सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार की याचिका खारिज, कहा- ‘कला पर न्याय नहीं बैठाया जा सकता’

Supreme Court dismisses Odisha Govt plea against release of ‘Mahaprabhu Jagannath’, says ‘cannot sit in judgment over ar — diagram

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार की याचिका खारिज, कहा- ‘कला पर न्याय नहीं बैठाया जा सकता’

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✎ सर्वोच्च न्यायालय ने कलात्मक स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वह 'कला पर निर्णय नहीं दे सकता' और एनिमेटेड फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज के खिलाफ ओडिशा सरकार की याचिका को खारिज कर दिया।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यप्रणाली, संघ और राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र और संस्थाएँ।  |  GS Paper II — न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली।  |  GS Paper I — भारतीय संस्कृति में कला के रूप।
  • Prelims: अनुच्छेद 19 (1) (a), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कलात्मक स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC), सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार
  • Essay: कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व, न्यायपालिका की भूमिका: संतुलनकारी शक्ति

त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने कलात्मक स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि वह ‘कला पर निर्णय नहीं दे सकता’ और एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज के खिलाफ ओडिशा सरकार की याचिका को खारिज कर दिया।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ नामक एक एनिमेटेड फिल्म की रिलीज के खिलाफ ओडिशा सरकार की याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने यह कहते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि वह ‘कला पर निर्णय नहीं दे सकता’ और कलात्मक अभिव्यक्ति को बच्चों के लिए महत्वपूर्ण बताया। यह निर्णय कलात्मक स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा की सीमाओं पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।

पृष्ठभूमि

  • ओडिशा सरकार ने ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ नामक एनिमेटेड फिल्म में भगवान जगन्नाथ के चित्रण पर आपत्ति जताई थी, जिसमें उन्हें ‘स्पाइडरमैन या डोरेमोन’ जैसे कार्टून रूपों में दिखाया गया था।
  • राज्य सरकार का तर्क था कि भगवान को ‘कार्टून रूप’ में चित्रित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है और उनकी दिव्यता को कम कर सकता है।
  • केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने इस फिल्म को पहले ही मंजूरी दे दी थी, लेकिन ओडिशा उच्च न्यायालय ने इसके प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया था।
  • फिल्म निर्माताओं ने उच्च न्यायालय के प्रतिबंध के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी।
  • न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि देश में रचनात्मकता है और एनिमेशन बच्चों के उद्देश्य से है, तथा ऐसी चीजें कला के मार्ग में नहीं आनी चाहिए।

कलात्मक स्वतंत्रता और संवैधानिक प्रावधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (a) सभी नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) का अधिकार प्रदान करता है। इसमें कलात्मक अभिव्यक्ति भी शामिल है।
  • हालांकि, यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है और अनुच्छेद 19 (2) के तहत राज्य कुछ उचित प्रतिबंध लगा सकता है, जैसे कि सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या मानहानि के आधार पर।
  • केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) एक वैधानिक निकाय है जो सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को विनियमित करता है। यह फिल्मों को प्रमाणित करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे दिशानिर्देशों का पालन करती हैं।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) भारतीय न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके तहत वह विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों और कार्यपालिका द्वारा जारी किए गए आदेशों की संवैधानिकता की जांच करती है। इस मामले में, न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश की समीक्षा की।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कलात्मक अभिव्यक्ति के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि ‘कला पर निर्णय नहीं दिया जा सकता’, यह दर्शाता है कि कला की व्याख्या व्यक्तिपरक हो सकती है और न्यायालयों को इसमें हस्तक्षेप करने में सावधानी बरतनी चाहिए।
  • न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि दिव्यता की अवधारणा बहुआयामी है और भगवान की विभिन्न धारणाएं दिव्यता या भक्ति को कम नहीं करती हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यह सुनिश्चित करता है कि कलाकार बिना किसी अनुचित प्रतिबंध के अपनी रचनात्मकता का प्रयोग कर सकें, जो एक जीवंत सांस्कृतिक समाज के लिए आवश्यक है।
न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ सर्वोच्च न्यायालय ने कलात्मक कृतियों के मूल्यांकन में अपनी भूमिका को सीमित किया है, यह दर्शाता है कि अदालतें कला के सौंदर्य या धार्मिक पहलुओं पर निर्णय नहीं दे सकतीं।
CBFC की भूमिका का समर्थन केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा प्रमाणित फिल्म को अदालत द्वारा अनुमति देना, प्रमाणन निकाय की स्वायत्तता और निर्णय का सम्मान करता है।
बच्चों के लिए सामग्री न्यायालय ने एनिमेशन को बच्चों के लिए महत्वपूर्ण माना, जो शिक्षा और मनोरंजन के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों को प्रसारित करने में इसकी भूमिका को रेखांकित करता है।
धार्मिक भावनाओं और कला के बीच संतुलन यह मामला धार्मिक आस्था और कलात्मक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को उजागर करता है, विशेषकर जब चित्रण पारंपरिक मान्यताओं से हटकर हो।

महत्व

सांस्कृतिक महत्व

  • यह निर्णय कलात्मक स्वतंत्रता के सिद्धांत को मजबूत करता है, विशेषकर धार्मिक विषयों से संबंधित रचनात्मक कार्यों के संदर्भ में।
  • यह बच्चों के लिए एनिमेशन जैसे माध्यमों के महत्व को स्वीकार करता है, जो आधुनिक समाज में जानकारी और मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

कानूनी और संवैधानिक महत्व

  • सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कला के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ हैं, जो न्यायिक सक्रियता और आत्म-संयम के बीच संतुलन को दर्शाती हैं।
  • यह केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) जैसी नियामक संस्थाओं की भूमिका को पुष्ट करता है, जिनके पास फिल्मों को प्रमाणित करने का अधिकार है।

सामाजिक महत्व

  • यह मामला समाज में धार्मिक भावनाओं और कलात्मक अभिव्यक्ति के बीच संभावित टकराव को दर्शाता है और सहिष्णुता तथा समझ की आवश्यकता पर बल देता है।
  • यह आधुनिक संदर्भ में पारंपरिक धार्मिक आकृतियों के चित्रण के बारे में सार्वजनिक बहस को बढ़ावा देता है।

चुनौतियाँ

1. कलात्मक स्वतंत्रता बनाम धार्मिक भावनाएँ

  • धार्मिक प्रतीकों या देवताओं के कलात्मक चित्रण को अक्सर धार्मिक समूहों द्वारा आपत्तिजनक माना जा सकता है, जिससे कलात्मक स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के बीच तनाव पैदा होता है।
  • यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि कब कोई कलाकृति केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति है और कब वह जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को आहत करती है।

2. नियामक संस्थाओं की स्वायत्तता

  • CBFC जैसी संस्थाओं द्वारा फिल्मों को मंजूरी दिए जाने के बाद भी, राज्य सरकारों या उच्च न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप नियामक प्रक्रिया की स्वायत्तता को कमजोर कर सकता है।
  • यह सुनिश्चित करना कि नियामक संस्थाएँ बिना किसी बाहरी दबाव के स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें, महत्वपूर्ण है।

3. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ

  • अदालतों के लिए कला के सौंदर्यपरक या धार्मिक पहलुओं पर निर्णय देना मुश्किल होता है, क्योंकि ये व्यक्तिपरक होते हैं और कानूनी मानकों पर आधारित नहीं होते।
  • अदालतों को कलात्मक कार्यों की समीक्षा करते समय आत्म-संयम बरतना चाहिए, ताकि रचनात्मकता को बाधित न किया जा सके।

4. बच्चों के लिए सामग्री का मूल्यांकन

  • बच्चों के लिए बनाई गई सामग्री में धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीकों का चित्रण करते समय संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है, ताकि वे गलत धारणाएँ न विकसित करें।
  • यह सुनिश्चित करना कि बच्चों की सामग्री रचनात्मक और शिक्षाप्रद हो, लेकिन साथ ही सांस्कृतिक रूप से भी उपयुक्त हो, एक चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
कला का चित्रण ओडिशा सरकार ने भगवान जगन्नाथ के ‘स्पाइडरमैन या डोरेमोन’ जैसे कार्टून रूप में चित्रण पर आपत्ति जताई, जिसे वे आपत्तिजनक मानते थे।
धार्मिक ग्रंथों का पालन फिल्म निर्माताओं पर स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण का सख्ती से पालन न करने का आरोप लगाया गया, जिससे धार्मिक सटीकता पर सवाल उठे।
उच्च न्यायालय का प्रतिबंध ओडिशा उच्च न्यायालय ने CBFC द्वारा मंजूरी के बावजूद फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे नियामक प्रक्रिया पर सवाल उठे।
कलात्मक स्वतंत्रता का दायरा यह मामला कलात्मक स्वतंत्रता की सीमाओं और धार्मिक भावनाओं के साथ इसके टकराव के बारे में बहस को दर्शाता है।

आगे की राह

  • कलात्मक स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन बनाने के लिए व्यापक दिशानिर्देश विकसित किए जाने चाहिए।
  • CBFC जैसी नियामक संस्थाओं को अपनी स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए और उनके निर्णयों का सम्मान किया जाना चाहिए, जब तक कि वे स्पष्ट रूप से कानून का उल्लंघन न करें।
  • कलाकारों और धार्मिक समुदायों के बीच संवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि गलतफहमी को कम किया जा सके और रचनात्मक कार्यों के प्रति अधिक समझ विकसित हो सके।
  • बच्चों के लिए सामग्री के निर्माताओं को सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनशीलता के प्रति जागरूक रहना चाहिए, जबकि रचनात्मकता को भी बनाए रखना चाहिए।
  • न्यायपालिका को कलात्मक अभिव्यक्ति के मामलों में आत्म-संयम बरतना चाहिए, यह मानते हुए कि कला का मूल्यांकन कानूनी मानकों से परे होता है।
  • सार्वजनिक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से कलात्मक स्वतंत्रता के महत्व और धार्मिक सहिष्णुता की आवश्यकता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता · न्यायिक समीक्षा · सेंसरशिप · संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) · केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) · संघवाद · उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार · धार्मिक भावनाओं का संरक्षण · कलात्मक स्वतंत्रता की सीमाएँ · संविधान का अनुच्छेद 25

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(a)’, ‘note’: ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 25’, ‘note’: ‘धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 26’, ‘note’: ‘धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता’}

अवधारणा प्रवाह

एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ का निर्माण और CBFC द्वारा प्रमाणन।  →  ओडिशा सरकार द्वारा फिल्म के चित्रण पर आपत्ति और उच्च न्यायालय में याचिका।  →  ओडिशा उच्च न्यायालय द्वारा फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध।  →  फिल्म निर्माताओं द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपील।  →  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ओडिशा सरकार की याचिका खारिज, कलात्मक स्वतंत्रता का समर्थन।  →  फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति, न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ स्पष्ट।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) एक सांविधिक निकाय है जो सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
2. भारत में फिल्मों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार केवल सर्वोच्च न्यायालय के पास है।
3. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी समाहित करता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। CBFC एक सांविधिक निकाय है, जो सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत स्थापित है और सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। कथन 2 गलत है। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय दोनों के पास फिल्मों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने या अनुमति देने का अधिकार है, जैसा कि इस मामले में देखा गया। कथन 3 सही है। अनुच्छेद 19(1)(a) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें कलात्मक अभिव्यक्ति भी शामिल है।

Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ नामक एनिमेटेड फिल्म की रिलीज के खिलाफ ओडिशा सरकार की याचिका को खारिज कर दिया।
कारण (R): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वह कला पर निर्णय नहीं दे सकता और बच्चों के लिए एनिमेशन को कलात्मक स्वतंत्रता के रूप में देखा जाना चाहिए।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने ओडिशा सरकार की याचिका को खारिज कर दिया। कारण (R) भी सही है क्योंकि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह कला पर निर्णय नहीं दे सकता और बच्चों के लिए एनिमेशन को कलात्मक स्वतंत्रता के दायरे में माना जाना चाहिए। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ कलात्मक स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करने में न्यायपालिका की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की स्वायत्तता और उसके निर्णयों की न्यायिक समीक्षा के महत्व पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** कलात्मक स्वतंत्रता (संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a)) और धार्मिक भावनाओं (अनुच्छेद 25) के बीच संवैधानिक संघर्ष का संक्षिप्त परिचय। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का संदर्भ।
2. **न्यायपालिका की भूमिका:**
* **संतुलन स्थापित करना:** न्यायपालिका कैसे दोनों अधिकारों के बीच संतुलन बनाती है, यह समझाना।
* **कलात्मक स्वतंत्रता का संरक्षण:** कला को अभिव्यक्ति के एक रूप के रूप में मान्यता देना और अनावश्यक सेंसरशिप से बचाना (जैसे ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ मामले में)।
* **धार्मिक भावनाओं का सम्मान:** यह भी सुनिश्चित करना कि कला अभिव्यक्ति के नाम पर जानबूझकर किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत न करे (उदाहरण के लिए, ‘एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम’ मामला)।
* **उचित प्रतिबंध:** अनुच्छेद 19(2) के तहत ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता’ आदि के आधार पर लगाए जा सकने वाले उचित प्रतिबंधों की व्याख्या।
3. **CBFC की स्वायत्तता और न्यायिक समीक्षा:**
* **CBFC की भूमिका:** सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत CBFC के सांविधिक अधिकार और उसकी प्रमाणन प्रक्रिया।
* **स्वायत्तता का महत्व:** कलात्मक कार्यों के मूल्यांकन में विशेषज्ञता और प्रथम दृष्टया निर्णय लेने में उसकी स्वायत्तता क्यों महत्वपूर्ण है।
* **न्यायिक समीक्षा का महत्व:** CBFC के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा (उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा) क्यों आवश्यक है। यह सुनिश्चित करता है कि CBFC के निर्णय मनमाने न हों, संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करें और कलात्मक स्वतंत्रता का उल्लंघन न करें। (उदाहरण के लिए, ‘के.ए. अब्बास बनाम भारत संघ’ मामला, जहां सेंसरशिप को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया गया लेकिन न्यायिक समीक्षा के अधीन रखा गया)।
* **हालिया मामले से जुड़ाव:** ओडिशा उच्च न्यायालय द्वारा CBFC से प्रमाणित फिल्म पर प्रतिबंध लगाना और फिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उस प्रतिबंध को हटाना, न्यायिक समीक्षा की शक्ति को दर्शाता है।
4. **निष्कर्ष:** कलात्मक स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखने में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को दोहराना, जो एक जीवंत लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। CBFC की विशेषज्ञता और न्यायिक समीक्षा की संवैधानिक सुरक्षा के सह-अस्तित्व पर बल देना।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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