19 Sep राष्ट्रपति ने 14 न्यायाधीशों की उच्च न्यायालयों में नियुक्ति की, जानिए कौन-कौन शामिल
✎ उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श के बाद की जाती है, जिसमें कॉलेजियम प्रणाली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यपालिका और न्यायपालिका का संगठन और कार्यप्रणाली
- Prelims: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, अपर न्यायाधीश, भारत का संविधान, अनुच्छेद 217, अनुच्छेद 224, कॉलेजियम प्रणाली, भारत के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की शक्तियाँ
- Essay: भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही, संविधान में निहित शक्तियों का पृथक्करण और उसका क्रियान्वयन
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श के बाद की जाती है, जिसमें कॉलेजियम प्रणाली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
राष्ट्रपति ने हाल ही में दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, झारखंड और कर्नाटक उच्च न्यायालयों में 14 न्यायिक अधिकारियों को न्यायाधीश और अपर न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया है। यह नियुक्तियाँ भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की गई हैं, जो उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान है। इस अनुच्छेद के अनुसार, उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), संबंधित राज्य के राज्यपाल और मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की जाती है।
- उच्च न्यायालय में अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 224 में है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को किसी उच्च न्यायालय में अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की शक्ति देता है, यदि किसी अस्थायी अवधि के लिए न्यायालय के कार्य में वृद्धि हुई हो या कार्य का बकाया हो।
- न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) विकसित हुई है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। यह प्रणाली उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के संबंध में सिफारिशें करती है।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए एक व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए और कम से कम दस वर्षों तक भारत के किसी न्यायिक पद पर कार्य किया हो या कम से कम दस वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो।
- अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए की जाती है। इन नियुक्तियों का उद्देश्य न्यायालयों में लंबित मामलों को कम करना और न्यायिक प्रक्रिया को गति देना है।
- न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों की भूमिका होती है, जो भारतीय संविधान में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को दर्शाती है।
उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श के बाद की जाती है।
- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की जाती है।
- कॉलेजियम की भूमिका: सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करता है।
- राज्य सरकार की भूमिका: संबंधित राज्य सरकार भी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नामों का सुझाव दे सकती है, जिसे कॉलेजियम द्वारा विचार किया जाता है।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और पद की शर्तों से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 224 अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
- कार्यकाल: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं। अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए होती है।
- योग्यताएँ: न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए, कम से कम दस वर्षों तक न्यायिक पद धारण किया हो या किसी उच्च न्यायालय में दस वर्षों तक अधिवक्ता रहा हो।
- निष्कासन: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जिससे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, यानी संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित प्रस्ताव के आधार पर राष्ट्रपति के आदेश से।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति | यह न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को सुचारु बनाए रखने और लंबित मामलों को कम करने में सहायक है। |
| राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति | भारत के संविधान के तहत राष्ट्रपति को उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार प्राप्त है, जो न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। |
| मुख्य न्यायाधीश से परामर्श | नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से परामर्श अनिवार्य है, जो न्यायिक नियुक्तियों में विशेषज्ञ राय और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। |
| न्यायिक अधिकारी | इन नियुक्तियों में न्यायिक अधिकारियों को शामिल किया गया है, जिनके पास न्यायिक प्रणाली का अनुभव होता है, जिससे न्याय वितरण में गुणवत्ता आती है। |
| विभिन्न उच्च न्यायालयों में नियुक्ति | दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, झारखंड और कर्नाटक जैसे विभिन्न उच्च न्यायालयों में नियुक्तियाँ क्षेत्रीय न्यायपालिका को मजबूत करती हैं। |
महत्व
न्यायिक प्रशासन
- उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से रिक्त पदों को भरने में मदद मिलती है, जिससे न्यायिक कार्यप्रणाली की दक्षता बढ़ती है।
- यह लंबित मामलों के बोझ को कम करने में सहायक है, जिससे नागरिकों को समय पर न्याय मिल पाता है।
- न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या न्यायपालिका पर जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
संवैधानिक प्रक्रिया
- यह नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 217 और 224 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करती है, जो संवैधानिक प्रावधानों के सम्मान को दर्शाती है।
- राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की गई नियुक्तियाँ न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यपालिका के बीच संतुलन स्थापित करती हैं।
शासन और विधि का शासन
- न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या विधि के शासन (Rule of Law) को बनाए रखने और सुशासन (Good Governance) सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
- यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को प्रभावी ढंग से संचालित करने में मदद करता है।
चुनौतियाँ
1. न्यायिक रिक्तियाँ
- उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद अक्सर रिक्त रहते हैं, जिससे न्यायपालिका पर अत्यधिक कार्यभार पड़ता है।
- रिक्तियों के कारण मामलों के निपटान में देरी होती है, जिससे न्याय की अवधारणा प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय न्यायपालिका; न्यायिक सुधार
2. नियुक्ति प्रक्रिया की जटिलता
- न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में लगने वाला समय और इसमें शामिल विभिन्न हितधारकों के कारण प्रक्रिया जटिल हो जाती है।
- कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक नियुक्तियाँ; कॉलेजियम प्रणाली
3. न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात
- भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या विकसित देशों की तुलना में काफी कम है, जिससे न्याय वितरण पर दबाव पड़ता है।
- यह अनुपात न्यायिक प्रणाली की क्षमता को सीमित करता है और न्याय तक पहुंच को प्रभावित करता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक क्षमता; न्याय तक पहुंच
4. न्यायिक विलंब
- न्यायिक रिक्तियों और अन्य संरचनात्मक मुद्दों के कारण बड़ी संख्या में मामले लंबित रहते हैं, जिससे न्याय में विलंब होता है।
- यह विलंब नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करता है और न्यायिक प्रणाली में विश्वास को कमजोर कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: लंबित मामले; न्याय में देरी
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| न्यायिक रिक्तियों का उच्च स्तर | न्यायपालिका पर अत्यधिक कार्यभार और लंबित मामलों में वृद्धि। |
| न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया में देरी | रिक्त पदों को भरने में लंबा समय लगना, जिससे न्यायिक कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। |
| कॉलेजियम प्रणाली पर बहस | पारदर्शिता और जवाबदेही से संबंधित चिंताएँ, जो न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती हैं। |
| न्यायाधीशों की कमी | जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की अपर्याप्त संख्या, जिससे न्याय तक पहुंच सीमित होती है। |
| न्याय में विलंब | मामलों के निपटान में लगने वाला अत्यधिक समय, जिससे नागरिकों का न्यायपालिका पर विश्वास कम हो सकता है। |
आगे की राह
- न्यायिक रिक्तियों को भरने के लिए एक समयबद्ध और पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित की जानी चाहिए।
- कॉलेजियम प्रणाली में सुधार कर इसे अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, जिसमें कार्यपालिका की भूमिका को भी स्पष्ट किया जाए।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की जानी चाहिए ताकि न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात को बेहतर बनाया जा सके।
- न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
- न्यायिक प्रक्रिया को डिजिटलीकरण (Digitization) और प्रौद्योगिकी (Technology) के उपयोग से और अधिक कुशल बनाया जाना चाहिए।
- लंबित मामलों के त्वरित निपटान के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) तंत्रों को मजबूत किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
उच्च न्यायालय · न्यायाधीशों की नियुक्ति · भारत का संविधान · अनुच्छेद 217 · कॉलेजियम प्रणाली · न्यायिक स्वतंत्रता · कार्यपालिका की भूमिका · न्यायपालिका की भूमिका · मुख्य न्यायाधीश से परामर्श · न्यायिक जवाबदेही
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 217’: ‘उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति’}
- {‘अनुच्छेद 224’: ‘अपर और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
- {‘अनुच्छेद 124’: ‘उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद रिक्त होते हैं। → विधि एवं न्याय मंत्रालय रिक्तियों की पहचान करता है। → भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श किया जाता है। → राष्ट्रपति संविधान प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हैं। → न्यायाधीशों/अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है। → न्यायपालिका की कार्यक्षमता बढ़ती है और न्याय वितरण सुधरता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
2. एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में, उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
3. भारत के संविधान के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में, उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की जाती है। कथन 2 सही है क्योंकि यह अनुच्छेद 217 में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। कथन 3 गलत है। संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए कोई न्यूनतम आयु निर्धारित नहीं की गई है, बल्कि योग्यताएं निर्धारित की गई हैं।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है?
- अनुच्छेद 124
- अनुच्छेद 214
- अनुच्छेद 217
- अनुच्छेद 226
उत्तर: अनुच्छेद 217 — अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके पद की शर्तों से संबंधित है। अनुच्छेद 124 उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है, अनुच्छेद 214 बताता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा, और अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या यह प्रक्रिया न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच उचित संतुलन स्थापित करती है? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया (अनुच्छेद 217) का उल्लेख करें। कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) की उत्पत्ति और विकास (द्वितीय न्यायाधीश मामला, तृतीय न्यायाधीश मामला) पर चर्चा करें। इस प्रणाली के लाभों (न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा) और कमियों (पारदर्शिता की कमी, भाई-भतीजावाद के आरोप, जवाबदेही का अभाव) का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के गठन और उच्चतम न्यायालय द्वारा इसे असंवैधानिक घोषित करने के निर्णय (चौथा न्यायाधीश मामला) का उल्लेख करें। न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए आवश्यक सुधारों पर सुझाव दें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Jharkhand PCS (JPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: झारखंड उच्च न्यायालय में हाल ही में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए न्यायाधीशों की संख्या कितनी है?
- 1
- 2
- 3
- 4
उत्तर: 1 — झारखंड उच्च न्यायालय में राष्ट्रपति द्वारा हाल ही में 1 न्यायाधीश और 1 अपर न्यायाधीश सहित कुल 2 न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की गई है।
Mains: झारखंड उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में राज्यपाल और राष्ट्रपति की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। साथ ही, झारखंड उच्च न्यायालय के इतिहास और इसकी स्थापना के संदर्भ में इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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