सुप्रीम कोर्ट ने वन कानून मामले को केवल 2023 अधिनियम के परिभाषा की वैधानिकता तक सीमित किया

Supreme Court limits forest law case to constitutional validity of definition under 2023 Act — diagram

सुप्रीम कोर्ट ने वन कानून मामले को केवल 2023 अधिनियम के परिभाषा की वैधानिकता तक सीमित किया

Map of Odisha highlighted on the map of India — वन संरक्षण अधिनियम 2023 वैधानिकता सुप्रीम कोर्ट
मानचित्र व माइंड-मैप: सुप्रीम कोर्ट का वन कानून पर संविधानिक वैधता संबंधी फैसला

✎ सर्वोच्च न्यायालय वन (संरक्षण एवं संवर्धन) संशोधन अधिनियम, 2023 में वनों की परिभाषा की संवैधानिक वैधता की जांच कर रहा है, विशेष रूप से 1996 के टी.एन. गोदावरमन वाद में दी गई व्यापक परिभाषा के आलोक में।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, शासन और सामाजिक न्याय  |  GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
  • Prelims: वन (संरक्षण एवं संवर्धन) संशोधन अधिनियम, 2023, टी.एन. गोदावरमन वाद (1996), वनों की परिभाषा, अनुच्छेद 142, विशेषज्ञ समिति, सामुदायिक वन भूमि
  • Essay: पर्यावरण संरक्षण और विकास: संतुलन की चुनौतियाँ, न्यायिक सक्रियता और विधायी सर्वोच्चता

त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय वन (संरक्षण एवं संवर्धन) संशोधन अधिनियम, 2023 में वनों की परिभाषा की संवैधानिक वैधता की जांच कर रहा है, विशेष रूप से 1996 के टी.एन. गोदावरमन वाद में दी गई व्यापक परिभाषा के आलोक में।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में वन (संरक्षण एवं संवर्धन) संशोधन अधिनियम, 2023 के तहत वनों की परिभाषा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले मामले की सुनवाई को सीमित कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वह केवल अधिनियम में दी गई वनों की परिभाषा और 1996 के टी.एन. गोदावरमन मामले में न्यायालय द्वारा दी गई परिभाषा के बीच संभावित विरोधाभास पर विचार करेगा। व्यक्तिगत भूमि पार्सल से संबंधित विवादों को उच्च न्यायालयों द्वारा निपटाया जाएगा।

पृष्ठभूमि

  • सर्वोच्च न्यायालय ने 1996 के टी.एन. गोदावरमन बनाम भारत संघ वाद में वनों की एक व्यापक परिभाषा दी थी, जिसमें ‘वन’ शब्द को उसके शब्दकोश अर्थ में समझा गया था, भले ही वे सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज न हों।
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 को 2023 में संशोधित किया गया, जिसका नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 कर दिया गया।
  • संशोधन अधिनियम, 2023 की धारा 1ए वनों की परिभाषा को प्रतिबंधित करती है, जिसमें कुछ प्रकार की भूमि को इसके दायरे से बाहर रखा गया है, जैसे कि गैर-वन उपयोग के लिए परिवर्तित भूमि।
  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि नई परिभाषा 1996 के फैसले में दी गई व्यापक परिभाषा को कमजोर करती है और इससे वन आवरण का नुकसान हो सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विशेषज्ञ समितियाँ गठित करने और वन-जैसी भूमि, अवर्गीकृत वन भूमि और सामुदायिक वन भूमि सहित भूमियों का एक समेकित रिकॉर्ड तैयार करने का निर्देश दिया है, जैसा कि वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 16(1) के तहत आवश्यक है।
  • न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत भूमि पार्सल से संबंधित विवादों का निपटारा उच्च न्यायालयों द्वारा किया जाएगा, जो ऐतिहासिक उपयोग, भौगोलिक स्थिति और अन्य प्रासंगिक कारकों पर विचार करेंगे।

वन (संरक्षण एवं संवर्धन) संशोधन अधिनियम, 2023 क्या है?

  • यह अधिनियम वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 का संशोधित रूप है, जिसका उद्देश्य वनों के संरक्षण और संवर्धन को सुनिश्चित करना है।
  • अधिनियम की धारा 1ए वनों की परिभाषा को स्पष्ट करती है, जिसमें वन भूमि की कुछ श्रेणियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है, जैसे कि सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाओं के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि।
  • इसका उद्देश्य वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए अनुमोदन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना और विकास परियोजनाओं को गति देना है।
  • अधिनियम में ‘वन’ की परिभाषा को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं, विशेषकर 1996 के टी.एन. गोदावरमन मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्यापक परिभाषा के संदर्भ में।
  • यह अधिनियम उन भूमियों को भी शामिल करता है जो सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज नहीं हैं, लेकिन जिनकी पहचान विशेषज्ञ समिति द्वारा वन-जैसी भूमि के रूप में की गई है।
  • अधिनियम में क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) और वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए अन्य उपायों का प्रावधान है।
  • यह अधिनियम केंद्र सरकार को वन संरक्षण से संबंधित मामलों में नियम बनाने की शक्ति प्रदान करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 यह अधिनियम वन संरक्षण अधिनियम, 1980 में संशोधन करता है, जिसका उद्देश्य वन भूमि के उपयोग और संरक्षण को विनियमित करना है।
वनों की परिभाषा संशोधित अधिनियम में ‘वन’ की परिभाषा को सीमित किया गया है, जिससे कुछ प्रकार की भूमि, जिन्हें पहले वन माना जाता था, अब इस श्रेणी से बाहर हो सकती हैं।
टी.एन. गोदावरमन वाद (1996) सर्वोच्च न्यायालय ने इस वाद में वनों की व्यापक परिभाषा दी थी, जिसमें शब्दकोश अर्थ के अनुसार सभी वन-समान क्षेत्रों को शामिल किया गया था। यह संशोधन इस परिभाषा को प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञ समिति का गठन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वन-समान क्षेत्रों, अवर्गीकृत वन भूमि और सामुदायिक वन भूमि सहित सभी भूमियों का समेकित रिकॉर्ड तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समितियाँ गठित करनी होंगी।
व्यक्तिगत भूमि विवादों का निपटान सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत भूखंडों से संबंधित विवादों का निपटान उच्च न्यायालयों द्वारा किया जाएगा, जो ऐतिहासिक उपयोग और भौगोलिक स्थिति जैसे कारकों पर विचार करेंगे।

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • वनों की परिभाषा में बदलाव से वन आवरण (forest cover) के संरक्षण पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जिन्हें पहले वन माना जाता था लेकिन अब नहीं।

कानूनी और संवैधानिक महत्व

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अधिनियम की संवैधानिक वैधता की समीक्षा न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के सिद्धांत को रेखांकित करती है और विधायिका की शक्ति पर संवैधानिक सीमाओं को स्थापित करती है।

शासन और प्रशासन

  • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा विशेषज्ञ समितियों का गठन और भूमि रिकॉर्ड का समेकन वन भूमि के प्रभावी प्रबंधन और संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।

सामाजिक महत्व

  • वन-समान क्षेत्रों के वर्गीकरण में बदलाव से वन-निवासी समुदायों (forest-dwelling communities) के अधिकारों और आजीविका पर असर पड़ सकता है, जो इन भूमियों पर निर्भर करते हैं।

चुनौतियाँ

1. वनों की परिभाषा का विवाद

  • वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 में ‘वन’ की परिभाषा को सीमित करने से टी.एन. गोदावरमन वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्यापक परिभाषा के साथ विरोधाभास उत्पन्न होता है।

2. वन आवरण पर संभावित प्रभाव

  • यदि वन-समान क्षेत्रों को वन की श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है, तो इन भूमियों का गैर-वन उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जा सकता है, जिससे समग्र वन आवरण में कमी आ सकती है।

3. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए चुनौतियाँ

  • विशेषज्ञ समितियों का गठन और सभी वन-समान भूमियों का समेकित रिकॉर्ड तैयार करना एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है, जिसमें पर्याप्त संसाधनों और समन्वय की आवश्यकता होगी।

4. मुआवजा वनीकरण (Compensatory Afforestation) का मुद्दा

  • याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि गैर-वन भूमि का उपयोग मुआवजा वनीकरण के लिए किया जा सकता है, जिससे वास्तविक वन भूमि का नुकसान हो सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
वन की परिभाषा का संकुचन टी.एन. गोदावरमन वाद (1996) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्यापक परिभाषा का कमजोर होना।
वन आवरण में कमी का जोखिम कुछ वन-समान क्षेत्रों को अधिनियम के दायरे से बाहर करने से उनके गैर-वन उपयोग की संभावना और वन आवरण का नुकसान।
भूमि रिकॉर्ड का समेकन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सभी वन-समान भूमियों का सटीक और समयबद्ध रिकॉर्ड तैयार करने में प्रशासनिक चुनौतियाँ।
मुआवजा वनीकरण की प्रभावशीलता गैर-वन भूमि पर मुआवजा वनीकरण से वास्तविक वन पारिस्थितिकी तंत्र के नुकसान की भरपाई न हो पाना।
न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केवल संवैधानिक वैधता पर ध्यान केंद्रित करना, जबकि व्यक्तिगत भूमि विवादों को उच्च न्यायालयों को सौंपना।

आगे की राह

  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हुए, वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 के तहत ‘वन’ की परिभाषा को स्पष्ट और व्यापक बनाना, ताकि किसी भी वन-समान क्षेत्र का अपवर्जन न हो।
  • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा विशेषज्ञ समितियों का त्वरित गठन और वन-समान क्षेत्रों सहित सभी प्रकार की वन भूमियों का सटीक और अद्यतन रिकॉर्ड तैयार करना।
  • मुआवजा वनीकरण के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश स्थापित करना, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह वास्तविक वन पारिस्थितिकी तंत्र के नुकसान की प्रभावी ढंग से भरपाई करे।
  • वन-निवासी समुदायों के अधिकारों और आजीविका की रक्षा के लिए वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) के प्रावधानों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
  • वन संरक्षण और विकास में जनभागीदारी को बढ़ावा देना, विशेषकर स्थानीय समुदायों और ग्राम सभाओं को सशक्त बनाना।
  • वन संरक्षण कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 2023 · वन की परिभाषा · टी.एन. गोदावरमन मामला 1996 · संवैधानिक वैधता · न्यायिक समीक्षा · संघवाद · राज्यों की भूमिका · विशेषज्ञ समिति · वनीकरण · पर्यावरण संरक्षण

अवधारणा प्रवाह

वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 पारित हुआ।  →  अधिनियम में ‘वन’ की परिभाषा को सीमित किया गया।  →  याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में संवैधानिक वैधता को चुनौती दी।  →  सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक वैधता की समीक्षा करने का निर्णय लिया।  →  राज्यों को विशेषज्ञ समितियाँ गठित करने का निर्देश दिया गया।  →  व्यक्तिगत भूमि विवादों को उच्च न्यायालयों को भेजा गया।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 2023 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अधिनियम वनों की परिभाषा को टी.एन. गोदावरमन मामले (1996) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई परिभाषा तक सीमित करता है।
2. यह अधिनियम केंद्र सरकार को कुछ प्रकार की भूमि को वन भूमि के दायरे से बाहर रखने की शक्ति प्रदान करता है।
3. इस अधिनियम के तहत, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को वन जैसी भूमि का समेकित रिकॉर्ड तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समितियाँ गठित करनी होंगी।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि अधिनियम की परिभाषा को सर्वोच्च न्यायालय की परिभाषा से भिन्न बताया गया है, जिस पर संवैधानिक वैधता की चुनौती लंबित है। कथन 2 गलत है क्योंकि अधिनियम की धारा 1A वनों की परिभाषा को प्रतिबंधित करती है, जिससे कुछ प्रकार की भूमि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के दायरे से बाहर हो सकती है। कथन 3 सही है, क्योंकि नियम 16(1) के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विशेषज्ञ समिति द्वारा पहचान की गई वन जैसी भूमि का समेकित रिकॉर्ड तैयार करना अनिवार्य है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन ‘वन’ की परिभाषा के संदर्भ में टी.एन. गोदावरमन बनाम भारत संघ मामले (1996) के निर्णय का सही ढंग से वर्णन करता/करते है/हैं?
1. इस निर्णय ने ‘वन’ शब्द को उसके शाब्दिक अर्थ (dictionary sense) में समझा जाने पर जोर दिया।
2. इस निर्णय ने केवल अधिसूचित वनों को ही वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के दायरे में माना।
3. इस निर्णय ने निजी वनों को वन भूमि के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया।
सही विकल्प का चयन कीजिए:

  1. केवल 1
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 — कथन 1 सही है। टी.एन. गोदावरमन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि ‘वन’ शब्द को उसके शाब्दिक अर्थ में समझा जाना चाहिए, जिसमें सभी प्रकार के वन शामिल हैं, चाहे वे अधिसूचित हों या नहीं। कथन 2 और 3 गलत हैं क्योंकि इस निर्णय ने अधिसूचित और गैर-अधिसूचित दोनों प्रकार के वनों, साथ ही निजी वनों को भी वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के दायरे में लाया था।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 2023 के तहत ‘वन’ की परिभाषा से संबंधित संवैधानिक चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, टी.एन. गोदावरमन मामले (1996) में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के महत्व पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 2023 का संक्षिप्त परिचय और इसके तहत ‘वन’ की परिभाषा पर उठे विवाद का उल्लेख।
2. संवैधानिक चुनौती: अधिनियम की धारा 1A द्वारा ‘वन’ की परिभाषा को प्रतिबंधित करने और इसके संवैधानिक वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती का विवरण। याचिकाकर्ताओं के मुख्य तर्कों को शामिल करें (जैसे कि परिभाषा का कमजोर होना, वन कवरेज का नुकसान)।
3. टी.एन. गोदावरमन मामले (1996) का महत्व: इस ऐतिहासिक निर्णय का विस्तृत वर्णन, जिसमें ‘वन’ की शाब्दिक परिभाषा, अधिसूचित और गैर-अधिसूचित वनों को शामिल करना, और वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के दायरे का विस्तार करना शामिल है। यह बताएं कि कैसे इस निर्णय ने वन संरक्षण के दायरे को व्यापक बनाया।
4. तुलना और विरोधाभास: 2023 अधिनियम की परिभाषा और 1996 के निर्णय की परिभाषा के बीच संभावित विरोधाभासों और उनके निहितार्थों का विश्लेषण।
5. न्यायिक समीक्षा की भूमिका: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक वैधता की जांच और न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत पर चर्चा।
6. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की भूमिका: नियम 16(1) के तहत विशेषज्ञ समितियों के गठन और वन जैसी भूमि के रिकॉर्ड तैयार करने के महत्व पर प्रकाश।
7. निष्कर्ष: वन संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के संभावित प्रभावों और भविष्य की राह पर एक संतुलित दृष्टिकोण।

स्रोत: orissapost.com


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