08 Aug मेकेडाटू बाँध पर केंद्र सरकार का पुरज़ोर पक्ष, लोकसभा में भी दोहराया जवाब
Mekedatu dam projectCauvery disputeCauvery Water Disputes TribunalInter-state riverRiparian statesCWDT final award✎ मेकेदाटू बांध परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जो अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 और उच्चतम न्यायालय के निर्णयों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के तहत एक जटिल अंतर-राज्यीय जल…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध, केंद्र-राज्य संबंध | GS Paper III — जल संसाधन, पर्यावरण
- Prelims: मेकेदाटू बांध परियोजना, कावेरी नदी जल विवाद, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT), अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262, उच्चतम न्यायालय का निर्णय, निचले तटवर्ती राज्य, ऊपरी तटवर्ती राज्य
- Essay: भारत में सहकारी संघवाद की चुनौतियाँ: अंतर-राज्यीय जल विवादों के विशेष संदर्भ में, जल सुरक्षा और टिकाऊ विकास: अंतर-राज्यीय विवादों का समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: मेकेदाटू बांध परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जो अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 और उच्चतम न्यायालय के निर्णयों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के तहत एक जटिल अंतर-राज्यीय जल विवाद का विषय है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने लोकसभा में मेकेदाटू बांध परियोजना (Mekedatu Dam Project) पर अपने पहले के रुख को दोहराया है। केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री ने बताया कि उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के फरवरी 2018 के कावेरी विवाद पर दिए गए निर्णय में कर्नाटक को कावेरी नदी पर किसी भी प्रकार की संरचना के निर्माण के लिए तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी जैसे अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति प्राप्त करने का कोई उल्लेख नहीं है। यह बयान तमिलनाडु सरकार और किसानों के संगठनों द्वारा परियोजना के संभावित प्रभावों पर व्यक्त की गई चिंताओं के बाद आया है।
पृष्ठभूमि
- मेकेदाटू बांध परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु शहर की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना और बिजली उत्पादन करना है।
- तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध कर रहा है, यह तर्क देते हुए कि यह कावेरी डेल्टा क्षेत्र में पानी की उपलब्धता को प्रभावित करेगा और निचले तटवर्ती राज्यों को पानी के निर्धारित प्रवाह को बाधित करेगा।
- कावेरी नदी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं।
- कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) का गठन 1990 में किया गया था और इसने 2007 में अपना अंतिम अधिनिर्णय (Final Award) दिया, जिसमें राज्यों के बीच जल बंटवारे का निर्धारण किया गया।
- उच्चतम न्यायालय ने फरवरी 2018 में CWDT के अधिनिर्णय को संशोधित करते हुए एक निर्णय दिया, जिसमें कर्नाटक के हिस्से में पानी की मात्रा बढ़ाई गई और तमिलनाडु के हिस्से में कुछ कमी की गई।
- तमिलनाडु का तर्क है कि CWDT के अधिनिर्णय में एक खंड स्पष्ट रूप से ऊपरी तटवर्ती राज्यों को ऐसे किसी भी कार्य से रोकता है जो निचले तटवर्ती राज्यों को निर्धारित जल वितरण को प्रभावित करता है।
- केंद्र सरकार ने तमिलनाडु सरकार और किसानों के संगठनों से प्राप्त अभ्यावेदनों पर संज्ञान लिया है, जिसमें कावेरी डेल्टा पर परियोजना के संभावित प्रभाव और अन्य जिलों में पेयजल की उपलब्धता पर चिंता व्यक्त की गई है।
अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद और संवैधानिक प्रावधान
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
- इसी अनुच्छेद के तहत, संसद ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किया है।
- यह अधिनियम केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है, यदि संबंधित राज्य बातचीत के माध्यम से समाधान तक पहुंचने में विफल रहते हैं।
- एक बार जब न्यायाधिकरण अपना अधिनिर्णय देता है, तो वह अंतिम और संबंधित राज्यों पर बाध्यकारी होता है। इस अधिनिर्णय को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, जिसमें उच्चतम न्यायालय भी शामिल है, हालांकि उच्चतम न्यायालय ने अपने न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधिकार का प्रयोग करते हुए CWDT के अधिनिर्णय को संशोधित किया है।
- नदी जल विवादों में, ऊपरी तटवर्ती राज्य (Upper Riparian State) वह होता है जहाँ से नदी का उद्गम होता है या जो नदी के ऊपरी हिस्से में स्थित होता है, जबकि निचले तटवर्ती राज्य (Lower Riparian State) नदी के निचले हिस्से में स्थित होते हैं।
- जल एक राज्य सूची का विषय है, लेकिन अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास से संबंधित मामलों में संसद को कानून बनाने का अधिकार है, जैसा कि संघ सूची की प्रविष्टि 56 में उल्लिखित है।
- इन विवादों में अक्सर पेयजल, सिंचाई, बिजली उत्पादन और पर्यावरणीय प्रवाह जैसे मुद्दे शामिल होते हैं, जो राज्यों के बीच गंभीर तनाव पैदा कर सकते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मेकेदाटू बांध परियोजना | यह परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित है, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना है। |
| कावेरी जल विवाद | यह विवाद कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच कावेरी नदी के जल-बंटवारे को लेकर है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने इस पर फरवरी 2018 में फैसला सुनाया था। |
| निचले तटीय राज्यों की सहमति | केंद्र सरकार का मत है कि सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के फैसले में कर्नाटक को अन्य तटीय राज्यों की सहमति लेने का कोई उल्लेख नहीं है। |
| तमिलनाडु का विरोध | तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध कर रहा है, क्योंकि उसका मानना है कि यह कावेरी डेल्टा क्षेत्र में पेयजल उपलब्धता और विनियमित प्रवाह व्यवस्था को प्रभावित करेगा। |
| संसद में चर्चा | इस मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा दोनों में चर्चा हुई है, जिसमें केंद्र सरकार ने अपने रुख को दोहराया है। |
महत्व
संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
- यह मुद्दा भारत में संघवाद (Federalism) की जटिलताओं और अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के प्रबंधन में केंद्र सरकार की भूमिका को उजागर करता है।
- राज्यों के बीच जल-बंटवारे को लेकर असहमति केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकती है, जैसा कि इस मामले में देखा जा रहा है।
जल सुरक्षा और शहरीकरण
- बेंगलुरु जैसे तेजी से बढ़ते शहरी केंद्रों की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जल परियोजनाओं का महत्व बढ़ रहा है, लेकिन इससे निचले तटीय क्षेत्रों की जल सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
- यह शहरीकरण के दबाव और प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को दर्शाता है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- बांध परियोजनाओं का नदी पारिस्थितिकी (River Ecosystem) और डेल्टा क्षेत्रों पर महत्वपूर्ण पर्यावरणीय प्रभाव हो सकता है, जिसमें जैव विविधता (Biodiversity) और कृषि पर असर शामिल है।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) और सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांतों का पालन ऐसे परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
न्यायिक निर्णय और उनकी व्याख्या
- सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की व्याख्या को लेकर केंद्र और तमिलनाडु के बीच मतभेद न्यायिक निर्णयों के कार्यान्वयन की चुनौतियों को दर्शाता है।
- यह दर्शाता है कि न्यायिक निर्णयों के बाद भी अंतर-राज्यीय विवादों का समाधान हमेशा सीधा नहीं होता है।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय जल विवादों का प्रबंधन
- विभिन्न राज्यों के बीच जल-बंटवारे को लेकर सहमति बनाना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रत्येक राज्य अपने हितों को प्राथमिकता देता है।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के बावजूद, कार्यान्वयन और व्याख्या को लेकर मतभेद बने रहते हैं, जिससे विवादों का स्थायी समाधान मुश्किल हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
2. पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव
- बड़े बांधों के निर्माण से निचले तटीय क्षेत्रों में जल प्रवाह, कृषि, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- परियोजनाओं के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का निष्पक्ष आकलन तथा प्रभावित पक्षों की चिंताओं को दूर करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रभाव आकलन, सतत विकास
3. बढ़ती शहरी पेयजल मांग
- तेजी से शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि के कारण शहरों में पेयजल की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे नए जल स्रोतों की तलाश और मौजूदा संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।
- शहरी जल प्रबंधन और जल संरक्षण के प्रभावी उपायों की कमी इस चुनौती को और बढ़ाती है।
यूपीएससी लिंक: शहरीकरण, जल संसाधन प्रबंधन
4. राजनीतिकरण और जनमत
- अंतर-राज्यीय जल विवाद अक्सर राजनीतिक रंग ले लेते हैं, जिससे समाधान की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है तथा जनमत को प्रभावित किया जाता है।
- विभिन्न राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा अपने-अपने राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करना, राष्ट्रीय हित में एक साझा समाधान तक पहुंचने में बाधा डाल सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजनीति और शासन, लोक प्रशासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जल-बंटवारा विवाद | कावेरी नदी के जल-बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद। |
| निचले तटीय राज्यों की सहमति | तमिलनाडु का तर्क है कि मेकेदाटू परियोजना के लिए निचले तटीय राज्यों की सहमति आवश्यक है, जबकि केंद्र और कर्नाटक इससे असहमत हैं। |
| पेयजल उपलब्धता | तमिलनाडु को डर है कि इस परियोजना से कावेरी डेल्टा क्षेत्र में पेयजल की उपलब्धता प्रभावित होगी। |
| नियमित प्रवाह व्यवस्था | तमिलनाडु का आरोप है कि यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) के अंतिम अधिनिर्णय (Final Award) द्वारा स्थापित नियमित प्रवाह व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। |
| सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की व्याख्या | सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के फैसले में ‘सहमति’ के प्रावधानों की अलग-अलग व्याख्या। |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए एक निष्पक्ष और सर्व-स्वीकार्य मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए।
- सभी हितधारक राज्यों के बीच रचनात्मक संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए ताकि एक साझा समाधान तक पहुंचा जा सके।
- कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम अधिनिर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के प्रावधानों की स्पष्ट और सर्वमान्य व्याख्या सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- परियोजनाओं के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव आकलन को पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाना चाहिए और सभी प्रभावित पक्षों की चिंताओं को सुना जाना चाहिए।
- जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और जल पुनर्चक्रण (Water Recycling) जैसे वैकल्पिक जल प्रबंधन उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि नए बांधों पर निर्भरता कम हो।
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) जैसे मौजूदा कानूनी ढांचे को और अधिक प्रभावी बनाने पर विचार किया जा सकता है।
- तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग करके जल-बंटवारे के लिए वैज्ञानिक और डेटा-आधारित समाधान विकसित किए जाने चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मेकेदाटू बांध परियोजना · कावेरी जल विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद · संघवाद · सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय · कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण · अनुच्छेद 262 · जल शक्ति मंत्रालय · निचले तटवर्ती राज्य · ऊपरी तटवर्ती राज्य · पर्यावरण प्रभाव आकलन · सहकारी संघवाद
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: “राज्य सूची में ‘जल’ का विषय”}
अवधारणा प्रवाह
कर्नाटक द्वारा मेकेदाटू बांध परियोजना का प्रस्ताव। → परियोजना का उद्देश्य बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना। → तमिलनाडु द्वारा परियोजना का विरोध, जल प्रवाह पर प्रभाव की चिंता। → केंद्र सरकार का सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कर्नाटक के पक्ष में रुख। → संसद में इस मुद्दे पर चर्चा और केंद्र द्वारा अपने रुख को दोहराना। → अंतर-राज्यीय जल विवाद और संघवाद पर प्रभाव।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. मेकेदाटू बांध परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित है, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर किसी भी संरचना के निर्माण के लिए अन्य तटवर्ती राज्यों (तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी) की सहमति लेनी होगी।
3. अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानून के माध्यम से किया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। मेकेदाटू बांध परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रस्तावित है। कथन 2 गलत है। सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के निर्णय में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि कर्नाटक को अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति लेनी होगी। कथन 3 सही है। संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
Q2. अभिकथन (A): केंद्र सरकार ने मेकेदाटू बांध परियोजना पर कर्नाटक के रुख का समर्थन किया है, यह कहते हुए कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति का उल्लेख नहीं है।
कारण (R): कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम अधिनिर्णय में स्पष्ट रूप से ऊपरी तटवर्ती राज्यों को निचले तटवर्ती राज्यों को निर्धारित जल वितरण को प्रभावित करने वाली कोई भी कार्रवाई करने से प्रतिबंधित किया गया है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है। — अभिकथन (A) सत्य है। केंद्र सरकार ने लोकसभा में यही रुख दोहराया है। कारण (R) भी सत्य है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने इसी खंड का हवाला दिया है। हालांकि, कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं है, क्योंकि केंद्र सरकार का रुख सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में सहमति के उल्लेख न होने पर आधारित है, न कि न्यायाधिकरण के अधिनिर्णय के निषेधात्मक खंड पर।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में केंद्र सरकार की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। मेकेदाटू बांध परियोजना के संदर्भ में, इस तरह के विवादों में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के सिद्धांतों को बनाए रखने की चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए:
1. **अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का संवैधानिक ढाँचा:** अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 का उल्लेख।
2. **केंद्र सरकार की भूमिका:** न्यायाधिकरणों का गठन, उनके निर्णयों को लागू करना, मध्यस्थता और समन्वय स्थापित करना।
3. **मेकेदाटू बांध परियोजना का संदर्भ:** कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद का संक्षिप्त विवरण, केंद्र सरकार का वर्तमान रुख।
4. **सहकारी संघवाद के सिद्धांत:** साझा संसाधनों के प्रबंधन में राज्यों और केंद्र के बीच सहयोग, विश्वास और समन्वय का महत्व।
5. **चुनौतियाँ:** राजनीतिकरण, राज्यों के हितों का टकराव, न्यायाधिकरणों के निर्णयों को लागू करने में देरी, पर्यावरण संबंधी चिंताएं, पेयजल और सिंचाई की आवश्यकताओं का संतुलन।
6. **समाधान के सुझाव:** स्थायी तंत्र, डेटा साझाकरण, वैज्ञानिक मूल्यांकन, केंद्र की निष्पक्ष मध्यस्थता, राज्यों के बीच संवाद को बढ़ावा देना।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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