कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, कावेरी जल विवाद में 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने के आदेश पर

Cauvery: Karnataka will approach Supreme Court, says Cheluvarayaswamy — labelled illustration

कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, कावेरी जल विवाद में 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने के आदेश पर

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✎ भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 262) और संसदीय कानूनों (अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956) के माध्यम से स्थापित न्यायाधिकरणों और प्रबंधन प्राधिकरणों द्वारा किया जाता है, जिनके निर्णयों…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ  |  GS Paper II — विभिन्न घटकों के बीच विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ
  • Prelims: कावेरी जल विवाद, अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956, अंतर-राज्यीय जल विवाद न्यायाधिकरण, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA), कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC), अनुच्छेद 262, अनुच्छेद 131, सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार
  • Essay: भारत में संघीय ढाँचे की चुनौतियाँ और सहकारी संघवाद का महत्त्व, जल संसाधन प्रबंधन: विवाद से सहयोग की ओर

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 262) और संसदीय कानूनों (अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956) के माध्यम से स्थापित न्यायाधिकरणों और प्रबंधन प्राधिकरणों द्वारा किया जाता है, जिनके निर्णयों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, कर्नाटक सरकार ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (Cauvery Water Management Authority – CWMA) के उस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का रुख करने का निर्णय लिया है, जिसमें कावेरी जल विनियमन समिति (Cauvery Water Regulation Committee – CWRC) द्वारा तमिलनाडु को 15 दिनों के लिए 12,000 क्यूसेक प्रतिदिन की दर से पानी छोड़ने के निर्देश को बरकरार रखा गया था। कर्नाटक का तर्क है कि राज्य में पीने के पानी की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, विशेषकर मानसून के शेष भाग में कम वर्षा के पूर्वानुमान को देखते हुए।

पृष्ठभूमि

  • कावेरी नदी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं।
  • यह विवाद मुख्य रूप से कावेरी नदी के जल के बँटवारे को लेकर है, जिसका उपयोग सिंचाई, पीने के पानी और बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है।
  • विवाद की जड़ें ब्रिटिश काल में मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच हुए समझौतों में निहित हैं।
  • भारत की स्वतंत्रता के बाद, यह विवाद विभिन्न राज्यों के बीच जारी रहा, जिससे कई बार तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई।
  • केंद्र सरकार ने 1990 में अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State Water Disputes Act, 1956) के तहत कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) का गठन किया।
  • न्यायाधिकरण ने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया, जिसमें विभिन्न राज्यों के लिए जल आवंटन निर्धारित किया गया। इस निर्णय को बाद में सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में न्यायाधिकरण के निर्णय को संशोधित किया और केंद्र सरकार को कावेरी जल प्रबंधन योजना अधिसूचित करने का निर्देश दिया, जिसके परिणामस्वरूप कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन हुआ।

अंतर-राज्यीय जल विवादों का संवैधानिक एवं संस्थागत समाधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 (Article 262) संसद को कानून द्वारा अंतर-राज्यीय नदी घाटियों या नदियों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने का अधिकार देता है।
  • इसी अनुच्छेद के तहत, संसद ने दो कानून बनाए हैं: नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956) और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956।
  • अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है। इस न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम और सभी संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction), जो आमतौर पर राज्यों के बीच विवादों को सुलझाता है (अनुच्छेद 131), अंतर-राज्यीय जल विवादों पर लागू नहीं होता है यदि संसद कानून द्वारा अन्यथा प्रावधान करती है, जैसा कि अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम में किया गया है।
  • कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर किया गया था ताकि कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार जल के बँटवारे और विनियमन को सुनिश्चित किया जा सके।
  • CWMA कावेरी बेसिन में जल के प्रबंधन, विनियमन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है, जबकि CWRC जल की उपलब्धता और आवश्यकता के आधार पर दैनिक या साप्ताहिक आधार पर जल छोड़ने की निगरानी और निर्देश देती है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
कावेरी जल विवाद यह भारत के सबसे पुराने और जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं।
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ये निकाय कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) द्वारा निर्धारित योजना के अनुसार जल वितरण को विनियमित करने और निगरानी करने के लिए स्थापित किए गए हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका अंतर-राज्यीय जल विवादों में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका निर्णायक होती है, खासकर जब वैधानिक निकायों के निर्णय विवादित हों।
जल संकट की स्थिति कम वर्षा और सूखे जैसी स्थितियों में जल वितरण का मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो जाता है, जिससे राज्यों के बीच तनाव बढ़ता है।
पेयजल बनाम कृषि जल संकट की स्थिति में, पेयजल की आवश्यकता को प्राथमिकता देना एक महत्वपूर्ण मानवीय और नीतिगत विचार है, जो अक्सर कृषि आवश्यकताओं के साथ संघर्ष करता है।

महत्व

राजव्यवस्था और शासन

  • यह मामला अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में संघीय ढांचे और न्यायिक हस्तक्षेप की जटिलताओं को उजागर करता है।
  • यह दर्शाता है कि कैसे वैधानिक निकायों (जैसे CWMA) के निर्णय भी राज्यों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिए जा सकते हैं, जो न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के महत्व को रेखांकित करता है।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

  • जल की कमी से कृषि उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित होती है और खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है।
  • पेयजल की कमी शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में गंभीर सामाजिक समस्याएं पैदा कर सकती है, जिससे स्वास्थ्य और स्वच्छता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

पर्यावरण

  • जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून पैटर्न जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं, जिससे ऐसे विवादों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।
  • नदी बेसिन प्रबंधन और जल संरक्षण की आवश्यकता को यह मामला रेखांकित करता है ताकि भविष्य के जल संकटों से निपटा जा सके।

चुनौतियाँ

1. जल वितरण में निष्पक्षता और वैज्ञानिकता

  • जल संकट की स्थिति में, उपलब्ध जल का वैज्ञानिक और निष्पक्ष वितरण सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है, खासकर जब राज्यों के बीच विश्वास की कमी हो।
  • विभिन्न राज्यों की आवश्यकताओं (पेयजल, कृषि, औद्योगिक) को संतुलित करना और डेटा की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना कठिन होता है।

2. अंतर-राज्यीय समन्वय और सहयोग का अभाव

  • राज्यों के बीच राजनीतिक इच्छाशक्ति और सहयोग की कमी विवादों को सुलझाने में बाधा डालती है, जिससे न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ती है।
  • दीर्घकालिक समाधानों के लिए राज्यों के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण का अभाव समस्या को और जटिल बनाता है।

3. जलवायु परिवर्तन और जल संसाधनों पर प्रभाव

  • अनियमित वर्षा पैटर्न, सूखे और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाएं जल उपलब्धता को अप्रत्याशित बनाती हैं, जिससे मौजूदा जल-साझाकरण समझौतों पर दबाव पड़ता है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जल प्रबंधन रणनीतियों को अनुकूलित करना आवश्यक है।

4. डेटा और सूचना की पारदर्शिता

  • जल स्तर, वर्षा और उपयोग से संबंधित सटीक और साझा डेटा की कमी अक्सर विवादों को बढ़ाती है।
  • सभी हितधारकों के लिए विश्वसनीय और पारदर्शी डेटा उपलब्ध कराना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
जल संकट की स्थिति में जल का आवंटन कम वर्षा के कारण उपलब्ध जल की कमी से राज्यों के बीच तनाव बढ़ता है, खासकर जब पेयजल और कृषि आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना हो।
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्णयों की स्वीकार्यता CWMA जैसे वैधानिक निकायों के निर्णयों को राज्यों द्वारा चुनौती देना, उनकी प्रभावशीलता और अंतिम समाधान तक पहुंचने की प्रक्रिया को बाधित करता है।
न्यायिक प्रक्रिया में देरी सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार अपील करने से विवादों का अंतिम समाधान विलंबित होता है, जिससे अनिश्चितता बनी रहती है और संबंधित राज्यों में विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
राजनीतिकरण जल विवाद अक्सर राजनीतिक रंग ले लेते हैं, जिससे समस्या का वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक समाधान खोजना कठिन हो जाता है।
अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 की सीमाएं यह अधिनियम विवादों के समाधान के लिए एक तंत्र प्रदान करता है, लेकिन इसकी प्रक्रियात्मक जटिलताएं और समय-सीमा अक्सर विवादों को लंबा खींचती हैं।

आगे की राह

  • राज्यों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना, जिसमें जल-साझाकरण के मुद्दों पर नियमित बैठकें और संयुक्त कार्य समूह शामिल हों।
  • जल उपलब्धता और उपयोग पर विश्वसनीय, वास्तविक समय (real-time) डेटा साझा करने के लिए एक पारदर्शी तंत्र स्थापित करना।
  • जल प्रबंधन प्राधिकरणों (जैसे CWMA) को और अधिक सशक्त बनाना और उनके निर्णयों की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए राज्यों में विश्वास पैदा करना।
  • जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और कुशल सिंचाई तकनीकों (जैसे सूक्ष्म सिंचाई) को बढ़ावा देना ताकि जल की मांग को कम किया जा सके।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जल-साझाकरण समझौतों की समीक्षा और उन्हें अनुकूलित करना।
  • विवादों के शीघ्र समाधान के लिए न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाना और वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) तंत्रों की संभावना तलाशना।
  • पेयजल की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देने के लिए एक राष्ट्रीय नीति या दिशानिर्देश विकसित करना, खासकर संकट की स्थितियों में।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 136’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय की विशेष अनुमति याचिका’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची II, प्रविष्टि 17)’, ‘note’: ‘राज्यों के भीतर जल का नियंत्रण’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची I, प्रविष्टि 56)’, ‘note’: ‘संघ द्वारा अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन’}

अवधारणा प्रवाह

कम वर्षा और जल संकट की स्थिति  →  कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु को जल छोड़ने में कठिनाई  →  कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का जल छोड़ने का निर्देश  →  कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) द्वारा CWRC के निर्देश का समर्थन  →  कर्नाटक द्वारा CWMA के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय  →  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मामले की सुनवाई और अंतिम निर्णय  →  राज्यों के बीच जल वितरण और संबंधित तनाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय जल विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित है।
2. संसद कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन के लिए प्रावधान कर सकती है।
3. सर्वोच्च न्यायालय को अंतर-राज्यीय जल विवादों से संबंधित मामलों में अधिकारिता प्राप्त नहीं है यदि संसद कानून द्वारा ऐसा प्रावधान करती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय जल विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित है। कथन 2 भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 262(1) संसद को ऐसा कानून बनाने का अधिकार देता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 262(2) संसद को यह प्रावधान करने का अधिकार देता है कि सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय ऐसे विवादों में अधिकारिता का प्रयोग नहीं करेगा।

Q2. कावेरी जल विवाद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा निकाय कावेरी नदी बेसिन में जल के विनियमन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है?

  1. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT)
  2. कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA)
  3. कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC)
  4. उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर: कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) — कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) कावेरी नदी बेसिन में जल के विनियमन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है। कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) CWMA को तकनीकी इनपुट प्रदान करती है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अंतर-राज्यीय जल विवाद भारत में संघवाद के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करते हैं। कावेरी जल विवाद के संदर्भ में, इन विवादों के समाधान में संवैधानिक और संस्थागत तंत्रों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: अंतर-राज्यीय जल विवादों का संक्षिप्त परिचय और भारत में संघवाद पर उनके प्रभाव का उल्लेख।
मुख्य भाग:
1. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 262 का विस्तृत उल्लेख, जिसमें संसद को अंतर-राज्यीय जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने की शक्ति दी गई है।
2. संस्थागत तंत्र: अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत गठित जल विवाद न्यायाधिकरणों (जैसे CWDT) की भूमिका और उनके निर्णयों की बाध्यकारी प्रकृति। कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) जैसे हालिया संस्थागत ढांचों की स्थापना और उनके कार्यों का वर्णन।
3. सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका: सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा की शक्ति और विवादों के समाधान में उसके हस्तक्षेप का विश्लेषण। कावेरी विवाद में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का संदर्भ।
4. चुनौतियों का आलोचनात्मक परीक्षण: इन तंत्रों के बावजूद विवादों के बने रहने के कारणों का विश्लेषण, जैसे डेटा की कमी, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, राज्यों के बीच विश्वास की कमी, और जलवायु परिवर्तन के कारण जल की उपलब्धता में कमी।
5. समाधान के सुझाव: सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना, वैज्ञानिक डेटा-आधारित निर्णय, जल-साझाकरण के लिए एक राष्ट्रीय नीति, और विवाद समाधान तंत्रों को और अधिक मजबूत करना।
निष्कर्ष: भारत में संघवाद की भावना को बनाए रखने और जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इन विवादों के प्रभावी और स्थायी समाधान की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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