12 Sep सोशल मीडिया से बढ़ रही बाल विवाह की चुनौती: जानिए क्या है समाधान?
✎ डिजिटल युग में बाल विवाह की बदलती प्रकृति से निपटने के लिए ऑनलाइन सुरक्षा जागरूकता, समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारियों की नियुक्ति और जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण के साथ एक बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — समाज एवं सामाजिक मुद्दे | GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा
- Prelims: बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS), बाल संरक्षण, साइबर अपराध, तस्करी, संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA), बाल विवाह निषेध अधिकारी (CMPO), बाल विवाह मुक्त भारत अभियान
- Essay: भारत में बाल विवाह: एक सामाजिक बुराई और उसके समाधान, डिजिटल युग में सामाजिक चुनौतियाँ: अवसर और खतरे
त्वरित पुनरावृत्ति: डिजिटल युग में बाल विवाह की बदलती प्रकृति से निपटने के लिए ऑनलाइन सुरक्षा जागरूकता, समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारियों की नियुक्ति और जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण के साथ एक बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, चेन्नई में सोशल मीडिया के माध्यम से हुए एक बाल विवाह का मामला सामने आया, जिसमें एक 15 वर्षीय नेपाली लड़की ने एक 28 वर्षीय व्यक्ति से शादी कर ली थी। इस घटना ने डिजिटल संचार के बढ़ते उपयोग और बाल विवाह के तरीकों में आ रहे बदलावों पर चिंता व्यक्त की है, जिससे कमजोर लड़कियाँ ऑनलाइन माध्यमों से बाल विवाह और तस्करी के प्रति अधिक संवेदनशील हो रही हैं। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस ‘सीमा रहित अपराध’ से निपटने के लिए ‘सीमा रहित प्रतिक्रिया’ की आवश्यकता पर बल दिया है।
पृष्ठभूमि
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-2019-21) के अनुसार, भारत में बाल विवाह का राष्ट्रीय औसत 23% है, जिसमें 10% की गिरावट दर्ज की गई है।
- बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (Prohibition of Child Marriage Act, 2006) के तहत बाल विवाह को रोकने, साक्ष्य एकत्र करने और जागरूकता बढ़ाने के लिए बाल विवाह निषेध अधिकारी (Child Marriage Prohibition Officers – CMPOs) नियुक्त किए जाते हैं।
- कई राज्यों में जिला समाज कल्याण अधिकारी (District Social Welfare Officer – DSWO) को CMPO के रूप में अधिसूचित किया गया है, लेकिन विशेषज्ञ एक समर्पित CMPO की नियुक्ति की वकालत करते हैं।
- महामारी के दौरान, ‘सेव द चिल्ड्रन’ (Save the Children) नामक एक गैर-सरकारी संगठन के अध्ययन में पाया गया कि भारत में लड़कियों को बाल विवाह और तस्करी का ऑनलाइन जोखिम अधिक था।
बाल विवाह क्या है?
- बाल विवाह एक ऐसी प्रथा है जिसमें 18 वर्ष से कम आयु की लड़की या 21 वर्ष से कम आयु के लड़के का विवाह कर दिया जाता है।
- यह प्रथा बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा का अधिकार शामिल है।
- भारत में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित करता है और इसके लिए दंड का प्रावधान करता है।
- बाल विवाह के सामाजिक-आर्थिक कारण गरीबी, अशिक्षा, लैंगिक असमानता, सामाजिक मानदंड और परंपराएँ हैं।
- ऑनलाइन माध्यमों के उदय ने बाल विवाह के तरीकों को बदल दिया है, जिससे कमजोर बच्चों को बहकाने या फंसाने के नए रास्ते खुल गए हैं।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन डेटिंग ऐप्स बच्चों को यौन शोषण, तस्करी और जबरन विवाह के जोखिम में डाल सकते हैं।
- बाल विवाह निषेध अधिकारी (CMPO) की भूमिका बाल विवाह को रोकने, मामलों की रिपोर्ट करने और जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण है।
- ग्राम पंचायतों को भी बाल विवाह रोकने के लिए सशक्त बनाना आवश्यक है, क्योंकि वे जमीनी स्तर पर कार्य करती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग | बाल विवाह के तौर-तरीकों में बदलाव, बच्चों की संवेदनशीलता में वृद्धि। |
| अंतर्राष्ट्रीय आयाम | सोशल मीडिया के माध्यम से सीमा पार बाल विवाह और तस्करी की घटनाओं में वृद्धि। |
| महामारी का प्रभाव | कोविड-19 महामारी के दौरान लड़कियों के लिए ऑनलाइन बाल विवाह और तस्करी का अधिक जोखिम। |
| बाल विवाह निषेध अधिकारियों (CMPOs) की भूमिका | बाल विवाह को रोकने, जागरूकता बढ़ाने और डेटा रिपोर्ट करने में महत्वपूर्ण, लेकिन कई राज्यों में समर्पित अधिकारियों की कमी। |
| पंचायती राज संस्थाओं का सशक्तिकरण | स्थानीय स्तर पर बाल विवाह की रोकथाम के लिए ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाना आवश्यक। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- बाल विवाह बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डालता है, जिससे शिक्षा और विकास के अवसर बाधित होते हैं।
- यह लैंगिक असमानता को बढ़ावा देता है और लड़कियों को कम उम्र में मातृत्व, स्वास्थ्य जोखिमों और घरेलू हिंसा के प्रति संवेदनशील बनाता है।
कानूनी और शासनिक महत्व
- बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (Prohibition of Child Marriage Act, 2006) जैसे कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन में चुनौतियाँ उजागर होती हैं, विशेषकर डिजिटल युग में।
- समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारियों की कमी और मौजूदा अधिकारियों पर अतिरिक्त कार्यभार, कानून के प्रवर्तन को कमजोर करता है, जिससे शासन में अंतराल पैदा होता है।
तकनीकी और सुरक्षा महत्व
- सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग बच्चों को बाल विवाह, यौन शोषण और तस्करी के लिए फंसाने में किया जा रहा है, जिससे ऑनलाइन सुरक्षा के नए आयाम सामने आए हैं।
- डिजिटल संचार में प्रगति ने अपराध के तरीकों को बदल दिया है, जिससे सीमा पार अपराधों से निपटने के लिए ‘सीमा रहित प्रतिक्रिया’ की आवश्यकता है।
चुनौतियाँ
1. ऑनलाइन माध्यमों का दुरुपयोग
- सोशल मीडिया और ऑनलाइन डेटिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग बच्चों को बाल विवाह के लिए लुभाने और फंसाने के लिए किया जा रहा है।
- डिजिटल संचार की गुमनामी और पहुंच अपराधियों को बच्चों तक पहुंचने और उन्हें प्रभावित करने के नए तरीके प्रदान करती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक मुद्दे, साइबर सुरक्षा
2. अंतर्राष्ट्रीय और सीमा पार अपराध
- ऑनलाइन माध्यमों से बच्चों की तस्करी और बाल विवाह अब भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता बढ़ गई है।
- विभिन्न देशों के कानूनों और प्रवर्तन तंत्रों में भिन्नता सीमा पार अपराधों से निपटने में बाधा डालती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, आंतरिक सुरक्षा
3. कानूनी और संस्थागत कमियाँ
- कई राज्यों में समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारियों (CMPOs) की कमी है, जिससे कानून का प्रभावी प्रवर्तन बाधित होता है।
- मौजूदा अधिकारियों पर बाल विवाह निषेध का अतिरिक्त कार्यभार उनके मुख्य कर्तव्यों को प्रभावित करता है, जिससे जवाबदेही कम होती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
4. जागरूकता और शिक्षा का अभाव
- बच्चों और अभिभावकों में ऑनलाइन सुरक्षा और बाल विवाह के खतरों के बारे में जागरूकता की कमी है।
- ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में, जहां शिक्षा का स्तर कम है, वहां बाल विवाह की प्रथा अभी भी प्रबल है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक मुद्दे, शिक्षा
5. डेटा और रिपोर्टिंग में अंतराल
- बाल विवाह के मामलों की पहचान और रिपोर्टिंग में अभी भी अंतराल हैं, खासकर ऑनलाइन माध्यमों से होने वाले मामलों में।
- सटीक डेटा की कमी प्रभावी नीतियों और हस्तक्षेपों को तैयार करने में बाधा डालती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| सोशल मीडिया का दुरुपयोग | बच्चों को बाल विवाह और तस्करी के लिए ऑनलाइन फंसाया जाना। |
| समर्पित CMPOs की कमी | बाल विवाह निषेध अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा। |
| सीमा पार अपराध | ऑनलाइन माध्यमों से बच्चों की तस्करी और विवाह का अंतर्राष्ट्रीय आयाम। |
| जागरूकता का अभाव | ऑनलाइन जोखिमों और बाल विवाह के परिणामों के बारे में बच्चों और समुदायों में कम जानकारी। |
| संस्थागत क्षमता | स्थानीय स्तर पर बाल विवाह को रोकने और रिपोर्ट करने के लिए ग्राम पंचायतों जैसी संस्थाओं का अपर्याप्त सशक्तिकरण। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- बाल विवाह मुक्त भारत अभियान
आगे की राह
- ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की निगरानी और विनियमन को मजबूत करना ताकि बाल विवाह और तस्करी के लिए उनके दुरुपयोग को रोका जा सके।
- समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारियों (CMPOs) की नियुक्ति सुनिश्चित करना और उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण व संसाधन प्रदान करना।
- बच्चों, अभिभावकों और समुदायों के बीच ऑनलाइन सुरक्षा और बाल विवाह के खतरों के बारे में व्यापक जागरूकता अभियान चलाना।
- ग्राम पंचायतों और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को बाल विवाह की रोकथाम और रिपोर्टिंग में सशक्त बनाना।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना ताकि सीमा पार बाल विवाह और तस्करी के मामलों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।
- स्कूलों और कॉलेजों में बाल विवाह निषेध अधिकारियों को शामिल करना, जैसा कि कर्नाटक में किया गया है, ताकि शिक्षा संस्थानों में जागरूकता बढ़ाई जा सके।
- बाल विवाह के मामलों की पहचान, रिपोर्टिंग और डेटा संग्रह के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
बाल विवाह · ऑनलाइन जोखिम · सामाजिक मीडिया · बाल संरक्षण · बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम · राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण · बाल विवाह मुक्त भारत अभियान · बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी · महिलाओं और बच्चों का कल्याण · डिजिटल संचार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (बच्चों के सुरक्षित जीवन का अधिकार)
- अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार (बाल विवाह से शिक्षा बाधित होती है)
- अनुच्छेद 23: मानव दुर्व्यापार और बलात्श्रम का प्रतिषेध (तस्करी और शोषण से सुरक्षा)
- अनुच्छेद 24: कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध (बच्चों के शोषण के खिलाफ सुरक्षा)
- अनुच्छेद 39(f): बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर (राज्य का नीति निदेशक सिद्धांत)
अवधारणा प्रवाह
सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग → बच्चों का ऑनलाइन माध्यमों से संपर्क → बाल विवाह के लिए ऑनलाइन प्रलोभन/फंसाना → बाल विवाह की घटनाओं में वृद्धि (विशेषकर सीमा पार) → बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन और सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) के अनुसार, भारत में बाल विवाह की राष्ट्रीय औसत दर 23% है।
2. बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (CMPO) की नियुक्ति केवल केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
3. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 27 नवंबर को बाल, प्रारंभिक और जबरन विवाह उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीनों
- कोई भी नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) के अनुसार, भारत में बाल विवाह की राष्ट्रीय औसत दर 23% है। कथन 2 गलत है। बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (CMPO) की नियुक्ति राज्य सरकारों द्वारा की जाती है, जैसा कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 में प्रावधान है। कथन 3 गलत है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर, 2026 को 27 नवंबर को बाल, प्रारंभिक और जबरन विवाह उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया।
Q2. बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
- यह अधिनियम केवल लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित करता है।
- यह अधिनियम बाल विवाह को शून्य घोषित करता है।
- इस अधिनियम के तहत बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (CMPO) की नियुक्ति का प्रावधान है।
- यह अधिनियम बाल विवाह के मामलों में केवल वित्तीय दंड का प्रावधान करता है।
उत्तर: इस अधिनियम के तहत बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (CMPO) की नियुक्ति का प्रावधान है। — बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006, बाल विवाह को रोकने और दंडित करने के लिए बनाया गया है। इसमें बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (CMPO) की नियुक्ति का प्रावधान है जो बाल विवाह को रोकने, साक्ष्य एकत्र करने और जागरूकता बढ़ाने का कार्य करते हैं। यह अधिनियम विवाह की न्यूनतम आयु लड़कों के लिए 21 वर्ष और लड़कियों के लिए 18 वर्ष निर्धारित करता है, लेकिन बाल विवाह को शून्य घोषित नहीं करता, बल्कि इसे ‘शून्यकरणीय’ (voidable) बनाता है, जिसे पीड़ित पक्ष द्वारा रद्द किया जा सकता है। इसमें कारावास और जुर्माने दोनों का प्रावधान है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में बाल विवाह की रोकथाम में सामाजिक मीडिया की भूमिका और चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन में आने वाली बाधाओं पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा:
1. परिचय: बाल विवाह की संक्षिप्त परिभाषा और भारत में इसकी वर्तमान स्थिति (NFHS-5 डेटा) का उल्लेख। सामाजिक मीडिया के बढ़ते उपयोग और बाल विवाह के नए तरीकों पर प्रकाश।
2. सामाजिक मीडिया की भूमिका (सकारात्मक और नकारात्मक):
a. नकारात्मक भूमिका (चुनौतियाँ): ऑनलाइन ग्रूमिंग, बच्चों को बहकाना, दूरियों के बावजूद विवाह की संभावना, तस्करी के लिए भेद्यता में वृद्धि (विशेषकर महामारी के दौरान), गोपनीयता का अभाव। उदाहरण: चेन्नई में इंस्टाग्राम के माध्यम से हुए विवाह का मामला।
b. सकारात्मक भूमिका (संभावित): जागरूकता बढ़ाना, हेल्पलाइन नंबरों का प्रचार, पीड़ितों तक पहुंच बनाने में मदद (जैसे नेपाल में बहन को फोन करने का मामला)।
3. बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन में बाधाएँ:
a. बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों (CMPOs) की कमी: कई राज्यों में समर्पित CMPO का अभाव, मौजूदा अधिकारियों पर अतिरिक्त कार्यभार (जैसे जिला समाज कल्याण अधिकारी)।
b. जागरूकता का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में अधिनियम और उसके प्रावधानों की जानकारी की कमी।
c. सामाजिक-सांस्कृतिक कारक: पारंपरिक प्रथाएँ, गरीबी, शिक्षा की कमी, लैंगिक असमानता।
d. सीमा पार अपराध: ऑनलाइन माध्यमों से होने वाली तस्करी और विवाह में अंतर-राज्यीय/अंतर्राष्ट्रीय समन्वय की कमी।
e. डेटा संग्रह और रिपोर्टिंग में अंतराल।
4. आगे की राह/सुझाव:
a. समर्पित CMPO की नियुक्ति (सर्वोच्च न्यायालय की सिफारिशों के आधार पर)।
b. ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना।
c. ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।
d. ‘बाल विवाह मुक्त भारत अभियान’ (2030 तक लक्ष्य) जैसे अभियानों को मजबूत करना।
e. अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।
5. निष्कर्ष: बाल विवाह एक बहुआयामी समस्या है जिसके समाधान के लिए कानून, जागरूकता, संस्थागत सुधार और तकनीकी समझ का समन्वित प्रयास आवश्यक है।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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