मूल प्रस्ताव में एक संशोधन शामिल किया गया, जिसमें विवाद के समाधान के लिए एक नए न्यायाधिकरण के गठन की मांग की गई।
मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका AIADMK के सचेतक (Whip) ने संशोधित प्रस्ताव को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की है, जिसमें दावा किया गया है कि इस पर बहस नहीं हुई थी।
अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 यह अधिनियम अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए न्यायाधिकरणों की स्थापना का प्रावधान करता है।

महत्व

संघवाद और राज्य संबंध

  • यह मामला भारत में संघवाद (Federalism) और राज्यों के बीच जल-साझाकरण से संबंधित तनावों को उजागर करता है।
  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अक्सर राज्यों के बीच राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को प्रभावित करते हैं।

न्यायिक और विधायी भूमिका

  • यह घटनाक्रम विधानसभा की विधायी प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे पर प्रकाश डालता है।
  • उच्च न्यायालय की भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि विधायी प्रक्रियाएं संवैधानिक मानदंडों के अनुरूप हों।

जल सुरक्षा और कृषि

  • कावेरी नदी जल विवाद दक्षिणी राज्यों की कृषि और पेयजल आवश्यकताओं के लिए जल सुरक्षा के महत्व को दर्शाता है।
  • बांधों का निर्माण निचले तटवर्ती (Riparian) राज्यों के जल प्रवाह को प्रभावित कर सकता है, जिससे उनकी कृषि और आजीविका पर असर पड़ सकता है।

चुनौतियाँ

1. अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान

  • भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है, जिसमें अक्सर कई दशक लग जाते हैं।
  • न्यायाधिकरणों के निर्णयों को लागू करने में भी चुनौतियाँ आती हैं, क्योंकि राज्य अक्सर उन्हें स्वीकार करने में हिचकिचाते हैं।

2. विधायी प्रक्रिया की पारदर्शिता

  • संशोधित प्रस्ताव पर बहस न होने के आरोप विधायी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और उचित विचार-विमर्श के महत्व पर सवाल उठाते हैं।
  • लोकतांत्रिक शासन के लिए यह आवश्यक है कि सभी महत्वपूर्ण निर्णय उचित बहस और सहमति से लिए जाएं।

3. सर्वोच्च न्यायालय और न्यायाधिकरणों की भूमिका

  • अंतर-राज्यीय जल विवादों में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और न्यायाधिकरणों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके निर्णयों का कार्यान्वयन अक्सर राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
  • न्यायालयों के निर्णयों का सम्मान और उनका पालन करना संघवाद की भावना के लिए आवश्यक है।

4. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

  • जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण वर्षा पैटर्न में बदलाव और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव से ऐसे विवाद और अधिक जटिल हो सकते हैं।
  • जल प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक और अनुकूलनीय रणनीतियों की आवश्यकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
अंतर-राज्यीय जल विवाद राज्यों के बीच जल-साझाकरण को लेकर स्थायी तनाव और राजनीतिक गतिरोध।
विधायी प्रक्रिया पर सवाल विधानसभा में प्रस्तावों पर उचित बहस और मतदान की प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह।
न्यायाधिकरणों का प्रभावी कार्यान्वयन अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद न्यायाधिकरणों के निर्णयों को लागू करने में देरी और प्रतिरोध।
निचले तटवर्ती राज्यों के अधिकार ऊपरी तटवर्ती राज्यों द्वारा बांध निर्माण से निचले तटवर्ती राज्यों के जल अधिकारों पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।
संघवाद पर दबाव जल विवादों के कारण केंद्र-राज्य और अंतर-राज्य संबंधों में तनाव, जिससे सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) कमजोर होता है।

आगे की राह

  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए एक स्थायी और समयबद्ध तंत्र विकसित करना।
  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 में संशोधन कर न्यायाधिकरणों को अधिक शक्तियां और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करना।
  • राज्यों के बीच जल-साझाकरण के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाना, जो सभी हितधारकों के हितों को संतुलित करे।
  • विधायी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और उचित विचार-विमर्श सुनिश्चित करना, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान हो।
  • जल प्रबंधन और संरक्षण के लिए राज्यों के बीच सहयोग और संवाद को बढ़ावा देना।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए एकीकृत योजनाएं विकसित करना।
  • केंद्र सरकार द्वारा विवादों के समाधान में एक निष्पक्ष मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका निभाना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद · कावेरी जल विवाद · मेकेदाटू बांध परियोजना · अनुच्छेद 262 · अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 · न्यायिक समीक्षा · संघवाद · राज्य विधानमंडल की शक्तियां · उच्चतम न्यायालय की भूमिका · जल शक्ति मंत्रालय

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘अनुच्छेद 262’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन।’}
  • {‘अनुच्छेद 131’: ‘राज्यों के बीच विवादों में सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार।’}
  • {‘सातवीं अनुसूची’: “राज्य सूची में ‘जल’ (प्रविष्टि 17) और संघ सूची में ‘अंतर-राज्यीय नदियाँ’ (प्रविष्टि 56)।”}

अवधारणा प्रवाह

कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर मेकेदाटू बांध का प्रस्ताव।  →  तमिलनाडु द्वारा बांध निर्माण पर आपत्ति और विरोध।  →  तमिलनाडु विधानसभा द्वारा केंद्र से न्यायाधिकरण गठन का आग्रह।  →  संशोधित प्रस्ताव पर मद्रास उच्च न्यायालय में रिट याचिका।  →  उच्च न्यायालय द्वारा विधानसभा सचिव, मुख्य सचिव और जल शक्ति मंत्रालय को नोटिस।  →  अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत समाधान की प्रक्रिया।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित है।
2. संसद को कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन के लिए प्रावधान करने का अधिकार है।
3. अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत गठित न्यायाधिकरणों के निर्णयों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित है और संसद को ऐसे विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है। हालांकि, कथन 3 गलत है क्योंकि अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत गठित न्यायाधिकरणों के निर्णयों को कुछ विशेष परिस्थितियों में उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, विशेषकर यदि वे संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करते हों या प्रक्रियात्मक त्रुटियां हों।

Q2. मेकेदाटू बांध परियोजना किन दो राज्यों के बीच विवाद का विषय रही है?

  1. केरल और तमिलनाडु
  2. कर्नाटक और तमिलनाडु
  3. आंध्र प्रदेश और कर्नाटक
  4. तेलंगाना और आंध्र प्रदेश

उत्तर: कर्नाटक और तमिलनाडु — मेकेदाटू बांध परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित है, जिस पर तमिलनाडु ने आपत्ति जताई है। यह परियोजना कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से चले आ रहे कावेरी जल विवाद का एक हिस्सा है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में संवैधानिक प्रावधानों और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ये तंत्र भारत में संघवाद की भावना को बनाए रखने में सफल रहे हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के महत्व और भारत में उनकी व्यापकता का संक्षिप्त परिचय।
2. **संवैधानिक प्रावधान:**
* अनुच्छेद 262 का उल्लेख: संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने की शक्ति।
* संसद की शक्ति: उच्चतम न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय के क्षेत्राधिकार से ऐसे विवादों को बाहर करने की शक्ति।
3. **अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956:**
* अधिनियम के मुख्य प्रावधान: केंद्र सरकार द्वारा न्यायाधिकरणों (Tribunals) का गठन।
* न्यायाधिकरणों की संरचना और कार्यप्रणाली।
* न्यायाधिकरणों के निर्णयों की बाध्यकारी प्रकृति।
4. **समालोचनात्मक परीक्षण (सफलताएं):**
* विवादों के समाधान के लिए एक संस्थागत तंत्र प्रदान करना।
* तकनीकी और वैज्ञानिक विशेषज्ञता के आधार पर निर्णय।
* न्यायिक प्रणाली पर बोझ कम करना।
5. **समालोचनात्मक परीक्षण (कमियां/चुनौतियां):**
* न्यायाधिकरणों के गठन और निर्णय देने में देरी।
* राज्यों द्वारा निर्णयों को स्वीकार करने में अनिच्छा और राजनीतिकरण।
* न्यायाधिकरणों के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा का मुद्दा (उच्चतम न्यायालय की भूमिका)।
* अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता (जैसे 2019 का संशोधन)।
6. **संघवाद की भावना पर प्रभाव:**
* **सफलता:** विवादों को हल करके सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देने का प्रयास। राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय का मंच।
* **चुनौतियां:** राज्यों के बीच अविश्वास, राजनीतिक हस्तक्षेप और न्यायाधिकरणों के निर्णयों को लागू करने में कठिनाई के कारण प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) को बढ़ावा। जल एक राज्य सूची का विषय होने के बावजूद केंद्र की भूमिका।
7. **निष्कर्ष:** अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए एक मजबूत, समयबद्ध और स्वीकार्य तंत्र की आवश्यकता पर बल, जो सहकारी संघवाद की भावना को बनाए रखे और राज्यों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध सुनिश्चित करे।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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