19 Sep यूपीएससी तैयारी: आरबीआई द्वारा 91, 182 और 364 दिनों के ट्रेजरी बिलों की नीलामी
✎ ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक, शून्य-कूपन ऋण साधन हैं जो सरकार की अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने और राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने में मदद करते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। सरकारी बजट के घटक तथा राजकोषीय नीति। | GS Paper III — निवेश मॉडल।
- Prelims: ट्रेजरी बिल (T-Bills), सरकारी प्रतिभूतियां (Government Securities – G-Secs), राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit), मुद्रास्फीति (Inflation), खुला बाज़ार परिचालन (Open Market Operations – OMO), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), ई-कुबेर प्रणाली (E-Kuber System), खुदरा प्रत्यक्ष योजना (Retail Direct Scheme)
- Essay: भारत में आर्थिक स्थिरता और विकास में सरकारी वित्त प्रबंधन की भूमिका।, मुद्रास्फीति नियंत्रण और राजकोषीय अनुशासन: चुनौतियाँ और समाधान।
त्वरित पुनरावृत्ति: ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक, शून्य-कूपन ऋण साधन हैं जो सरकार की अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने और राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने में मदद करते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय ट्रेजरी बिलों (Treasury Bills) की नीलामी की घोषणा की है। यह नीलामी भारत सरकार की ओर से की जा रही है, जिसका कुल अधिसूचित मूल्य 24,000 करोड़ रुपये है। यह कदम सरकार की अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने और बाज़ार से धन जुटाने के लिए महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- भारत सरकार अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाज़ार से ऋण लेती है। यह ऋण मुख्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities – G-Secs) के माध्यम से जुटाया जाता है।
- सरकारी प्रतिभूतियां दो प्रकार की होती हैं: ट्रेजरी बिल (अल्पकालिक) और दिनांकित प्रतिभूतियां (दीर्घकालिक)।
- ट्रेजरी बिल अल्पकालिक ऋण साधन होते हैं जिनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है। भारत में, ट्रेजरी बिल 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन की परिपक्वता अवधि में जारी किए जाते हैं।
- ये ‘शून्य-कूपन’ प्रतिभूतियां होती हैं, जिसका अर्थ है कि इन पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता। इन्हें अंकित मूल्य (face value) से छूट पर जारी किया जाता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य पर भुनाया जाता है।
- RBI सरकार के बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है। यह सरकार की ओर से ट्रेजरी बिलों और अन्य सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी करता है।
- इन नीलामियों में बैंक, वित्तीय संस्थान, राज्य सरकारें, भविष्य निधि और अब खुदरा निवेशक भी भाग ले सकते हैं।
- खुदरा निवेशक RBI की खुदरा प्रत्यक्ष योजना (Retail Direct Scheme) के माध्यम से गैर-प्रतिस्पर्धी बोली (non-competitive bidding) के आधार पर भाग ले सकते हैं।
- इन नीलामियों से प्राप्त धन का उपयोग सरकार अपने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को वित्तपोषित करने और अपने दैनिक व्यय को पूरा करने के लिए करती है।
- ट्रेजरी बिलों की नीलामी सरकार के ऋण प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह अर्थव्यवस्था में तरलता (liquidity) और ब्याज दरों को भी प्रभावित करती है।
ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) क्या हैं?
- ट्रेजरी बिल (T-Bills) भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक ऋण साधन हैं।
- इनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है, जो वर्तमान में 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन होती है।
- इन्हें भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा सरकार की ओर से नीलामी के माध्यम से जारी किया जाता है।
- ट्रेजरी बिल ‘शून्य-कूपन’ प्रतिभूतियां होती हैं, जिसका अर्थ है कि इन पर कोई आवधिक ब्याज भुगतान नहीं होता है।
- इन्हें अंकित मूल्य (face value) से छूट (discount) पर जारी किया जाता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य पर भुनाया जाता है, जिससे निवेशक को लाभ होता है।
- ये अत्यधिक तरल साधन होते हैं और इन्हें द्वितीयक बाज़ार (secondary market) में भी खरीदा और बेचा जा सकता है।
- ट्रेजरी बिलों का उपयोग सरकार द्वारा अपने अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने और राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने के लिए किया जाता है।
- भारत में, राज्य सरकारें, केंद्र शासित प्रदेश, पात्र भविष्य निधि, विदेशी केंद्रीय बैंक और अब खुदरा निवेशक भी इन नीलामियों में भाग ले सकते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) की नीलामी | सरकार के अल्पकालिक ऋण प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण साधन। |
| 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय अवधि | विभिन्न परिपक्वता अवधियों के माध्यम से सरकार की विविध वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना। |
| ₹24,000 करोड़ की कुल अधिसूचित राशि | सरकार की तात्कालिक नकदी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक धन जुटाना। |
| गैर-प्रतिस्पर्धी बोली (Non-Competitive Bidding) सुविधा | छोटे निवेशकों (व्यक्तियों, राज्य सरकारों, भविष्य निधि) की भागीदारी को प्रोत्साहित करना, जिससे बाजार में व्यापक आधार मिलता है। |
| RBI रिटेल डायरेक्ट पोर्टल के माध्यम से भागीदारी | खुदरा निवेशकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश को सुलभ और सुविधाजनक बनाना। |
| एकाधिक मूल्य विधि (Multiple Price Method) का उपयोग | बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण सुनिश्चित करना, जिससे निवेशकों को उनकी बोली के अनुसार प्रतिभूतियां प्राप्त होती हैं। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- ट्रेजरी बिलों की नीलामी सरकार के राजकोषीय प्रबंधन (Fiscal Management) का एक अभिन्न अंग है। यह सरकार को अपने अल्पकालिक व्यय को पूरा करने और अस्थायी राजस्व-व्यय असंतुलन को प्रबंधित करने के लिए धन जुटाने में मदद करती है।
- यह भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) द्वारा मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के संचालन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह बाजार में तरलता (Liquidity) को प्रभावित करता है।
- ट्रेजरी बिलों की उपज (Yield) अल्पकालिक ब्याज दरों के लिए एक बेंचमार्क के रूप में कार्य करती है, जो अर्थव्यवस्था में अन्य ऋण उत्पादों की लागत को प्रभावित करती है।
वित्तीय बाजार महत्व
- ट्रेजरी बिल एक सुरक्षित और तरल निवेश विकल्प प्रदान करते हैं, जो निवेशकों को कम जोखिम पर रिटर्न अर्जित करने का अवसर देते हैं।
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली और RBI रिटेल डायरेक्ट पोर्टल के माध्यम से व्यक्तियों की भागीदारी वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ावा देती है, जिससे आम नागरिक भी सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश कर सकते हैं।
- यह नीलामी प्रक्रिया भारत के ऋण बाजार की गहराई और परिपक्वता को दर्शाती है, जो घरेलू और विदेशी निवेशकों के विश्वास को बढ़ाती है।
शासन और पारदर्शिता
- RBI द्वारा नीलामी प्रक्रिया का संचालन सरकार के ऋण प्रबंधन में पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करता है।
- इलेक्ट्रॉनिक बोली प्रणाली (E-Kuber system) और समय-सीमा का पालन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और निष्पक्ष बनाता है।
चुनौतियाँ
1. बढ़ती ब्याज दरें
- यदि बाजार में ब्याज दरें बढ़ रही हैं, तो सरकार को ट्रेजरी बिलों पर अधिक उपज देनी पड़ सकती है, जिससे उसके ऋण की लागत बढ़ जाएगी।
- उच्च ब्याज दरें निजी निवेश को भी हतोत्साहित कर सकती हैं, क्योंकि कंपनियों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति, सरकारी वित्त
2. तरलता प्रबंधन
- RBI को बाजार में पर्याप्त तरलता सुनिश्चित करनी होती है ताकि नीलामी सफल हो सके, लेकिन अत्यधिक तरलता मुद्रास्फीति (Inflation) का कारण बन सकती है।
- तरलता के अचानक उतार-चढ़ाव से ट्रेजरी बिलों की मांग और मूल्य निर्धारण प्रभावित हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति, वित्तीय बाजार
3. राजकोषीय अनुशासन
- सरकार को अपने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित करने की आवश्यकता है, क्योंकि लगातार उच्च घाटा अधिक उधार लेने की आवश्यकता को जन्म देता है, जिससे ऋण का बोझ बढ़ता है।
- अत्यधिक उधार लेने से भविष्य की पीढ़ियों पर ऋण का बोझ बढ़ सकता है और आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: सरकारी बजट, राजकोषीय नीति
4. खुदरा निवेशकों की सीमित भागीदारी
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली और रिटेल डायरेक्ट पोर्टल के बावजूद, कुल अधिसूचित राशि के मुकाबले खुदरा निवेशकों की भागीदारी अभी भी सीमित हो सकती है।
- जागरूकता की कमी या प्रक्रिया की जटिलता छोटे निवेशकों को दूर रख सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: वित्तीय समावेशन, पूंजी बाजार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| उच्च सरकारी उधार | बढ़ता राजकोषीय घाटा और भविष्य की पीढ़ियों पर ऋण का बोझ। |
| ब्याज दरों में अस्थिरता | सरकार के लिए उधार लेने की लागत में वृद्धि और निजी निवेश पर संभावित नकारात्मक प्रभाव। |
| बाजार तरलता का प्रबंधन | मुद्रास्फीति के दबाव या ऋण बाजार में तनाव के जोखिम। |
| खुदरा भागीदारी बढ़ाना | छोटे निवेशकों तक पहुंच और जागरूकता की कमी। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- RBI रिटेल डायरेक्ट योजना (RBI Retail Direct Scheme)
आगे की राह
- सरकार को राजकोषीय घाटे को कम करने और ऋण स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए विवेकपूर्ण राजकोषीय नीति अपनानी चाहिए।
- RBI को बाजार में तरलता का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करना चाहिए ताकि ब्याज दरों में अत्यधिक अस्थिरता से बचा जा सके।
- खुदरा निवेशकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश को और अधिक सरल और सुलभ बनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।
- सरकारी ऋण प्रबंधन में पारदर्शिता और दक्षता बनाए रखने के लिए तकनीकी उन्नयन और प्रक्रिया सुधार जारी रखने चाहिए।
- दीर्घकालिक ऋण प्रबंधन रणनीति विकसित की जानी चाहिए जो अल्पकालिक उधार पर निर्भरता को कम करे और विभिन्न परिपक्वता अवधियों में विविधता लाए।
- सरकारी प्रतिभूतियों के लिए एक मजबूत द्वितीयक बाजार (Secondary Market) विकसित करना चाहिए ताकि निवेशकों के लिए तरलता सुनिश्चित हो सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
ट्रेजरी बिल · सरकारी प्रतिभूतियाँ · राजकोषीय नीति · मौद्रिक नीति · भारतीय रिज़र्व बैंक · खुले बाजार परिचालन · सरकारी ऋण प्रबंधन · मुद्रा बाजार · राजकोषीय घाटा · निवेश के साधन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद’: ‘अनुच्छेद 292’, ‘नोट’: ‘केंद्र सरकार द्वारा उधार लेने की शक्ति’}
- {‘अनुच्छेद’: ‘अनुच्छेद 293’, ‘नोट’: ‘राज्य सरकारों द्वारा उधार लेने की शक्ति’}
- {‘अनुच्छेद’: ‘अनुच्छेद 112’, ‘नोट’: ‘वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) का प्रावधान’}
अवधारणा प्रवाह
सरकार को धन की आवश्यकता होती है (राजकोषीय घाटा) → RBI ट्रेजरी बिलों की नीलामी की घोषणा करता है → निवेशक (बैंक, वित्तीय संस्थान, व्यक्ति) बोली लगाते हैं → RBI सफल बोलीदाताओं को ट्रेजरी बिल आवंटित करता है → सरकार को धन प्राप्त होता है, निवेशक प्रतिभूतियां प्राप्त करते हैं → परिपक्वता पर, सरकार मूलधन का भुगतान करती है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) भारत सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले अल्पकालिक ऋण साधन हैं।
2. ट्रेजरी बिल केवल 91 दिन और 364 दिन की परिपक्वता अवधि के लिए जारी किए जाते हैं।
3. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत सरकार की ओर से ट्रेजरी बिलों की नीलामी करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले अल्पकालिक ऋण साधन हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि ट्रेजरी बिल 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन की परिपक्वता अवधि के लिए जारी किए जाते हैं। कथन 3 सही है क्योंकि RBI भारत सरकार के ऋण प्रबंधक के रूप में ट्रेजरी बिलों की नीलामी करता है। अतः, केवल दो कथन सही हैं।
Q2. ट्रेजरी बिलों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. ट्रेजरी बिलों को ‘शून्य कूपन बॉन्ड’ (Zero Coupon Bonds) भी कहा जाता है क्योंकि उन पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता है।
2. ट्रेजरी बिलों को अंकित मूल्य (Face Value) से कम कीमत पर जारी किया जाता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य पर भुनाया जाता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: 1 और 2 दोनों — कथन 1 सही है। ट्रेजरी बिलों को शून्य कूपन बॉन्ड कहा जाता है क्योंकि उन पर कोई प्रत्यक्ष ब्याज भुगतान नहीं होता है। कथन 2 भी सही है। निवेशक इन्हें अंकित मूल्य से कम पर खरीदते हैं और परिपक्वता पर अंकित मूल्य प्राप्त करते हैं, जिससे उन्हें लाभ होता है।
Q3. भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ट्रेजरी बिलों की नीलामी का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
- देश में मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करना।
- सरकार के अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना।
- वाणिज्यिक बैंकों को ऋण उपलब्ध कराना।
- विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को बढ़ाना।
उत्तर: सरकार के अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना। — ट्रेजरी बिल सरकार के अल्पकालिक ऋण साधन हैं। RBI सरकार की ओर से इनकी नीलामी करके सरकार की अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करता है, जैसे कि राजकोषीय घाटे का प्रबंधन।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत सरकार के ऋण प्रबंधन में ट्रेजरी बिलों की भूमिका का परीक्षण कीजिए। साथ ही, भारतीय अर्थव्यवस्था पर इनके व्यापक प्रभावों की चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में ट्रेजरी बिलों की परिभाषा, उनकी परिपक्वता अवधि और वे कैसे काम करते हैं, इसका संक्षिप्त परिचय शामिल होना चाहिए।
मुख्य भाग में, भारत सरकार के ऋण प्रबंधन में ट्रेजरी बिलों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा करें, जिसमें शामिल हैं:
1. अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति: सरकार के दैनिक नकदी प्रवाह (Cash Flow) और अस्थायी राजकोषीय घाटे को पूरा करना।
2. राजकोषीय घाटे का प्रबंधन: बजट घाटे के वित्तपोषण में सहायता।
3. मुद्रा बाजार का विकास: अल्पकालिक ऋण बाजार में तरलता (Liquidity) प्रदान करना।
4. बेंचमार्क दर: अन्य अल्पकालिक दरों के लिए एक संदर्भ बिंदु प्रदान करना।
5. RBI की भूमिका: सरकार के ऋण प्रबंधक के रूप में RBI की नीलामी प्रक्रिया।
दूसरे भाग में, भारतीय अर्थव्यवस्था पर ट्रेजरी बिलों के व्यापक प्रभावों पर चर्चा करें:
1. मौद्रिक नीति पर प्रभाव: RBI द्वारा खुले बाजार परिचालन (Open Market Operations) के माध्यम से तरलता प्रबंधन।
2. ब्याज दरों पर प्रभाव: ट्रेजरी बिलों की उपज (Yield) का अन्य ब्याज दरों पर प्रभाव।
3. निवेशकों के लिए विकल्प: बैंकों, वित्तीय संस्थानों और खुदरा निवेशकों के लिए सुरक्षित अल्पकालिक निवेश विकल्प।
4. वित्तीय स्थिरता: सरकार के ऋण को व्यवस्थित तरीके से प्रबंधित करके वित्तीय स्थिरता में योगदान।
5. मुद्रास्फीति पर प्रभाव: अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी खर्च और तरलता के माध्यम से मुद्रास्फीति पर प्रभाव।
निष्कर्ष में, ट्रेजरी बिलों के महत्व को संक्षेप में प्रस्तुत करें और सरकारी वित्त और व्यापक अर्थव्यवस्था के बीच उनके संबंध पर जोर दें।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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