सुपर एल नीनो: 2026 में विनाशकारी जलवायु संकट की आशंका, जानिए भारत पर प्रभाव

A Super El Niño bracing for showdown — diagram

सुपर एल नीनो: 2026 में विनाशकारी जलवायु संकट की आशंका, जानिए भारत पर प्रभाव

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Super El Niño effects

✎ अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि की एक प्राकृतिक घटना है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है और भारत में कमजोर मानसून तथा सूखे का कारण बन सकती है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भारतीय भूगोल, विश्व का भौतिक भूगोल)  |  GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन, भारतीय अर्थव्यवस्था
  • Prelims: अल नीनो, ला नीना, ENSO, भारतीय मानसून, प्रशांत महासागर, वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन, सूखा
  • Essay: जलवायु परिवर्तन और मानव जीवन पर इसके प्रभाव, भारत में खाद्य सुरक्षा और कृषि पर जलवायु परिवर्तन का असर

त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि की एक प्राकृतिक घटना है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है और भारत में कमजोर मानसून तथा सूखे का कारण बन सकती है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में एक ‘सुपर अल नीनो’ (Super El Niño) की स्थिति बन रही है, जिसके 2026 के अंत तक समुद्री सतह के तापमान में 2°C से अधिक की वृद्धि होने की संभावना है। जलवायु वैज्ञानिकों ने इसे अब तक की सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं में से एक बताया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मॉडल संकेत दे रहे हैं कि इसका चरम प्रभाव आगामी शरद ऋतु के महीनों में होगा और स्थितियाँ 2027 की शुरुआत तक बनी रह सकती हैं। इस घटना से वैश्विक स्तर पर अत्यधिक गर्मी और चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बढ़ गया है, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा और व्यापार मार्गों पर भी असर पड़ सकता है।

पृष्ठभूमि

  • अल नीनो (El Niño) भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के जल में तापमान वृद्धि की एक प्राकृतिक घटना है, जिसका विश्व भर के मौसम पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
  • यह घटना प्रशांत महासागर से बड़ी मात्रा में समुद्री गर्मी को वायुमंडल में छोड़ती है, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ता है और चरम मौसमी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
  • भारतीय उपमहाद्वीप के लिए अल नीनो का एक महत्वपूर्ण प्रभाव दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) की पवनों का कमजोर होना है, जिससे वर्षा में कमी आती है और सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
  • 1871 से अब तक, भारत के छह बड़े सूखे अल नीनो से जुड़े रहे हैं, जिनमें 2002 और 2009 के सूखे भी शामिल हैं।
  • 1880 से 2014 तक के 135 वर्षों के मौसम डेटा से पता चलता है कि लगभग 90% अल नीनो वर्षों में सामान्य से कम वर्षा हुई, जबकि 65% वर्षों में गंभीर सूखे की स्थिति दर्ज की गई।
  • इस वर्ष भी, अल नीनो के मजबूत होने से दक्षिण-पश्चिम मानसून बाधित हुआ है।

अल नीनो क्या है?

  • अल नीनो दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) के साथ मिलकर अल नीनो-दक्षिणी दोलन (El Niño-Southern Oscillation – ENSO) चक्र का एक गर्म चरण है।
  • यह पूर्वी और मध्य उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान (Sea Surface Temperature – SST) के सामान्य से अधिक गर्म होने की स्थिति को दर्शाता है।
  • यह आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होता है और 9 से 12 महीने तक रहता है, हालांकि कभी-कभी यह अधिक समय तक भी रह सकता है।
  • अल नीनो के दौरान, प्रशांत महासागर में व्यापारिक पवनें (trade winds) कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं, जिससे गर्म पानी दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट की ओर बढ़ने लगता है।
  • इसके परिणामस्वरूप, समुद्र से वायुमंडल में अधिक गर्मी स्थानांतरित होती है, जिससे वैश्विक औसत तापमान बढ़ता है और विश्व भर में मौसम पैटर्न में बड़े बदलाव आते हैं।
  • भारत में, अल नीनो अक्सर कमजोर मानसून, कम वर्षा और सूखे से जुड़ा होता है, जिससे कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • इसके विपरीत, ला नीना (La Niña) ENSO चक्र का ठंडा चरण है, जिसमें पूर्वी और मध्य प्रशांत महासागर में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है और यह आमतौर पर भारत में अच्छे मानसून से जुड़ा होता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
सुपर अल नीनो यह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में 2°C से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है, जिससे वैश्विक मौसम पैटर्न पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
वैश्विक तापमान में वृद्धि अल नीनो समुद्र की बड़ी मात्रा में गर्मी को वायुमंडल में छोड़ता है, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ता है और अत्यधिक गर्मी की लहरें आती हैं।
भारतीय मानसून पर प्रभाव यह दक्षिण-पश्चिम मानसून की हवाओं को कमजोर करता है, जिससे भारत में कम वर्षा और अनियमित वर्षा पैटर्न होता है, जो सूखे और अकाल का कारण बन सकता है।
अत्यधिक मौसमी घटनाएँ सुपर अल नीनो दुनिया भर में अत्यधिक मौसम की घटनाओं जैसे सूखा, बाढ़ और भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाता है।
खाद्य सुरक्षा और व्यापार मार्ग यह वैश्विक खाद्य सुरक्षा और पनामा नहर जैसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों को बाधित कर सकता है।

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • सुपर अल नीनो वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और बढ़ा देता है, जिससे अभूतपूर्व गर्मी और चरम मौसमी घटनाएँ होती हैं।
  • यह ग्लेशियरों के पिघलने और पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) के क्षरण में योगदान कर सकता है, जिससे भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

आर्थिक महत्व

  • भारत में मानसून की कमी कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर खतरा और व्यापार मार्गों में व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, जिससे वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।

सामाजिक महत्व

  • सूखे और पानी की कमी से पेयजल संकट, बिजली कटौती और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • अत्यधिक मौसमी घटनाएँ विस्थापन, आजीविका के नुकसान और आपदा राहत प्रयासों पर दबाव डाल सकती हैं।

चुनौतियाँ

1. कृषि और खाद्य सुरक्षा

  • कमजोर मानसून और अनियमित वर्षा पैटर्न से कृषि उत्पादन में गिरावट आ सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • सूखे की स्थिति से किसानों की आय प्रभावित होगी और ग्रामीण संकट बढ़ सकता है।

2. जल संसाधन प्रबंधन

  • जलाशयों के स्तर में कमी से पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी।
  • शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की कमी से संघर्ष और सामाजिक अशांति बढ़ सकती है।

3. ऊर्जा सुरक्षा

  • जलविद्युत उत्पादन में कमी से बिजली संकट और बिजली कटौती हो सकती है, जिससे औद्योगिक और घरेलू गतिविधियाँ प्रभावित होंगी।
  • ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अन्य स्रोतों पर निर्भरता बढ़ सकती है।

4. आपदा प्रबंधन और अनुकूलन

  • अत्यधिक मौसमी घटनाओं जैसे बाढ़, सूखा, भूस्खलन और गर्मी की लहरों से निपटने के लिए प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीतियों की आवश्यकता है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन के लिए दीर्घकालिक योजनाओं का अभाव एक चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
मानसून की अनिश्चितता भारत में कृषि और अर्थव्यवस्था पर सीधा नकारात्मक प्रभाव, जिससे सूखे और अकाल का खतरा बढ़ जाता है।
जल संकट जलाशयों के स्तर में कमी, जिससे पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए पानी की उपलब्धता पर असर पड़ता है।
वैश्विक खाद्य आपूर्ति अल नीनो के कारण दुनिया भर में फसल उत्पादन में कमी, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा और कीमतों पर दबाव पड़ता है।
चरम मौसम की घटनाएँ बाढ़, सूखा, गर्मी की लहरें और भूस्खलन जैसी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि, जिससे जान-माल का नुकसान होता है।
आर्थिक व्यवधान कृषि, व्यापार और ऊर्जा क्षेत्रों में व्यवधान, जिससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी हो सकती है।

आगे की राह

  • मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों को मजबूत करना और किसानों को समय पर और सटीक जानकारी प्रदान करना।
  • जल संरक्षण और जल संचयन (Water Harvesting) तकनीकों को बढ़ावा देना, साथ ही जल संसाधनों का कुशल प्रबंधन सुनिश्चित करना।
  • सूखा प्रतिरोधी फसलों की किस्मों को विकसित करना और कृषि विविधीकरण (Agricultural Diversification) को प्रोत्साहित करना।
  • आपदा प्रबंधन योजनाओं को अद्यतन करना और चरम मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए तैयारी और प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना।
  • नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश बढ़ाना ताकि जलविद्युत पर निर्भरता कम हो सके और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन के लिए दीर्घकालिक रणनीतियों का विकास और कार्यान्वयन करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना ताकि अल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु घटनाओं के प्रभावों को कम किया जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

अल नीनो · जलवायु परिवर्तन · भारतीय मानसून · खाद्य सुरक्षा · सूखा · अत्यधिक मौसम की घटनाएँ · वैश्विक तापन · कृषि पर प्रभाव · आपदा प्रबंधन · समुद्री सतह का तापमान

अवधारणा प्रवाह

सुपर अल नीनो का विकास  →  भूमध्यरेखीय प्रशांत में समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि  →  वैश्विक मौसम पैटर्न में व्यवधान  →  भारतीय मानसून का कमजोर होना  →  भारत में कम वर्षा और सूखे की स्थिति  →  कृषि, जल और ऊर्जा सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. अल नीनो घटना के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के जल के तापमान में वृद्धि को संदर्भित करता है।
2. यह घटना आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करती है।
3. अल नीनो के कारण वैश्विक तापमान में कमी आती है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के जल के तापमान में वृद्धि को संदर्भित करता है। कथन 2 सही है क्योंकि अल नीनो भारतीय मानसून को कमजोर करता है, जिससे कम वर्षा होती है। कथन 3 गलत है क्योंकि अल नीनो वैश्विक तापमान को बढ़ाता है, न कि कम करता है, क्योंकि यह समुद्र की गर्मी को वायुमंडल में छोड़ता है।

Q2. अभिकथन (A): अल नीनो की घटना से वैश्विक खाद्य सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
कारण (R): अल नीनो दुनिया भर में अत्यधिक मौसम की स्थिति, जैसे सूखा और बाढ़, का कारण बनता है, जो कृषि उत्पादन को प्रभावित करता है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि अल नीनो वैश्विक खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। कारण (R) भी सही है और A का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि अल नीनो के कारण होने वाली अत्यधिक मौसम की घटनाएँ कृषि उत्पादन को बाधित करती हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अल नीनो घटना क्या है और यह भारतीय मानसून को किस प्रकार प्रभावित करती है? भारत में खाद्य सुरक्षा और जल संसाधनों पर इसके संभावित प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण करें। (15 Marks)

रूपरेखा: एक पूर्ण उत्तर में अल नीनो की वैज्ञानिक परिभाषा, प्रशांत महासागर में इसकी उत्पत्ति और वैश्विक मौसम पैटर्न पर इसके प्रभाव को शामिल करना चाहिए। भारतीय मानसून पर इसके विशिष्ट प्रभावों को विस्तार से बताया जाना चाहिए, जिसमें व्यापारिक पवनों का कमजोर होना और वर्षा के पैटर्न में बदलाव शामिल है। उत्तर में भारत में खाद्य सुरक्षा (कृषि उत्पादन, फसल की पैदावार) और जल संसाधनों (जलाशय के स्तर, पेयजल आपूर्ति, बिजली उत्पादन) पर अल नीनो के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों का समालोचनात्मक विश्लेषण करना चाहिए। इसमें 2002 और 2009 के सूखे जैसे ऐतिहासिक संदर्भों और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों (जैसे कृषि मंत्रालय द्वारा उच्च-प्राथमिकता वाले जिलों की पहचान) का भी उल्लेख किया जा सकता है।

स्रोत: orissapost.com


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