14 Aug सुप्रीम कोर्ट ने रोकी मद्रास हाईकोर्ट की करूर हादसे पीड़ितों को नौकरी देने के आदेश पर रोक
✎ सर्वोच्च न्यायालय ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर मद्रास उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश को रोक दिया है, जिसमें मानवीय दृष्टिकोण और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के बीच संतुलन…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यप्रणाली, संघ एवं राज्य के कार्य और उत्तरदायित्व, संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र और संस्थाएँ। | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली।
- Prelims: अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 162, अनुकंपा नियुक्ति, न्यायिक समीक्षा, भगदड़
- Essay: आपदा प्रबंधन और मानवीय दृष्टिकोण, संवैधानिक नैतिकता और लोक प्रशासन
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर मद्रास उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश को रोक दिया है, जिसमें मानवीय दृष्टिकोण और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें करूर भगदड़ (Karur stampede) के पीड़ितों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में मानवीय दृष्टिकोण पर जोर दिया, जबकि उच्च न्यायालय ने संवैधानिक समानता और उचित प्रक्रिया के सिद्धांतों का हवाला देते हुए राज्य सरकार के आदेश को असंवैधानिक ठहराया था।
पृष्ठभूमि
- सितंबर 2025 में करूर में एक राजनीतिक रोड शो के दौरान हुई भगदड़ में 41 लोगों की मृत्यु हो गई थी और लगभग 100 लोग घायल हुए थे।
- तमिलनाडु सरकार ने इस त्रासदी के पीड़ितों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया था।
- मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने जुलाई 2026 में राज्य सरकार के इस आदेश को रद्द कर दिया था।
- उच्च न्यायालय ने तर्क दिया था कि अनुकंपा नियुक्तियों के लिए विशिष्ट दिशानिर्देश मौजूद हैं और राज्य सरकार उन्हें दरकिनार नहीं कर सकती।
- उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि सरकार का यह कदम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन होगा, क्योंकि इससे प्रतीक्षा सूची में शामिल अन्य पात्र व्यक्तियों के अधिकार प्रभावित होंगे।
अनुकंपा नियुक्ति और संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate appointment) का उद्देश्य सरकारी कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान मृत्यु होने पर उसके परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना है, ताकि परिवार को अचानक आई आर्थिक कठिनाई से बचाया जा सके।
- यह नियुक्ति किसी अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि एक विशेष मानवीय विचार के रूप में दी जाती है।
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 ‘कानून के समक्ष समानता’ और ‘कानूनों का समान संरक्षण’ सुनिश्चित करता है, जिसका अर्थ है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
- अनुच्छेद 21 ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण’ का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है।
- अनुच्छेद 162 राज्य की कार्यकारी शक्ति के विस्तार से संबंधित है, जिसमें कहा गया है कि राज्य की कार्यकारी शक्ति उन सभी मामलों तक विस्तृत होगी जिनके संबंध में राज्य के विधानमंडल को कानून बनाने की शक्ति है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial review) न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके तहत वह विधायिका द्वारा पारित कानूनों और कार्यपालिका द्वारा जारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करती है। यदि कोई कानून या आदेश संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका उसे रद्द कर सकती है।
- अनुकंपा नियुक्तियों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि ये नियुक्तियाँ समानता के सिद्धांत का उल्लंघन न करें और केवल वास्तविक कठिनाई वाले मामलों तक ही सीमित रहें।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| करुणापूर्ण नियुक्तियाँ (Compassionate Appointments) | यह उन सरकारी नौकरियों को संदर्भित करता है जो किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार के आश्रित सदस्य को दी जाती हैं, ताकि परिवार को आर्थिक कठिनाई से बचाया जा सके। |
| कार्यकारी शक्ति का प्रयोग (Exercise of Executive Power) | राज्य सरकार ने अनुच्छेद 162 के तहत अपनी कार्यकारी शक्ति का प्रयोग करते हुए पीड़ितों के परिजनों को नौकरी देने का तर्क दिया था। |
| समानता का अधिकार (Right to Equality) | उच्च न्यायालय ने माना कि करुणापूर्ण नियुक्तियों के लिए प्रतीक्षा सूची में शामिल अन्य व्यक्तियों की अनदेखी करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन होगा। |
| कानून की उचित प्रक्रिया (Due Process of Law) | उच्च न्यायालय ने यह भी तर्क दिया कि ऐसी नियुक्तियाँ संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत कानून की उचित प्रक्रिया का उल्लंघन करती हैं। |
| न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) | यह न्यायपालिका की शक्ति है जिसके तहत वह विधायिका द्वारा पारित कानूनों और कार्यपालिका द्वारा जारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करती है। इस मामले में, उच्च न्यायालय ने सरकारी आदेशों की न्यायिक समीक्षा की। |
महत्व
न्यायिक महत्व
- यह मामला करुणापूर्ण नियुक्तियों के दायरे और शर्तों को स्पष्ट करता है, विशेषकर उन स्थितियों में जहाँ कोई मौजूदा नीति या दिशानिर्देश नहीं हैं।
- यह न्यायिक समीक्षा के महत्व को रेखांकित करता है, जहाँ न्यायपालिका कार्यपालिका के निर्णयों की संवैधानिकता की जाँच करती है।
प्रशासनिक महत्व
- यह राज्य सरकारों के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है कि कार्यकारी आदेशों को संवैधानिक प्रावधानों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के दायरे में ही जारी किया जाना चाहिए।
- यह आपदा पीड़ितों के लिए राहत उपायों को तैयार करते समय कानूनी और संवैधानिक निहितार्थों पर विचार करने की आवश्यकता पर बल देता है।
सामाजिक महत्व
- यह मामला आपदा पीड़ितों के परिवारों को मानवीय सहायता प्रदान करने की सरकार की इच्छा और संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को दर्शाता है।
- यह दर्शाता है कि सार्वजनिक रोजगार में समानता और निष्पक्षता के सिद्धांत, भले ही मानवीय विचार हों, को दरकिनार नहीं किया जा सकता है।
चुनौतियाँ
1. आपदा राहत और संवैधानिक सिद्धांत
- आपदाओं के बाद पीड़ितों के परिवारों को तत्काल राहत प्रदान करने की मानवीय आवश्यकता और सार्वजनिक रोजगार में समानता जैसे संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
- सरकार की कार्यकारी शक्ति का उपयोग करते हुए मानवीय आधार पर निर्णय लेने और स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने के बीच अक्सर टकराव होता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान- कार्यपालिका और न्यायपालिका
2. करुणापूर्ण नियुक्तियों के दिशानिर्देश
- करुणापूर्ण नियुक्तियों के लिए स्पष्ट और व्यापक दिशानिर्देशों का अभाव या उनका उल्लंघन ‘बाढ़ के द्वार खोलने’ (opening the floodgates) का जोखिम पैदा कर सकता है, जिससे अयोग्य व्यक्तियों को नियुक्तियाँ मिल सकती हैं।
- प्रतीक्षा सूची में शामिल अन्य योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों की अनदेखी करना समानता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: लोक प्रशासन- कार्मिक प्रशासन
3. कार्यकारी और न्यायिक शक्तियों का पृथक्करण
- कार्यपालिका द्वारा लिए गए निर्णयों की न्यायिक समीक्षा, हालांकि आवश्यक है, कभी-कभी सरकार के नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप के रूप में देखी जा सकती है।
- यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को बनाए रखते हुए प्रत्येक अंग की भूमिकाओं और सीमाओं को स्पष्ट करने की चुनौती को दर्शाता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान- शक्तियों का पृथक्करण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| संवैधानिक समानता का उल्लंघन | उच्च न्यायालय ने तर्क दिया कि करुणापूर्ण नियुक्तियों के लिए प्रतीक्षा सूची में शामिल अन्य योग्य उम्मीदवारों की अनदेखी करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। |
| कानून की उचित प्रक्रिया का अभाव | उच्च न्यायालय ने पाया कि स्थापित दिशानिर्देशों को दरकिनार कर नियुक्तियाँ देना अनुच्छेद 21 के तहत कानून की उचित प्रक्रिया का उल्लंघन करता है। |
| कार्यकारी शक्ति की सीमाएँ | राज्य सरकार ने अनुच्छेद 162 के तहत कार्यकारी शक्ति का तर्क दिया, लेकिन उच्च न्यायालय ने जोर दिया कि कार्यकारी शक्ति भी संविधान के दायरे में होनी चाहिए। |
| पूर्व उदाहरण स्थापित होने का जोखिम | उच्च न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि ऐसे सरकारी कार्यों को स्वीकार किया जाता है, तो यह भविष्य में इसी तरह की अनियमित नियुक्तियों के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है। |
| प्रतीक्षा सूची में शामिल लोगों के अधिकार | सरकारी विभागों में करुणापूर्ण नियुक्तियों के लिए पहले से ही प्रतीक्षा सूची मौजूद है, और इन लोगों के अधिकारों की उपेक्षा करना अनुचित होगा। |
आगे की राह
- राज्य सरकारों को आपदा राहत के लिए एक व्यापक नीति विकसित करनी चाहिए जो मानवीय सहायता और संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करे।
- करुणापूर्ण नियुक्तियों के लिए मौजूदा दिशानिर्देशों की समीक्षा की जानी चाहिए और उन्हें स्पष्ट तथा पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की मनमानी से बचा जा सके।
- आपदा पीड़ितों के परिवारों को सहायता प्रदान करने के लिए वैकल्पिक तंत्रों, जैसे वित्तीय मुआवजा, कौशल विकास कार्यक्रम या स्वरोजगार सहायता पर विचार किया जाना चाहिए।
- कार्यकारी आदेश जारी करते समय, संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक मिसालों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
- न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि नीतिगत निर्णयों और संवैधानिक अनुपालन के बीच सामंजस्य स्थापित हो सके।
- सार्वजनिक रोजगार में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सभी नियुक्तियों को स्थापित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 16’, ‘note’: ‘सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 162’, ‘note’: ‘राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार’}
अवधारणा प्रवाह
करूर भगदड़ में कई लोगों की मृत्यु। → तमिलनाडु सरकार ने पीड़ितों के परिजनों को करुणापूर्ण नियुक्तियाँ दीं। → मद्रास उच्च न्यायालय ने इन नियुक्तियों को रद्द कर दिया। → उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन का तर्क दिया। → राज्य सरकार ने अनुच्छेद 162 के तहत कार्यकारी शक्ति का हवाला दिया। → उच्च न्यायालय ने कहा कि कार्यकारी शक्ति संविधान के दायरे में होनी चाहिए। → सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाई।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 162 राज्य की कार्यकारी शक्ति के विस्तार से संबंधित है।
2. अनुच्छेद 162 के तहत राज्य की कार्यकारी शक्ति का प्रयोग केवल उन मामलों तक सीमित है जिन पर राज्य विधानमंडल कानून बना सकता है।
3. अनुच्छेद 162 के तहत कार्यकारी शक्ति का प्रयोग संविधान के प्रावधानों के अनुरूप होना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 162 राज्य की कार्यकारी शक्ति के विस्तार को परिभाषित करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 162 के तहत राज्य की कार्यकारी शक्ति उन मामलों तक विस्तारित होती है जिन पर राज्य विधानमंडल कानून बना सकता है, लेकिन यह केवल उन मामलों तक सीमित नहीं है। यह उन मामलों पर भी लागू हो सकती है जहां कोई कानून नहीं है। कथन 3 सही है क्योंकि किसी भी कार्यकारी शक्ति का प्रयोग संविधान के प्रावधानों के दायरे में ही होना चाहिए।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद भारतीय संविधान में ‘कानून के समक्ष समानता’ और ‘कानूनों के समान संरक्षण’ के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है?
- अनुच्छेद 19
- अनुच्छेद 14
- अनुच्छेद 21
- अनुच्छेद 22
उत्तर: अनुच्छेद 14 — अनुच्छेद 14 भारतीय संविधान में ‘कानून के समक्ष समानता’ और ‘कानूनों के समान संरक्षण’ के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है, जो समानता के मौलिक अधिकार का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के संबंध में राज्य की कार्यकारी शक्ति और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने में न्यायपालिका की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। हाल के न्यायिक निर्णयों के आलोक में इस पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: अनुकंपा नियुक्ति की अवधारणा और इसके उद्देश्य का संक्षिप्त परिचय।
2. राज्य की कार्यकारी शक्ति: संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत राज्य की कार्यकारी शक्ति का उल्लेख, जिसमें सरकार को नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार है।
3. मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का संदर्भ, विशेष रूप से सार्वजनिक रोजगार में समानता के संदर्भ में।
4. न्यायपालिका की भूमिका:
क. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से कार्यकारी निर्णयों की संवैधानिकता की जांच।
ख. उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण: मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख, जिसमें अनुकंपा नियुक्तियों को रद्द करने के कारणों पर प्रकाश डाला गया, जैसे कि प्रतीक्षा सूची और समानता के अधिकार का उल्लंघन।
ग. सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने का संदर्भ, जिसमें मानवीय दृष्टिकोण और त्रासदी से प्रभावित परिवारों को राहत देने के महत्व पर जोर दिया गया।
घ. संतुलन स्थापित करना: न्यायपालिका कैसे कार्यकारी विवेक और संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती है, इसका विश्लेषण।
5. चुनौतियाँ और निहितार्थ: अनुकंपा नियुक्तियों से संबंधित नीतिगत दिशानिर्देशों की आवश्यकता, ‘बाढ़ के द्वार खुलने’ (floodgates) की चिंता, और न्यायिक हस्तक्षेप के दीर्घकालिक प्रभाव।
6. निष्कर्ष: एक संतुलित निष्कर्ष जो अनुकंपा नियुक्तियों के मानवीय पहलू और संवैधानिक सिद्धांतों के पालन के महत्व को रेखांकित करता है।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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