मेकेडाटू बाँध पर केंद्र सरकार का रुख: लोकसभा में दोहराया पक्ष

Centre sticks to its stand on the Mekedatu dam project, reiterates its reply in the Lok Sabha too — labelled illustration

मेकेडाटू बाँध पर केंद्र सरकार का रुख: लोकसभा में दोहराया पक्ष

Exploded view: Centre sticks to its stand on the Mekedatu dam project, reiterates its reply in the Lok SaMekedatu dam projectCauvery Water Disputes TribunalCauvery river basinLok Sabha
Exploded view: Centre sticks to its stand on the Mekedatu dam project, reiterates its reply in the Lok Sa

✎ अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित न्यायाधिकरणों के माध्यम से किया जाता है, जिनके निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होते हैं।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय जल विवाद  |  GS Paper I — भूगोल: भारत का भौतिक भूगोल (नदियाँ)
  • Prelims: मेकेदाटू बांध परियोजना, कावेरी जल विवाद, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण, अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, अनुच्छेद 262, रिपेरियन राज्य, केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय
  • Essay: भारत में सहकारी संघवाद की चुनौतियाँ, जल सुरक्षा और अंतर-राज्यीय सहयोग

त्वरित पुनरावृत्ति: अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित न्यायाधिकरणों के माध्यम से किया जाता है, जिनके निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होते हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार ने लोकसभा में मेकेदाटू बांध परियोजना पर अपनी पूर्व की स्थिति को दोहराया है। केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री ने बताया कि फरवरी 2018 के सर्वोच्च न्यायालय के कावेरी विवाद संबंधी निर्णय में यह उल्लेख नहीं है कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर किसी भी प्रकार की संरचना के निर्माण के लिए अन्य तटवर्ती राज्यों (रिपेरियन स्टेट्स) जैसे तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी की सहमति प्राप्त करनी होगी। यह परियोजना बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित है, जिस पर तमिलनाडु सरकार और किसानों के संगठन चिंता व्यक्त कर रहे हैं।

पृष्ठभूमि

  • मेकेदाटू बांध परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित है, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु शहर की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना है।
  • तमिलनाडु सरकार इस परियोजना का विरोध कर रही है, क्योंकि उसका मानना है कि यह कावेरी डेल्टा क्षेत्र में पानी की उपलब्धता को प्रभावित करेगी, विशेषकर निचले तटवर्ती राज्यों के लिए।
  • कावेरी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं।
  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) ने 2007 में अपना अंतिम अधिनिर्णय (Final Award) दिया था, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2018 में संशोधित किया।
  • सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के निर्णय ने कावेरी नदी के जल बंटवारे की योजना को अंतिम रूप दिया और केंद्र सरकार को इस योजना को अधिसूचित करने का निर्देश दिया।
  • तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री के जवाब पर आपत्ति जताते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जवाब वापस लेने का अनुरोध किया है, उनका तर्क है कि यह परियोजना अधिनिर्णय द्वारा स्थापित विनियमित प्रवाह व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

अंतर-राज्यीय जल विवाद और संवैधानिक प्रावधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 262(1) संसद को कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 262(2) संसद को यह प्रावधान करने का अधिकार देता है कि सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय ऐसे किसी भी विवाद पर अधिकारिता (jurisdiction) का प्रयोग नहीं करेगा।
  • इस शक्ति का प्रयोग करते हुए, संसद ने नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956) और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किए हैं।
  • अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 केंद्र सरकार को राज्यों के बीच जल विवादों के निपटारे के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
  • एक बार न्यायाधिकरण का गठन हो जाने के बाद, उसका निर्णय अंतिम और संबंधित राज्यों के लिए बाध्यकारी होता है, और इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • जल एक राज्य सूची का विषय है, लेकिन अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास को संघ सूची की प्रविष्टि 56 के तहत संसद द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है, यदि संसद सार्वजनिक हित में ऐसा करना आवश्यक समझे।
  • तटवर्ती राज्य (Riparian States) वे राज्य होते हैं जो एक ही नदी के किनारे स्थित होते हैं और उस नदी के जल का उपयोग करने का अधिकार रखते हैं।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मेकेदातू बांध परियोजना · कावेरी जल विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद · संघवाद · न्यायिक समीक्षा · उच्चतम न्यायालय का निर्णय · कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण · निचले तटवर्ती राज्य · ऊपरी तटवर्ती राज्य · जल शक्ति मंत्रालय · राज्य सूची · समवर्ती सूची

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
2. उच्चतम न्यायालय के 2018 के निर्णय के अनुसार, कर्नाटक को मेकेदातू बांध परियोजना के लिए अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं है।
3. जल संसाधन, नदियों और नदी घाटियों का विनियमन तथा विकास मुख्य रूप से संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची का विषय है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था। कथन 2 गलत है। उच्चतम न्यायालय के 2018 के निर्णय में यह उल्लेख नहीं है कि कर्नाटक को अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह कहा गया है कि न्यायाधिकरण के अंतिम अधिनिर्णय में ऐसी कोई शर्त नहीं है। कथन 3 सही है। जल संसाधन, नदियों और नदी घाटियों का विनियमन तथा विकास मुख्य रूप से संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची का विषय है, हालांकि संसद अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन के लिए कानून बना सकती है।

Q2. अभिकथन (A): केंद्र सरकार ने मेकेदातू बांध परियोजना पर अपना रुख दोहराया है कि कर्नाटक को अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं है।
कारण (R): उच्चतम न्यायालय के 2018 के निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर किसी भी प्रकार की संरचना के निर्माण के लिए तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी की सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A सत्य है, लेकिन R असत्य है। — अभिकथन (A) सत्य है, क्योंकि केंद्र सरकार ने लोकसभा में अपना रुख दोहराया है। कारण (R) असत्य है। उच्चतम न्यायालय के 2018 के निर्णय में यह उल्लेख नहीं है कि कर्नाटक को अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह कहा गया है कि न्यायाधिकरण के अंतिम अधिनिर्णय में ऐसी कोई शर्त नहीं है। केंद्र सरकार ने न्यायाधिकरण के अंतिम अधिनिर्णय के प्रासंगिक खंड का हवाला दिया है, न कि सीधे उच्चतम न्यायालय के निर्णय का।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों को सुलझाने में संवैधानिक और कानूनी तंत्रों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। मेकेदातू बांध परियोजना के संदर्भ में, इन तंत्रों की प्रभावशीलता और चुनौतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर में निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए:
1. **परिचय:** भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों की प्रकृति और उनके महत्व का संक्षिप्त परिचय।
2. **संवैधानिक प्रावधान:** अनुच्छेद 262 (अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों से संबंधित विवादों का अधिनिर्णय) और सातवीं अनुसूची (राज्य सूची, संघ सूची) के तहत जल से संबंधित प्रविष्टियों का उल्लेख।
3. **कानूनी तंत्र:** अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 का उल्लेख और इसके तहत गठित न्यायाधिकरणों (जैसे कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण) की भूमिका।
4. **न्यायिक समीक्षा की भूमिका:** उच्चतम न्यायालय के निर्णयों (जैसे 2018 का कावेरी निर्णय) और उनकी बाध्यकारी प्रकृति पर चर्चा।
5. **तंत्रों की प्रभावशीलता:** इन तंत्रों ने किस हद तक विवादों को सुलझाने में मदद की है, इसके सकारात्मक पहलुओं पर प्रकाश डालना।
6. **चुनौतियाँ:** मेकेदातू बांध परियोजना के संदर्भ में इन तंत्रों के समक्ष आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करें, जैसे:
* राज्यों के बीच सहमति का अभाव।
* निर्णयों के कार्यान्वयन में देरी या प्रतिरोध।
* राजनीतिकरण और भावनात्मक मुद्दे।
* न्यायाधिकरणों के निर्णयों की जटिलता और व्याख्या संबंधी विवाद।
* जलवायु परिवर्तन और बढ़ती जल मांग जैसे नए कारक।
7. **निष्कर्ष:** विवादों के समाधान के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण, सहयोगात्मक संघवाद और दीर्घकालिक समाधानों की आवश्यकता पर जोर।

स्रोत: The Hindu


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