11 Aug लोकसभा में गतिरोध जारी, बिना चर्चा दो विधेयकों को पारित किया गया

✎ किसी राज्य का नाम बदलने का अधिकार संसद के पास अनुच्छेद 3 के तहत है, और ऐसे विधेयक को साधारण बहुमत से पारित किया जाता है, जिसमें राज्य विधानमंडल की राय बाध्यकारी नहीं होती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – संसद और राज्य विधानमंडल – संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय। | GS Paper II — भारतीय संविधान – संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ।
- Prelims: संसद की कार्यवाही, राज्य का नाम परिवर्तन, अनुच्छेद 3, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम, धन विधेयक, साधारण विधेयक, संसदीय गतिरोध, लोकसभा स्पीकर, ध्वनि मत
- Essay: भारतीय लोकतंत्र में संसदीय कार्यवाही की चुनौतियाँ और उनका समाधान, संघवाद और राज्यों की स्वायत्तता: संवैधानिक प्रावधानों का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: किसी राज्य का नाम बदलने का अधिकार संसद के पास अनुच्छेद 3 के तहत है, और ऐसे विधेयक को साधारण बहुमत से पारित किया जाता है, जिसमें राज्य विधानमंडल की राय बाध्यकारी नहीं होती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, लोकसभा में जारी गतिरोध के बीच बिना किसी चर्चा के दो विधेयक पारित किए गए। इनमें से एक विधेयक केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने से संबंधित था, जबकि दूसरा राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक, 2026 था। इस घटनाक्रम ने संसदीय कार्यवाही, विधायी प्रक्रिया और राज्य के नाम परिवर्तन से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर ध्यान आकर्षित किया है।
पृष्ठभूमि
- संसद में गतिरोध के कारण कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं, जिससे विधायी गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
- किसी राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत निर्धारित की गई है, जो संसद को यह शक्ति प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) एक सांविधिक निकाय है जो सहकारी क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देता है। इसके संशोधन विधेयक का उद्देश्य इस क्षेत्र को और मजबूत करना है।
- संसदीय कार्यवाही में व्यवधान भारत में एक सामान्य घटना बन गई है, जिससे महत्वपूर्ण विधायी कार्यों में बाधा आती है और सार्वजनिक धन का अपव्यय होता है।
- ध्वनि मत (voice vote) के माध्यम से विधेयक पारित करना एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन जब यह बिना किसी चर्चा के होता है, तो यह लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध माना जा सकता है।
राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया और संसदीय कार्यवाही
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह किसी भी राज्य का नाम बदल सकती है।
- राज्य का नाम बदलने से संबंधित विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- विधेयक प्रस्तुत करने से पहले, राष्ट्रपति को संबंधित राज्य विधानमंडल को विधेयक पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा के भीतर भेजना होता है।
- राज्य विधानमंडल के विचार संसद पर बाध्यकारी नहीं होते हैं; संसद उन्हें स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
- संसद में, ऐसे विधेयक को साधारण बहुमत (simple majority) से पारित किया जाता है, यानी सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के 50 प्रतिशत से अधिक मतों से।
- संसदीय गतिरोध तब उत्पन्न होता है जब विपक्षी दल किसी मुद्दे पर सरकार से असहमति के कारण सदन की कार्यवाही को बाधित करते हैं।
- लोकसभा स्पीकर (Lok Sabha Speaker) सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं और उन्हें सदन में व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति प्राप्त है।
- ध्वनि मत एक प्रक्रिया है जिसमें अध्यक्ष विधेयक के पक्ष और विपक्ष में ‘हाँ’ या ‘नहीं’ कहने के लिए सदस्यों से पूछते हैं, और बहुमत की आवाज के आधार पर निर्णय लेते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्य का नाम परिवर्तन | किसी राज्य के नाम में परिवर्तन भारतीय संघवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो सांस्कृतिक पहचान और भाषाई संवेदनशीलता को दर्शाता है। |
| सहकारी क्षेत्र में संशोधन | सहकारी क्षेत्र भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसमें संशोधन से इसकी कार्यप्रणाली, वित्तपोषण और शासन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। |
| संसदीय गतिरोध | संसदीय कार्यवाही में गतिरोध विधायी कार्यों को बाधित करता है, जिससे महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा और जांच की प्रक्रिया प्रभावित होती है, जो लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। |
| बिना चर्चा के विधेयक पारित | बिना पर्याप्त चर्चा के विधेयकों का पारित होना संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत है, क्योंकि यह विधायी जांच, बहस और सार्वजनिक जवाबदेही को कमजोर करता है। |
| सदन का स्थगन | बार-बार सदन का स्थगन संसद के बहुमूल्य समय और सार्वजनिक धन की बर्बादी का कारण बनता है, साथ ही विधायी एजेंडे को भी बाधित करता है। |
महत्व
विधायी प्रक्रिया पर प्रभाव
- संसदीय गतिरोध के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा और बहस नहीं हो पाती है, जिससे विधायी गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- बिना चर्चा के विधेयकों का पारित होना संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों, जैसे विचार-विमर्श और जवाबदेही, को कमजोर करता है।
संघवाद और राज्य की पहचान
- राज्य का नाम बदलने का विधेयक संघवाद के तहत राज्यों की पहचान और स्वायत्तता के महत्व को रेखांकित करता है।
- यह प्रक्रिया केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक संबंधों को भी दर्शाती है, विशेषकर अनुच्छेद 3 के तहत।
सहकारी क्षेत्र का महत्व
- राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक, 2026 सहकारी समितियों के माध्यम से ग्रामीण विकास और कृषि क्षेत्र को मजबूत करने के सरकार के प्रयासों को दर्शाता है।
- सहकारी क्षेत्र भारत में लाखों लोगों की आजीविका और सामाजिक-आर्थिक उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही
- संसद में गतिरोध और चर्चा की कमी सरकार की जवाबदेही को कम करती है, क्योंकि विपक्ष को मुद्दों पर सवाल उठाने और सरकार से जवाब मांगने का अवसर नहीं मिलता।
- यह नागरिकों के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि उनके प्रतिनिधियों को विधायी प्रक्रिया में भाग लेने का पूरा अवसर नहीं मिलता।
चुनौतियाँ
1. संसदीय कार्यवाही में बाधा
- बार-बार होने वाला गतिरोध और व्यवधान संसद के कामकाज को बाधित करता है, जिससे विधायी कार्य और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर चर्चा प्रभावित होती है।
- यह संसद के समय और संसाधनों की बर्बादी का कारण बनता है, जिसका उपयोग महत्वपूर्ण नीतियों और कानूनों पर विचार-विमर्श के लिए किया जा सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संसद और उसकी कार्यप्रणाली
2. विधायी जांच का अभाव
- बिना चर्चा के विधेयकों का पारित होना उनकी गहन जांच और संभावित कमियों की पहचान को रोकता है।
- यह सुनिश्चित करता है कि कानून बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के पारित हो जाएं, जिससे उनकी प्रभावशीलता और वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: संसदीय समितियाँ और विधायी प्रक्रिया
3. लोकतांत्रिक सिद्धांतों का क्षरण
- बहस, विचार-विमर्श और असहमति संसदीय लोकतंत्र के आधार स्तंभ हैं। इनका अभाव लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है।
- यह सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता को भी प्रभावित करता है, क्योंकि विपक्ष को अपनी भूमिका निभाने का अवसर नहीं मिलता।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: लोकतांत्रिक सिद्धांत
4. जनता के प्रतिनिधित्व पर प्रभाव
- जब सांसद विरोध प्रदर्शनों के कारण चर्चा में भाग नहीं ले पाते, तो वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों की चिंताओं और विचारों को प्रभावी ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते।
- यह नागरिकों के विश्वास को कम कर सकता है कि उनकी आवाज संसद में सुनी जा रही है।
यूपीएससी लिंक: संसद में प्रतिनिधित्व और जवाबदेही
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| संसदीय गतिरोध | विधायी कार्यों में देरी और महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा का अभाव। |
| बिना चर्चा के विधेयक पारित | कानूनों की गुणवत्ता और प्रभावशीलता पर समझौता, लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी। |
| राज्य के नाम परिवर्तन की प्रक्रिया | संवैधानिक प्रावधानों के तहत राज्यों की पहचान और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रबंधन। |
| सहकारी क्षेत्र का विनियमन | ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रभावी शासन और विकास सुनिश्चित करना। |
| सदन का बार-बार स्थगन | सार्वजनिक धन और संसद के बहुमूल्य समय की बर्बादी, विधायी एजेंडे में बाधा। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (National Co-operative Development Corporation)
आगे की राह
- संसदीय कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच रचनात्मक संवाद और आम सहमति स्थापित करना।
- अध्यक्ष/सभापति की भूमिका को मजबूत करना ताकि वे सदन में व्यवस्था बनाए रखने और सभी सदस्यों को बोलने का अवसर प्रदान करने में अधिक प्रभावी हों।
- विधेयकों को स्थायी समितियों को भेजने की प्रथा को बढ़ावा देना ताकि गहन जांच और विचार-विमर्श सुनिश्चित किया जा सके, भले ही सदन में चर्चा का समय सीमित हो।
- संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करना ताकि गतिरोध की स्थिति में भी विधायी कार्य को आगे बढ़ाने के लिए तंत्र विकसित किए जा सकें।
- सांसदों के लिए आचार संहिता को मजबूत करना और सदन के भीतर गरिमापूर्ण व्यवहार को बढ़ावा देना।
- जनता को संसदीय कार्यवाही के महत्व और व्यवधानों के परिणामों के बारे में शिक्षित करना ताकि सार्वजनिक दबाव के माध्यम से बेहतर व्यवहार को प्रोत्साहित किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संसदीय प्रक्रियाएँ · विधेयक पारित करना · संसदीय गतिरोध · राज्य का नाम परिवर्तन · सहकारी क्षेत्र · लोकतांत्रिक बहस · अधिनियमन प्रक्रिया · संसद की भूमिका · संवैधानिक संशोधन · विधायी कामकाज
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 3: नए राज्यों का निर्माण और मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन।
- अनुच्छेद 118: संसद की प्रक्रिया के नियम बनाने की शक्ति।
- अनुच्छेद 122: न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाही की जांच न किया जाना।
अवधारणा प्रवाह
संसदीय गतिरोध और व्यवधान → विधेयकों पर चर्चा का अभाव → बिना बहस के विधेयकों का पारित होना → विधायी जांच और जवाबदेही में कमी → लोकतांत्रिक सिद्धांतों का क्षरण और शासन की गुणवत्ता पर प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत में किसी राज्य के नाम में परिवर्तन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी राज्य का नाम बदलने का विधेयक केवल भारत के राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश पर ही संसद में पेश किया जा सकता है।
2. ऐसे विधेयक को संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक है।
3. राज्य के नाम में परिवर्तन से संबंधित विधेयक पर संबंधित राज्य विधानमंडल की सहमति अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 3 के तहत किसी राज्य के नाम में परिवर्तन से संबंधित विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश पर ही संसद में पेश किया जा सकता है। कथन 2 सही है। ऐसे विधेयक को संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से पारित किया जाता है। कथन 3 गलत है। संबंधित राज्य विधानमंडल की सहमति अनिवार्य नहीं है; संसद उनके विचारों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
Q2. अभिकथन (A): संसदीय कार्यवाही में गतिरोध के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों को बिना चर्चा के पारित किया जा सकता है।
कारण (R): भारत के संविधान के अनुसार, बिना चर्चा के पारित विधेयक अमान्य होते हैं।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A सत्य है, लेकिन R असत्य है। — अभिकथन (A) सत्य है, जैसा कि हाल की घटनाओं से पता चलता है जहां गतिरोध के कारण विधेयक बिना चर्चा के पारित किए गए। कारण (R) असत्य है। भारत के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो बिना चर्चा के पारित विधेयक को अमान्य ठहराता हो। विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन चर्चा की अनुपस्थिति उसे स्वतः अमान्य नहीं करती।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संसदीय कार्यवाही में गतिरोध के कारण विधेयकों को बिना चर्चा के पारित करने की प्रवृत्ति भारतीय लोकतंत्र के लिए क्या निहितार्थ रखती है? चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना: परिचय में संसदीय गतिरोध और बिना चर्चा के विधेयक पारित होने की हालिया प्रवृत्ति का उल्लेख करें। मुख्य भाग में, इसके निहितार्थों पर चर्चा करें: 1. लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रभाव (बहस, विचार-विमर्श का अभाव)। 2. विधायी गुणवत्ता पर प्रभाव (खामियों की संभावना)। 3. जवाबदेही में कमी (सरकार और विपक्ष दोनों की)। 4. संघवाद पर प्रभाव (राज्य के नाम परिवर्तन जैसे मामलों में)। 5. संसदीय सर्वोच्चता और कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न। 6. जनता के विश्वास पर प्रभाव। निष्कर्ष में, इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए उपायों का सुझाव दें, जैसे सर्वसम्मति निर्माण, नियमों का पालन और रचनात्मक विपक्ष की भूमिका।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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