23 Sep सर्वोच्च न्यायालय ने सीईसी और ईसी की नियुक्ति संबंधी कानून को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा

✎ सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता की जाँच के लिए याचिकाओं को पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा है, जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना। | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघवाद से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ। | GS Paper II — विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।
- Prelims: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC), चुनाव आयुक्त (EC), भारत का चुनाव आयोग, संविधान पीठ, अनुच्छेद 324, न्यायिक समीक्षा, कार्यकारी हस्तक्षेप, संवैधानिक निकाय
- Essay: भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव: चुनौतियाँ और समाधान, संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता और लोकतंत्र का भविष्य
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता की जाँच के लिए याचिकाओं को पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा है, जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए महत्त्वपूर्ण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners – ECs) की नियुक्ति से संबंधित 2023 के एक कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Constitution Bench) के पास भेज दिया है। यह निर्णय इस कानून की संवैधानिक वैधता और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर इसके संभावित प्रभावों के संबंध में महत्त्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- दिसंबर 2023 में, संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 (Chief Election Commissioner and other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023) पारित किया।
- इस अधिनियम ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदल दिया, जिसमें अब प्रधानमंत्री (Prime Minister), केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (Union Cabinet Minister) और लोकसभा में विपक्ष के नेता (Leader of Opposition in Lok Sabha) वाली एक चयन समिति (Selection Committee) शामिल है।
- इससे पहले, मार्च 2023 में, सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सलाह पर की जानी चाहिए, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India – CJI) शामिल हों।
- नए कानून ने सर्वोच्च न्यायालय के मार्च 2023 के फैसले में CJI को चयन समिति से हटा दिया, जिससे सरकार का प्रभाव बढ़ गया।
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि यह नया कानून चुनाव आयोग (Election Commission) की स्वतंत्रता को कमजोर करता है और कार्यपालिका (Executive) को नियुक्तियों पर अनुचित नियंत्रण प्रदान करता है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के सिद्धांतों के खिलाफ है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने अब इन याचिकाओं को एक बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा है ताकि कानून की संवैधानिक वैधता और इसके निहितार्थों की गहन जाँच की जा सके।
भारत का चुनाव आयोग क्या है?
- भारत का चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय (Autonomous Constitutional Body) है जो भारत में संघ और राज्य चुनाव प्रक्रियाओं के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है।
- यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 (Article 324) के तहत स्थापित किया गया था।
- इसका मुख्य कार्य संसद, राज्य विधानसभाओं, भारत के राष्ट्रपति (President of India) और भारत के उपराष्ट्रपति (Vice-President of India) के चुनावों का अधीक्षण (Superintendence), निर्देशन (Direction) और नियंत्रण (Control) करना है।
- चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और उतने अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं जितने राष्ट्रपति समय-समय पर निर्धारित करें। वर्तमान में, इसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त शामिल हैं।
- मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है। वे 6 वर्ष की अवधि के लिए या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, पद धारण करते हैं।
- मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही प्रक्रिया और आधार पर पद से हटाया जा सकता है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
- चुनाव आयोग की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से आयोजित हों।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति पर 2023 का कानून | यह कानून चुनाव आयोग (Election Commission) के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करता है, जो भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए महत्वपूर्ण है। |
| सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती | कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जिसमें नियुक्तियों में कार्यपालिका के कथित प्रभाव पर चिंता व्यक्त की गई है। |
| पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा गया | यह दर्शाता है कि मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं, जिसके लिए सर्वोच्च न्यायालय की एक बड़ी पीठ द्वारा विचार की आवश्यकता है। |
| न्यायाधीशों का विभाजित फैसला | दो-न्यायाधीशों की पीठ के बीच प्रारंभिक असहमति ने मामले की जटिलता को उजागर किया, लेकिन अंततः इसे संविधान पीठ को भेजा गया ताकि और देरी से बचा जा सके। |
| एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य याचिकाएँ | ये याचिकाएँ लोकतांत्रिक सुधारों और चुनावी अखंडता को बनाए रखने के लिए नागरिक समाज और राजनीतिक नेताओं की चिंता को दर्शाती हैं। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- चुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है। इसकी संरचना और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया का लोकतंत्र की अखंडता पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
- यह मामला चुनाव आयोग की स्वायत्तता और स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, जो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए आवश्यक है।
संवैधानिक महत्व
- यह मामला संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की शक्तियों और नियुक्तियों से संबंधित प्रावधानों की व्याख्या से जुड़ा है।
- सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय कार्यपालिका और स्वतंत्र संवैधानिक निकायों के बीच शक्ति संतुलन पर दूरगामी प्रभाव डालेगा।
शासन और पारदर्शिता
- नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना सुशासन (Good Governance) का एक महत्वपूर्ण पहलू है। इस मामले का परिणाम भविष्य में अन्य संवैधानिक निकायों की नियुक्तियों के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है।
- यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के सिद्धांत को भी मजबूत करता है, जहां न्यायपालिका कानूनों की संवैधानिक वैधता की जांच करती है।
चुनौतियाँ
1. चुनाव आयोग की स्वतंत्रता
- नए कानून में मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति से बाहर करने से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ने की आशंका है।
- यह चुनाव आयोग की निर्णय लेने की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: संवैधानिक निकाय
2. शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत
- याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह कार्यपालिका को चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर अधिक नियंत्रण देता है।
- यह लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: बुनियादी संरचना
3. संवैधानिक नैतिकता
- संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय के रूप में परिकल्पित किया था। नए कानून की वैधता संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) के सिद्धांतों पर भी परखी जाएगी।
- यह सुनिश्चित करना कि संवैधानिक निकाय अपने कर्तव्यों का निर्वहन बिना किसी बाहरी दबाव के करें, अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: संवैधानिक सिद्धांत
4. न्यायिक मिसाल
- सर्वोच्च न्यायालय ने पहले एक अंतरिम व्यवस्था दी थी जिसमें CJI को चयन समिति में शामिल किया गया था। नए कानून द्वारा इस व्यवस्था को पलटना न्यायिक मिसाल (Judicial Precedent) के सम्मान पर सवाल उठाता है।
- यह विधायिका और न्यायपालिका के बीच संबंधों को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय न्यायपालिका: सर्वोच्च न्यायालय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति | चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाने से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। |
| कार्यपालिका का नियंत्रण | नए कानून के तहत, चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल हैं, जिससे सरकार को बहुमत प्राप्त होता है और नियुक्तियों पर अधिक नियंत्रण मिलता है। |
| स्वायत्तता का क्षरण | चुनाव आयोग जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप से उसकी स्वायत्तता और निष्पक्षता का क्षरण हो सकता है। |
| लोकतांत्रिक अखंडता | स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की नींव होते हैं। चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी लोकतांत्रिक अखंडता पर सवाल उठा सकती है। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मामले की त्वरित सुनवाई और स्पष्ट संवैधानिक व्याख्या प्रदान करना।
- चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए एक संतुलित नियुक्ति तंत्र विकसित करना।
- नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और व्यापक परामर्श को बढ़ावा देना।
- संवैधानिक निकायों की नियुक्तियों में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच उचित संतुलन बनाए रखना।
- भविष्य में ऐसे कानूनों के निर्माण में सभी हितधारकों, विशेषकर विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श करना।
- संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना।
- न्यायिक समीक्षा के माध्यम से संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान सुनिश्चित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मुख्य चुनाव आयुक्त · चुनाव आयुक्त · नियुक्ति प्रक्रिया · भारत निर्वाचन आयोग · संवैधानिक निकाय · कार्यकारी हस्तक्षेप · न्यायिक समीक्षा · शक्तियों का पृथक्करण · स्वतंत्रता और निष्पक्षता · संवैधानिक पीठ
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 324’, ‘note’: ‘चुनाव आयोग का गठन और कार्य’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
अवधारणा प्रवाह
2023 में CEC और ECs की नियुक्ति पर नया कानून बना। → इस कानून ने चयन समिति से CJI को हटाया। → याचिकाकर्ताओं ने कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। → याचिकाओं में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर चिंता व्यक्त की गई। → सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा। → संविधान पीठ कानून की संवैधानिक वैधता की जांच करेगी। → निर्णय का चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर प्रभाव पड़ेगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) से संबंधित है।
2. मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
3. वर्ष 2023 के कानून के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग के गठन और कार्यों से संबंधित है, और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। कथन 3 गलत है क्योंकि 2023 के कानून में चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) के स्थान पर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है।
Q2. अभिकथन (A): भारत निर्वाचन आयोग एक स्थायी और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है।
कारण (R): निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, परन्तु R गलत है।
- A गलत है, परन्तु R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसकी स्थापना संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत की गई है। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान होने से आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने में मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। हालिया विधायी परिवर्तनों के संदर्भ में इस पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** भारत निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324) की संवैधानिक स्थिति और लोकतंत्र में इसकी भूमिका का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **नियुक्ति प्रक्रिया का महत्व:** आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने में नियुक्ति प्रक्रिया की केंद्रीय भूमिका पर प्रकाश डालें।
3. **पूर्व की स्थिति:** 2023 के कानून से पहले की स्थिति का उल्लेख करें (मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति, जिसमें कोई विशिष्ट चयन समिति नहीं थी)।
4. **सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ, 2023):** सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का उल्लेख करें, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली चयन समिति की सिफारिश का प्रावधान किया गया था।
5. **2023 का नया कानून:** ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ के प्रावधानों का विस्तार से वर्णन करें, विशेषकर चयन समिति की संरचना में बदलाव (भारत के मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का शामिल होना)।
6. **समालोचनात्मक परीक्षण और संभावित प्रभाव:**
* **सकारात्मक पक्ष (यदि कोई हो):** सरकार का तर्क कि यह संसद की संप्रभुता को दर्शाता है।
* **नकारात्मक पक्ष/चिंताएँ:** कार्यकारी प्रभाव में वृद्धि की संभावना, आयोग की स्वायत्तता पर संभावित प्रभाव, ‘शक्तियों के पृथक्करण’ के सिद्धांत का उल्लंघन, और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के निर्णय की भावना के विपरीत होना।
* **न्यायिक समीक्षा:** सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस कानून को संवैधानिक पीठ को संदर्भित करने का महत्व।
7. **निष्कर्ष:** एक स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन आयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए, नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्ति सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दें।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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