09 Aug तमिलनाडु में पहली बार मंगrove संरक्षण केंद्र मुजुकुत्तुराई में स्थापित होगा
Mangrove Conservation CentreShore Restoration InitiativeRamsar ConventionCoastal Ecosystem✎ तमिलनाडु का पहला मैंग्रोव संरक्षण केंद्र मुज़ुकुथुराई में स्थापित किया जा रहा है, जो मैंग्रोव संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर केंद्रित होगा, साथ ही रामसर अभिसमय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता | GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल)
- Prelims: मैंग्रोव वन, रामसर अभिसमय, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र, तमिलनाडु शोरलाइन रेस्टोरेशन इनिशिएटिव, पिचावरम मैंग्रोव, आर्द्रभूमि संरक्षण, जैव विविधता हॉटस्पॉट, जलवायु लचीलापन
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास, तटीय समुदायों का सशक्तिकरण और पारिस्थितिक पर्यटन
त्वरित पुनरावृत्ति: तमिलनाडु का पहला मैंग्रोव संरक्षण केंद्र मुज़ुकुथुराई में स्थापित किया जा रहा है, जो मैंग्रोव संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर केंद्रित होगा, साथ ही रामसर अभिसमय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को मजबूत करेगा।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले के मुज़ुकुथुराई में राज्य के पहले मैंग्रोव संरक्षण केंद्र की आधारशिला रखी गई है। यह केंद्र ₹26.50 करोड़ की अनुमानित लागत से तमिलनाडु शोरलाइन रेस्टोरेशन इनिशिएटिव (TN-SHORE) के तहत स्थापित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य मैंग्रोव संरक्षण, पारिस्थितिक बहाली, वैज्ञानिक अनुसंधान और जन जागरूकता को बढ़ावा देना है।
पृष्ठभूमि
- मैंग्रोव वन (Mangrove Forests) तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं, जो समुद्री और स्थलीय वातावरण के बीच एक अद्वितीय संक्रमण क्षेत्र बनाते हैं।
- ये वन तटीय कटाव को रोकने, तूफानों और सुनामी से बचाव करने, कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में मदद करने और विभिन्न समुद्री प्रजातियों के लिए नर्सरी मैदान प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- मैंग्रोव संरक्षण केंद्र रामसर अभिसमय (Ramsar Convention) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को मजबूत करेगा, जिसका उद्देश्य आर्द्रभूमियों (Wetlands) का संरक्षण और बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करना है।
- परियोजना के कार्यान्वयन में स्थानीय समुदायों के साथ व्यापक परामर्श शामिल था, जिसमें उनकी आजीविका संबंधी चिंताओं और बुनियादी ढांचे की मांगों को संबोधित किया गया।
- यह केंद्र वैज्ञानिक अनुसंधान, जैव विविधता संरक्षण, जलवायु लचीलापन (Climate Resilience), पर्यावरण शिक्षा और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देगा।
मैंग्रोव वन और उनका महत्व
- मैंग्रोव उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में खारे जल में उगने वाले झाड़ियाँ या छोटे पेड़ होते हैं।
- इनमें विशेष जड़ प्रणालियाँ होती हैं, जैसे प्रॉप रूट्स और न्यूमेटोफोर्स, जो उन्हें ऑक्सीजन-रहित मिट्टी और खारे पानी में जीवित रहने में मदद करती हैं।
- मैंग्रोव वन समुद्री जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं, जिनमें मछली, केकड़े, झींगे और विभिन्न पक्षी प्रजातियाँ शामिल हैं।
- ये तटीय क्षेत्रों को चक्रवातों, तूफानों और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाते हुए एक प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं।
- मैंग्रोव कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे वे महत्वपूर्ण कार्बन सिंक (Carbon Sinks) बन जाते हैं।
- भारत में, मैंग्रोव मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल (सुंदरबन), गुजरात, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- पिचावरम मैंग्रोव वन भारत के सबसे बड़े मैंग्रोव वनों में से एक है और अपनी अनूठी पारिस्थितिकी के लिए जाना जाता है।
- मैंग्रोव संरक्षण केंद्र जैसे पहल इन महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण और सतत प्रबंधन के लिए आवश्यक हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| पहला मैंग्रोव संरक्षण केंद्र | तमिलनाडु में मैंग्रोव पारिस्थितिकी प्रणालियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक समर्पित केंद्र। |
| स्थान | मुझुकुथुराई, किल्लई के पास, कुड्डालोर जिला। |
| अनुमानित लागत | ₹26.50 करोड़। |
| उद्देश्य | मैंग्रोव संरक्षण, पारिस्थितिक बहाली, वैज्ञानिक अनुसंधान, जन जागरूकता और तटीय पारिस्थितिकी प्रणालियों की सुरक्षा। |
| परावर्श | स्थानीय समुदाय और विभिन्न सरकारी विभागों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद स्थापित। |
| रामसर अभिसमय से जुड़ाव | भारत की रामसर अभिसमय (Ramsar Convention) और आर्द्रभूमि (wetland) संरक्षण प्रतिबद्धताओं को मजबूत करेगा। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र (Mangrove Ecosystem) का संरक्षण: यह केंद्र मैंग्रोव वनों की सुरक्षा और बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, जो तटीय क्षेत्रों को कटाव और तूफानों से बचाते हैं।
- जैव विविधता (Biodiversity) का संवर्धन: मैंग्रोव कई समुद्री और स्थलीय प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं, इसलिए यह केंद्र जैव विविधता के संरक्षण में सहायक होगा।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रति लचीलापन: मैंग्रोव कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है।
सामाजिक और आर्थिक
- स्थानीय आजीविका (Livelihood) का संवर्धन: केंद्र के माध्यम से विकसित होने वाला इको-टूरिज्म स्थानीय समुदायों के लिए आय के नए स्रोत प्रदान करेगा।
- जन जागरूकता और शिक्षा: यह केंद्र मैंग्रोव के महत्व के बारे में जनता को शिक्षित करेगा, जिससे संरक्षण प्रयासों में सामुदायिक भागीदारी बढ़ेगी।
- सतत विकास (Sustainable Development): यह परियोजना पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ और आर्थिक रूप से लाभकारी मॉडल को बढ़ावा देगी, जो स्थानीय लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाएगी।
वैज्ञानिक और अनुसंधान
- वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा: केंद्र मैंग्रोव पारिस्थितिकी पर गहन शोध के लिए एक मंच प्रदान करेगा, जिससे संरक्षण रणनीतियों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
- डेटा संग्रह और विश्लेषण: यह मैंग्रोव स्वास्थ्य, जैव विविधता और तटीय पारिस्थितिकी पर महत्वपूर्ण डेटा एकत्र करने और उसका विश्लेषण करने में सहायक होगा।
चुनौतियाँ
1. स्थानीय समुदाय की चिंताएँ
- परियोजना के प्रारंभिक चरणों में स्थानीय लोगों की आजीविका और विस्थापन को लेकर चिंताएँ थीं।
- समुदाय ने सौर स्ट्रीटलाइट, पेयजल सुविधाएँ और इको-टूरिज्म से संबंधित बुनियादी ढाँचे की मांग की।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
2. कार्यान्वयन चुनौतियाँ
- विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना एक चुनौती थी।
- परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण और अन्य प्रशासनिक बाधाएँ भी सामने आईं।
यूपीएससी लिंक: शासन, विकास प्रक्रियाएँ
3. पर्यावरणीय संवेदनशीलता
- पोटेंशियल इको-टूरिज्म से पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का जोखिम।
- संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| स्थानीय आजीविका | परियोजना से स्थानीय मछुआरों और अन्य समुदायों की पारंपरिक आजीविका पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव। |
| बुनियादी ढाँचे की कमी | समुदाय द्वारा पेयजल, सौर स्ट्रीटलाइट और इको-टूरिज्म से संबंधित बुनियादी ढाँचे की मांग। |
| पारिस्थितिक संतुलन | संरक्षण केंद्र और इको-टूरिज्म गतिविधियों के कारण संवेदनशील मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले संभावित दबाव। |
| हितधारक समन्वय | परियोजना के सफल कार्यान्वयन के लिए विभिन्न सरकारी विभागों और स्थानीय समुदायों के बीच प्रभावी समन्वय की आवश्यकता। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- तमिलनाडु शोरलाइन रेस्टोरेशन इनिशिएटिव (Tamil Nadu Shoreline Restoration Initiative – TN-SHORE)
आगे की राह
- स्थानीय समुदायों को परियोजना के लाभों में सक्रिय रूप से शामिल करना और उनकी आजीविका के अवसरों को बढ़ाना।
- मैंग्रोव संरक्षण और सतत इको-टूरिज्म के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखना।
- वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना ताकि मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र की बेहतर समझ विकसित हो सके।
- जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना ताकि मैंग्रोव के महत्व के बारे में लोगों को शिक्षित किया जा सके।
- विभिन्न सरकारी विभागों, गैर-सरकारी संगठनों और स्थानीय समुदायों के बीच प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करना।
- रामसर अभिसमय और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप आर्द्रभूमि संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करना।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए मैंग्रोव की भूमिका को उजागर करना और उसे बढ़ावा देना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मैंग्रोव संरक्षण · तटीय पारिस्थितिकी तंत्र · रामसर अभिसमय · आर्द्रभूमि संरक्षण · जलवायु प्रत्यास्थता · जैव विविधता संरक्षण · सामुदायिक भागीदारी · सतत विकास · पर्यावरण शिक्षा · तटीय पारिस्थितिकी बहाली
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48क’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51क (छ)’, ‘note’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार’}
अवधारणा प्रवाह
मैंग्रोव वनों का महत्व (तटीय सुरक्षा, जैव विविधता) → तमिलनाडु में मैंग्रोव संरक्षण की आवश्यकता → मैंग्रोव संरक्षण केंद्र की स्थापना → वैज्ञानिक अनुसंधान, जन जागरूकता और इको-टूरिज्म → स्थानीय आजीविका में सुधार और पारिस्थितिक संतुलन → रामसर अभिसमय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे तूफान और सुनामी से बचाव प्रदान करते हैं।
2. भारत में मैंग्रोव वन केवल पूर्वी तट पर पाए जाते हैं।
3. रामसर अभिसमय (Ramsar Convention) आर्द्रभूमि (Wetlands) के संरक्षण से संबंधित एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि मैंग्रोव तटीय क्षेत्रों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि भारत में मैंग्रोव वन पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटों पर पाए जाते हैं। कथन 3 सही है क्योंकि रामसर अभिसमय आर्द्रभूमि के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
Q2. अभिकथन (A): मैंग्रोव संरक्षण केंद्र तटीय समुदायों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी हो सकते हैं।
कारण (R): ये केंद्र सतत इको-पर्यटन (Eco-tourism) और स्थानीय आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देते हैं।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि मैंग्रोव संरक्षण केंद्र इको-पर्यटन के माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकते हैं। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि इको-पर्यटन और आजीविका के अवसर ही इन केंद्रों को आर्थिक रूप से लाभकारी बनाते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी के महत्व का परीक्षण कीजिए। भारत में तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों की सुरक्षा में इस तरह के प्रयासों की सफलता सुनिश्चित करने के लिए किन चुनौतियों का समाधान किया जाना चाहिए? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्रों का संक्षिप्त परिचय और उनके महत्व पर प्रकाश डालें (तटीय सुरक्षा, जैव विविधता, कार्बन पृथक्करण)।
2. **सामुदायिक भागीदारी का महत्व:**
* **स्थानीय ज्ञान:** पारंपरिक ज्ञान का उपयोग।
* **स्वामित्व की भावना:** संरक्षण प्रयासों में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी से परियोजना की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित होती है।
* **आजीविका एकीकरण:** संरक्षण को स्थानीय आजीविका से जोड़ना (जैसे सतत मत्स्य पालन, इको-पर्यटन)।
* **संघर्ष समाधान:** स्थानीय चिंताओं और जरूरतों को संबोधित करना (तमिलनाडु के मुज़ुकुथुरई केंद्र का उदाहरण)।
* **प्रभावी निगरानी:** स्थानीय समुदायों द्वारा अनधिकृत गतिविधियों की निगरानी।
3. **चुनौतियाँ और समाधान:**
* **जागरूकता की कमी:** पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों का अभाव।
* **आजीविका पर निर्भरता:** मैंग्रोव संसाधनों पर स्थानीय समुदायों की अत्यधिक निर्भरता।
* **भूमि अधिकार और विस्थापन:** संरक्षण क्षेत्रों के सीमांकन से संबंधित मुद्दे।
* **संस्थागत समन्वय:** विभिन्न सरकारी विभागों (वन, राजस्व, पुलिस) और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय की कमी।
* **वित्तीय संसाधन:** संरक्षण परियोजनाओं के लिए पर्याप्त और सतत वित्तपोषण का अभाव।
* **जलवायु परिवर्तन के प्रभाव:** समुद्र के बढ़ते स्तर और चरम मौसमी घटनाओं से मैंग्रोव पर खतरा।
4. **आगे की राह:** नीतिगत हस्तक्षेप, क्षमता निर्माण, वैकल्पिक आजीविका के अवसर, बहु-हितधारक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना।
5. **निष्कर्ष:** मैंग्रोव संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी के महत्व को दोहराते हुए एक समग्र और समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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