एनजीटी ने आगरा के प्रदूषित तालाबों पर 10 सप्ताह में रिपोर्ट मांगी, अतिक्रमण हटाने के निर्देश

आगरा के तालाब-पोखरों पर एनजीटी सख्त: अतिक्रमण और प्रदूषण की होगी जांच, 10 हफ्ते में मांगी रिपोर्ट — labelled illustration

एनजीटी ने आगरा के प्रदूषित तालाबों पर 10 सप्ताह में रिपोर्ट मांगी, अतिक्रमण हटाने के निर्देश

✎ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के त्वरित तथा प्रभावी निपटान के लिए स्थापित एक विशेष न्यायिक निकाय है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, पारदर्शिता एवं जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष, विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय  |  GS Paper III — पर्यावरण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन
  • Prelims: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, जल प्रदूषण, अतिक्रमण, आर्द्रभूमि संरक्षण, पर्यावरण न्याय
  • Essay: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास: चुनौतियाँ एवं समाधान, न्यायिक सक्रियता और पर्यावरण शासन

त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के त्वरित तथा प्रभावी निपटान के लिए स्थापित एक विशेष न्यायिक निकाय है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने आगरा जिले में तालाबों, पोखरों और झीलों के अतिक्रमण तथा प्रदूषण से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए एक संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति जल निकायों के वास्तविक क्षेत्रफल, अतिक्रमण की स्थिति और प्रदूषण के स्तर की जांच कर 10 सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। इस कदम का उद्देश्य इन महत्वपूर्ण जल स्रोतों का संरक्षण और जीर्णोद्धार सुनिश्चित करना है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में जल निकाय, विशेषकर तालाब और झीलें, सिंचाई, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • शहरीकरण, औद्योगीकरण और कृषि विस्तार के कारण इन जल निकायों पर अतिक्रमण और प्रदूषण का खतरा बढ़ गया है।
  • अवैध निर्माण, ठोस अपशिष्ट डंपिंग और अनुपचारित सीवेज का निर्वहन जल निकायों के पारिस्थितिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए स्थापित किया गया है।
  • NGT को पर्यावरण से संबंधित कानूनी अधिकारों को लागू करने और व्यक्तियों तथा संपत्तियों को हुए नुकसान के लिए राहत एवं मुआवजा प्रदान करने का अधिकार है।
  • अधिकरण पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974, वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 सहित विभिन्न पर्यावरण कानूनों के तहत मामलों की सुनवाई करता है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) क्या है?

  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) की स्थापना 18 अक्टूबर, 2010 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी।
  • इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों का प्रभावी और शीघ्र निपटान करना है।
  • NGT एक विशेष न्यायिक निकाय है जो पर्यावरण संबंधी विवादों को बहु-अनुशासनात्मक विशेषज्ञता के साथ निपटाता है।
  • यह पर्यावरण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन और व्यक्तियों तथा संपत्तियों को हुए नुकसान के लिए राहत एवं मुआवजा प्रदान करने के लिए भी जिम्मेदार है।
  • NGT का मुख्यालय नई दिल्ली में है और इसके भोपाल, पुणे, कोलकाता तथा चेन्नई में चार क्षेत्रीय कार्यालय हैं।
  • अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से बाध्य नहीं है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होता है।
  • NGT के आदेशों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
  • यह भारत को एक विशेष पर्यावरण न्यायाधिकरण स्थापित करने वाला दुनिया का तीसरा देश बनाता है, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
एनजीटी का हस्तक्षेप पर्यावरण संरक्षण और जल निकायों के अतिक्रमण एवं प्रदूषण पर न्यायिक सक्रियता को दर्शाता है।
संयुक्त समिति का गठन विभिन्न सरकारी विभागों (प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण विभाग, TTZ, जिलाधिकारी) के समन्वय से समस्या के समाधान का प्रयास।
राजस्व अभिलेखों से मिलान जल निकायों के वास्तविक क्षेत्रफल का पता लगाने और अतिक्रमण की पहचान करने में सहायक।
पानी के नमूनों की जांच जल निकायों में प्रदूषण के स्तर और प्रकार का वैज्ञानिक मूल्यांकन।
10 सप्ताह में रिपोर्ट समस्या के त्वरित समाधान और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम।

महत्व

पर्यावरण और पारिस्थितिकी

  • तालाबों और पोखरों का संरक्षण स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) और जैव विविधता (Biodiversity) के केंद्र होते हैं।
  • जल निकायों का प्रदूषण जल-जनित बीमारियों का कारण बन सकता है और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

शासन और प्रशासन

  • एनजीटी (NGT) का यह निर्देश स्थानीय प्रशासन को जल निकायों के संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए प्रेरित करेगा।
  • अतिक्रमण हटाने और प्रदूषण रोकने के लिए अंतर-विभागीय समन्वय (Inter-departmental Coordination) की आवश्यकता पर बल देता है।

सामाजिक और आर्थिक

  • स्वच्छ जल निकायों की उपलब्धता ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है।
  • जल निकायों का अतिक्रमण भूमि उपयोग पैटर्न को बदलता है और शहरी नियोजन (Urban Planning) के लिए चुनौतियां पैदा करता है।

चुनौतियाँ

1. अतिक्रमण हटाना

  • अतिक्रमण हटाने में राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्थानीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है।
  • अतिक्रमणकारियों के पुनर्वास और कानूनी प्रक्रियाओं में जटिलताएं आ सकती हैं।

2. प्रदूषण नियंत्रण

  • घरेलू सीवेज और औद्योगिक अपशिष्टों के अनियंत्रित निर्वहन को रोकना एक बड़ी चुनौती है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) और अपशिष्ट जल उपचार (Wastewater Treatment) सुविधाओं की कमी।

3. राजस्व अभिलेखों का अद्यतन

  • पुराने और त्रुटिपूर्ण राजस्व अभिलेखों के कारण वास्तविक स्थिति का पता लगाना मुश्किल हो सकता है।
  • डिजिटलीकरण और भूमि सर्वेक्षण में देरी।

4. निगरानी और प्रवर्तन

  • समिति की रिपोर्ट के बाद भी, दीर्घकालिक निगरानी और निर्देशों का प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
  • पर्याप्त मानव संसाधन और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जल निकायों पर अतिक्रमण जल निकायों का सिकुड़ना, भूजल स्तर में गिरावट और पारिस्थितिक असंतुलन।
घरेलू सीवेज का निर्वहन जल प्रदूषण, ऑक्सीजन की कमी, जलीय जीवन को खतरा और दुर्गंध।
कूड़ा डालना जल निकायों का अवरुद्ध होना, प्लास्टिक प्रदूषण और जल गुणवत्ता में गिरावट।
राजस्व अभिलेखों में विसंगतियां अतिक्रमण की पहचान में बाधा और कानूनी विवादों का जन्म।
अंतर-विभागीय समन्वय का अभाव समस्या के समाधान में देरी और प्रभावी कार्रवाई की कमी।

आगे की राह

  • समिति की रिपोर्ट के आधार पर अतिक्रमणकारियों की पहचान कर नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
  • शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों (Wastewater Treatment Plants) का निर्माण और उनका प्रभावी संचालन सुनिश्चित किया जाए।
  • ठोस अपशिष्ट के उचित प्रबंधन के लिए डोर-टू-डोर संग्रह और प्रसंस्करण सुविधाओं को मजबूत किया जाए।
  • राजस्व अभिलेखों का डिजिटलीकरण और नियमित अद्यतन (Updation) किया जाए ताकि जल निकायों की सीमाओं का स्पष्ट निर्धारण हो सके।
  • जन जागरूकता अभियान चलाकर स्थानीय समुदायों को जल निकायों के संरक्षण में शामिल किया जाए।
  • जल निकायों के जीर्णोद्धार (Restoration) और पुनरुद्धार (Rejuvenation) के लिए विशेष परियोजनाएं शुरू की जाएं।
  • पर्यावरण नियमों के उल्लंघन पर त्वरित और प्रभावी न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) · जल निकाय संरक्षण · अतिक्रमण · प्रदूषण नियंत्रण · पर्यावरण संरक्षण अधिनियम · न्यायिक सक्रियता · सतत विकास · स्थानीय स्वशासन · राजस्व अभिलेख · संयुक्त समिति

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘राज्य द्वारा पर्यावरण संरक्षण का दायित्व’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘नागरिकों का पर्यावरण संरक्षण कर्तव्य’}

अवधारणा प्रवाह

जल निकायों पर अतिक्रमण और प्रदूषण  →  नागरिक द्वारा एनजीटी में याचिका दायर  →  एनजीटी द्वारा संयुक्त समिति का गठन  →  समिति द्वारा जांच और रिपोर्ट प्रस्तुत करना  →  एनजीटी द्वारा आगे की कार्रवाई के निर्देश  →  स्थानीय प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाना और प्रदूषण नियंत्रण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत की गई थी।
2. NGT को पर्यावरण से संबंधित मामलों में त्वरित न्याय प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है।
3. NGT के पास सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत निर्धारित प्रक्रिया से बंधे होने की आवश्यकता नहीं है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी, न कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत। कथन 2 और 3 सही हैं। NGT का उद्देश्य पर्यावरण संबंधी मामलों का त्वरित निपटान करना है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करता है, सिविल प्रक्रिया संहिता से बंधा नहीं है।

Q2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?

  1. NGT के अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है।
  2. NGT के पास पर्यावरण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन का अधिकार है।
  3. NGT केवल उन मामलों की सुनवाई कर सकता है जो सीधे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 से संबंधित हैं।
  4. NGT के निर्णयों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

उत्तर: NGT केवल उन मामलों की सुनवाई कर सकता है जो सीधे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 से संबंधित हैं। — NGT केवल पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 से संबंधित मामलों तक सीमित नहीं है। यह जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974; वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981; जैव विविधता अधिनियम, 2002 जैसे अन्य पर्यावरण संबंधी कानूनों के तहत भी मामलों की सुनवाई करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण और जल निकायों के अतिक्रमण को रोकने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस संदर्भ में, NGT की शक्तियों और कार्यों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना, उद्देश्य (त्वरित पर्यावरण न्याय) और इसके महत्व का संक्षिप्त परिचय।
2. NGT की शक्तियाँ: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत प्राप्त शक्तियाँ जैसे कि सिविल प्रक्रिया संहिता से बाध्य न होना, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन, क्षतिपूर्ति और बहाली के आदेश देने की शक्ति।
3. NGT के कार्य: पर्यावरण संबंधी विवादों का निपटारा, पर्यावरण कानूनों का प्रवर्तन, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण, सतत विकास को बढ़ावा देना। आगरा के तालाबों के मामले का उदाहरण।
4. आलोचनात्मक परीक्षण (सकारात्मक पहलू): पर्यावरण न्याय तक पहुँच में सुधार, त्वरित निपटान, विशेषज्ञता-आधारित निर्णय, न्यायिक सक्रियता के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण में योगदान।
5. आलोचनात्मक परीक्षण (चुनौतियाँ/सीमाएँ): निर्णयों के प्रवर्तन में चुनौतियाँ, अपर्याप्त जनशक्ति और वित्तीय संसाधन, अधिकार क्षेत्र संबंधी मुद्दे, राज्य सरकारों के साथ समन्वय की कमी।
6. निष्कर्ष: NGT की भूमिका का सारांश, इसकी प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए सुझाव और भारत में पर्यावरण शासन के लिए इसका महत्व।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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