23 Sep महिलाओं के पास डिग्रियाँ, गोल्ड मेडल, फिर भी नौकरी में क्यों नहीं? राष्ट्रपति मुर्मू का सवाल
✎ राष्ट्रपति ने महिलाओं की अकादमिक सफलता और कार्यबल में उनकी भागीदारी के बीच के अंतर को रेखांकित किया, यह स्वीकार करते हुए कि बच्चों का पालन-पोषण भी राष्ट्र निर्माण में एक महत्वपूर्ण योगदान है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय समाज, महिलाओं की भूमिका | GS Paper II — सामाजिक न्याय, मानव संसाधन | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था, समावेशन
- Prelims: महिला कार्यबल भागीदारी दर (FWPR), श्रम शक्ति भागीदारी दर (LFPR), सकल नामांकन अनुपात (GER), महिला सशक्तिकरण, जनसांख्यिकीय लाभांश, कौशल विकास
- Essay: भारत के विकास में महिलाओं की भूमिका: शिक्षा से कार्यबल तक, जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग: महिला सशक्तिकरण की अनिवार्यता
त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रपति ने महिलाओं की अकादमिक सफलता और कार्यबल में उनकी भागीदारी के बीच के अंतर को रेखांकित किया, यह स्वीकार करते हुए कि बच्चों का पालन-पोषण भी राष्ट्र निर्माण में एक महत्वपूर्ण योगदान है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, वडोदरा के 75वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए महिलाओं की अकादमिक उपलब्धियों और कार्यबल में उनकी भागीदारी के बीच के अंतर पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डिग्रियां और स्वर्ण पदक जीतने वाली महिलाओं की बढ़ती संख्या का मतलब यह नहीं है कि कार्यबल में उनकी भागीदारी भी बढ़ रही है, क्योंकि कई महिलाएं बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रही हैं।
पृष्ठभूमि
- भारत में महिलाओं की शिक्षा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जैसा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्राओं की बढ़ती संख्या और स्वर्ण पदक विजेताओं में उनकी अधिकता से स्पष्ट होता है।
- पारंपरिक सामाजिक मानदंड और घरेलू जिम्मेदारियां अक्सर महिलाओं को औपचारिक कार्यबल से बाहर रहने या छोड़ने के लिए प्रेरित करती हैं।
महिला कार्यबल भागीदारी और इसके निहितार्थ
- महिला कार्यबल भागीदारी दर (FLFPR) कुल कामकाजी आयु वर्ग की महिलाओं में से उन महिलाओं का प्रतिशत है जो या तो कार्यरत हैं या सक्रिय रूप से काम की तलाश में हैं।
- भारत में FLFPR ऐतिहासिक रूप से कम रहा है, हालांकि हाल के वर्षों में इसमें कुछ सुधार देखा गया है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
- कम FLFPR के कई कारण हैं, जिनमें शिक्षा के बाद विवाह और मातृत्व के कारण कार्यबल छोड़ना, परिवार की देखभाल की जिम्मेदारियां, सुरक्षित परिवहन की कमी, और कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव शामिल हैं।
- महिलाओं की कार्यबल में कम भागीदारी देश की आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) और जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का पूर्ण लाभ उठाने में बाधा डालती है।
- कार्यबल में महिलाओं की अधिक भागीदारी से न केवल व्यक्तिगत आय बढ़ती है, बल्कि घरेलू क्रय शक्ति में वृद्धि होती है, गरीबी कम होती है और आर्थिक असमानता घटती है।
- यह लैंगिक समानता (Gender Equality) और महिला सशक्तिकरण के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिससे उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अधिक स्वायत्तता मिलती है।
- राष्ट्रपति के विचारों ने इस बात पर जोर दिया है कि घर पर बच्चों का पालन-पोषण और शिक्षा भी राष्ट्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण कार्य है, जो महिलाओं के अदृश्य योगदान को मान्यता देता है।
- नीति निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे ऐसी नीतियां बनाएं जो महिलाओं को शिक्षा के बाद औपचारिक कार्यबल में शामिल होने और बने रहने के लिए प्रोत्साहित करें, साथ ही उनके घरेलू योगदान को भी महत्व दें।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| शैक्षणिक उपलब्धियों में लैंगिक समानता | यह समावेशी विकास (Inclusive Development) की दिशा में देश के बढ़ते कदम का संकेत है। |
| कार्यबल में महिलाओं की कम भागीदारी | उच्च शैक्षणिक योग्यता के बावजूद, कई महिलाएं औपचारिक रोजगार से बाहर रहती हैं, जो मानव पूंजी के अप्रयुक्त क्षमता को दर्शाता है। |
| बच्चों के पालन-पोषण को राष्ट्र निर्माण में योगदान | राष्ट्रपति ने इस भूमिका को देश के विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में मान्यता दी है, जो सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव का सुझाव देता है। |
| उच्च शिक्षा संस्थानों में महिलाओं की बढ़ती संख्या | यह ‘बदलते भारत’ का प्रतीक है, जहाँ शिक्षा तक महिलाओं की पहुँच बढ़ रही है। |
| स्वर्ण पदक विजेताओं में महिलाओं की अधिकता | यह विभिन्न विषयों में महिलाओं की बौद्धिक क्षमता और उत्कृष्टता को दर्शाता है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण की दिशा में हुई प्रगति को उजागर करता है, जहाँ वे पुरुषों के बराबर या उनसे अधिक शैक्षणिक सफलता प्राप्त कर रही हैं।
- यह लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती देता है कि महिलाएं केवल कुछ ही क्षेत्रों में सफल हो सकती हैं, क्योंकि वे विभिन्न संकायों में उत्कृष्टता प्राप्त कर रही हैं।
- बच्चों के पालन-पोषण को राष्ट्र निर्माण के रूप में मान्यता देना महिलाओं के अदृश्य श्रम को मूल्य प्रदान करता है और सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव का संकेत देता है।
आर्थिक महत्व
- कार्यबल में महिलाओं की कम भागीदारी से देश की GDP (सकल घरेलू उत्पाद) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि यह मानव पूंजी का एक बड़ा हिस्सा अप्रयुक्त रहता है।
- महिलाओं की उच्च शैक्षणिक योग्यता के बावजूद कार्यबल से बाहर रहना आर्थिक असमानता को बढ़ा सकता है और आय के अवसरों को सीमित कर सकता है।
- महिलाओं की कार्यबल में बढ़ती भागीदारी से आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा मिल सकता है और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो सकती है।
शासन और नीतिगत महत्व
- यह सरकार के लिए ऐसी नीतियां बनाने की आवश्यकता पर बल देता है जो महिलाओं को शिक्षा के साथ-साथ कार्यबल में भी सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
- यह महिला-केंद्रित योजनाओं और कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने और उनमें सुधार करने की आवश्यकता को दर्शाता है, ताकि शैक्षणिक उपलब्धियों को आर्थिक भागीदारी में बदला जा सके।
- यह कार्यस्थल पर लैंगिक समानता और समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए कानूनों और विनियमों को मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
चुनौतियाँ
1. कार्यबल में महिलाओं की कम भागीदारी
- उच्च शैक्षणिक योग्यता के बावजूद, कई महिलाएं औपचारिक रोजगार में शामिल नहीं हो पाती हैं या बीच में ही छोड़ देती हैं।
- यह देश की मानव पूंजी का एक बड़ा हिस्सा अप्रयुक्त छोड़ देता है, जिससे आर्थिक संवृद्धि बाधित होती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, भारतीय अर्थव्यवस्था
2. लैंगिक वेतन असमानता और भेदभाव
- महिलाओं को अक्सर पुरुषों की तुलना में समान काम के लिए कम वेतन मिलता है, और उन्हें पदोन्नति के अवसरों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
- यह महिलाओं को कार्यबल में बने रहने से हतोत्साहित करता है और उनकी आर्थिक स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, भारतीय अर्थव्यवस्था
3. पारिवारिक और सामाजिक दबाव
- महिलाओं पर अक्सर बच्चों के पालन-पोषण और घरेलू जिम्मेदारियों का प्राथमिक बोझ होता है, जिससे उनके लिए करियर और परिवार के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है।
- सामाजिक मानदंड और अपेक्षाएं भी महिलाओं को घर पर रहने के लिए प्रेरित करती हैं, भले ही उनके पास उच्च शिक्षा हो।
यूपीएससी लिंक: भारतीय समाज, सामाजिक न्याय
4. सुरक्षित कार्य वातावरण का अभाव
- कई कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए सुरक्षित और सहायक वातावरण का अभाव होता है, जिसमें यौन उत्पीड़न और भेदभाव शामिल है।
- यह महिलाओं को कार्यबल में शामिल होने या बने रहने से रोकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, शासन
5. कौशल अंतर और प्रशिक्षण की कमी
- कुछ क्षेत्रों में महिलाओं के पास आवश्यक कौशल या प्रशिक्षण की कमी हो सकती है, जिससे उन्हें रोजगार के अवसर प्राप्त करने में बाधा आती है।
- तकनीकी और इंजीनियरिंग जैसे कुछ क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अभी भी कम है।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन, कौशल विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| शैक्षणिक उपलब्धि बनाम कार्यबल भागीदारी | उच्च शिक्षा और स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद, महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी कम है, जो मानव पूंजी के अप्रयुक्त क्षमता को दर्शाता है। |
| घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ | बच्चों के पालन-पोषण और घरेलू कार्यों का प्राथमिक बोझ अक्सर महिलाओं पर पड़ता है, जिससे उनके लिए औपचारिक रोजगार में शामिल होना या बने रहना मुश्किल हो जाता है। |
| लैंगिक रूढ़िवादिता | सामाजिक अपेक्षाएं और रूढ़िवादिता महिलाओं को कुछ भूमिकाओं तक सीमित करती हैं, जिससे उनके करियर के विकल्प प्रभावित होते हैं। |
| सुरक्षित और सहायक कार्य वातावरण का अभाव | कार्यस्थलों पर सुरक्षा, लैंगिक संवेदनशीलता और सहायक नीतियों की कमी महिलाओं को कार्यबल से दूर रखती है। |
| नीतिगत अंतराल | मौजूदा नीतियां शैक्षणिक सफलता को कार्यबल भागीदारी में बदलने में पूरी तरह से प्रभावी नहीं हो पा रही हैं। |
आगे की राह
- महिलाओं के लिए लचीले कार्य घंटे, दूरस्थ कार्य विकल्प और बाल देखभाल सुविधाओं सहित परिवार-अनुकूल नीतियों को बढ़ावा देना।
- STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम और छात्रवृत्तियां शुरू करना।
- महिलाओं के लिए कौशल विकास (Skill Development) और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मजबूत करना, ताकि उन्हें उभरते उद्योगों में रोजगार के लिए तैयार किया जा सके।
- कार्यस्थलों पर लैंगिक समानता, सुरक्षित वातावरण और यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए कानूनों को सख्ती से लागू करना।
- सामाजिक मानदंडों और रूढ़ियों को बदलने के लिए जागरूकता अभियान चलाना जो महिलाओं को केवल घरेलू भूमिकाओं तक सीमित करते हैं।
- महिला उद्यमियों को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और परामर्श प्रदान करके उद्यमशीलता (Entrepreneurship) को बढ़ावा देना।
- सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में नेतृत्व के पदों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई और आरक्षण नीतियों पर विचार करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
महिला श्रम शक्ति भागीदारी · लैंगिक समानता · समावेशी विकास · मानव पूंजी · जनसांख्यिकीय लाभांश · कौशल विकास · बाल देखभाल अवसंरचना · सामाजिक मानदंड · आर्थिक सशक्तिकरण · शिक्षा और रोजगार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘भेदभाव का निषेध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 16’, ‘note’: ‘सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 39(a)’, ‘note’: ‘आजीविका के पर्याप्त साधन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 39(d)’, ‘note’: ‘समान काम के लिए समान वेतन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 42’, ‘note’: ‘काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियाँ तथा मातृत्व राहत’}
अवधारणा प्रवाह
उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी → शैक्षणिक उपलब्धियों में लैंगिक समानता → कार्यबल में महिलाओं की कम भागीदारी → मानव पूंजी का अप्रयुक्त रहना → आर्थिक संवृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव → सामाजिक-आर्थिक असमानता का बढ़ना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर (Female Labour Force Participation Rate) पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है।
2. परिवार के भीतर बच्चों की देखभाल और पालन-पोषण को देश के विकास में योगदान के रूप में मान्यता दी जा सकती है।
3. शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी सीधे तौर पर कार्यबल में उनकी उच्च भागीदारी में परिणत होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 गलत है। भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर में उतार-चढ़ाव देखा गया है और यह वैश्विक औसत से कम है, हालांकि हाल के कुछ वर्षों में इसमें मामूली वृद्धि देखी गई है। कथन 2 सही है। राष्ट्रपति के बयान के अनुसार, बच्चों का पालन-पोषण भी राष्ट्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कथन 3 गलत है। राष्ट्रपति के बयान के अनुसार, उच्च शैक्षणिक उपलब्धियों के बावजूद कई महिलाएं औपचारिक कार्यबल से बाहर रहती हैं, जो इस बात का संकेत है कि शिक्षा में भागीदारी सीधे तौर पर कार्यबल में उच्च भागीदारी में नहीं बदलती है।
Q2. अभिकथन (A): भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
कारण (R): सामाजिक मानदंड और बाल देखभाल की जिम्मेदारियाँ अक्सर महिलाओं को औपचारिक कार्यबल में शामिल होने से रोकती हैं।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है। — अभिकथन (A) सत्य है, जैसा कि राष्ट्रपति के बयान में उल्लेख किया गया है कि महिलाएं डिग्री और स्वर्ण पदक प्राप्त करने में आगे हैं। कारण (R) भी सत्य है, क्योंकि ये कारक अक्सर महिलाओं की कार्यबल भागीदारी को प्रभावित करते हैं। हालांकि, R, A की सीधी व्याख्या नहीं है, बल्कि यह एक अलग चुनौती का वर्णन करता है जो महिलाओं की शैक्षणिक उपलब्धि के बावजूद कार्यबल में उनकी भागीदारी को प्रभावित करती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में महिलाओं की बढ़ती शैक्षणिक उपलब्धियों और कार्यबल में उनकी भागीदारी के बीच के अंतर का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस अंतर को कम करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में राष्ट्रपति के बयान का उल्लेख करते हुए समस्या को रेखांकित करें। मुख्य भाग में, महिलाओं की उच्च शैक्षणिक उपलब्धियों के आंकड़े प्रस्तुत करें (जैसे स्वर्ण पदक, डिग्री)। इसके बाद, कार्यबल में उनकी कम भागीदारी के कारणों का विश्लेषण करें, जिसमें सामाजिक मानदंड, बाल देखभाल की कमी, सुरक्षित कार्यस्थल का अभाव, कौशल बेमेल और अनौपचारिक क्षेत्र में अधिक भागीदारी जैसे कारक शामिल हों। सरकार द्वारा उठाए गए कदमों जैसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy), बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (Beti Bachao Beti Padhao), प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (Pradhan Mantri Kaushal Vikas Yojana), मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम (Maternity Benefit (Amendment) Act), राष्ट्रीय क्रेच योजना (National Creche Scheme) आदि का उल्लेख करें। अंत में, समावेशी विकास और जनसांख्यिकीय लाभांश के लिए इस अंतर को पाटने के महत्व पर बल देते हुए निष्कर्ष प्रस्तुत करें।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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