18 Aug एनजीटी नेised केरल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर कदम उठाने में अधूरी रिपोर्ट के लिए फटकारा
✎ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) एक विशेष अर्ध-न्यायिक निकाय है जो पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के त्वरित निपटान के लिए स्थापित किया गया है, और यह 'प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत' के आधार पर पर्यावरणीय मुआवजे…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी | GS Paper II — शासन, नीतियां और हस्तक्षेप
- Prelims: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB), कादंब्रयार नदी, प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत, जल प्रदूषण, पर्यावरण मुआवजा
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास में नियामक संस्थाओं की भूमिका, भारत में नदी प्रदूषण: चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) एक विशेष अर्ध-न्यायिक निकाय है जो पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के त्वरित निपटान के लिए स्थापित किया गया है, और यह ‘प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत’ के आधार पर पर्यावरणीय मुआवजे का आकलन करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की दक्षिणी पीठ ने कादंब्रयार नदी में प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपायों पर केरल राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (KSPCB) की रिपोर्ट को ‘अधूरा और निर्देशों का पालन न करने वाला’ बताते हुए खारिज कर दिया है। NGT ने उल्लंघनकर्ताओं द्वारा देय पर्यावरणीय मुआवजे का आकलन करने के अपने पहले के निर्देश का अनुपालन न होने पर असंतोष व्यक्त किया और बोर्ड को एक बेहतर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
पृष्ठभूमि
- कादंब्रयार नदी केरल की 32 प्रदूषित नदी खंडों/स्थानों में से एक है, जिनकी पहचान केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की ‘जल गुणवत्ता बहाली के लिए प्रदूषित नदी खंड, 2025’ रिपोर्ट में की गई है।
- NGT ने ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए उपचारात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी, जिसमें एर्नाकुलम जिले में कादंब्रयार नदी में मल संदूषण (faecal contamination) की स्थिति पर प्रकाश डाला गया था।
- अधिकरण ने पहले राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कादंब्रयार नदी की बहाली पर स्थानीय स्वशासन विभाग द्वारा दायर की गई कार्रवाई रिपोर्ट की समीक्षा करने के लिए कहा था।
- NGT ने ‘प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत’ (Polluter Pays Principle) के आधार पर पर्यावरणीय मुआवजे का आकलन करने का निर्देश दिया था।
- KSPCB ने अपनी रिपोर्ट में विभिन्न स्थानीय निकायों द्वारा किए गए निरीक्षणों और लगाए गए जुर्माने का उल्लेख किया था, लेकिन NGT ने इसे अपर्याप्त पाया।
- ब्रह्मपुरम अपशिष्ट संयंत्र में 100 KLD क्षमता का एक सीवेज उपचार संयंत्र (Sewage Treatment Plant – STP) स्थापित किया गया है, जो उपचारात्मक उपायों का एक हिस्सा है।
- KSPCB की रिपोर्ट में कहा गया था कि थ्रिक्काकारा नगर पालिका ने मार्च 2024 से अगस्त 2024 तक जल निकायों में कचरा फेंकने वालों पर ₹26,590 का कुल जुर्माना लगाया था।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) क्या है?
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) भारत में पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और त्वरित निपटान के लिए स्थापित एक विशेष निकाय है।
- इसकी स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (National Green Tribunal Act, 2010) के तहत की गई थी।
- NGT पर्यावरण संबंधी कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन और व्यक्तियों या संपत्ति को हुए नुकसान के लिए राहत तथा मुआवजा प्रदान करने में मदद करता है।
- यह एक अर्ध-न्यायिक निकाय है, जिसके पास सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Code of Civil Procedure, 1908) के तहत निर्धारित प्रक्रिया से बंधे होने के बजाय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होने की शक्ति है।
- NGT का मुख्यालय नई दिल्ली में है और इसकी चार क्षेत्रीय पीठें (Regional Benches) भोपाल, पुणे, कोलकाता और चेन्नई में हैं।
- अधिकरण में एक अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य शामिल होते हैं।
- NGT को पर्यावरण से संबंधित सात कानूनों के तहत आने वाले मामलों को निपटाने का अधिकार है, जिनमें जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 शामिल हैं।
- ‘प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत’ NGT के निर्णयों का एक महत्वपूर्ण आधार है, जिसके तहत पर्यावरण को प्रदूषित करने वाला व्यक्ति या संस्था प्रदूषण से होने वाले नुकसान की लागत वहन करने के लिए जिम्मेदार होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की भूमिका | पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित मामलों में त्वरित और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना। |
| प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) की जवाबदेही | राज्यों में पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन को लागू करने और प्रदूषण की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण। |
| कादम्बरायर नदी प्रदूषण | शहरीकरण, औद्योगिक अपशिष्ट और अनुपचारित सीवेज के कारण भारत में नदियों के व्यापक प्रदूषण का एक उदाहरण। |
| प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) | पर्यावरणीय क्षति के लिए जिम्मेदार लोगों को उसकी लागत वहन करने के लिए बाध्य करने वाला एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सिद्धांत। |
| अधूरा अनुपालन प्रतिवेदन | पर्यावरण नियमों के प्रवर्तन में प्रशासनिक अक्षमता और ढिलाई को दर्शाता है। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- नदी प्रदूषण से जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (aquatic ecosystem) और जैव विविधता (biodiversity) को गंभीर खतरा होता है।
- प्रदूषित नदियाँ पेयजल स्रोतों को दूषित करती हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- NGT का हस्तक्षेप पर्यावरणीय शासन (environmental governance) को मजबूत करता है और प्रदूषण नियंत्रण निकायों की जवाबदेही तय करता है।
शासन और नियामक महत्व
- यह घटना राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की कार्यप्रणाली और उनकी रिपोर्टिंग की गुणवत्ता पर सवाल उठाती है।
- NGT जैसे न्यायिक-सह-विशेषज्ञ निकायों की भूमिका पर्यावरण कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक है।
- स्थानीय निकायों (local bodies) की भूमिका अपशिष्ट प्रबंधन और नदी प्रदूषण नियंत्रण में महत्वपूर्ण है, जैसा कि इस मामले में देखा गया।
सामाजिक महत्व
- स्वच्छ जल की उपलब्धता मानव स्वास्थ्य और आजीविका के लिए मौलिक है।
- नदी प्रदूषण से प्रभावित समुदायों के जीवन की गुणवत्ता में गिरावट आती है।
- पर्यावरणीय न्याय (environmental justice) सुनिश्चित करने के लिए प्रदूषण के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की क्षमता और स्वायत्तता
- राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के पास अक्सर पर्याप्त जनशक्ति, तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय संसाधन नहीं होते हैं।
- राजनीतिक हस्तक्षेप और उद्योग के दबाव के कारण उनकी स्वायत्तता और प्रभावी ढंग से कार्य करने की क्षमता प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, संस्थागत चुनौतियाँ
2. अपशिष्ट प्रबंधन और सीवेज उपचार का अभाव
- शहरी क्षेत्रों में अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट का नदियों में सीधे निर्वहन एक बड़ी समस्या है।
- पर्याप्त सीवेज उपचार संयंत्रों (sewage treatment plants) और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (solid waste management) बुनियादी ढांचे की कमी है।
यूपीएससी लिंक: शहरीकरण, अपशिष्ट प्रबंधन
3. कानूनों का कमजोर प्रवर्तन और अनुपालन
- पर्यावरण कानूनों का प्रभावी ढंग से प्रवर्तन नहीं हो पाता है, और उल्लंघनकर्ताओं पर पर्याप्त जुर्माना या कार्रवाई नहीं होती है।
- स्थानीय निकायों और उद्योगों द्वारा पर्यावरणीय मानदंडों का अनुपालन सुनिश्चित करने में ढिलाई बरती जाती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण कानून, शासन
4. डेटा की कमी और निगरानी में अक्षमता
- प्रदूषण के स्तर और स्रोतों पर सटीक और अद्यतन डेटा की कमी प्रभावी नीति निर्माण में बाधा डालती है।
- प्रदूषण की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीकों और पर्याप्त निगरानी स्टेशनों का अभाव है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण निगरानी, डेटा शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अधूरा प्रतिवेदन | प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सवाल। |
| प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत का उल्लंघन | पर्यावरणीय क्षति के लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित करने में विफलता। |
| सीवेज और अपशिष्ट का निर्वहन | नदी पारिस्थितिकी तंत्र और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा। |
| स्थानीय निकायों की भूमिका | अपशिष्ट प्रबंधन और निगरानी में उनकी प्रभावशीलता की कमी। |
| पर्यावरण मुआवजा आकलन | क्षति की भरपाई और भविष्य के प्रदूषण को रोकने के लिए महत्वपूर्ण। |
आगे की राह
- राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की क्षमता निर्माण और उन्हें पर्याप्त तकनीकी तथा वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना।
- अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों (wastewater treatment plants) और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना।
- पर्यावरणीय कानूनों का सख्त प्रवर्तन सुनिश्चित करना और ‘प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत’ को प्रभावी ढंग से लागू करना।
- स्थानीय निकायों को अपशिष्ट प्रबंधन और नदी संरक्षण में उनकी भूमिका के लिए सशक्त और जवाबदेह बनाना।
- प्रदूषण निगरानी के लिए आधुनिक तकनीकों जैसे CCTV और सेंसर का उपयोग बढ़ाना तथा डेटा संग्रह में सुधार करना।
- जन जागरूकता बढ़ाना और सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना ताकि नदी प्रदूषण को रोका जा सके।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) प्रक्रियाओं को मजबूत करना और उनका प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राष्ट्रीय हरित अधिकरण · पर्यावरण संरक्षण · जल प्रदूषण · प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड · प्रदूषक भुगतान सिद्धांत · पर्यावरण मुआवजा · स्थानीय स्वशासन · सतत विकास · न्यायिक सक्रियता · नदी कायाकल्प · अपशिष्ट प्रबंधन · पर्यावरण शासन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 21’: ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।’}
- {‘अनुच्छेद 48A’: ‘राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार का प्रयास करेगा।’}
- {‘अनुच्छेद 51A(g)’: ‘पर्यावरण की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।’}
अवधारणा प्रवाह
कादम्बरायर नदी में प्रदूषण की समस्या। → NGT द्वारा प्रदूषण पर संज्ञान और केरल PCB को निर्देश। → केरल PCB द्वारा अधूरा और गैर-अनुपालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करना। → NGT द्वारा प्रतिवेदन को अस्वीकार करना और असंतोष व्यक्त करना। → NGT द्वारा ‘प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत’ के आधार पर मुआवजे के आकलन का निर्देश। → पर्यावरण नियमों के प्रभावी प्रवर्तन और अनुपालन की आवश्यकता पर बल।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी।
2. यह पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए स्थापित किया गया था।
3. NGT के पास सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत निर्धारित प्रक्रिया से बाध्य होने के बजाय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होने की शक्ति है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि NGT की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी। कथन 2 भी सही है क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संबंधी मामलों का त्वरित निपटान करना है। कथन 3 भी सही है क्योंकि NGT प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर कार्य करता है, न कि सिविल प्रक्रिया संहिता से पूरी तरह बाध्य होता है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धांत ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ (Polluter Pays Principle) का सबसे सटीक वर्णन करता है?
- यह सिद्धांत कहता है कि प्रदूषण को रोकने या कम करने के लिए सरकार को सभी लागतें वहन करनी चाहिए।
- यह सिद्धांत कहता है कि जो व्यक्ति या संस्था प्रदूषण फैलाती है, उसे उस प्रदूषण से होने वाली क्षति की लागत और निवारक उपायों की लागत वहन करनी चाहिए।
- यह सिद्धांत कहता है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए उद्योगों को सब्सिडी दी जानी चाहिए।
- यह सिद्धांत कहता है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को जिम्मेदार होना चाहिए।
- यह सिद्धांत कहता है कि जो व्यक्ति या संस्था प्रदूषण फैलाती है, उसे उस प्रदूषण से होने वाली क्षति की लागत और निवारक उपायों की लागत वहन करनी चाहिए।
उत्तर: यह सिद्धांत कहता है कि जो व्यक्ति या संस्था प्रदूषण फैलाती है, उसे उस प्रदूषण से होने वाली क्षति की लागत और निवारक उपायों की लागत वहन करनी चाहिए। — प्रदूषक भुगतान सिद्धांत एक पर्यावरण कानून सिद्धांत है जिसमें प्रदूषण फैलाने वाले पक्ष को पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को आंतरिक बनाने के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसका अर्थ है कि प्रदूषण से होने वाले नुकसान की भरपाई और उसे रोकने के उपायों का खर्च प्रदूषक को उठाना होगा।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस संदर्भ में, NGT की भूमिका और शक्तियों का आलोचनात्मक परीक्षण करें तथा भारत में पर्यावरणीय शासन में इसकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना और उसके उद्देश्य का संक्षिप्त परिचय।
मुख्य भाग:
1. NGT की भूमिका और शक्तियाँ:
क. NGT अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित एक सांविधिक निकाय।
ख. पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों का निपटान।
ग. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर कार्य करना।
घ. पर्यावरण मुआवजा (Environmental Compensation) और ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ (Polluter Pays Principle) लागू करने की शक्ति।
ङ. उच्च न्यायालयों के समान अपीलीय क्षेत्राधिकार।
2. पर्यावरणीय शासन में प्रभावशीलता:
क. सकारात्मक पहलू: त्वरित न्याय, विशेषज्ञ सदस्यों की उपस्थिति, जनहित याचिकाओं पर संज्ञान, प्रदूषणकारी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में सफलता (जैसे कादंब्रयार नदी प्रदूषण मामला)।
ख. चुनौतियाँ/सीमाएँ: न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (State Pollution Control Boards) के साथ समन्वय की कमी, आदेशों के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ, मानव संसाधन और वित्तीय संसाधनों की कमी, कुछ मामलों में अधिकार क्षेत्र संबंधी विवाद।
ग. हाल के उदाहरण: विभिन्न नदियों के प्रदूषण, अपशिष्ट प्रबंधन, अवैध खनन आदि से संबंधित मामलों में NGT के हस्तक्षेप।
निष्कर्ष: NGT की भूमिका का सारांश और भारत में पर्यावरणीय शासन को मजबूत करने के लिए आवश्यक सुधारों और उपायों पर सुझाव।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments